Prabhat Books
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संपादकीय

श्री अटल बिहारी वाजपेयी : मेरी स्मृति में
श्री अटल बिहारी वाजपेयी का नाम सर्वप्रथम मैंने कानपुर में १९४६-४७ में संभवतः अक्तूबर अथवा नवंबर में एक मित्र से सुना था। ...और आगे

प्रतिस्मृति

कुछ कहना है कुछ कहना है
दिन जाते देर नहीं लगती। देखते-देखते ४२ वर्ष बीत गए। फिर भी लगता है, जैसे कल ही की बात हो। वह १९५७ का साल था। लोकसभा का दूसरा आम चुनाव होने जा रहा था। ...और आगे

भाषण

विदेश नीति में अंतरराष्ट्रीयता का अतिरेक
उपाध्यक्ष महोदय, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि पिछले दस वर्षों में हमने जिस विदेश नीति का अवलंबन किया है, उसके कारण संसार में भारत की प्रतिष्ठा बढ़ी है। ...और आगे

साक्षात्कार

पाञ्चजन्य के प्रश्न, अटलजी के कालजयी उत्तर
मुसलिम समुदाय का बड़ी संख्या में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ संवाद और भाजपा के साथ जुड़ाव दिखने लगा है। अभी तक राष्ट्रभावी विचारधारा के विरोधी यह कहते थे कि चाहे कुछ भी हो जाए, पर मुसलिम समाज इस विचारधारा और इससे जुडे़ संगठनों के निकट नहीं आएगा। इस बदलाव के पीछे आप क्या कारण मानते हैं? ...और आगे

संस्मरण

मेरे अटलजी मेरे अटलजी
(प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की कलम से पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयीजी को भावपूर्ण श्रद्धांजलि) ...और आगे

आलेख

एक कवि-हृदय राजनेता एक कवि-हृदय राजनेता
टूटे हुए सपने की सुने कौन सिसकी? अंतर को चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी। हार नहीं मानूँगा, रार नई ठानूँगा। काल के कपाल पर लिखता-मिटाता हूँ। गीत नया गाता हूँ। ...और आगे

कविता

सच्ची श्रद्धांजलि
श्रीवाजपेयी अब नहीं रहे। संपूर्ण देश ने उन्हें अश्रुपूरित नेत्रों से अंतिम बिदाई दी। ...और आगे

राम झरोखे बैठ के

देश के झूठेश्वर के साधक देश के झूठेश्वर के साधक
कुछ आदतें हैं, जो जिंदगी भर इनसान का पीछा नहीं छोड़ती हैं। कोई शराब का लतियल है, कोई सिगरेट का तो कोई स्मार्ट फोन का। फोन कान में लगाए कई बस का शिकार हुए हैं तो कइयों को ट्रेन ने कुचला है। ...और आगे