सुपरिचित लेखिका। अब तक अक्षरा, मधुमती, वीणा, अपनी माटी, पाथेय कण, अहा जिंदगी, आउट लुक और अन्यान्य पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। दैनिक भास्कर पत्रिका में गेस्ट राइटर के रूप में कुछ आलेख प्रकाशित। लोक-संस्कृति से जुड़े विषयों में रुचि, विशेषकर राजस्थानी लोक-जीवन में।
आदित्यहृदय स्तोत्र’ में भगवान् सूर्य की स्तुति में एक शब्द आता है, विन्ध्यवीथीप्लवङ्गम। अर्थात् तीव्र गति से आकाश में विचरण करने वाले। अविश्रांत रूप से अहर्निश गतिमान रहने के कारण ही एेतरेय ब्राह्मण में सूर्य का दृष्टांत देकर मनुष्य को सदैव चलते रहने की प्रेरणा प्रदान की गई है।
सूर्यस्य पश्य श्रेमाणं यो न तन्द्रयते चरन्
मगर एक अपूर्व घटना घटी। अबाध गति से चलने वाले सूर्य एक दिन रुक गए और रुके भी ऐसे कि फिर चलने की सुध न रही। वह दिन कौन सा होगा?
मास दिवस कर दिवस भा मरम न जानइ कोइ।
रथ समेत रबि थाकेउ निसा कवन बिधि होइ॥
जिस शुभ दृश्य को देखने के लिए सूर्य अपनी गति रोक दे, वह घटना साधारण तो नहीं हो सकती। अयोध्या, तिस में भी रामलला का जन्म! अयोध्या स्वयं इस भूमि पर किसी कौतुक से कम नहीं! एक ऐसा नगर, जो भगवान् के मस्तक पर विराजमान है।
अयोध्यापुरी मस्तकम् (रुद्रयामल)
कुश और लव ने रामजी के दरबार में अयोध्या की महिमा गाई है। एक ऐसी नगरी, जिसे वैकुंठ से धरती पर लाया गया है। इसे मनु ने वरदान में पाया है ब्रह्मा से।
अयोध्या नाम नगरी तत्रासील्लोकविश्रुता।
मनुना मानवेन्द्रेण या पुरी निर्मिता स्वयम्॥
भगवान् का अवतरण हुआ, पर उनसे पूर्व उनकी पुरी का भी अवतरण हुआ भू-लोक पर। वैकुंठ का हृदय है अयोध्या। आदिकवि ने एक पूरा सर्ग लिखा इसकी महिमा में।
कहते हैं, मनु ने जब इसे पृथ्वी पर स्थापित करना चाहा तो पृथ्वी ने धारण करने में अक्षमता व्यक्त कर दी। तब श्रीहरि ने इसे अपने सुदर्शन चक्र पर स्थापित किया। भूमि भर पर कोई चक्रांकित पुरी है तो वह अयोध्या है। मोक्षदायिनी पुरियों में सुमेरु यह पुरी, जिसमें निवास करने वालों को जन्म-मरण के चक्र से मुक्त रखा गया है।
अयोध्या च पर ब्रह्म सरयू सगुण पुमान्।
तन्निवासी जगन्नाथ: सत्यं सत्यं वदाम्यहम्॥
अयोध्या पुरी भगवान् का स्वरूप है और सरयू सगुण ब्रह्म है। यहाँ निवास करने वाला हर प्राणी जगन्नाथ का स्वरूप है।
यहाँ के नागर तो ऐसे कि शील और सदाचार में महर्षियों से समानता रखते हैं। सभी सुंदर, नहाए-धोए और सुगंधित इत्र-फुलेल लगाने वाले। श्रीहीन और रूप-रहित ढूँढ़ने से भी नहीं मिलता।
यहाँ के शासकों का गौरव तो गिरी से भी गुरु है। एक नाम है सगर, जिन्होंने पृथ्वी को सागर जैसा जलाशय दिया।
येषां स सगरो नाम सागरो येन खानित:।
महाराज इक्ष्वाकु जिन्होंने पृथ्वी पर सर्वप्रथम गीता का ज्ञान प्राप्त करने का गौरव पाया। राजा रघु के पराक्रम को कौन भूलेगा, जिनके भय से कुबेर धन-वर्षा करने को विवश होता है और भगीरथ का अवदान तो आज भी भागीरथी गंगा के रूप में साकार समुपस्थित है।
अयोध्या के नाम समस्त सौभाग्य जुड़े हुए हैं, फिर रामावतरण का परम सौभाग्य क्यों न जुड़ता?
चैत्र मास, नूतन वर्षारंभ, देवी पूजन और अनुष्ठानों में व्यस्त अयोध्यावासी। हर घर से घृत-मिष्टान्न मिश्रित धूम्र की महक, नए-नए पत्तों और विभिन्न प्रकार की मंजरियों से सजे सुरभित तोरणद्वार और व्रत-उपवास से तप्त-दृप्त मुख अधिक आभायुक्त हो चले हैं।
नवरात्रि अनुष्ठान है और अनुष्ठान निर्विघ्न होने चाहिए, किंतु राजमहल में किसी भी समय सुआ (जनना शोच) लग सकता है। प्रसूति का समय निकट से निकटतर है। निपुण चारिकाएँ पूजा की सामग्री पृथक् कर रही हैं। एक पैर अनुष्ठान-कक्ष तो दूसरा पैर रनिवास में। खुशी थामे नहीं थम रही। आनंद अँटाए नहीं अँट रहा। नवरात्रि के एक-एक दिन अपने साथ शुभ संकेत ला रहे हैं। पुष्प भाराक्रांत शाखाएँ कहती हैं, राम आने वाले हैं, दुगुने वेग से बहती निर्झरणी कहती है, अब और प्रतीक्षा नहीं, किंतु मुख्य चारिका कहती है—दो दिन गुजर गए हैं, दो दिन और!
थोड़ा धैर्य और धरो प्रभु! नवरात्रि निर्विघ्न संपन्न हो जाए।
कन्याएँ और युवतियाँ भी यही चाहती हैं, पर उनका ध्यान उपासना से अधिक उत्सव की ओर है। भूखे पेट उत्सव में रस आता है भला?
सचमुच उनकी प्रार्थनाएँ सुनी गईं। महागौरी श्वेतांबरा का पूजन संपन्न हुआ। बस एक दिन और! मगर इतना धैर्य स्वयं उनका मन भी धरने को राजी न था। नवमी की प्रभात कुछ अलग थी। बाकी दिनों से तो बिल्कुल अलग—
जोग लगन ग्रह बार तिथि सकल भए अनुकूल।
चर अरु अचर हर्षजुत राम जनम सुखमूल॥
(योग, लग्न, ग्रह, वार और तिथि सभी अनुकूल हो गए। जड़ और चेतन सब हर्ष से भर गए। क्योंकि राम का जन्म सुख का मूल है।)
अब और प्रतीक्षा नहीं। नवरात्रि का अंतिम दिवस खंडित न हो, इसलिए शीघ्रता की गई। सूर्योदय तक सब घरों में माँ की ज्योत ले ली गई। जुहारे बड़े कर नारियल का भोग दे दिया गया। अब बालक जनमे, तब भी नवरात्रि खंडित न मानी जाएगी।
बालक भी कदाचित् इसी प्रतीक्षा में था—
नौमी तिथि मधुमास पुनीता। शुकल पच्छ अभिजीत हरि प्रीता॥
मध्य दिवस अति धूप न घामा। प्रकटे अखिल लोक विश्रामा॥
प्रजाननों की प्रसन्नता का पारावार न रहा। प्रसन्नता की अभिव्यक्ति तुलसी बाबा ने भरपूर कर ही दी है। अगर-धूप का धुआँ और अबीर तो ऐसे उड़े हैं कि दिन में भी संध्या का वातावरण निर्मित हो चला है। बाबा सुंदर निरूपण करते हुए कहते हैं—मानो रात भी बालक के दर्शन को उत्सुक है, किंतु सूर्य के रहते लज्जा की ललाई से संध्या बन जाती है।
अवधपुरी सोहइ एहि भाँती। प्रभुहि मिलन आई जनु राती॥
देखि भानु जनु मन सकुचानी। तदपि बनी संध्या अनुमानी॥
अगर धूप के धुएँ से रात्रि जैसा अंधकार छा गया। ध्वजा, पताका और तोरण से इसकी शोभा बहुगुणित हो गई। कैसा दृश्य रहा होगा!
सूर्यवंश कुलदीपक का जन्म कुलगुरु वसिष्ठ के लिए इतना आह्लादित करने वाला क्षण है कि वे स्वयं को रोक न सके।
वैराग्य के शिखर पर विराजित कुलगुरु वसिष्ठ बालक राम के दर्शन हेतु सपत्नीक दौड़ पड़े। इस क्षण की उन्हें भी चिरकाल से प्रतीक्षा थी। पौरोहित्य जैसे निंदित कर्म का वरण उन्होंने श्रीराम सान्निध्य हेतु किया था।
उपरोहित्य कर्म अति मंदा। बेद पुरान सुमृति कर निंदा॥
जब न लेउँ मैं तब बिधि मोही। कहा लाभ आगें सुत तोही॥
जिनके दर्शन के लिए सूर्य अपनी गति छोड़ रहे हैं, ज्ञानी अपना व्रत तोड़ रहे हैं और शिव अपनी स्थिति, वह पुण्य योग भाग्य वालों को ही मिलता होगा। सूर्य तसल्ली से अपना सप्तसप्ति रोककर इस अनुपम क्षण के साक्षी बन रहे हैं।
सूर्य की पत्नी संजना का एक नाम संध्या भी है। सूर्यदेव अकेले जाते तो संध्या नाराज हो जाती, क्योंकि लल्ला की झलक पाने की जो द्विगुणित उत्कंठा स्त्री में है, वह पुरुष कहाँ से लाएगा?
ज्योत तो अखंड संपन्न हुई, किंतु नवरात्रि किंचित् अधूरी रह गई। द्विपहर बाद सुआ लग गया। सूर्यवंश की नवरात्रि अष्ट दिवसीय ही रह गई। नवें दिन सिर्फ ज्योत ली जाती है, अनुष्ठान के दिन तो आठ ही रहे।
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