कुत्ता कमेटी

कुत्ता कमेटी

सुपरिचित लेखक। युवाओं, महिलाओं, शिक्षा, हिंदी भाषा तथा व्यंग्य पर लगभग ५०० लेख, २० शोध निबंध तथा अनेक कविताएँ, कहानियाँ प्रकाशित। देश-विदेश की अनेक संस्थाओं द्वारा लगभग तीन दर्जन सम्मानों से अलंकृत। अनेक देशों की साहित्यिक-सांस्कृतिक यात्राएँ। संप्रति श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स, दिल्ली में प्रोफेसर एवं हिंदी विभागाध्यक्ष।

ताऊ भीम सिंह बहुत नाराज हैं। उनका नाराज होना जायज भी है। परसों उनकी पोती श्रेया को उसके कॉलेज में एक कुत्ते ने काट लिया। दरअसल हुआ यह कि वह कुत्ता भारतीय था तो स्वाभाविक रूप से हिंदी अच्छी जानता था और अंग्रेजी की कहावतें न उसने पढ़ी थीं, न सुनी थीं, जबकि ताऊ भीम सिंह की पोती अंग्रेजी माध्यम से पढ़कर आई थी और उसे अंग्रेजी की कहावतें अच्छी तरह से कंठस्थ थीं। उसने पढ़ा था कि ‘बार्किंग डॉग्स, सेल्डम बाइट’ अर्थात् जो कुत्ते भौंकते हैं, वे प्राय: काटते नहीं। वह इसी नियम से चल रही थी। 
कॉलेज में कुत्तों की जनसंख्या भारतीय जनसंख्या की तरह अभूतपूर्व वृद्धि को प्राप्त हो रही थी। कॉलेज में एक कुत्ता श्रेया की विचित्र वेशभूषा को देखकर हैरान-परेशान हुआ। वह भौंकते हुए अपना विरोध प्रदर्शन करने लगा तथा भौंकते हुए उसके पीछे चल रहा था। भारत में अपना विरोध प्रदर्शन करने को सबको मौलिक अधिकार है, तो ऐसे में कुत्ते भला पीछे क्यों रहें। श्रेया निश्चिंत थी, क्योंकि उसने अंग्रेजी में पढ़ रखा था कि भौंकने वाले कुत्ते काटते नहीं हैं, मगर चूँकि उस कुत्ते ने अंग्रेजी की यह कहावत पढ़ी-सुनी नहीं थी, लिहाजा उसने श्रेया को काट लिया। 
श्रेया बहुत चीखी-चिल्लाई, मगर कुत्ते ने कोई दया नहीं दिखाई। श्रेया ने घर जाकर अपने दादाजी को यह बात बताई। ताऊ भीम सिंह तो पहले ही अपनी कॉलोनी के कुत्तों से बहुत परेशान थे। इसका कारण था—ताऊ का लंबा-तगड़ा कसरती बदन, हाथ में भीमसेनी लट्ठ, धोती-कुरता और पगड़ी। शहरी कुत्ते इस तरह के रूप से अपरिचित थे। वे ताऊ को किसी अन्य ग्रह का प्राणी समझकर पूरे दल-बल के साथ उन्हें अपने क्षेत्र से बाहर खदेड़ने के लिए प्रयास करते। ताऊ पुरानी कहावत—‘कुत्ते भौंकते रहते हैं, हाथी चलते रहते हैं’ के अनुसार अपनी मस्तानी चाल से चलते चले जाते। 
श्रेया के साथ कुत्ते की यह बदतमीजी ताऊ को बरदाश्त नहीं हुई। वे अगले दिन ही अपनी पोती के कॉलेज पहुँच गए। कॉलेज के प्राचार्य ने खेद व्यक्त करते हुए इस पर आवश्यक काररवाई करने का आश्वासन दिया। प्राचार्य कोई घुटे हुए राजनेता तो थे नहीं, जो आश्वासन देकर भूल जाते। लिहाजा उन्होंने अगले दिन ही कॉलेज डिसिप्लिन कमेटी की बैठक बुलाई। डिसिप्लिन कमेटी ने इस विषय पर अपने हाथ खड़े कर दिए। कमेटी के सदस्यों का कहना था कि यह विषय उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता, क्योंकि यह कमेटी विद्यार्थियों को अनुशासित करने के लिए बनी है, न कि कुत्तों को। रही बात लड़की को अनुशासित करने की, तो वह भी संभव नहीं था, क्योंकि लड़कियों को फटी जींस पहनने या कॉलेज में उल-जलूल कपड़े पहनकर आने से रोकना उनके नारी स्वातंत्र्य के अधिकार का हनन होगा। वैसे भी आजकल जब माँ-बाप ही अपने बच्चों को नहीं रोक पा रहे तो शिक्षकों को ऐसा असाधारण रिस्क लेने की क्या आवश्यकता है।
प्राचार्य ने सब बातें सुनीं, समझीं और मामले को सुलझाने के लिए एक विशेष कमेटी बनाने का विचार किया। प्रत्येक समझदार प्राचार्य ऐसा ही करता है। इस नई कमेटी के नामकरण को लेकर भी बहुत वाद-विवाद हुआ। वह कमेटी ही क्या, जिसमें वाद-विवाद न हो, असहमति न हो, बहिष्कार न हो। किसी ने कहा कि इसका नाम ‘कुत्ते हटाओ कमेटी’ होना चाहिए तो विरोधी पक्ष ने तुरंत ही अपनी असहमति जताते हुए ‘कुत्ते बचाओ कमेटी’ नाम सुझा दिया। किसी एक नाम पर सहमति न बनती देखकर यह प्रस्ताव आया कि इस कमेटी का नाम ‘कुत्ता कमेटी’ ही रख देते हैं। इसका भी विरोध हुआ। प्रश्न उठा कि कुत्ता कमेटी के सदस्य क्या कहलाएँगे। अंत में तय हुआ कि जब तक कोई बेहतर नाम नहीं सूझता, कुत्ता कमेटी नाम ही चलने देते हैं। और अपने देश में जो नाम एक बार चल जाता है, वह आसानी से बदलता नहीं। व्यक्ति को भी अपना नाम बदलने के लिए बहुत पापड़ बेलने पड़ते हैं, समाचार-पत्रों में विज्ञापन निकलवाना पड़ता है, शपथपत्र या घोषणापत्र देना पड़ता है, ऐसे में कॉलेज की कमेटी का नाम बदलना कोई हँसी-खेल नहीं होता।
कॉलेज में कुत्ता कमेटी गठित होने की खबर जंगल में आग की तरह फैल गई। पूरे विश्वविद्यालय में हलचल मच गई। कुत्ता कमेटी की बैठकें होने लगीं। कुत्तों द्वारा किए गए उत्पातों की सूची बनने लगी। पिछले वर्षों में कितने लोगों को कॉलेज के कुत्तों ने काटा, कुत्तों की संख्या वृद्धि की दर क्या रही है, कॉलेज के कुत्तों की कुल संख्या कितनी है, कितने कुत्ते अन्य कॉलेजों से यहाँ आकर बस गए, कुत्तों को कितने लोग खाना खिलाते हैं, कितने लोग कुत्तों के विरुद्ध शिकायतें करते हैं, आदि-आदि।
कुत्ता कमेटी का कार्य जैसे-जैसे आगे बढ़ा, कॉलेज की एकता डगमगाने लगी, जबकि कुत्तों की एकता जगमगाने लगी। कॉलेज में बाकायदा कुत्ता समर्थक एवं कुत्ता विरोधी दल बन गए। कुत्ता समर्थकों ने कहा, “बेचारे, निरीह, निर्दोष कुत्ते अपने विरुद्ध हो रहे षड्‍यंत्रों का विरोध नहीं कर पाते, इसलिए हमारा नैतिक दायित्व है कि हम उनके अधिकारों के लिए लड़ें, संघर्ष करें।” 
वास्तव में प्रत्येक संस्थान में एक वर्ग सत्ता विरोधी, प्रशासन विरोधी और कार्य विरोधी होता है। उसका काम ही होता है, किसी बनते काम को बिगाड़ना, सत्ता पक्ष या प्रशासन द्वारा किए जा रहे प्रत्येक कार्य का विरोध करना। ऐसा वर्ग सदैव अपने लिए कुछ-न-कुछ कार्य तलाशता रहता है। इस कॉलेज में भी एक ऐसा ही वर्ग था, जो बहुत दिनों से किसी मुद्दे की तलाश में था, ताकि उसे विरोध करने या धरने-प्रदर्शन की, कम-से-कम धमकी देने का अवसर तो मिले। उन्होंने इस अवसर को ऐसे लपक लिया, जैसे कुशल क्षेत्ररक्षक बैट से लगकर आई गेंद को लपक लेता है। उन्होंने कहा, “बेचारे कुत्ते तभी काटते हैं, जब वे भूखे होते हैं, इसलिए सब साथी उनके लिए खाने का प्रबंध करना शुरू करें, तभी इस समस्या का समाधान हो सकेगा।” 
कुत्तों के आतंक से परेशान पक्ष, जिसे कुत्ता समर्थक वर्ग कुत्ता विरोधी वर्ग कहता था, का कहना था, “अब बहुत हो चुका, हम और नहीं सह सकते। इन कुत्तों ने सबका जीना हराम कर रखा है। ये कुत्ते मनुष्यों की तरह भेदभाव नहीं करते। चाहे विद्यार्थी हों या शिक्षक, कर्मचारी हों या अतिथि, ये कुत्ते किसी को नहीं बख्शते। इनके कारण कॉलेज में आतंक का भाव रहता है। और-तो-और ये अकसर कक्षाओं में भी घुस जाते हैं। अब हम विद्यार्थियों को पढ़ाएँ या कुत्तों को?” इस प्रश्न पर पूरी कुत्ता कमेटी में ठहाके गूँज उठे।  
कुत्ता कमेटी ने इस समस्या की गंभीरता को समझते हुए इस पर विचार करने के लिए एक सब-कमेटी बना दी। सब-कमेटी के सदस्यों ने अध्ययन और शोध के बाद पता लगाया कि विदेशों में यह समस्या नहीं है। इस पर कुछ समझदार सदस्यों ने सुझाव दिया कि क्यों न विदेश जाकर पता लगाएँ कि वहाँ इस समस्या का समाधान कैसे निकाला गया। सभी सदस्यों ने समझदार सदस्यों की समझदारी के लिए उन्हें गले से लगा लिया। कुत्ता समर्थक और कुत्ता विरोधी दोनों इस विषय पर एकमत थे और उन्होंने आनन-फानन में ध्वनि मत से यह प्रस्ताव पारित कर दिया। 
कॉलेज प्राचार्य ने इस शर्त पर विदेश दौरे की अनुमति दे दी कि उनके द्वारा नामित उनके चहेते सदस्यों को भी विदेश यात्रा के लिए दल में शामिल किया जाए। भारत में अपना उल्लू सीधा करने के लिए कभी-कभी गधे को भी बाप बनाना पड़ता है। सब-कमेटी अपना उल्लू सीधा करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार थे। अत: सब सदस्यों से सहमति पाकर यह दौरा गुपचुप शुरू हो गया। सब-कमेटी ने कई देशों का दौरा किया और वापस आकर रिपोर्ट दी कि वहाँ के कुत्ते पढ़े-लिखे होते हैं, अत: वे केवल उन्हीं को काटते हैं, जिन्हें काटने का उन्हें लिखित आदेश मिलता है। इसलिए भारत में भी सभी कुत्तों को पढ़ाया-लिखाया जाए, उनके लिए विशेष प्रशिक्षण केंद्र खोले जाएँ। ऐसे में जब तक उन्हें लिखित आदेश नहीं दिया जाएगा, वे किसी को नहीं काटेंगे। इस प्रकार कुत्तों पर न अत्याचार होंगे, न उन्हें कोई तंग करेगा। उनके अधिकारों का हनन भी नहीं होगा और वे मान-सम्मान का जीवन बिता सकेंगे।
सब-कमेटी की इस रिपोर्ट को पढ़कर सब चकरा गए। अभी तक तो इस देश में सब बच्चों को पढ़ाने की उचित व्यवस्था नहीं हो पाई, कुत्तों के लिए कैसे होगी! सर्वसम्मति से इस रिपोर्ट को रद्द कर दिया गया। कुत्ता कमेटी के उन सदस्यों ने रिपोर्ट रद्द किए जाने का विरोध किया, जिन्हें विदेश जाने का अवसर नहीं मिला था, परंतु उनकी आवाज नक्कारखाने में तूती की तरह दबकर रह गई। कमेटी ने फिर से नए सिरे से समस्या के समाधान के लिए प्रयास करने शुरू कर दिए। अभी प्रयास चल ही रहे थे कि कुत्ता कमेटी के एक कुत्ता समर्थक सदस्य को ही एक कुत्ते ने कॉलेज में काट लिया। अब उन्हें ‘जाके पैर न फटे बिवाई, वह क्या जाने पीर पराई’ कहावत का अर्थ समझ आ गया। उन्हें मामले की गहराई और गंभीरता अब समझ में आ गई। कुत्ता कमेटी ने दो तिहाई बहुमत से निर्णय लिया कि कॉलेज में मौजूद सभी कुत्तों की नसबंदी करवाई जाए, ताकि उनकी सुरसा के मुँह की तरह बढ़ती जनसंख्या पर नियंत्रण लगाया जा सके। उनके गले में पट्टा पहनाया जाए, ताकि बाहरी कुत्ते कॉलेज में दूर से ही पहचाने जा सके। कुत्तों को खाना खिलाने पर रोक लगाई गई। 
कुत्तों का एक जासूस प्रतिनिधि कुत्ता कमेटी की सभी बैठकों में सदस्यों के आने से पहले ही कुरसी के नीचे दुबककर बैठ जाता था और सारी रिपोर्ट कुत्तों के मुखिया को देता था। उसने जैसे ही ये निर्णय मुखिया को बताए, उसकी आँखों से अंगारे बरसने लगे। वह जोर-जोर से गुर्राने और दाँत पीसने लगा। उसने तुरंत एक प्रतिनिधि मंडल तैयार किया और एक ज्ञापन बनवाया। प्रतिनिधि मंडल के सदस्य अपना ज्ञापन लेकर जीव कल्याण मंत्री के पास पहुँचा और अपना ज्ञापन उन्हें सौंप दिया। मंत्रीजी ने उन्हें आश्वासन दिया कि उनके अधिकारों का हनन नहीं होने दिया जाएगा। उन्हें न्याय दिलाने के लिए सरकार हरसंभव प्रयास करेगी और यदि आवश्यक हुआ तो एक कुत्ता संरक्षक अधिनियम भी विधानसभा के आगामी सत्र में लाया जाएगा।
कुत्तों का प्रतिनिधि मंडल संतुष्ट होकर लौट आया और कुत्तों की सभा में अपनी इस उपलब्धि की जानकारी दी। एक युवा कुत्ते ने उनकी उपलब्धि की हवा निकालते हुए कहा, “इन मनुष्यों की बातों पर आपको इतनी आसानी से विश्वास नहीं करना चाहिए। वैसे भी भारत में मंत्री कभी अपने आश्वासन पूरे नहीं करते।” मुखिया ने कहा, “बच्चे, मैंने भी घर-घर की रोटी खाई है। मैंने पक्की गोलियाँ खेली हैं। यदि मंत्रीजी ने अपने आश्वासन को पूरा नहीं किया तो हम विश्वविद्यालय के सारे कुत्ते मिलकर उनके बँगले का घेराव करेंगे। मैंने मंत्रीजी की सुरक्षा में लगे अपने साथियों से बात कर ली है। वे हमारी मदद के लिए तैयार हैं।”
मंत्रीजी कुत्तों के आक्रोश से परिचित थे। इसीलिए उन्होंने तुरंत उस विश्वविद्यालय के कुलपति को पत्र लिखा और कॉलेज के प्राचार्य को अपने निर्णय वापस लेने के लिए कहा। कुलपतिजी मंत्रीजी का पत्र पाकर हैरान-परेशान हो गए। उनके पास पहले से ही विश्वविद्यालय से संबंधित अनेक समस्याएँ लंबित पड़ी थीं, यह नई सिरदर्दी आ गई। उन्होंने कॉलेज प्राचार्य को बुलाया। सारा मामला समझा। प्राचार्य को समझा-बुझाकर इस बात के लिए राजी किया कि इस मामले में कोई निर्णय न लिया जाए, मामले को उसी प्रकार लटकाए रखा जाए, जैसे भारत के समझदार राजनेता मूलभूत समस्याओं को पिछले लगभग सात दशक तक लटकाए रखने में सफल होते रहे थे। प्राचार्यजी क्या करते! मन मसोसकर कुलपतिजी की बात मान ली। कॉलेज आकर कुत्ता कमेटी को भंग कर दिया और नई कुत्ता कमेटी के गठन की घोषणा कर दी। नई कुत्ता कमेटी ने अभी कार्यभार नहीं सँभाला है, जैसे ही वह काम करना शुरू करेगी, आपको नवीनतम स्थिति से अवगत करवा दिया जाएगा।

सुर-सदन, डब्ल्यू.जेड. १९८७, 
रानी बाग, दिल्ली-११००३४ 
दूरभाष : ९८११०३६१४०

 

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