सुपरिचित बाल-साहित्यकार। देश और विदेश की बाल-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। विदेशी रेडियो के हिंदी प्रसारणों पर रचनाएँ प्रचारित। कई पुरस्कार प्राप्त|
वह लड़की अकसर मेरी दुकान पर सामान लेने आती थी। उम्र कोई बीस साल की रही होगी।
एक रोज वह मेरी दुकान पर वाई टोन क्रीम लेने आई, मैं क्रीम देकर उस लड़की से पूछ पड़ा, “क्या तुम रील बनाती हो?”
मेरी बात सुनकर वह लड़की पूछ पड़ी, “आप को कैसे पता चला कि मैं रील बनाती हूँ।”
बस यों ही मन में खयाल आया तुमसे पूछ लूँ, क्योंकि आजकल बहुत सारी लड़कियाँ रील बनाकर इंस्टाग्राम पर डाल रही हैं।
मेरी बात सुनकर वह लड़की बोली, “हाँ, मैं रील बनाती हूँ। मगर कम बनाती हूँ, हमें पढ़ना भी रहता है और स्कूल भी जाना रहता है। इसलिए कभी मन में आता है तो रील बनाकर इंस्टाग्राम पर पोस्ट कर देती हूँ।”
“क्या आपने मेरा कोई रील देखा है?”
“नहीं, अभी तक तो नहीं देखा है, वैसे हमें इंस्टाग्राम के बारे में कुछ पता नहीं है।” तभी वह लड़की बोली, “आप अपना मोबाइल हमें दीजिए, मैं आपका इंस्टाग्राम आई.डी. बना देती हूँ, फिर आपको रोज ढेर सारे रील देखने को मिलेंगे।”
मैंने उसको अपना मोबाइल दे दिया। उसने कुछ ही समय में मेरे मोबाइल को इंस्टाग्राम से जोड़ दिया और मेरा इंस्टाग्राम मेल आई.डी. बनाकर बोली, अब आप अपनी भी वीडियो और जो कुछ लिखते हैं, उसे अपने इंस्टाग्राम पर डाल सकते हैं।
दस-बारह साल से मैं मोबाइल चला रहा था, मगर मेरा कोई इंस्टाग्राम नहीं था, आज पहली बार इंस्टाग्राम से जुड़कर मुझे बहुत खुशी हो रही थी।
उससे मैंने उसका नाम पूछा तो उसने अपना नाम मधु बताया। उसका नाम जानकर मैं बोल पड़ा, “तुम्हारा नाम तो बहुत प्यारा लग रहा है। क्या तुम सचमुच मधु हो?”
“हाँ, मेरी मीठी-मीठी बातें सुनकर लोग हमें मधु कहकर ही बुलाते हैं। आप भी अब मुझे मधु नाम से बुलाइएगा।”
मैंने उससे उसका मोबाइल नंबर भी माँगा तो वह झटपट मुझे अपना मोबाइल नंबर देने को तैयार हो गई।
उसने अपना मोबाइल नंबर मेरे मोबाइल में सेव कर दिया।
वह अपना क्रीम लेकर जब घर जाने लगी तो मैंने बोला, “जब तुमको समय मिले तो हमारी दुकान पर आ जाना, मुझे तुमसे रील बनाने के बारे में बहुत कुछ सीखना है।”
“मैं शाम को चार-पाँच बजे आ सकती हूँ।” उस दिन से मधु मेरी दुकान पर अकसर आने लगी।
मेरी उससे सचमुच दोस्ती हो गई।
एक रोज उसने कहा, “आप हमें कुछ खिलाते नहीं हैं!”
मैं पूछ पड़ा, “क्या खाओगी?”
“चाऊमीन, मोमो और चाय।”
मैंने झट से मेरी दुकान के सामने चाऊमीन, मोमो, चाय बेचने वाले से कह दिया, ये जो माँगें खिला दो, पैसा मैं दे दूँगा।
वह चाऊमीन, मोमो, चाय, खा-पीकर घर जाने लगी तो मैं बोल पड़ा, “तुम हमसे फोन पर भी बात कर सकती हो।”
“मुझे तुमसे बात करके बहुत अच्छा लगेगा।”
अब वह मुझे जब भी मन करता, फोन करके बात कर लेती थी।
और कभी-कभी हमसे रील बनाने के लिए शेरो-शायरी भी लिखवाकर ले जाती थी। वह मेरी शेरो-शायरी पर चार-पाँच रील बना चुकी थी।
एक रोज जब वह मेरी दुकान पर सामान लेने आई तो कहने लगी, “आज मेरा मन रेस्टोरेंट में चलकर डोसा, पिज्जा खाने का कर रहा है।”
मैंने बोला, “खा लेना, मैं कहाँ रोक रहा हूँ।” इतना कहकर मैंने उसे दो सौ का नोट पकड़ा दिया और बोला, “जाओ, तुमको जिस रेस्टोरेंट में डोसा, पिज्जा पसंद पड़े खा लो।”
“आप नहीं चलेंगे मेरे साथ!”
“मैं दुकान छोड़कर नहीं जा सकता हूँ। दुकान कौन देखेगा?” मैं बोल पड़ा।
वह बोली, “ठीक है, मैं आपके लिए डोसा लेकर आऊँगी, उसे खा लीजिएगा।”
“ठीक है, जैसी तुम्हारी मर्जी। मैं तुम्हारा दिल नहीं तोड़ सकता हूँ। ”
हमारी दोस्ती छह माह पुरानी हो गई। एक रोज मधु मुझसे कहने लगी, शनिवार को दुकान बंद रहती है, तुम मुझे लेकर रामगढ़ ताल, तारा मंडल और चिड़ियाघर घुमा दो। तुम मेरे लिए हाँ कह दो, फिर कभी कहीं घुमाने को नहीं कहूँगी।
मैं उसे रामगढ़ ताल, तारामंडल और चिड़ियाघर घुमाकर उसके घर छोड़कर अपने घर चला आया।
आज मधु की शादी थी, उसने मुझे भी शादी का कार्ड दिया था। मैं भी उसकी शादी में गया था।
अपनी तरफ से उसे उपहार में एक सूट दिया था।
शादी के बाद मधु अपने ससुराल चली गई, वहाँ से भी मुझे वह फोन करती थी। और मेरा हालचाल पूछती रहती थी।
मधु का पति मेरी दोस्ती से बहुत खुश था, क्योंकि हमारी दोस्ती सच्ची और पवित्र थी। मैं मधु की दोस्ती को सच्ची दोस्ती मानता हूँ, और मानता रहूँगा।
गल्लामंडी, गोलाबाजार
गोरखपुर-२७३४०८ (उ.प्र.)
दूरभाष : ९८३८९११८३६