पिता के संस्कार और शिक्षा के कारण पुत्र भी घर को एक मंदिर ही मानता था। इसलिए वक्त के साथ राहुल ने पिता की बात मान शादी कर ली। कुछ साल बाद ही दो कन्हैया भी घर पधार गए। परिवार आगे बढ़ता रहा। बच्चों की किलकारियों से पूरा घर खुशियों से गूँजता।
बच्चे भी परिवार का खास खयाल रखते। सामान्य शिक्षाओं तक तो वे साथ रहे। मगर आधुनिक चलन के अनुसार उच्च शिक्षा के लिए दोनों ही बच्चे अपने शहर से दूर चले गए। जिससे राहुल को दु:ख तो हुआ, लेकिन अच्छे भविष्य के लिए बच्चे की इच्छा देख वह मौन ही रह गया। वैसे तो सबकुछ ठीक ही चल रहा था। बच्चे भी छुट्टियों में अपने घर आ जाते, जिससे पूरा परिवार प्यार के सूत्र में बँधा रहता। अब उनकी नौकरी भी वहीं लग गई।
अचानक एक बार राहुल की पत्नी सुनैना की तबीयत बिगड़ी। उसने बच्चों को देखने की इच्छा जाहिर की, लेकिन वक्त ने साथ नहीं दिया। दोनों में से किसी एक को भी अवकाश न मिल पाया, जिससे राहुल को बहुत दु:ख हुआ। वहीं बार-बार सुनैना के पूछे जाने पर उसने फटकारते हुए कहा, ‘मैं हूँ न तुम्हारे पास, तो किसी और की क्या जरूरत।’
दो पल सुनैना मौन रही, फिर बोली, ‘लेकिन बच्चे भी तो हमारे...।’
‘सुनैना सब मोह-माया है, ये रिश्ते-नाते सबकुछ...मत सोचो, जब उन्हें वक्त होगा तो वह स्वयं ही आ जाएँगे। और इस कलियुग में यदि खुश रहना चाहो तो सिर्फ अपने आप को अपना साथी बनाओ। किसी से कोई अपेक्षा मत करो और करो भी तो उतनी ही करो, जितनी पूरी हो सके, क्योंकि आज बिना जरूरत के कोई साथ नहीं।’
वह अपनी बात कहने लगा, मैं तो अपने रिश्ते से पूरी तरह संतुष्ट हूँ। सुनैना मौन हो सबकुछ सुनती रही। गला रुद्धकर बोली, ‘हमारे बच्चे...!’
तुम्हारी एक आह में मैं हाजिर हो जाता हूँ, फिर इतनी चिंता क्यों? कहा न, सब मोह-माया है! किसी की नजरों में अपनी अहमियत बनाना चाहती हो तो उसकी जरूरत बनो। तभी वह आपको चाहेगा। चाहे वह कोई भी रिश्ता हो, सुनैना। वह दिल में दर्द छुपाए राहुल के कंधे से लिपट गई।
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