जानी-मानी लेखिका। छह कहानी-संग्रह समेत अन्य विषयों पर १७ पुस्तकें तथा १००० से अधिक कहानियाँ व लेख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। चिल्ड्रंस बुक ट्रस्ट (हिंदी विभाग) में बतौर संपादक कार्य व जागरण सखी, मेरी संगिनी, फोर्थ डी वूमेन नामक पत्रिकाओं में विभिन्न संपादकीय पदों पर कार्य। १६० से अधिक पुस्तकों का अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद किया।
कल्पना करें ऐसे रेगिस्तान की, जिसमें जब सूर्यास्त होता है तो भी उत्सव होता है, जब सूर्याेदय होता है, तब भी एक समाँ बन जाता है और जब उस पर चाँद की दूधिया रोशनी पड़ती है तो भी उत्साह और ऊर्जा की लहरें नर्तन करने लगती हैं। अगर वह रेगिस्तान ऐसा हो, जिसमें रेत न होकर नमक हो, जिसके विस्तार में केवल सफेद चमकता नमक ही दिखाई दे, तो अवश्य ही कौतूहल चरम सीमा पर पहुँच जाता है। कच्छ का रण उत्सव प्रकृति के इसी चमत्कार को इंगित करता है। कहते हैं न कच्छ नहीं देखा तो कुछ नहीं देखा। यह इसलिए ही कहा जाता है कि वहाँ देखने को इतना कुछ है कि आँखें देखते नहीं देखती, पैर चलते नहीं ठहरते।
कच्छ तो देखना ही था, इसलिए निकल गई यात्रा पर। दिसंबर आधा खत्म हो चुका था। सुबह दिल्ली से अहमदाबाद की फ्लाइट पकड़नी थी। कड़ाके की ठंड पड़ रही थी, इसलिए बहुत सारे गरम कपड़े रख लिये थे। पर अहमदाबाद एयरपोर्ट पर उतरते ही अहसास हो गया कि नाहक ही कपड़ों का इतना बोझा उठाया है। सबसे पहले जैकेट को वापस अटैची में डाला और शॉल ओढ़ लिया। बस में भी ए.सी. चलाने की जरूरत पड़ गई। दोपहर में तो धूप बहुत ही चुभने लगी थी। वहाँ के स्थानीय निवासियों को बिना स्वेटर पहने, आधी बाजू की शर्ट में घूमते देखा तो शॉल भी हँसी उड़ाता प्रतीत हुआ। खैर, शाम होते-होते मन को सांत्वना दी कि अब तो ठंड लगेगी और दस्तानों व मफलर की जरूरत पड़ जाएगी, पर वे सब हैंडबैग में दुबके मेरा मुँह चिढ़ाते रहे। मौसम को लेकर गूगल सर्च बहुत भारी पड़ गई थी।
प्रकृति से साक्षात्कार
गुजराती में कहा जाता है—
शियाणे सोरठ भलो
उनाणे गुजरात
चौमासे वागड़ भली
कच्छड़ो बारोमास।
अर्थात् सर्दियों में सौराष्ट्र अच्छा है, गरमियों में गुजरात, बारिश में राजस्थान बाॅर्डर, लेकिन कच्छ में बारह महीने जा सकते हैं। और जब बात कच्छ की हो तो खयाल केवल ‘रण उत्सव’ का ही आता है। यह मात्र उत्सव ही नहीं है, यह कला, संस्कृति, परंपरा और प्रकृति के अद्भुत रूपों का मिलन है, जिसे बार-बार देखने का मन करता है। रेगिस्तान सफेद कैसे हो सकता है, यह बात वहाँ जाकर ही महसूस की जा सकती है, जब पाँव वहाँ के फैलाव पर पड़ते हैं और सफेदी के कुछ कण जूतों से चिपक जाते हैं। श्वेत नमक के उस विस्तार को देख अचंभित हुए बिना नहीं रहा जा सकता है।
बस से अहमदाबाद से भुज का सफर कोई सात-आठ घंटे का है। बीच-बीच में रुकते जा रहे थे, इसलिए साढ़े आठ बजे ही भुज के होटल में पहुँच सकी। रास्ते में बैकवाटर और उसमें एकत्र नमक व नमक के ढेर...पानी पर छाई वह सफेदी एकदम अनूठी थी। हम इसी नमक को खाते हैं। पानी में जमे नमक का विस्तार...नमक-ही-नमक...खाने में ज्यादा नमक हो जाए तो मुँह कसैला हो जाता है, पर यहाँ से गुजरते हुए इसे देखना किसी अकल्पनीय अनुभव से कम नहीं था। नमक नहीं, मानो पानी में बर्फ तैर रही हो...सूर्यास्त का समय हो गया था और आकाश में डूबती लालिमा...एक चित्र सा बन गया था फलक पर। प्रकृति जब अठखेलियाँ करती है तो सबकुछ अविश्वसनीय-सा लगता है। न जाने कितने रूपों में वह हमारे सामने आती है...लेकिन जब भी सामने आती है, कुछ नया दे जाती है, कुछ नया सिखा जाती है...अब यह हम पर है, हम उसे कितना आत्मसात् कर पाते हैं, उसे कितना जीवन में ढाल पाते हैं। कहते हैं कि प्रकृति के पास सबको देने के लिए बहुत कुछ है—झोली भर-भर है।
कच्छ का नया बना पुल भी रास्ते में पड़ा, जो कोई एक कि.मी. लंबा है। भुज से कच्छ के खूबसूरत रण की तरफ बढ़े तो कई कि.मी. लंबा एक उजाड़-बियाबान सा इलाका दिखा...सड़क के दोनों तरफ कई कि.मी. का खाली इलाका, कहीं-कहीं पीली घास-फूस तो कहीं लंबी-लंबी जंगली घास जैसे झुरमुटे से जंगल। शाम ढलने को थी।
पहले दो-चार भैंसें दिखीं, फिर भैंसों का लंबा-चौड़ा झुंड नजर आया। इन जंगली घासों को चरती भैंसों का डीलडौल आम भैंसों से एकदम अलग था। पता चला, यहाँ की भैंसें दुनिया भर में मशहूर हैं और यह जगह है—बन्नी।
बन्नी क्षेत्र
बन्नी ग्रास लैंड गुजरात के कच्छ का ऐसा विशाल वनक्षेत्र है, जहाँ दूर-दूर तक पानी नहीं होता। १८१९ से पहले यहाँ सिंधु नदी बहती थी, खूब हरियाली थी और यहाँ की लहलहाती फसलों में सबसे ज्यादा मशहूर था लाल चावल, लेकिन १८१९ में आए भीषण भूकंप ने सिंधु नदी की दिशा बदल दी और उसके बाद से वह पाकिस्तान के सिंध से होकर बहने लगी। और रण नमकीन कणों के साथ विशाल मरुस्थल में बदल गया
करीब पौने चार हजार वर्ग कि.मी. में फैला विशाल बन्नी वन क्षेत्र दिन भर तपता है। कच्छ के रण से लगे होने की वजह से यहाँ की जमीन नमक वाली है। यहाँ उगने वाली घास पीली-हरी सी होती है। इसे भी ‘बन्नी घास’, ही कहा जाता है। यह घास अत्यधिक पौष्टिक होती है, जिसे खाने के कारण ही भैंसें इतना दूध देती हैं। बन्नी भैंसों की नस्ल ऐसी है कि देश के तमाम बड़े दूध उत्पादक बन्नी की भैंस खरीदना पसंद करते हैं। घास का एक टुकड़ा उठाकर जो कुछ-कुछ नलकी जैसा था, जब मुँह में डाला तो स्वाद अच्छा लगा। नमकीन व नमी लिये हुए। ऊँट इसे खाकर ही अपनी प्यास बुझाते हैं।
वैसे तो दूर-दूर तक यहाँ गाँव नजर नहीं आते, लेकिन बन्नी में अगर भीतर तक जाएँ तो कई गाँव और घर मिल जाएँगे। लेकिन वे बहुत दूर-दूर बने होते हैं। कच्चा रास्ता देख तय करना मुश्किल है कि वहाँ घर होंगे। चारों तरफ बबूल-ही-बबूल फैला हुआ है, इसीलिए रात को लोग रास्ते का पता रखने के लिए बाहर एक डंडे पर कपड़ा लटका देते हैं। देखने में बंजर, बियाबान यह रेगिस्तान अपनी भैंसों और घासों की वजह से कैसे दुनिया में मशहूर है, यह यहाँ से गुजरने के बाद ही महसूस हुआ।
भुंगा-वास्तुशिल्प का नायाब नमूना
यहाँ गोलाकार मिट्टी के घर बने हुए हैं। इन्हें ‘भुंगा’ कहा जाता है। देखने में ही वे बहुत दिलचस्प लग रहे थे। गोलाकार भुंगा ज्यादातर कच्छ के बन्नी घास के मैदान में पाए जाते हैं। इनकी छत शंकु के आकार की थी। कुछ घरों के अंदर की सजावट मिट्टी के लेप और छोटे-छोटे शीशों की नक्काशी के काम से हुई होती है। घर के अंदर जाने का दरवाजा छोटा था, फर्श मिट्टी का और उसके ऊपर गोबर का लेप किया जाता है। दीवारें भी परतदार होती हैं, जिस पर गोबर से लेप किया रहता है। भुंगा में अंदर की ओर अँधेरा होता है और शंकु के आकार की घास की छत ज्यादा धूप को अंदर जाने से रोकती है। दीवारों के नीचे छोटे-छोटे गोलाकार सुराख होते हैं, जो घर को हवादार बनाते हैं। इन घरों का गोल आकार ही इन्हें भूकंपरोधी बनाता है और यदि ये घर गिर भी जाएँ, तो हल्के होने के कारण इनसे कोई नुकसान नहीं होता।
लगातार यहाँ भूकंप आने के कारण ही इन घरों में भूकंपरोधी प्रक्रिया को विकसित किया गया था। स्थानीय सामग्री, पत्थर और लकड़ी का प्रयोग करके घरों को चबूतरों के ऊपर बनाया जाता है, इस प्रक्रिया को ‘कथ-कुनी’ कहा जाता है। इनकी मोटी दीवारें, बिना किसी चूने या मसाले के पत्थर और लकड़ी की एक के ऊपर एक पड़ी परत का परिणाम हैं, जो कि भूकंप के झटकों को रोक सकती हैं। इन घरों की सतह भी लकड़ी से बनी होती है, जो कि आसानी से ठंडी नहीं होती। घर के निचले भाग में पशुओं को रखा जाता है और घरों को इस तरह से बनाया जाता है कि पशुओं और रसोईघर से गरमाहट पैदा होती रहती है, जो घर को गरम रखती है।
रूप बदलता है कई
धोर्ड़ो गाँव जो भुज से ८० कि.मी. दूर है, यहीं से सफेद रण शुरू होता है। यहीं पर हर साल ‘रण उत्सव’ मनाया जाता है। देखा जाए तो यहाँ कुछ भी नहीं है, सिवाय मीलों तक फैले सफेद रण के। कच्छ जिला पश्चिमी भारत में गुजरात राज्य का एक जिला है। ४५,६७४ वर्ग कि.मी. के क्षेत्र में फैला यह भारत का सबसे बड़ा जिला है। कच्छ का शाब्दिक अर्थ है, जो रुक-रुक कर गीला और सूखा हो जाता है। इस जिले का एक बड़ा हिस्सा कच्छ के रण के रूप में जाना जाता है, जो उथली आर्द्र भूमि है। यह हिस्सा बारिश के मौसम में पानी में डूब जाती है और अन्य मौसमों में सूख जाती है। और तब यहाँ सफेद नमक की चादर बिछ जाती है। एक विशाल सफेद रेगिस्तान जिस पर जब चाँद की दूधिया रोशनी पड़ती है तो हजारों लोग उसे देखने के लिए उमड़ पड़ते हैं। इसी नजारे को देखने के लिए रण उत्सव का आयोजन हर साल किया जाता है। तीन दिनों से शुरू हुए इस उत्सव की अवधि लगातार बढ़ती जा रही है। इस साल १ नवंबर से शुरू होकर इसे २८ फरवरी, २०२५ तक मनाया जाएगा।
कछुए के आकार का यह इलाका दो हिस्सों में बँटा है—ग्रेट रण १८,००० वर्ग कि.मी. में फैला है। दूसरा हिस्सा ‘लिटिल रण’ कहलाता है, जो ५,००० वर्ग कि.मी. में फैला है। इन दोनों को मिला दें तो नमक और ऊँची घास का विस्तृत मैदान बनता है, जो दुनिया के सबसे बड़े नमक के रेगिस्तानों में से एक है। यहीं से भारत को ७५ फीसदी नमक मिलता है। हर साल गरमियों के महीने में मानसून की बारिश होने पर रण में बाढ़ आ जाती है। सफेद नमक के सूखे मैदान बिल्कुल गायब हो जाते हैं और उनकी जगह झिलमिलाता समुद्र बन जाता है, जो उत्सव मनाने का अवसर देता है। जून के आखिर में यहाँ मानसून की मूसलधार बारिश शुरू हो जाती है। अक्तूबर तक यहाँ बाढ़ के हालात रहते हैं। फिर धीरे-धीरे पानी भाप बनकर उड़ने लगता है और अपने पीछे नमक के क्रिस्टल छोड़ जाता है। पानी घटने पर प्रवासी किसान चौकोर खेत बनाकर नमक की खेती शुरू करते हैं। सर्दियों से लेकर अगले जून तक वे जितना ज्यादा नमक निकाल सकते हैं, उतना नमक निकालते हैं।
यह सफेद रेगिस्तान इतना सपाट है कि आप क्षितिज तक देख सकते हैं, जैसा कि समुद्र में दिखता है। नमक के उस विशाल समुद्र पर पैर रखते हुए लगा, मानो हर ओर ओस बिखरी हुई है। थोड़ी नमी होने के कारण नमक जूते में भी चिपक रहा था।
दूधिया रोशनी में रण
टहलते हुए मैंने तारों से जगमगाते आकाश को देखा। शहर में तो तारे देखे न जाने कितने दशक बीत चुके हैं। बहुत नखरे दिखाने के बाद चाँद निकला। सर्दी के कारण हाथ-पैर ठिठुर रहे थे, पर उसकी रोशनी जब श्वेत लवण पर पड़ी तो सुधबुध ही खो बैठी। लग रहा था कि हर ओर ओस की बूँदें छिटक आई हैं। बार-बार नमक उठाकर देख रही थी, सच में नमक ही था। दूर-दूर तक फैला केवल नमक। कहीं-कहीं अभी भी नमी थी, इसलिए जूते रेगिस्तान में धँसे जा रहे थे, पर मन कर रहा था कि चलते ही जाएँ। ऊपर मुसकाता चाँद और नीचे गिरती चाँदनी, हवा में तैरता लोक-संगीत...अद्भुत, अनोखा,...शब्द ही नहीं हैं, उस अनुभूति को बयान करने के लिए। रात गहरा रही थी, जाना ही पड़ा, क्योंकि सुबह आना था सूर्याेदय का चमत्कार देखने।
बिखरी जब किरणें
सुबह-सुबह साढ़े पाँच ही ठंड में कँपकँपाते पहुँच गई। पता था कि साढ़े छह बजे से पहले सूरज दर्शन नहीं देगा, पर चाहती थी कि उसके उदय के एक भी पल से वंचित न रह जाऊँ। यहाँ से पाकिस्तान के सिंध क्षेत्र का नजारा भी देखने को मिलता है, जो कच्छ से थोड़ी दूर पर ही स्थित है। यह क्षेत्र स्वामी विवेकानंद के कारण भी काफी मशहूर है। कहा जाता है कि १८९३ में शिकागो सम्मेलन के लिए रवाना होने से पहले उन्होंने कच्छ की यात्रा की थी।
धीरे-धीरे सूरज उगने लगा और काला, स्लेटी आसमान और लालिमा के विभिन्न वर्ण रेगिस्तान को आलोकित करने लगे। आकाश के विविध रंग थे और सूरज के भी। अप्रतिम सौंदर्य के दर्शन हुए मुझे उस दिन सूरज के। यहाँ जो खूबसूरत नजारा दिखाई देता है, उसे शब्दों में बयान कर पाना मुमकिन नहीं है। तेज हवा चल रही थी, फिर भी वहीं खड़ी रही बहुत देर। लेकिन बाकी साथी वापस लौटने के लिए शोर मचाने लगे, क्योंकि आगे भी यात्रा के लिए निकलना था।
रण की खासियत और खूबसूरती यह है कि यह पूरे दिन में अपना रूप बदलता है। सूर्योदय के समय इसका रूप कुछ अलग होता है और सूर्यास्त पर कुछ और। चाँदनी रात में यह किसी बहते सफेद समुद्र की तरह लगता है। आसमान से गिरती चाँदनी और तारों की रोशनी-एक करिश्माई वातावरण के आप साक्षी बनते हैं तब। रण में बने वॉच टावर से इन सारे रूपों को अच्छी तरह से देखा जा सकता है। पर भारी भीड़ होने के कारण उस पर चढ़ना किसी दुरूह काम से कम न था।
इस रणोत्सव में पारंपरिक लोकनृत्य, सफेद रण का भ्रमण, ऊँट की सवारी और अन्य तरह की गतिविधियों का आनंद लेने के सिवाय सबसे प्रमुख आकर्षण है, टेंट सिटी में रहना। यहाँ रण उत्सव मनाने के लिए पूरी की पूरी टेंट सिटी बसाई जाती है। टेंट सिटी अपने आप में बहुत ही अद्वितीय है और आने वाले पर्यटकों को मंत्रमुग्ध करती है। इसमें ४०० टेंट सारी सुविधाओं के साथ बने हुए हैं। वातानुकूलित या गैर-वातानुकूलित टेंट का विकल्प चुना जा सकता है। इसके कमरों में हीटर लगे हुए हैं और गरम पानी की भी आपूर्ति की जाती है। इसमें शॉपिंग कॉम्प्लेक्स भी है, जहाँ से हस्तशिल्प की वस्तुएँ खरीदी जा सकती हैं। इसमें डाइनिंग हॉल है, जिसमें सुस्वादों भोजन का आनंद लिया जा सकता है।
सूरज की लालिमा और चाँदनी में चमकता रण
लोक-नृत्यों, संगीत और रंगारंग कार्यक्रमों के बीच ढलते सूरज को देखना...एक ऐसा अनुभव था, जिसने एक तरफ मुझे विस्मित कर दिया, वहीं दूसरी ओर मेरे रोंगटे खड़े हो गए। नीचे सफेद रेगिस्तान का असीम विस्तार और आसमान पर लाल गोले का धीर-धीरे तिरोहित होना, मानो वह श्वेत लवण में मिल जाना होता है। उसकी किरणें उसे छू रही थीं और मेरा कैमरा उस तिलिस्म को कैद करने के लिए रुक ही नहीं रहा था। बादल की एक लंबी सी लकीर खिंच गई थी और धीरे-धीरे काला-स्लेटी होता आसमान चाँद के निकलने की प्रतीक्षा करने लगा। प्रतीक्षा तो मैं भी कर रही थी। जब दूधिया चाँदनी बिखरी तो सफेद रेगिस्तान मोतियों के थाल की तरह चमकने लगा। नमक जैसी मामूली सी चीज इतनी सुंदर लग सकती है, यह तो वहाँ पहुँचकर ही जाना जा सकता है। समुद्र और रेगिस्तान—दोनों मन ने सोचा। अब देखना था सूर्योदय और रात गुजरने का इंतजार था, इसलिए वापस टेंट सिटी लौटना पड़ा। छह बजे ही ठिठुरती सुबह में जब रण पहुँचे तो सूरज अभी निकला नहीं था। पर देखने वालों की भीड़ लगी हुई थी। बहुत जगहों पर सूर्योदय देखा है, फिर यहाँ क्या खास होगा...सोच ही रही थी कि तभी एक लाली फूटी। बहुत ही धीरे-धीरे पौ फटने लगी और लाल-नारंगी रंग के कितने ही वर्ण सफेद विस्तार पर छिटक गए—मन हुआ उस नमक को मुट्ठी में भर लूँ। हर ओर सौंदर्य बिखर गया था—आसमान में, रेगिस्तान में और पूरे वातावरण में।
लौटना था, ताकि अगले पड़ाव की खूबसूरती को जी सकें। वापसी में भुज एयरपोर्ट से मुंबई और वहाँ से दिल्ली की फ्लाइट लेकर नमक के एक अलग स्वाद को साथ लिये जो कसैला कतई न था, लौटी।
कैसे पहुँचें
यहाँ हवाई सेवा, रेल और सड़क मार्ग से पहुँचा जा सकता है, भुज हवाई सेवा से जुड़ा है तथा देश के प्रमुख शहरों से हवाई सेवा द्वारा पहुँचा जा सकता है। इसके अलावा भुज देश के प्रमुख रेल नेटवर्क से भी जुड़ा है। सड़क मार्ग से राज्य के प्रमुख शहरों से यहाँ आसानी से पहुँचा जा सकता है।
१२, एकलव्य विहार, सेक्टर-१३
रोहिणी, दिल्ली-११००८५
दूरभाष : ९८१०७९५७०५