Prabhat Books
Prabhat Books

दिसम्बर 2020

IS ANK MEN

More

संपादकीय

नए क्षितिज बुलाते हैं...
लेखिका की आक्रोश भरी शिकायत बिलकुल उचित थी। उन्होंने फौजियों के परिवारों को केंद्र में रखकर उपन्यास लिखा है। ...और आगे

प्रतिस्मृति

स्वर्ग और पृथ्वी
कल्पना ने आश्चर्य में भरकर वातायन के दोनों पट खोल दिए। सामने अनंत की सीमा को स्पर्श करता हुआ विशाल सागर लहरा रहा था। ...और आगे

कहानी

पोटेट की कीमत
"हेलो समीर, कहाँ हो? अच्छा जनाब अभी तक सो रहे हैं, अंकल-आंटी मंदिर चले गए तो पूरे दिन सोने की आजादी मिल गई।" ...और आगे

आलेख

भारत की सांस्कृतिक अस्मिता और जातीय सभ्यता की संवाहिका संस्कृत भारत की सांस्कृतिक अस्मिता और जातीय सभ्यता की संवाहिका संस्कृत
सदियों से संस्कृत भाषा भारत की राष्ट्रीय अस्मिता की आधारशिला व प्राणवायु रही है। ...और आगे

लघुकथा

ट्रेन में नशा
रवि कानपुर अपनी साली की पुत्री की शादी में गया था। शादी बहुत धूम-धाम के साथ संपन्न हुई। ...और आगे

कविता

चार गजलें चार गजलें
काम आती है हमारे उम्र भर मिट्टी। कह दिया बेकार चीजों को मगर मिट्टी। बीज पौधा बन सके यह है बड़ा मुश्किल है नहीं चारों तरफ उसके अगर मिट्टी। ...और आगे

राम झरोखे बैठ के

मौसम के बदलते संकेत
मौसम में बदलाव के संकेत स्पष्ट हैं। रोजमर्रा की सड़क फैशन प्रतियोगिता प्रारम्भ हो गई है। ...और आगे

स्‍मरण

लोक-जीवन की आस्थाओं की चितेरी नायिका
जिन्हें जिंदगी मुसकराती सी दिखती थी और जीवन सुंदर लगता था, वह मृदुलाजी अब नहीं रहीं, यह मानने को मन तैयार नहीं है। ...और आगे

व्यंग्य

तुम कब जाओगे, कोरोना!
कल मैं अपने गाँव के एक मित्र से फोन पर बात कर रहा था, तभी उसने मुझे सुझाव दिया कि मित्र, आप केवल कविता लिखते हो, कभी गद्य की विधा लेख आदि क्यों नहीं लिखते? ...और आगे

साहित्य का विश्व परिपार्श्व

कहना नहीं चाहते जो कहना नहीं चाहते जो
और ही कुछ देखते हैं जब चित्र कोई तो देखते हैं वह जो चित्र में नहीं है देखते हैं वह जो गैरहाजिर कोई और ही चित्र रचता सा। ...और आगे

साहित्य का विश्व परिपार्श्व

निर्वाचन
कुछ वर्ष पूर्व डेनबई नाम का एक भद्र पुरुष नगर के गंदगी भरे इलाके में रहने के लिए आया। ...और आगे

यात्रा-वृत्तांत

सोमनाथ मंदिर : दिव्यता कण-कण में व्याप्त है
गुजरात एक ऐसा राज्य है, जहाँ एक बार जाकर मन नहीं भरता। इसीलिए कई बार वहाँ जा चुकी हूँ। ...और आगे

बाल-कहानी

पानी रे पानी
विक्रम गरमी से बहुत परेशान था। उसका किसी भी काम में बिल्कुल मन नहीं लग रहा था। ...और आगे