Prabhat Books
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संपादकीय

संपूर्ण विश्व के राम
वह 'थाई एयरवेज' की उड़ान थी, अर्थात् एक बौद्ध देश थाईलैंड की राष्ट्रीय एयरलाइंस; इस उड़ान में हर यात्री के लिए समाचार-पत्र, सुरक्षा संबंधी पत्रक के अतिरिक्त चित्रकथा के रूप में रामकथा भी रखी हुई थी। ...और आगे

प्रतिस्मृति

मेरे राम का मुकुट भीग रहा है
महीनों से मन बेहद-बेहद उदास है। उदासी की कोई खास वजह नहीं, कुछ तबीयत ढीली, कुछ आसपास के तनाव और कुछ उनसे टूटने का डर, खुले आकाश के नीचे भी खुलकर साँस लेने की जगह की कमी, जिस काम में लगकर मुक्ति पाना चाहता हूँ, उस काम में हजार बाधाएँ; कुल ले-देकर उदासी के लिए इतनी बड़ी चीज नहीं बनती। फिर भी रात-रात नींद नहीं आती। ...और आगे

कहानी

मन चातक हुआ मन चातक हुआ
''अरे, ऐसे माँजो नऽ यार!'' उसने मूठा भर पैर में पहले मिट्टी, फिर घड़ी डिटर्जेंट पाउडर लगाया, फिर पूरी ताकत से लोहे की बड़ी वाली कड़ाही झाँय-झाँय करके माँजने लगा। ...और आगे

आलेख

विज्ञानसम्मत भारतीय संवत्सर विज्ञानसम्मत भारतीय संवत्सर
समय का हिसाब रखना आज के मानव के लिए कोई कठिन कार्य नहीं है। छपे कलेंडर, हाथ में बँधी घड़ी, मोबाइल फोन, कंप्यूटर आदि अनेक साधन समय का हिसाब रखने में मनुष्य की मदद करने को तत्पर हैं। ...और आगे

लघुकथा

पावन संकल्प
नवदंपति घर में प्रवेश के लिए आतुर से गेट पर खड़े थे और वातावरण भी खुशियों से महक उठा था, मगर एकाएक, मम्मी-पापा नवदंपति के समीप पहुँचकर उन्होंने हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींचना चाहा। ...और आगे

कविता

बना भीम सरहद का रक्षक बना भीम सरहद का रक्षक
निशा-सुंदरी रजनी बाला तिमिरांगन की अद्भुत हाला हीरक हारों से भरा थाल ले कहाँ चली जाती हर रात और बेचकर हार रुपहले सुबह लौटती खाली हाथ पूरा थाल खरीदा मैंने चलो आज तुम मेरे साथ उस सरहद पर जहाँ पराक्रम दिखा रहा है अपने हाथ बना भीम सरहद का रक्षक रिपु की गरदन तोड़ रहा है, ...और आगे

रेखाचित्र

शीत-रात का अनुराग शीत-रात का अनुराग
रात के एक बजे ट्रेन ने पेंड्रा रोड स्टेशन पर उतारा। अनजाने मुझे और सुनील को शीत का आभास तब हुआ, जब हम प्लेटफॉर्म पर उतरे। कोच की गरमी में बाहर की ठंडक का थोड़ा भी अंदाजा हमें नहीं था। ...और आगे

राम झरोखे बैठ के

शिकारपुर के उत्पाती शिकारपुर के उत्पाती
हमारे छोटे शहर में इतनी इनसानी विविधता है कि दुनिया के सबसे बड़े चिड़ियाघर में क्या होगी? कोई विपन्न है, कोई संपन्न, शोषित, अपाहिज, पीड़ित, दलित, शक्तिशाली, निर्बल, कुबड़े, काने, हर तरह के मानवीयता के अजूबे उपलब्ध हैं। ...और आगे

ललित निबंध

भीलनी गाए गीत भीलनी गाए गीत
स्वर से सृजन हुआ। एक स्वर गूँजते हुए समूचे ब्रह्मांड में व्याप्त हो गया। समय की टेगरी पर रखे अंतरिक्ष के अँधियारे माठ से, स्वर बूँदों सा रिंझने लगा। रिंझते-रिंझते (टपकते-टपकते) सरगम के स्वर निकलने लगे। ...और आगे

व्यंग्य

गहरी निद्रा पैठ गहरी निद्रा पैठ
सवेरे पाँच बजे उठने वाले प्राणियों पर मुझे दया आती है। यह समय ब्रह्म मुहूर्त कहा गया है। इसमें ब्रह्मांड के मुख्य कार्यपालक ब्रह्माजी उठते हैं। उनके उठते ही मुर्गे बाँग देते हैं। ब्रह्माजी के चमचे इसे शुभ मुहूर्त समझते हैं। ...और आगे

साहित्य का भारतीय परिपार्श्व

कन्नड़ की चार कविताएँ कन्नड़ की चार कविताएँ
डूबता सूरज बूढ़े सिंह से होकर पश्चिम पर्वत की गुहा में दुबक रहा है, अपना सर्वाधिकार अंत होते-होते लोगों की ओर घूरकर देख रहा है! शाम के धुँधलके ने गगन सिंहासन पर काला झंडा उठाकर दिखाया है पक्षी संकुल एकत्र हो छुटकारे की खुशी में गाकर जय-जयकार कर रहा है। ...और आगे

साहित्य का विश्व परिपार्श्व

संकटों के बीच संकटों के बीच
सरल कविता है। इस कविता में ऐसा कुछ नहीं कि किसी भी तरह यह समझ में न आए। सभी शब्द सरल और प्रासंगिक हैं। कोई नई अवधारणा नहीं, न ही कोई सिद्धांत न ही भ्रमित करने वाला कोई विचार। ...और आगे

बाल-संसार

कौन था... कौन था...
गिलहरी उचककर पैरों पर खड़ी हो गई। बुदबुदाई, ''साँप, नेवला, खरगोश और मेढक एक साथ हैं! कोई तो वहाँ है।'' गिलहरी दबे पांव चलना जानती थी। वह वहाँ जा पहुँची, जहाँ सब थे। ...और आगे