जाने-माने व्यंग्य-लेखक। अब तक आठ व्यंग्य-संग्रह, छह काव्य-संग्रह, चार बाल-काव्य-संग्रह प्रकाशित। चंडीगढ़ साहित्य अकादमी एवं हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित। संप्रति भारत-सरकार के कार्यालय से सेवा-निवृत्त राजपत्रित अधिकारी एवं अब स्वतंत्र-लेखन।
दिल तो बच्चा है जी! तभी तो वह कभी अधेड़ उम्र में भी मचलता रहता है, ललचाता रहता है। लालच का अमृत हर किसी को प्रिय है। यह गुणों की खान है। जितना भी चख लो, कम है। इसी की बदौलत कई बार पेटू किस्म के लोग विवाह-शादियों पर अपने भीतर इतना कुछ ठूँस जाते हैं कि बाद में अपच रोग के पचड़े में पड़ सकते हैं। माया वैसे भी ठगनी मानी जाती है। सौ रुपए वाले को हजार रुपए पाने की लालसा रहती है। इसी प्रकार हजार रुपए वाला लाखों में और लाखों वाला करोड़ों में खेलना चाहता है। हर आदमी अपना-अपना खेल खेल रहा है। पर लालच का कुआँ कभी भरता नहीं। बाहर कोलाहल है तो भीतर भी कोलाहल समाया हुआ है। आदमी के चिंतन के दरवाजे उसके चिता तक पहुँचने तक खुले ही रहते हैं। वैसे माना जाता है कि मृत्यु की चर्चा से भय जागता है। भय की व्यापता से हर कोई डरता है। आज दुनिया बारूद के ढेर पर बैठी है, न जाने कब विस्फोट हो जाए।
फिर भी हर कोई अपना दिल हर उम्र में बच्चे के समान रखने का दावा करता है। बचपन की मीठी यादें सँजोकर रखना चाहता है। बारिश के भीगे दिनों में कागज की कश्ती चलाने का मंजर उसे अकसर याद आता रहता है। वह गुड्डे-गुड़िया का खेल, तितली के पीछे भागने की भागमभाग, न जाने कौन सी यादों को अपने भीतर समेटे रखता है। मगर नई पीढ़ी शायद अपवाद है, क्योंकि समय का पंछी नित नए-नए पंखों का अाविष्कार करता रहता है। कागज की कश्ती चलाना अब आउट-डेटिड लगने लगा है। पुराने जमाने के टूटे-फूटे खिलौनों से खेलने के दिन लद चुके हैं। कथित नई संचार-क्रांति ने बहुत कुछ बदल दिया है। फिर भी कहा जा सकता है—
खूबसूरत पल जो चुपके से गुजर जाते हैं
यकीनन वो ही हमें बहुत याद आते हैं।
यादों का कारवाँ सदा चलता रहता है। लेकिन परिस्थितियों की खुदरा हकीकत ख्वाबों की तसवीर को धुँधला कर देती है। एक मुकाम ऐसा भी आ सकता है, जब आदमी का बच्चा-मन कुछ मीठा खाने को मचलता है, लेकिन खा नहीं सकता। शारीरिक रोग इसकी आज्ञा नहीं देता। फिर भी कभी-कभी चोरी-छिपे आदमी अपनी इस लालसा को पूर्ण करने से गुरेज नहीं करता।
कहते हैं कि बच्चे मन के सच्चे होते हैं। मासूमियत का खजाना होते हैं। मस्ती की पाठशाला होते हैं। न नून, तेल, लकड़ी की चिंता और न ही कोई गम। लेकिन कुछ अपना खोटा भाग्य लेकर जन्म लेते हैं। सरकार के लाख आश्वासनों के बावजूद, उनके पाठशाला जाने के दिनों में, उन्हें किसी माचिश या पटाखे बनाने वाले की मशीन का पुर्जा बनना पड़ता है या किसी पहलवान के ढाबे वगैरह पर बरतन माँजने का पवित्र काम करना पड़ता है। इसे ‘भाग्य के लेखे’ कहकर हम अपना मन हलका कर लेते हैं। बचपन का फूल इनकी बगिया में खिलता नहीं।
वैसे भी बड़ा होने पर सब बातें हवा-हवाई सी हो जाती हैं। अब ‘झूठे का बोलबाला और सच्चे का मुँह काला’ जैसी परिस्थितियों से अकसर दो-चार होना पड़ सकता है। जमाना उलटबाँसी की प्रक्रिया से गुजर रहा है। झूठ और फरेब की परिपाटी ने अपना जाल बिछा दिया है। कभी कहा जाता था कि ‘पढ़ोगे, लिखोगे, बनोगे नवाब; खेलोगे, कूदोगे तो होगे खराब’, लेकिन अब खेलों का बोलबाला है। खेलों में पदक जीतने वालों को सिर-आँखों पर बिठाया जाता है। उधर ‘पढ़े फारसी, बेचे तेल; ये देखो किस्मत के खेल’ वाली बात सच होने लगी है। कई बार सिर पर डिग्रियों की गठरी रखे व्यवसाय के लिए दर-दर भटकना पड़ता है, घिसी हुई जूतियों के तलवे इसके गवाह बन जाते हैं। उधर महँगाई का राक्षस और भ्रष्टाचार के प्रेत जीना हराम करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते।
फिर भी कभी सुबह किसी पार्क में सैर करते समय चंद प्रौढ़ों को योगा के नाम पर झूठे ठहाके लगाते हुए देखकर बच्चा-मन खुश हो जाता है, मानो कुबेर का खजाना हाथ लग गया हो। लेकिन उन्हीं को शाम की सैर के समय आपस में दर्द बाँटते हुए नहीं देेखना चाहता। आदमी की फितरत यही है। गिरगिट की तरह रंग बदलना आज की जीवन-शैली का एक अंग है। हमारे नेता तो इस खेल में सिद्धहस्त माने जा सकते हैं। देश की किस्मत चमकाने के नाम पर अपनी किस्मत चमकाने लगते हैं। कुछ का बचपना तो उनके मरते-दम तक कायम रहता है और देश इसकी कीमत चुकाता रहता है।
कवि विलियम वर्डसवर्थ अपनी ही रौ में कह गए कि ‘चाइल्ड इज दि फॉदर ऑफ मैन’, यानी बच्चा अपने बाप का बाप होता है। बच्चा हमको बहुत कुछ सीख देता है, हम ऐसा मान सकते हैं। बच्चा दिल का सच्चा होता है। उसकी तरह अपने भीतर थोड़ी सी मासूमियत का अमृत घोलिए, अपने दिल के बच्चे को अठखेलियों का वरदान दीजिए। फुरसत में मस्ती की गंगा में डुबकी लगाइए। शायद आज की विषम परिस्थितियों में थोड़े से आनंद की अनुभूति मिल जाए!
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