सदन की काररवाई के दौरान अध्यक्षजी वक्तव्य दे रहे सांसद को टोकते हैं—आपका समय पूरा हो गया, अब समाप्त करिए...। सांसद कहते हैं, बस एक मिनट और। अध्यक्षजी फिर रोकते हैं तो सांसद कहते हैं, अच्छा तीस सेकंड और दे दीजिए...एक कविता से समापन करूँगा! और फिर वे अपने वक्तव्य का समापन स्वयं की लिखी अथवा किसी और कवि की पंक्तियों से करते हैं।
ऐसा कोई एक-दो सांसद नहीं करते वरन् अधिकांश सांसद यही करते हैं और अपने वक्तव्य का समापन कविता की पंक्तियों से करते हैं। कुछ सांसद तो वक्तव्य का प्रारंभ भी कविता की पंक्तियों से करते हैं। उन्हें लगता है कि कविता से उनका वक्तव्य प्रभावशाली बनेगा। साथ ही उन पंक्तियों में समाहित गहरे भाव और अर्थ वह बात कह देते हैं, जिन्हें सामान्य तौर पर सही अभिव्यक्ति देना कठिन होता है। कुछ सांसदों द्वारा कहे गए शेर याद आते हैं—
कहानी जो अपनी सुनाने लगेंगे
तो पत्थर भी आँसू बहाने लगेंगे।
× × ×
तुम्हारी फाइलों में गाँव का
मौसम गुलाबी है...
मगर ये आँकड़े झूठे हैं,
ये दावा किताबी है।
कुछ वर्षों पहले सुषमा स्वराजजी द्वारा उद्धृत शेर आज भी कितनी ही विधानसभाओं में गँूजता है—
तू इधर-उधर की न बात कर
ये बता कि कारवाँ क्यों लुटा
मुझे रहजनों से गिला नहीं
तेरी रहबरी का सवाल है...!
वर्तमान प्रधानमंत्री भी कविता की पंक्तियों अथवा शेरो-शायरी को खूब पिरोते हैं। एक बार उन्होंने निदा फाजली के ये शेर उद्धृत किए थे—
सफर में धूप तो होगी
जो चल सको तो चलो
सभी हैं भीड़ में,
तुम भी विकल सको तो चलो
× × ×
किसी के वास्ते राहें कहाँ
बदलती हैं...
तुम अपने आपको खुद ही
बदल सको तो चलो...
एक बार उन्होंने यह शेर कहा था—
जिंदगी भर गालिब
ये भूल करता रहा
धूल आँखों में थी, लेकिन
चश्मा साफ करता रहा...।
हालाँकि यह शेर गालिब का नहीं है, वरन् गीतकार बुद्धिसेन शर्मा के शेर का बदला रूप है।
एक पूर्व प्रधानमंत्री, जिन पर कम बोलने या मौन रहने का आक्षेप लगाया जाता था; उन्होंने इस आक्षेप का जवाब एक शेर के माध्यम से दिया था—
हजार बोलों से बेहतर है
मेरी खामोशी...
न जाने कितने सवालों की
आबरू रख ली!
देश के पूर्व प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री ने ताशकंद समझौते की रात में अपनी डायरी में यह शेर लिखा था—
बड़े शौक से सुन रहा था
जमाना...
हमीं सो गए दास्तां कहते-कहते।
अपनी मृत्यु से कुछ ही पहले उनका यह शेर लिखना कितना विचित्र संयोग है, जैसे उन्हें पूर्वाभास हो गया था।
देश के पहले प्रधानमंत्री की मेज पर कवि राॅबर्ट फ्रस्ट की एक कालजयी कविता की ये पंक्तियाँ लिखी रहती थीं—
जंगल बहुत घने एवं
अँधेरे भरे हैं...
लेकिन सोने से पहले
मुझे मीलों चलना है!
देश के राष्ट्रपति जब राष्ट्र के नाम संदेश देते हैं तो उनमें प्राय: महान् कवियों की पंक्तियों का समावेश अवश्य मिलता है। कभी रवींद्रनाथ टैगोर की पंक्तियाँ, कभी तिरुवल्लुवर, कभी सुब्रह्मण्यम भारती, कभी तुकाराम अथवा नामदेव आदि की पंक्तियाँ...!
वर्तमान समय में एक मुख्य चुनाव आयुक्त ने अपनी हरेक प्रेस वार्त्ता में शेरो-शायरी के माध्यम से वह बात कहने का प्रयास किया, जो अन्यथा कहे जाने पर नििश्चत ही विवाद को जन्म देती।
अकसर लोकसभा में रेल बजट (पहले अलग से प्रस्तुत होता था) अथवा मुख्य बजट जैसे शुष्क विषयों की प्रस्तुति के समय भी वित्त मंत्रियों ने कविता का सहारा लिया है।
कविता के साथ का सिलसिला सदियों पुराना है। एक मार्मिक प्रसंग याद आता है। प्रथम स्वाधीनता संग्राम के नायक बहादुरशाह जफर चूँकि शायर थे, इसलिए एक अंग्रेज अफसर ने उन्हें अपमानित करने के लिए ये शेर लिखकर भेजा—
दमदमे में दम नहीं है,
खैर माँगो जान की
ऐ जफर, अब बुझ चुकी है
तेग हिंदुस्तान की...!
(दमदमा—मोर्चाबंदी, तेग—तलवार)
बहादुरशाह जफर ने उत्तर में जो शेर लिखकर भेजा, वह रोमांचित कर देता है—
दमदमे में दम बहुत है,
खैर माँगो जान की...
तख्ते लंदन तक चलेगी
तेग हिंदुस्तान की...।
पुराने समय में राजाओं के दरबार में कवियों की अनिवार्य उपस्थिति भी कविता के महत्त्व को दरशाती है। युद्ध के समय सेनाओं को जोश दिलाने का काम भी कवि अपनी जोशीली वीररस की कविताओं से करते थे। कविताओं का प्रभाव यदि जनमानस पर पड़ता है तो राजाओं और सत्ताओं पर भी पड़ता है।
महाकवि बिहारी का प्रसंग सर्वविदित है। जब महाराजा नवविवाहिता पत्नी के प्रेम में राजकाज से कुछ विमुख होने लगे तो बिहारीजी ने उन्हें दोहा लिखकर भेजा—
नहि पराग नहि मधुर मधु
नहिं विकास इहि काल...।
अली कली ही सो विंध्यो
आगे कौन हवाल॥
कुछ और मार्मिक प्रसंगों का उल्लेख प्रासंगिक होगा—अंग्रेजों द्वारा छल करके उत्तर प्रदेश, बिहार आदि से जिन भारतीयों को त्रिनिदाद, मॉरीशस, फीजी ले जाया गया, वे गिरमिटिया कहलाए। ये मजदूर यदि हिंदी में बात करते थे तो अंग्रेज सुरक्षाकर्मी इन पर कोड़े लगाते थे। अंग्रेजों का उद्देश्य था कि भारतीय मजदूर अपनी भाषा-संस्कृति को भूल जाएँ। तो इन भारतीयों ने तरकीब निकाली। रात में जब पहरे हट जाते तो ये सब मिल बैठते। कोई हनुमान चालीसा सुनाता, कोई लोकगीत सुनाता, कोई कविताएँ। इस तरह इन गिरमिटियों ने कविता का सहारा लेकर अपनी भाषा और संस्कृति की रक्षा का प्रयास किया।
कविता के प्रभाव का सबसे बड़ा उदाहरण तो भारत का स्वाधीनता संग्राम है। तब न सोशल मीडिया था, न टेलीविजन, न रेडियो, न ही अखबारों-पत्रिकाओं की पहुँच थी, अधिकांश आबादी गाँवों में थी तथा शिक्षा से वंचित और गरीब थी। राजा-नवाब अंग्रेजों के पक्षधर थे, बुद्धिजीवी अंग्रेजों के प्रशंसक थे, एक वर्ग मुसलिम शासन समाप्त करने के कारण, अंग्रेजों के साथ था। ऐसी विषम परिस्थिति में स्वाधीनता की व्यापक चेतना जगाने, उसे गाँव-गाँव तक पहुँचाने का सबसे बड़ा दायित्व देशभर के कवियों और लोकगीतकारों ने ही सँभाला था।
आज के समय में जब हम इतने अपराध, इतनी हिंसा, इतनी क्रूरता, संवेदनहीनता देख रहे हैं तो ये कहने में अतिशयोक्ति नहीं होगी कि हम कविता से दूर हो गए हैं। बचपन से ही कविताएँ हमें संस्कारित करती थीं। बच्चे के जन्म से अंतिम समय तक कविताएँ किसी-न-किसी रूप में हमें जीवन-मूल्यों से जोड़ती थीं। किसी भी धर्म में विवाह के समय बारात के लिए स्वागत गान अथवा सेहरा पढ़ना कविता के महत्त्व को दरशाता था। अमेरिका के राष्ट्रपति के शपथ ग्रहण पर कविता-पाठ भी होता है।
आवश्यकता है कि देशवासी कविताओं से जुड़ें, उनसे संस्कार और महान् आदर्श सीखें। एक सभ्य-सुसंस्कृत समाज के लिए कविता का साथ अनिवार्य है।
(लक्ष्मी शंकर वाजपेयी)