परिवार नहीं होगा तब?

परिवार नहीं होगा तब?

जाने-माने साहित्यकार। आठ ललित-निबंध संग्रह, एक नवगीत, एक संत-साहित्य आदि पुस्तकें प्रकाशित तथा पत्रिका ‘अक्षत’ का संपादन। ‘वागीश्वरी पुरस्कार’, ‘सृजन सम्मान’, ‘श्रेष्ठ कला आचार्य सम्मान’, ‘निर्मल पुरस्कार’, ‘राष्ट्रधर्म गौरव सम्मान’, ‘ईसुरी पुरस्कार’, ‘दुष्यंत कुमार राष्ट्रीय अलंकरण’ सहित अनेक सम्मान प्राप्त।

इधर पढ़ने, सुनने और देखने में आ रहा है कि आजकल के आधुनिक शिक्षा प्राप्त छोरा-छोरी विवाह नहीं करना चाहते हैं। आग्रह-दुराग्रह से जैसे-तैसे विवाह कर भी लिया तो संतान पैदा नहीं करना चाहते हैं। वे अपने माता-पिता के साथ रहना नहीं चाहते हैं। परिवार उनको बंधन-सा लगता है। उन्हें रिश्तों-नातों से कोई सरोकार नहीं है। सगे-संबंधियों से वे मिलना-जुलना नहीं चाहते हैं। उन्हें पहचानना नहीं चाहते हैं। वे अपना जीवन अपने तरीके से जीना चाहते हैं। वे अपना व्यक्तित्व पैसे कमाने की मशीन की तरह विकसित करना चाहते हैं। वे बहुराष्ट्रीय कंपनियों या निजी उद्यम के आधार पर बाजार के कोलाहल में एक वस्तु बनकर दिखना चाहते हैं। न वे परिवार बनाना चाहते हैं। न वे परिवार बसाना चाहते हैं, न परिवार में रहना चाहते हैं। उनका स्व इतना स्वकेंद्रित हो गया है कि वे उससे बाहर आत्मविस्तार करना निरर्थक समझते हैं। ऐसे युवक-युवतियों की संख्या निरंतर बढ़ रही है। परिवार-संस्कार की नाव पर वे बैठकर पच्चीस-तीस वर्ष की अवस्था की नदी को पार कर परिवार की नैया को मझधार में धकाकर उस पार बहुत दूर चले जाना चाहते हैं। अकेलेपन से भरे और शून्य से गहराते हुए धन के कोलाहल भरे संसार में चले जाना चाहते हैं। 
परिवार नहीं होगा; तब समाज कैसा होगा? मनुष्य कैसा होगा? जीवन कैसा होगा? मनुष्य के परिवार से जुड़े हुए अन्य जीवों का जीवन कैसा होगा? परिवार से जुड़ी हुई प्रकृति का जीवन कैसा होगा? नदी, पर्वत, खेत-खलिहान की हँसी का क्या होगा? तब सुबह के आकाश में रंगोली कौन माँडेगा? वह सुबह कैसी होगी? साँझ के आकाश में कुमकुम कौन बिखेरेगा? वह साँझ कितनी उदास ढलेगी? तुलसी बिरवा पर एक कलश जल कौन चढ़ाएगा? गाय को पहली बनी हुई रोटी कौन खिलाएगा? नदी के जल में खडे़ होकर सूर्य को अर्घ्य कौन देगा? क्या माँ का आँचल किलकारियों से शून्य हो जाएगा? अपनी माँ के आँचल को धन्यता कौन देगा? आँगन घुटने-घुटने चलते हुए राम-कृष्ण की रुनझुन से रहित हो जाएगा? पिता के सान्निध्य में संस्कारों की किताब कौन बाँचेगा? यह सब सोचकर सिहर उठता हूँ।
परिवार तो पशु-पक्षियों का भी होता है। बिना माता-पिता के सृष्टि का कोई भी जीव जन्म नहीं लेता है। जीव चार प्रकार के बताए गए हैं— अंडज, पिंडज, उद्भिज, स्वेदज। इन सभी की उत्पत्ति में पुरुषतत्त्व और स्त्रीतत्त्व का किसी-न-किसी रूप में सुमेल होता ही है। पशु-पक्षी भी अपनी संतान को और संतान भी अपनी माँ को प्यार करते हैं। जब तक पशु या पक्षी का बच्चा सक्षम, स्वयंरक्षक और आत्मनिर्भर नहीं हो जाता, तब तक माता-पिता उसके सुरक्षा-कवच और पालनहार होते ही हैं। उनमें भी आपस में स्नेह, प्यार, ममता, आतुरता, उत्कंठा, उत्सुकता कम या अधिक अवश्य रहती है। आत्मनिर्भर होने पर भी पशु-पक्षी अधिकांशतः समूह में रहते हैं। वही उनका परिवार भी हो जाता है। पालतू पशु-पक्षी अपने पालनहार के परिवार के साथ ममतालु और आत्मीय संबंध अनुभव करने लगते हैं। मनुष्य के परिवार के वे पाल्य पशु-पक्षी सदस्य बन जाते हैं। गाय के साथ यह संबंध अत्यंत आत्मीय एवं प्रगाढ़ होता है। देखने में तो यह आया है कि नदी, सरोवर, अमराई, वृक्ष, लता, पर्वत, झरने, कुएँ, बावड़ी, घाट, गलियाँ निकट रहने वाले मनुष्य-परिवारों के आत्मीय सदस्य बन जाते हैं। उनसे अलग होने पर मनुष्य रोता है। रह-रहकर उनको याद करता है। अपने आसपास की खोई हुई निःसर्ग सुषमा की याद में बार-बार झुरता है। उसे पुनः-पुनः पाना चाहता है। 
मनुष्य मनुष्य है। पुराकथाओं के अनुसार वह मनु का पुत्र है। शतपथ ब्राह्म‍ण से सूत्र लेकर रची गई महाकवि जयशंकर प्रसाद की अमर कृति ‘कामायनी’ भी यही कहती है। दूसरी विशेष बात यह है कि मनुष्य के पास मन है, इसीलिए वह मानव है। और विशेष बात यह है कि ईश्वर ने उसे अनेक अनुपम उपहार दिए हैं। उसे बुद्धि प्रदान की है। उसे विवेक दिया है। उसे अद्वितीय वाणी दी है। उसे सद्-असद् की समझ दी है। उसे कर्म की प्रवृत्ति दी है। उसे कौशल दिया है। उसके भीतर आत्मतत्त्व है। वह आत्मतत्त्व का विस्तार मानुषभाव में करता है। मानुषभाव ही उसे सच्चा मनुष्य बनाता है। जीवन धारण करने का उद्देश्य पूरा करता है। जीवन धन्य हो जाता है। धरती गौरव पाती है। माँ की कोख धन्यता को प्राप्त होती है। इन्हीं सब कारणों से मनुष्य मनुष्य है। आत्मविस्तार के कारण ही वह दूसरों से जुड़ता है। आत्मीयता स्थापित करता है। परिवार बनाता है। समाज निर्माण करता है। जीवन में अकेलापन फटकने नहीं पाता है। यह सभी प्रकृति पशु-पक्षियों एवं अन्य जीवों में अत्यल्प होती है, पर होती अवश्य है। उनके जीवन-विकास की परिधि होती है। मनुष्य असीम संभावनाएँ लेकर जनमता है। ये संभावनाएँ सही दिशा में यदि फलीभूत होती हैं तो मनुष्यजीवन, समाजजीवन, राष्ट्रजीवन और सृष्टिजीवन विहँसता है। अखंड आनंद घनीभूत हो जाता है। अखंड आनंद ही जीवन और सृष्टि का अंतिम आलोकबिंदु है। इस यात्रा की प्रथम कर्म-रेख परिवार से ही प्रारंभ होती है। इसीलिए परिवार जीवन की सार्थकता के लिए आवश्यक है। संयुक्त परिवार सफलता के लिए आवश्यक है।   
यह सत्य है कि संस्कार परिवार से ही मिलते हैं। बचपन के संस्कार जीवन भर मनुष्य के आसपास घूमते रहते हैं। साथ-साथ चलते रहते हैं। व्यक्तित्व बनाते हैं। कार्यों में झलकते हैं। व्यवहार में मुसकराते हैं। संस्कारों से दृष्टि बनती है। परिवार, माँ, पिता, परिवेश और प्रकृति से संस्कार बनते हैं। परिवेश और प्रकृति बनती है—घर-परिवार से। सांस्कृतिक अनुष्ठानों से। श्रद्धा से। विश्वास से। अभ्यास से। प्रयोजन से। अभिप्रायः से। यह सब बनते हैं—संस्कृति से। इन सबके निर्माण में प्रत्येक युग के प्रत्येक संस्कारित जन-युवा, बाल, वृद्ध, दादा, दादी, नाना, नानी, माँ, पिताजी, भैया, भाभी, पति, पत्नी, बेटा, बेटी, बहन, बहनोई, फुई, फुआजी, पोता, पोती, नाती, नातीन, भतीजा, भतीजी सबकी संबंध-सुवास और कर्म-शक्ति काम करती रहती है। एक व्यक्ति के निर्माण में एक पूरा कुटुंब तथा समाज प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से नेह-माला गँूथता रहता है। दृष्टि के निर्माण में पूरे संस्कारों का निधिवन मौन सक्रिय रहता है। तब परिवार के बेटा-बेटी के व्यक्तित्व में संस्कार बोलते हैं। मनुष्य की महिमा बढ़ती है। जीवन की मूल्यवत्ता सँवरती है। एक साफ-सुथरी, सरल-तरल जीवन-दृष्टि से मानवता का पथ आलोकित होता है, तब सौंदर्य की केवल पूजा ही नहीं होती; सौंदर्य को आत्मसात् करने वाली लालिमा गहराती है। यह दृष्टि ही घटना, वस्तु, व्यक्ति और व्यक्तित्व के स्थूल के भीतर धँसकर उसके सांस्कृतिक संदर्भों, उसके जीवन-अर्थों और शाश्वत मूल्यों को प्रणाम करती है। अपने साथ बहुत कुछ ललित लेकर लौटती है। यह सृष्टि सौंदर्य से भरी-पूरी है। ललित सौंदर्य का बेटा है। ललिताभा सौंदर्य की बेटी है। जीवन में दोनों का बचा रहना, सुरक्षित रहना और विहँसना मानव-हित और सृष्टि-हित में है।
परिवार की रचना केवल व्यक्तित्व के विकास का ही सोपान नहीं है। परिवार बना, परिवार से संबंध बनें। संबंधों से संस्कार बनें। संस्कारों से व्यक्ति, समाज और राष्ट्र समृद्ध हुआ। वैश्विक समाज में समरसता और शांति का सहज प्रसार हुआ। परिवार रचना की एक व्यापक भूमिका संस्कार, सभ्यता और संस्कृति के निर्माण में रेखांकित होती रही है। संबंधों के आधार पर भाषा में संबोधन-शब्द आए। हमारी भाषा में माँ, पिता, भाई, बहन, पति, पत्नी के अतिरिक्त संबंधों के आधार पर शब्द हैं। पश्चिम की भाषाओं, विशेषकर अंग्रेजी में मदर, फादर, सिस्टर, ब्रदर, हसबैंड, वाईफ ही शब्द हैं। अन्य शब्द उन्होंने जबरदस्ती दो शब्दों को मिलाकर गढ़े हैं। यह स्वभाविक है, क्योंकि उनके यहाँ परिवार के आधार पर नहीं, जैविक आधार पर चार ही व्यक्ति निकट होते हैं। भारतीय समाज व्यवस्था में संयुक्त परिवार में गोत्र और वंशनुक्रम में अनेक व्यक्ति साथ रहते हैं। इनका संबंध केवल जैविक नहीं, आत्मीय होता है। अब यदि वर्तमान आधुनिक शिक्षा और अर्थ की अंधी दौड़ वाली जीवन-राह घुप्पखोह में व्यक्ति को ले जाएगी, तो समाज, परिवार, व्यक्ति सब खंडित और अधूरे हो जाएँगे। विवाह न करने पर तो सृष्टि की सहज धारा ही बंद हो जाएगी। विवाह करने के बाद बच्चा न पैदा करने की कुंद मानसिकता सृष्टि की स्वाभाविक धारा को अवरुद्ध कर धारा में पहाड़ खड़ा कर देगी। संतान के रूप में एक बालक या एक बालिका होने की दशा में काका, काकी, मौसा, मौसी, भानजा, भानजी, भाई, बहन, भतीजा, भतीजी आदि संबोधन से वह बालक एवं बालिका किसको पुकारेगी? परिवार और समाज का टूटना, बिखरना, समाप्त होना भाषा की संस्कृति का समाप्त हो जाना है। आकाश में खींची संस्कारों की रेखा का मिट जाना है। संस्कृति की लालिमा का लुप्त हो जाना है। मानव, समाज, राष्ट्र, विश्व और सृष्टि के हित में यह किसी भी दशा और स्थिति में शुभ नहीं है। माँ की गोद में किलकारी भरता हुआ शिशु ही मानव का भविष्य-स‍्रष्टा है।
अकेलापन जीवन के लिए अभिशाप है। अध्ययन से यह जाना कि सृष्टि के रचयिता ने भी अपने अकेलेपन को तोड़ने के लिए यह जगत् बनाया है। धरती से सौरमंडल तक विविध रंगी सुंदर ग्रह, नक्षत्र, प्रकृति, निःसर्ग मनुष्य, जीव, जंतु, सूर्य, चंद्र आदि अनंत-अनंत बनाए हैं। इन सबका परिवार है। वन में कोई वनस्पति अकेली नहीं है। उद्यान में भी नहीं। परिवार तो सबका है। तब फिर इस अंधी आधुनिकता की खोह में मनुष्य क्यों अकेला धँसता चला जा रहा है? वर्षों पहले पश्चिम के देशों ने, विशेषकर अमेरिका ने यह प्रचारित किया कि अकेलापन ही व्यक्तित्व विकास का कारण है। यह अठारहवीं शताब्दी में आई औद्योगिक क्रांति की उपज है। उद्योगों ने, बहुराष्ट्रीय कंपनियों और बाजारों ने मनुष्य को भी औद्योगिक उत्पाद करने के लिए सहायक कच्चा माल समझ लिया है। मशीन की तरह मनुष्य भी इनमें उपयोग किया जा रहा है। उन्हीं देशों में अब अकेलापन महामारी की तरह फैल रहा है। भारत भी उस अँधेरी राह में उत्सुकता से बढ़ा जा रहा है। विशेषकर भारत के बेटा-बेटी उस ओर बिना सोचे-समझे दौडे़ जा रहे हैं। संयुक्त परिवार टूटे। एकल परिवार बने। माँ-पिता अकेले रहने के लिए अभिशप्त हैं। घर खाली हो रहे हैं। वृद्धाश्रमों में जगह नहीं है। बेटा-बेटी माता-पिता के साथ परिवार में रहना नहीं चाहते हैं। वे अपने साथ माता-पिता को भी रखना नहीं चाहते हैं। जो माता-पिता अपनी संतान को अपनी पलकों की छाँव में रखते रहे हैं; उन्हीं माता-पिता को परिवार और संतान का आश्रय दुर्लभ हो गया है। जो माता बेटे को एक पल के लिए भी अपनी आँखों से दूर नहीं करना चाहती थी, उसी माता को अब बेटा देखना नहीं चाहता है। अब व्यक्ति या बेटा-बेटी अकेले ही रहना चाहते हैं। यह उन्हें अपने व्यक्तित्व विकास और वैयक्तिक स्वतंत्रता के लिए लुभावना पथ लग रहा है, पर यह जादू बहुत जल्दी ऊब, निराशा, उदासी, कुंठा, आत्म-संकुचन और अकेलेपन में बदलने लगता है। इन सबसे मुक्ति पाने के लिए ही तो बहुत-बहुत समय पहले हमारे पूर्वजों ने परिवार नामक सुंदर रचना रची है। घर बनाया है, माँ-पिता, भाई-बहन, बंधु-बांधव, सगे-संबंधी, रिश्ते-नाते स्थापित किए हैं। ईश्वर करे, यह सब कभी न टूटे। कभी न छूटे। कभी न बिखरे। ममता और आत्मीयता की छाया में मानव सुख से बिरमे।    
भारत को पूरा विश्वास है कि उस पार गए हुए बेटा-बेटी अवश्य परिवार में लौटकर आएँगे। वह देखो! उस पार कोई चला आ रहा है। एक आत्मीय पुकार सुनाई दे रही है। सुबह से उड़कर गई हुई चिड़िया अपने घोंसले की ओर उड़कर चली आ रही है। उसके पंखों पर उत्साह बैठा है। 


आजाद नगर, 
खंडवा-४५०००१
दूरभाष : ९४२५३४२७४८

हमारे संकलन