जब नहीं थी बिजली
वह भी इक युग था।
आज युग बदल गया
जहाँ एक शब्द
गहरे गले में जाकर
हो गया है लुप्त,
बन गया है गुप्त।
कभी हर घर में होती थी
लालटेन।
काँच की चिमनी
ढिबरी वाली लालटेन
मिट्टी का तेल
उसका आहार।
करती उजाला उस पार।
अँधेरा होता दूर
करती रोशनी भरपूर।
रास्ता दिखाती, साथ निभाती।
समय बीता, जब बिजली आई।
चमक-दमक बढ़ी
लालटेन हो गई विलीन।
हम होते रहे दिशाहीन।
आज की पीढ़ी,
सही-गलत का अंतर नहीं जानती
बड़ों का कहा नहीं मानती।
लालटेन जलाने के लिए
भरते थे तेल।
जलाते बाती, रोशनी हो जाती।
अब तो हाथ उठाया,
बटन दबाया
जल गई बत्ती
हो गई छुट्टी।
बिजली हमारा जीवन है
नए-नए आविष्कारों ने
हमें बना दिया नाकारा।
आज की पीढ़ी
बन गई आवारा।
कानफाड़ू संगीत, इनकी पसंद।
सरलता, सहजता हो गई लुप्त
जैसे लालटेन।
आज का जीवन
केवल दिखावा
दौलत के रंग,
शरीर के अंग
बाजार सजा है
काबू नहीं हालात पर।
यह पीढ़ी, कितना गिरेगी
इसका हल न इनके पास है,
न हमारे पास।
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