मूली

भैया, वह वाली साड़ी दिखाना!”
“कौन सी... ये?
“ये नहीं, वो!”
बीच में कोई बोला...आवाज जानी-पहचानी लगी तो मालिनी ने पलटकर देखा।
दीपक को देख भौचक्की रह गई।
“तुम?”
“हाँ मैं! कोई शक है क्या?”
“नहीं-नहीं, वह इतने बरसों बाद अचानक देखा तो एकदम यकीन नहीं हो पाया।”
“हाँ वह तो है...।”
“तुम्हें एतराज नहीं हो तो, एक कप कॉफी साथ पी ली जाए।”
“ओके!”
दुकान वाले का हिसाब करके दोनों कॉफी-हाउस पहुँच गए। 
कॉफी का आॅर्डर दे दिया गया।
दोनों के बीच पसरे सन्नाटे को तोड़ते हुए दीपक बोला, “एक बात पूछूँ, बुरा न मानो तो?”
“हाँ पूछो।”
“तुम बिना कुछ कहे-सुने ही...!”
दीपक के आशय को समझती हुई मालिनी बोली, “मम्मी-पापा को दु:खी करके मुझे खुशियाँ नहीं बटोरनी थीं। कहने-सुनने के लिए कुछ था ही क्या?”
“छोड़ो इन बातों को। यह बताओ, कैसी चल रही है तुम्हारी जिंदगी?”
“अच्छी चल रही है।”
“तुम सुनाओ, तुम्हारी कैसी चल रही है?”
“एक फक्कड़ की जैसी चलती है, वैसी चल रही है।”
“क्या?”
“सही कह रहा हूँ, मैं तुम्हारे जिस्म से दूर हूँ, मगर आत्मा से नहीं। फिर किसी और से शादी का औचित्य ही कहाँ?”
“आज के दौर में कौन इतना सोचता है? पल में रिश्ते बदलते हैं। कौन किससे बँधकर रहता है। सबको अपने-अपने सुख की पड़ी है, तू नहीं तो कोई और सही का जमाना है, और तुम हो कि...।”
“मालिनी! वे रिश्ते जिस्म के होते हैं, आत्मा के नहीं।”
“सही कह रहे हो, दीपक! मैं भी तो बोझ ही ढो रही हूँ।” मन-ही-मन बुदबुदाई मालिनी।
फिर अचानक आत्मविश्वास से बोली, “चलती हूँ दीपक, अब अपना मिलना नहीं होगा, एक दफा टूटकर बड़ी मुश्किल से जुड़ी हूँ, अब टूटी तो बिखर जाऊँगी।”
“दुनिया ने सीताजी को भी नहीं बख्शा, मैं किस खेत की मूली हूँ?”

हनुमंत कृपा, १०-बी-१२,
आर.सी.व्यास कॉलोनी, 
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