जाने-माने कवि-लेखक। अब तक आराधना अग्नि की, शिव ओम अंबर की चुनी हुई गजलें, शब्दों के माध्यम से अशब्द तक (गीत-संग्रह), अंतर्ध्वनियाँ (लघु कविताएँ), दोहा द्विशती, त्रिदलम् उद्भावनाएँ, अक्षर मालिका, इकाइयाँ, सजल सप्तक-५ में प्रतिभागिता। (गद्य रचनाएँ) गवाक्ष-दृष्टि, परिदृश्य, आलोक-अभ्यर्चन समसामयिक महत्त्व के आलेख एवं अथातो गीतिका व्याख्या, आस्वाद के आवर्त। साहित्य कोना (सात खंडों में) एवं संपादित गजल-संग्रह
दुष्यंत स्मृति सम्मान, साहित्य-भूषण सम्मान, राष्ट्रीय प्रदीप सम्मान, भानुप्रताप शुक्ल स्मृति राष्ट्र धर्म सम्मान, पंडित दीनदयाल उपाध्याय पुरस्कार एवं अन्य अनेक सम्मान।
: एक :
लोग जो हर दौड़ में, प्रायः प्रथम देखे गए
वो रहे संत्रस्त ही, संतुष्ट कम देखे गए
घाट पर याचक बना बैठा दिखा कल सुंदरम्
हाट में आकर खड़े सत्यम्-शिवम् देखे गए
धृष्टताओं ने चखा वर्जित फलों को बेहिचक
शिष्टताओं के लिए सौ-सौ नियम देखे गए
सेज पर तम की मिली हैं रोशनी की पायलें
लड़खड़ाते मूल्यमानों के कदम देखे गए
आइनाखाना थी ये दुनिया कोई दूजा न था
जिस तरफ नजरें उठीं इक हम-ही हम देखे गए
: दो :
पीड़ा के पर्वत हैं हम
अक्षर हैं शाश्वत हैं हम
क्या प्रतिकार करें आखिर
अपनों से आहत हैं हम
बाँचों मत, महसूस करो
आँसू भीगे खत हैं हम
परिपाटी के पृष्ठों पर
एक पृथक् अभिमत हैं हम
युग है कोलाहलधर्मी
गजलों के संवत् हैं हम।
: तीन :
शुभ शोभन शाश्वत सौगातें
शास्त्रों की, संतों की बातें
इक उजले पल की आशा में
कट जाती हैं काली रातें
आँखों से ओझल हो तुमने
बैठा दीं इनमें बरसातें
शाहों से अकसर टकराईं
कंगालों की क्रुद्ध जमातें
कवि की जीवन-गाथा, यानी
शह पर शह, मातों पर मातें
: चार :
स्नेह की संहिता रही है माँ
भागवत की कथा रही है माँ
इक मुझे चैन से सुलाने को
मुद्दतों रतजगा रही है माँ
दाह खुद को, प्रकाश जगती को
वर्तिका की शिखा रही है माँ
मंजु मुसकान की लिखावट में
अश्रुओं का पता रही है माँ
दृष्टि में ले अनंत आद्र्राएँ
उम्र भर मृगशिरा रही है माँ
: पाँच :
जिनमें अंतर्नाद नहीं है
उन शब्दों में स्वाद नहीं है
अग-जग से चर्चा-परिचर्चा
इक खुद से संवाद नहीं है
ये संवित् है या सम्मूच्र्छा
मन में हर्ष-विषाद नहीं है
पिछली बार हँसे थे हम कब
हमको बिल्कुल याद नहीं है
पीड़ा है परिलब्धि सभी की
कोई भी अपवाद नहीं है।
४/१०, नुनहाई,
फर्रूखाबाद-२०९६२५ (उ.प्र.)
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