सच्ची निष्ठा

क्या हुआ पूजा?”
“कुछ नहीं!”
“कुछ तो है? सुस्त लग रही हो, थकी-थकी सी।” मयंक ने चिंता जताई। 
“हाँ! काम की थकान तो हो ही जाती है, आप तो जानते ही हो। 
घर और नौकरी की दोहरी जिम्मेदारी है सिर पर, ऊपर से इनकी भी। इसी चक्कर में पूरा ध्यान भी कहाँ रख पाती हूँ? पूजा थके हुए से स्वर में बोली। 
“जानता हूँ! एक्सीडेंट में राकेश का पाँव कटने से तुम्हारा काम बहुत बढ़ गया है। बस कोल्हू के बैल की तरह पिली रहती हो।” 
“नहीं मयंक! ऐसा कुछ नहीं है, यह तो मेरा परिवार और मेरी जिम्मेदारी है। माँ, बाबूजी व इनका ध्यान और कौन रखेगा?”
“वह सब मुझे नहीं पता! मैं तो इतना जानता हूँ कि अभी तुम्हारी उम्र ही क्या है? कब तक खपोगी? कैसे काटोगी पूरी जिंदगी? मयंक के ठीक होने की संभावनाएँ लगभग खत्म सी हैं। अगर तुम चाहो तो मैं तुम्हारा...”
“खबरदार! तुमने ऐसा सोचा भी कभी। कोई और होता तो मुँह नोंच लेती इसी समय। लेकिन तुमने मेरी बहुत मदद की है, इसलिए मेहरबानी करके यहाँ से तुरंत दफा हो जाओ। फिर कभी अपनी मनहूस सूरत मत दिखाना?” तमतमाती पूजा बोली।
 यह वार्त्तालाप अचानक बाबूजी ने सुना। वे पत्नी से बोले, “सुनती हो भाग्यवान! हमारे घर में तो सतयुग की सावित्री आई है।” 

हनुमंत कृपा, १०-बी-१२,
आर.सी.व्यास कॉलोनी, 
केशव हॉस्पिटल के पास,
भीलवाड़ा-३११००१ (राज.)
दूरभाष  : ९४६२६५४५००

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