सुपरिचित बाल-साहित्यकार। अब तक विविध विषयों पर बाईस पुस्तकें प्रकाशित। अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त। संप्रति विद्या भारती शिक्षा संस्कृति संस्थान कुरुक्षेत्र की अखिल भारतीय कार्यकारिणी की सदस्य एवं आकाशवाणी, प्ररागराज में उद्घोषक।
बहुत दिन हो गए हैं रंग खेले हुए।” पोपली अम्मा ने हँसते हुए कहा। हँसने के कारण उनकी छोटी आँखें और छोटी हो गई थीं।
मीठी बोली, “क्यों अम्मा, हम लोग तो हर साल होली खेलते हैं, तुम ही नहीं खेलती हो हमारे साथ।”
“अच्छा, क्यों झूठ बोल रही हो मीठी, तुम भी अम्मा को कहाँ छूती हो, अभी भी देखो, कितनी दूर से बात कर रही हो।” गुड्डी बोली।
मीठी ने सकपकाते हुए कहा, “तो क्या हुआ, हम पिचकारी से तो अम्मा पर रंग डाल ही सकते हैं।”
अम्मा ने आँखें मिचमिचाते हुए मीठी का चेहरा देखने की कोशिश की, पर आँसू सब धुँधला कर दे रहे थे।
तभी गुड्डी ने मुँह बनाते हुए कहा, “मीठी बहुत खराब है, इसी ने सभी बच्चों को अम्मा से दूर रहने के लिए कहा है।”
“मैंने नहीं कहा है, मेरी मम्मी ने कहा है, क्योंकि दादी के हाथ में सफेद दाग है। अगर हम अम्मा को छुएँगे तो हम सबको भी सफेद दाग हो जाएगा।”
मीठी की बात सुनकर सब चुप हो गए, क्योंकि अम्मा के हाथ में सफेद दाग का गोला साफ नजर आ रहा था।
इसी सफेद गोले ने अम्मा को बिल्कुल अकेला कर दिया था। अम्मा का बेटा शहर में काम करने गया था, इसलिए वह पहले भी अकेले ही रहती थीं, पर पूरा गाँव अम्मा के घर के आसपास चक्कर लगाता था, इसलिए अम्मा को कभी अकेलापन महसूस ही नहीं हुआ।
अम्मा पहले सब्जी बेचा करती थी, पर हाथ पर सफेद दाग उभरने के बाद से लोगों ने उनसे सब्जी खरीदना बंद कर दिया था।
जो पैसे उनका बेटा शहर से भेजता था, वह उसी में अपने घर का खर्चा चलाती थी। सब्जी के पैसे बचाने के लिए अम्मा ने अपने घर के आसपास ही बहुत सारी सब्जी उगा रखी थी।
वैसे अम्मा का अपना एक अलग संसार था, जो बहुत खूबसूरत था। लोग हँसी-मजाक में उनके घर को चिड़ियाघर भी कहते थे, क्योंकि अम्मा का घर घर नहीं था, बल्कि सच में पूरा चिड़ियाघर ही लगता था। सोना गिलहरी, टुकटुक मैना, बिंदी बुलबुल, हीरामन तोता, पूसी बिल्ली, शेरू कुत्ता, यहाँ तक कि डमरू बंदर भी उनके घर में ही रहता था। ये सभी अम्मा के साथ ही खाते-पीते और सोते थे। डमरू तो अम्मा के हाथ से ही खाना खाता था। ये सभी जानवर सिर्फ लोगों के लिए ही जानवर थे, अम्मा के लिए तो उनके बच्चे थे। अम्मा के सुख-दु:ख के साथी थे। सब जानते थे कि अम्मा बहुत दयालु थीं। गिलहरी के ऊपर कोई डाल टूटकर गिर पड़ी थी और अम्मा घायल गिलहरी को अपने आँचल में उठाकर रो पड़ी थी। बिल्ली और कुत्ते के ऊपर कोई गाड़ी चढ़ा गया था, जब बच्चों ने दौड़ते हुए जाकर अम्मा को बताया था तो अम्मा झटपट जाकर उन्हें अपने घर ले आई थी। उनके पास पैसे नहीं रहते थे, क्योंकि सब्जी बेचकर ही उनका गुजारा होता था, पर उन दोनों के इलाज में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। गाँव वाले बताते हैं कि अम्मा अपनी पायल बेच आई थी। नटखट पूसी और शेरू को देखकर कोई कह नहीं सकता था कि इन दोनों की हिड्डयाँ टूटी थीं और वे महीनों तक हिल भी नहीं सकते थे।
बंदरों से तो अम्मा हमेशा से ही डरती थी। कोई बंदर पेड़ों से कूदकर उनकी सब्जियाँ खाने आ जाता था तो वह घर छोड़कर भाग जाती थीं।
पर जब उन्हें पता चला कि एक बंदर का बच्चा बिजली के तार से करंट लगकर गिर गया है तो अम्मा भागी-भागी उस जगह पर जा पहुँचीं और बेहोश बंदर के बच्चे को उठाकर घर ले आईं। उनकी दिन-रात की सेवा से बंदर का बच्चा बच गया। वह इतना उछलता-कूदता, ऊधम मचाता था कि अम्मा ने उसका नाम ही डमरू रख दिया, तब से लेकर आज तक डमरू एक पल के लिए भी अम्मा को नहीं छोड़ता है।
गाँव वालों ने सफेद दाग के कारण अम्मा को एक पल में पराया कर दिया, जबकि अम्मा सभी गाँव वालों के सुख-दुःख में भी एक पैर से खड़ी रहीं। अब चाहे होली हो या दीवाली, अम्मा अकेली ही बैठी रहती थी। हाँ, यह बात अलग थी कि टुकटुक, बिंदी, सोना, हीरामन, डमरू, शेरू और पूसी को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था कि अम्मा के हाथ में दाग है। वे तो अपनी अम्मा को पागलों की तरह प्यार करते थे।
अम्मा अपनी सोच में गुम थी, तभी गुड्डी बोली, “अम्मा, हम जा रहे हैं। हमें रंग और पिचकारी खरीदनी है।”
अम्मा धीरे से बोली, “मेरे सारे बच्चे भी तुम लोगों को बहुत याद करते हैं। याद है, डमरू तुम लोगों को देखकर गुलाटी खाने लगता था और शेरू कैसे अपनी झबरीली पूँछ हिलाते हुए तुम सबके चक्कर काटा करता था और तुम्हारे पीछे कितनी दूर तक दौड़कर जाता था, मेरे लिए नहीं तो उन्हीं सब से मिलने आ जाया करो।”
बच्चे कुछ नहीं बोल पाए तो अम्मा रुँधे गले से बोलीं, “कोई बात नहीं, मम्मी ने मना किया है तो मत आना।” और अम्मा आँसू बहाती हुई अपने घर की ओर चली गई।
घर जाकर अम्मा ने बड़ा सा थैला निकाला। उसके अंदर सभी तरह के रंग थे। अम्मा हर साल रंग खरीदकर लाती थी और किसी के होली खेलने नहीं आने पर वापस उन्हें बैग में रख देती थीं। अम्मा ने रंगों पर हाथ फेरा और वापस थैले में रख दिया।
तभी शेरू दौड़ता हुआ आया और अम्मा के ऊपर चढ़ गया। पूसी भी आकर उनके पैरों के पास बैठ गई। हीरामन भी टांय-टांय करता हुआ अम्मा के कंधे पर बैठ गया।
तभी अम्मा को याद आया कि होली तो अगले दिन ही है और अभी तक घर के किराने का सामान नहीं लिया है। होली के दिन तो दुकान बंद रहेगी तो बेचारे डमरू और बाकी बच्चे खाना कैसे खाएँगे! बस यह सोचकर अम्मा अपनी लाठी लेकर चल दी तो शेरू और डमरू पीछे आए। अम्मा ने उन्हें वापस जाने के लिए कहा, वे दोनों उछलते-कूदते वापस घर चले गए। अम्मा किराना की दुकान पर सामान लेने चली गई।
दुकानदार ने जब उन्हें देखा तो गंदा सा मुँह बनाते हुए पूछा, “क्या चाहिए?”
अम्मा बोली, “एक नमक का पैकेट, एक माचिस की डिब्बी, एक नीली वाली साबुन की टिक्की और एक किलो चीनी दे दो।”
तभी उनके बगल में सफेद कोट पहने हुए एक साँवला सा लड़का आकर खड़ा हो गया।
अम्मा को वह सुदर्शन और सौम्य लड़का बड़ा भला सा लगा और अम्मा उसे देखकर मुसकरा दी।
लड़के ने भी मुसकराते हुए अम्मा को देखा और दुकान के अंदर सामान देखने लगा।
दुकानदार बाकी सबको तो हाथ में पैकेट पकड़ा रहा था, पर अम्मा को दूर से फेंककर सामान दे रहा था। अम्मा बेचारी चुपचाप सामान जमीन से उठाकर अपने थैले में रख रही थी। जब अम्मा ने दुकानदार को हाथ बढ़ाकर पैसे देने चाहे तो दुकानदार चिल्लाकर बोला, “आपको मैं सामान दे देता हूँ, क्या यह कम नहीं है और कोई दुकानदार तो आपको सामान भी नहीं देता है। अपना नोट वहीं दूर रख दीजिए, मैं उसे धोकर ही छुऊँगा।”
यह देखकर उस लड़के का चेहरा गुस्से से तमतमा उठा।
उसने दुकानदार से कहा, “तुम अम्माजी से इस तरह से क्यों बात कर रहे हो?”
दुकानदार बोला, “आप देख नहीं रहे हो, उनके हाथ में सफेद दाग है, उसके बाद भी मुझे अपने हाथ से नोट पकड़ा रही है।”
अम्मा का चेहरा उतर गया। वह नोट पकड़े हुए ऐसे खड़ी हो गई, मानो कोई अपराधी हो।
“तो उससे क्या हो गया?” लड़के ने गुस्से से पूछा।
“अरे, तो यह जिसको भी छू लेगी, उसे यह दाग हो जाएगा, इसलिए हम लोग इससे दूर ही रहते हैं।”
यह सुनकर वह लड़का आश्चर्य से बोला, “किसने कहा है कि छूने से दाग फैल जाएगा? तुमने क्या बिल्कुल भी पढ़ाई नहीं की है?”
दुकानदार यह सुनकर सकपकाता हुआ बोला, “बचपन में हमारा मन खेलने-कूदने में बहुत लगता था, इसलिए हम कभी स्कूल नहीं गए।”
लड़का बोला, “हाँ, वह तो तुम्हारे व्यवहार से पता चल ही रहा है, वैसे बहुत से लोग स्कूल नहीं गए हैं, पर आदर और मान-सम्मान देना तो सभी जानते हैं।”
दुकानदार से कुछ भी कहते नहीं बना।
वह लड़का बोला, “इस गाँव में सरकारी अस्पताल खुलने जा रहा है और मैं उसी के बारे में यहाँ के सरपंचजी से बात करने के लिए आया हूँ। मैं वहीं पर काम करूँगा, डॉक्टर हूँ मैं।”
“अच्छा-अच्छा तो आप डॉक्टर साहब हैं। माफ कर दीजिए। मैं अभी सबको बुला लेता हूँ।” और यह कहकर दुकानदार ने खुशी से चिल्लाते हुए आस-पास के सभी लोगों को इकट्ठा कर लिया।
तभी अम्मा वहाँ से चलने को हुई तो डॉक्टर ने अम्मा का हाथ पकड़कर कहा, “अरे अम्माजी, आप कहाँ जा रही हैं। आप ही के बारे में तो बताकर इन सबकी गलतफहमी दूर करनी है।”
दादी घबराते हुए बोली, “बेटा, मुझे मत छुओ वरना यह सफेद दाग तुम्हें भी हो जाएगा।”
“यह सफेद दाग कोई बीमारी नहीं है, जो मुझे भी हो जाएगा।”
डॉक्टर साहब की बात सुनकर वहाँ खड़े सभी लोग हैरान हो गए।
डॉक्टर साहब बोले, “और आपको पता है, मेरी माँ के तो कॉलेज के समय से हाथ में सफेद दाग है। मैं इतना बड़ा हो गया हूँ, पर जब घर में रहता हूँ तो छोटा बच्चा बन जाता हूँ और माँ के हाथ से ही खाना खाता हूँ। मुझे तो नहीं हुआ कोई दाग।” डॉक्टर साहब बोले।
सभी लोग आपस में खुसुर-पुसुर करने लगे। उन्हें डॉक्टर की बात पर विश्वास ही नहीं हो रहा था।
उन सबको असमंजस में देखकर डॉक्टर ने अपनी जेब से मोबाइल निकाला और कुछ देखने के बाद सबके सामने करके बोले, “ये मेरी माँ हैं।”
मोबाइल की स्क्रीन पर होलिका दहन की पूजा की फोटो थी, जिसमें डॉक्टर साहब अपनी माँ के पैर छू रहे थे और वह डॉक्टर साहब के सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दे रही थीं। उनके उसी हाथ में कोहनी से लेकर उँगलियों तक सफेद दाग था।
“पर...तो क्या ये छूने से नहीं फैलता है?” दुकानदार ने फोटो को देखकर आश्चर्य से कहा।
“यह एक त्वचा रोग है, जिसे ‘विटिलिगो’ भी कहते हैं, इसका इलाज संभव है और उसके बारे में आप सबको मैं आराम से बताऊँगा, अभी तो आप सिर्फ इतना जान लीजिए कि अम्मा बिल्कुल स्वस्थ हैं, जैसे आप और हम हैं।”
डॉक्टर साहब की बातें सुनकर सबकी आँखें शर्म से झुक गईं। दुकानदार को याद आया, जब वह बीमार पड़ा था तो अम्मा ने रात-रात भर जागकर उसके माथे पर ठंडी पट्टी रखी थी। वहाँ खड़ा हर व्यक्ति अब अम्मा के उपकार को याद कर रहा था।
दुकानदार बोला, “हम सबसे अनजाने में बहुत बड़ी गलती हो गई है।”
डॉक्टर साहब बोले, “माफी तो आपको अम्मा से माँगनी चाहिए।”
“पर अम्मा है कहा?” भीड़ में से किसी ने कहा।
अम्मा वहाँ नहीं थी। वह तो रोती हुई न जाने कब वहाँ से जा चुकी थी। उनका साबुन, नमक, माचिस की डिब्बी और चीनी का पैकेट जमीन पर पड़ा हुआ था।
जमीन पर सामान बिखरा हुआ देखकर दुकानदार के गले में जैसे कुछ फँस गया और वह हथेलियों में मुँह छिपाकर रो पड़ा।
अगले दिन होली थी और अम्मा के घर में न चाय बनाने को चीनी थी, न सब्जी बनाने के लिए नमक। वह चुपचाप लेटी हुई छत को ताक रही थीं। हीरामन, डमरू, पूसी और शेरू उनके पास चुपचाप लेटे हुए थे। वे सब समझ गए थे कि अम्मा दु:खी हैं, इसलिए वे सब भी उदास थे।
तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।
अम्मा ने धीरे से उठकर दरवाजा खोला।
सामने दुकानदार खड़ा हुआ था। अम्मा डर गई।
उन्हें लगा, दुकानदार उनसे लड़ने आया है।
“मेरा नोट तुमसे छुआ नहीं था बेटा।” अम्मा काँपते स्वर में बोली।
दुकानदार अम्मा के पैरों में गिर पड़ा और रुँधे गले से बोला, “माफ कर दो अम्मा, माफ कर दो।”
अम्मा ने रुलाई रोकने के लिए मुँह में पल्लू ठूँस लिया।
तभी अम्मा ने देखा, दुकानदार के आसपास तो बहुत लोग खड़े हैं, बहुत लोग नहीं, बल्कि पूरा गाँव ही खड़ा था।
सभी अम्मा के पास आ गए।
मीठी की माँ ने लाल रंग अम्मा के गालों पर लगा दिया और अम्मा के गले लगकर सिसक उठी।
सब अम्मा से माफी माँग रहे थे, उन्हें गले लगा रहे थे। बच्चे शेरू और पूसी को इतने दिनों बाद देखकर खुशी से झूम उठे थे और उनके साथ दौड़ लगा रहे थे। इसी बीच डमरू जाकर अम्मा के रंगों वाला थैला उठा लाया था और उसमें से रंग का पैकेट फाड़-फाड़कर सबके ऊपर रंग उड़ा रहा था।
हरा, पीला, नारंगी, गुलाबी रंग हवा में उड़ रहा था। रंगों से सराबोर डॉक्टर साहब और सभी लोग अम्मा के पैर छू रहे थे और अम्मा...अम्मा मन-ही-मन सबको ढेरों आशीर्वाद देते हुए हथेलियों में चेहरा छिपाए रोए जा रही थी।
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भगवती अपार्टमेंट के सामने, गर्ल्स हाईस्कूल के पास
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