मेरी दीवाली तो आज ही है

मेरी दीवाली तो आज ही है

बाल-संसार
उसका नाम था लावनी। छोटी, बहुत छोटी थी लावनी। होगी कोई सात-आठ बरस की।...और आगे

निमाड़ की पारंपरिक दीवाली

लोक-साहित्य
पर्व और उत्सवों की प्रकृति नदी के जल जैसी होती है, वे कुछ पीछे छोड़ते हैं,...और आगे

समर्पित मित्र

साहित्य का विश्व परिपार्श्व
बहुत दिन हुए, हांस नाम का एक साधारण परंतु ईमानदार व्यक्ति था। वह कोई बहुत प्रसिद्ध व्यक्ति नहीं था...और आगे

अंतरगंगी

साहित्य का भारतीय परिपार्श्व
अटारी पर मेरा कमरा है। एक पलंग, एक कुरसी, एक टेबल है।...और आगे
हे उलूकवाहिनी! बरसो छप्पर फाड़ के

हे उलूकवाहिनी! बरसो छप्पर फाड़ के

व्यंग्य
इधर जब से सुना है कि लक्ष्मी जब भी बरसती है तो छप्पर फाड़ के बरसती है, मैं सतर्क हो गया हूँ...और आगे
त्योहारों की परिधि में लोक-संस्कृति की ज्योति

त्योहारों की परिधि में लोक-संस्कृति की ज्योति

ललित निबंध
मानव जीवन में सबसे विशिष्ट और तेज गति से खत्म होती चीज है वक्त। ...और आगे
मौसम के रंग

मौसम के रंग

राम झरोखे बैठ के
मौसम की भी विविधता है भारत में, जैसे खान-पान, पहनावे और भाषा की। ...और आगे
मनुष्य नहीं हुआ पुराना

मनुष्य नहीं हुआ पुराना

निबंध
अरस्तू ने सदियों पहले कहा था कि जितना सोचा जा सकता था, वह सोचा जा चुका। तब फिर आज क्या हो रहा है?...और आगे
हुकुम का गुलाम

हुकुम का गुलाम

कविता
राधे मेरी बाँसुरी जब से तुम मथुरा गए मेरे प्राण पथ पर प्रतीक्षारत आँख की पलकें पथरा गईं पर तुम नहीं लौटे शापित तो नहीं किया था ...और आगे

एकमात्र दिवस

लघुकथा
महिला दिवस पर कुछ परिचित साहित्यकारों ने मुझे बधाई देने के लिए फोन किए।...और आगे
दीपों का त्योहार दीवाली

दीपों का त्योहार दीवाली

आलेख
शरद ऋतु अपने आप में सर्वाधिक सुखद होती है। शरद ऋतु का सौंदर्य श्री का सौंदर्य है।...और आगे
ईशरदास की वसीयत

ईशरदास की वसीयत

कहानी
ईशरदास मंडी गए थे, शाक-भाजी लाने।...और आगे

अमन के रक्षक

प्रतिस्मृति
दुनिया की सभी तरक्की अमन पर निर्भर है। जहाँ उथल-पुथल, लूटखसोट, मारपीट है, वहाँ क्या सुख, क्या सभ्यता।...और आगे

न्यायपालिका के बदलते आयाम

संपादकीय
इस वर्ष की १२ जनवरी से शीर्ष न्यायालय काफी सुर्खियों में रहा है।...और आगे