सुपरिचित लेखक-संपादक। बुलंदशहर (उ.प्र.) के मीरपुर-जरारा गाँव में जन्म। देसी चिकित्सा लेखन में विशेष दक्षता। ‘सेहत की खान : शाक-सब्जियाँ’, ‘स्वास्थ्य के रखवाले’, ‘घर का डॉक्टर’, ‘स्वस्थ कैसे रहें?’, ‘शुद्ध अन्न, स्वस्थ तन’, ‘जड़ी-बूटियों का संसार’ एवं ‘नगरी-नगरी, द्वारे-द्वारे’ (यात्रा-संस्मरण), ‘स्मृतियों के मोती’ (संस्मरण) कृतियाँ चर्चित। ‘साहित्य मंडल’ नाथद्वारा द्वारा ‘संपादक-रत्न’ एवं ‘हिंदी साहित्य-मनीषी’ की मानद उपाधियाँ। आकाशवाणी मथुरा तथा नई दिल्ली से परिचर्चा, वार्त्ता आदि प्रसारित।
हिंदी दिवस’ के अवसर पर इस बार भी भगवान् एकलिंग की धरती पर जाना हुआ। एक मंगल अवसर भी था कि श्रीनाथद्वारा स्थित साहित्यिक-सांस्कृतिक-शैक्षणिक संस्था साहित्य मंडल में हिंदी दिवस पर आयोजित ‘हिंदी लाओ, देश बचाओ’ समारोह में मेरे और आनंद शर्मा द्वारा संयुक्त रूप से लिखी गई पुस्तक ‘डॉक्टर स्मरजीत जैना : अँधेरी जिंदगियों में रोशनी के मसीहा’ का लोकार्पण होना था। रेलवे में आरक्षण पहले ही करा लिया गया था, सो राजस्थान के तीर्थ घूमने की इच्छा से आनंद शर्माजी के कुछ मित्र भी हमारे साथ जुड़ गए। कुल पाँच सदस्यीय इस यात्रीदल में मैं, मित्र आनंद शर्मा, उनके मित्र विनोद मिश्रा, दिनेश लाल और कृष्णपालजी हैं। १३ सितंबर, २०२४ को चेतक एक्सप्रेस से जाना तय हुआ। दिल्ली एनसीआर में भारी बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही है। जोरदार बारिश के बीच मैं और आनंद शर्मा सराय रोहिल्ला स्टेशन से चेतक में सवार हो गए। बाकी तीन साथियों को दिल्ली कैंट से गाड़ी में चढ़ना था।
दिल्ली से दो ही रेलगाड़ियाँ उदयपुर तक जाती हैं। मेवाड़ एक्सप्रेस इन दिनों किन्हीं कारणों से बंद है। अत: चेतक एक्सप्रेस में भारी भीड़ हो गई है। आरक्षित डिब्बों में भी जनरल टिकट वाले यात्री इस कदर भर गए हैं कि वाशरूम (शौचालय) तक जा पाना भी दुश्वार हो गया है। स्टेशन पर टी.सी. अपनी लूटमार मचाने में लगे हैं। दो-दो सौ रुपए में आरक्षित सीटों को इन घुसपैठियों को बेच दे रहे हैं खुलेआम। सबसे ज्यादा नरक बनाया है रिंगस तक जाने वाले तथाकथित खाटू श्याम के भक्तों ने। युवा लड़के-लड़कियों ने सीटों पर कब्जा कर, शोरगुल और जयकारों से यात्रियों का जीना हराम कर दिया है। रेलवे की धारा १५५ धरी की धरी रह गई है। मैं पूछता हूँ, सरकार ऐसे कानून बनाती ही क्यों है, जिनका वह पालन नहीं करवा सकती है। रेलवे पुलिस और टी.सी. ऐसे गायब हैं, जैसे गधे के सिर पर से सींग।
अव्यवस्था का आलम यह है कि जैसे ही गाड़ी सरकती है, चेन पुलिंग हो जाती है। गाड़ी पूरी तरह से इन घुसपैठियों के कब्जे में है। हालात इतने बद से बदतर हो गए कि हमारे साथी कैंट से गाड़ी में जैसे-तैसे चढ़ तो गए, पर (आधी रात गुजरने पर) रिंगस तक अपनी सीटों पर नहीं पहुँच पाए। सीनियर सिटीजन होकर भी ऐसी पीड़ा और धक्का-मुक्की सही कि क्या कहें। उनकी सीटों पर इन तथाकथित खाटू भक्तों ने मौज में सफर किया। रेलवे ईमानदार यात्रियों के साथ बेहद नाइनसाफी कर रही है। उन्हें खुले हाथों लूट रही है। आरक्षित बॉगी की संख्या घटाकर ए.सी. कोच की संख्या बढ़ाती जा रही है। मोदी सरकार में रेलवे खुले हाथों यात्रियों को लूट रही है। दो माह पूर्व आरक्षण लेने के बावजूद रिंगस तक हमें नरक-यातनाएँ सहनी पड़ीं। १३९ पर शिकायत कोई नहीं सुनता। भारतीय रेलवे का सिस्टम बस राम भरोसे चल रहा है। वर्तमान सरकार भले ही कितने ही दावे करे, सरकार रेलयात्रा को गरीब-मजदूर लोगों की पहुँच से दूर करती जा रही है। रेलवे स्टाफ में भ्रष्टाचार खूब फल-फूल रहा है। टी.सी. खुलेआम लोगों को लूट अपनी जेबें भर रहे हैं, सुनने वाला कोई नहीं। रेलवे में जंगलराज है, चाहे आप बिहार की ट्रेन में जाएँ या गुजरात-राजस्थान की।
आखिर रोते-कलपते हम प्रात: छह बजे चित्तौड़गढ़ स्टेशन पर उतर गए हैं। हमारा ऑटो ड्राइवर केशवराज अभी पंद्रह मिनट में पहुँच रहा है। स्टेशन के बाहर निकल चाय पी, तब तक केशव आ गया, बोला—सर, इन दिनों यहाँ द्वादशी का मेला चल रहा है, साँवलिया सेठ मंदिर पर काफी भीड़ है, लंबी कतार में ढाई-तीन घंटे आपके दर्शन करने में लग जाएँगे और ऑटो भी मुझे मंदिर से एक किमी. पहले ही रोक देना पड़ेगा। आखिर ऑटो में बैठ साँवलिया सेठ मंदिर आ गए हैं। यहाँ से अंदर जाने के लिए एक और ऑटो लिया। देख रहा हूँ, लंबी-लंबी कतारें लगी हैं, जगह-जगह पानी के टैंकर और फयर ब्रिगेड की गाड़ियाँ खड़ी हैं। भाई कृष्णपाल ने सबके जूते-चप्पल एक फायर ब्रिगेड की गाड़ी के नीचे रख दिए और हम लोग भी पंक्तिबद्ध हो गए। मंदिर प्रशासन ने धूप से बचने के लिए ऊपर चाँदने तान दिए हैं और महिला-पुरुषों की पंक्ति अलग-अलग हैं। धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए साँवलिया सेठ के भव्य दर्शन किए। साँवलिया सेठ के प्रगट होने वाले स्थान पर भी भव्य मंदिर है, यहाँ भी दर्शन किए। थोड़ा हटकर तीसरे गाँव में भी साँवलिया सेठ का मंदिर है, वहाँ भी दर्शन कर आगे कपासन शनि मंदिर के दर्शन करते हुए लौटते हुए मेवाड़ की शान इतिहास प्रसिद्ध किला चित्तौड़गढ़ देखा। लौटते समय जाम लग गया और भोजन करने में भी देरी हुई सो चार बजे चित्तौड़गढ़ के बस अड्डा पर उतर गए हैं। केशव भाई को उसका किराया दे सधन्यवाद विदा किया।
देख रहा हूँ, चारों ओर बड़ी रौनक और चहल-पहल है। जगह-जगह स्वागत द्वार, बंदनवार और सड़क किनारे स्टेज बने हुए हैं। पता चला कि द्वादशा पर यहाँ झाँकियाँ निकाली जाती हैं। हमें मावली जं. के लिए सायं पाँच बजे की बस मिली। मावली से हमें एक टैंपो गाड़ी मिल गई और करीब साढ़े आठ बजे नाथद्वारा आ पहुँचे हैं। साहित्य मंडल के सायं के सत्र का कार्यक्रम अभी चल रहा है और बाईं ओर भोजन भी। साथी लोग बाहर ही बैठ गए, मैं अंदर जाकर श्याम भाईजी से मिला। मेरे किसी साथी ने वहाँ खाना नहीं खाया, बस एक ही रट—होटल में अपने कमरे में चलो। काजल होटल, सिंधी कॉलोनी में हमारे ठहरने की व्यवस्था थी, पर विलंब होते देख आनंद शर्माजी ने इसके सामने ही स्थित चंपा भवन धर्मशाला में चार बेड का कमरा ले लिया। इसी दौरान श्याम भाईजी का फोन आया कि आपका कमरा खाली करा दिया है, अपने कमरे में आ जाओ। मैं बहुत शर्मिंदा हुआ। अपने साथियों द्वारा की गई जल्दबाजी के लिए श्याम भाईजी से क्षमा माँगी। दरअसल वहाँ न रहने का इनका एक दूसरा ही कारण था, प्राइवेसी का।
प्रात: मैं समय से तैयार होकर साहित्य मंडल के कार्यक्रमों में शामिल रहा। श्याम भाईजी को अपनी नई आई तीन पुस्तकें भेंट कीं। भाईजी ने फिर मुझे भी मंचासीन कर दिया। लोकार्पण के सत्र में इसी भव्य मंच से मंचासीन मान्य विद्वानों द्वारा हमारी पुस्तक ‘डॉक्टर स्मरजीत जैना : अँधेरी जिंदगियों के मसीहा’ का शानदार लोकार्पण किया गया। अन्य पुस्तकों का भी लोकार्पण हुआ। दुपहर में हम सब ने यहीं पर भोजन किया। दुपहर के बाद से नाथद्वारा में मूसलधार बारिश शुरू होकर सायं तक चली, सो कहीं घूमने का कार्यक्रम बन ही नहीं पाया। सायं पाँच बजे बारिश हल्की हो जाने पर मैं दौड़ता हुआ मधुसूदन भाई की दुकान पर गया। भेंट-मुलाकात हुई, वे बोले कि सायं के दर्शन तो बंद हो चुके हैं, अब तो सुबह ही दर्शन हो सकेंगे। बारिश हल्की हो गई तो बाकी लोग भी वहीं आ गए। कुछ भाइयों ने यहाँ से इत्र खरीदा। रात को भगवान् श्रीनाथजी की रसोई में हम सब ने भोजन किया।
अगले दिन प्रात: यानी सोमवार को मैं और कृष्णपाल भाई साढ़े पाँच बजे भगवान् श्रीनाथजी के मंगला दर्शन करने गए, बाकी साथी निद्रावधू के आलिंगन में बेसुध रहे। रात को हमने धर्मशाला के केयरटेकर चतुर्वेदीजी के माध्यम से एक ऑटो चालक भैंरूलाल दिन भर के लिए बुक कर लिया था। वह साढ़े आठ के बाद लगभग समय पर ही आ गया। युवा भैंरूलाल बड़ा ही सुशील और भला इनसान है। ऑटो में बैठे, पहले काँकरौली में भगवान् द्वारकाधीश के दर्शन किए, फिर नौ चौकी यानी मीठे पानी की सबसे बड़ी झील, जो महाराणा राजसिंह ने बनवाई, देखी, वहाँ खूब फोटो खींचे, मछलियों को आटे की गोलियाँ खिलाईं। अब हमारा ऑटो नाथद्वारा की ओर वापस लौट उदयपुर राजमार्ग पर भगवान् एकलिंग के मंदिर जाने के लिए दौड़ रहा है। तब तक मैं आपको भगवान् एकलिंग के बारे में कुछ बताता हूँ।
झीलों की नगरी उदयपुर से २३ किमी. दूर राष्ट्रीय राजमार्ग सं. ८ पर सघन वनों से आच्छादित घाटी में अरावली पर्वत शृंगों से घिरा है कैलाशपुरी गाँव, यहीं पर स्थित है मेवाड़ की शान भगवान् एकलिंग महादेव मंदिर। यहीं पर विराजते हैं, इतिहास में प्रसिद्ध मेवाड़ के शूरवीर महाराणाओं के आराध्य देव भगवान् एकलिंग महादेवजी। मेवाड़ में यह परंपरा रही है कि मेवाड़ का राज्य भगवान् एकलिंग का है। यहाँ के महाराणा अपने-आपको राज्य की व्यवस्था और रक्षा करने वाले मानते आए हैं। उन्होंने अपने-आपको मेवाड़ का राजा कभी नहीं माना, मेवाड़ के राजा तो भगवान् एकलिंग ही हैं। युद्धों के दौरान भी वे भगवान् एकलिंग की सौगंध खाकर रणक्षेत्र में उतरते थे और अपने सैनिकों में उत्साह का संचार करने के लिए भगवान् एकलिंग का ही जय-जयकार किया करते थे। अत: भगवान् एकलिंग मेवाड़ के लिए आराध्य देव हैं। यह स्थान पौराणिक काल से ही विख्यात रहा है। ‘श्री एकलिंग माहात्म्य’ में ऐसा उल्लेख मिलता है कि सतयुग में जब देवराज इंद्र ने वृत्तासुर का वध कर दिया तो उसे ब्रह्महत्या का दोष लगा। इस दोष के निवारण के लिए गुरु बृहस्पति के कहने पर उसने यहाँ आकर भगवान् एकलिंग महादेव की तपस्या की, वह लंबी तपस्या के बाद पापमुक्त हो गया। इस दृष्टि से यह स्थान बेहद पवित्र और दैवीय है।
इतना ही नहीं, त्रेता युग में कामधेनु की पुत्री नंदिनी ने विश्वामित्र ऋिष के डर से भयभीत हो यहाँ आकर भगवान् एकलिंग की शरण ली थी और उनकी तपस्या कर भगवान् एकलिंग को प्रसन्न किया था। इन्हीं की कृपा प्राप्त कर नंदिनी ने विश्वामित्र को पराजित किया था। द्वापर युग में महाभारत युद्ध के बाद राजा परीक्षित की मृत्यु का बदला लेने के लिए परीक्षित के पुत्र जनमेजय ने जब नागयज्ञ किया तो नागराज तक्षक भयातुर हो भगवान् एकलिंग की शरण में आया था और कलियुग में अब से करीब साढ़े चौदह वर्ष पूर्व योगीराज हारीत ने भगवान् एकलिंग की लंबे समय तक आराधना कर उन्हें प्रसन्न किया और फिर भगवान् एकलिंग की कृपा से मेवाड़ में एक सुदृढ़ राज्य की स्थापना की थी, तभी से भगवान् एकलिंग महादेव मेवाड़ के आराध्य देव हैं। भगवान् एकलिंग के यहाँ प्राकट्य की और भी कहानियाँ हैं। संस्कृत के इस श्लोक में भगवान् एकलिंग महादेव की महत्ता बतलाई गई है—
न तीर्थेन तपोदानेनं यज्ञैर्बविस्तरै:।
यत्फलं प्राप्यते ब्रह्मन्नेकलिावलोकनात्॥
अर्थात् जो पुण्य फल भगवान् एकलिंग महादेव के दर्शन मात्र से प्राप्त होता है, वह न तो तीर्थाटन से, न तप से, न दान से और न ही बड़े-बड़े यज्ञों के आयोजन से प्राप्त हो सकता है।
कैलाशपुरी में भगवान् एकलिंग का मंदिर कब बना, इसके तो कोई साक्ष्य नहीं हैं, परंतु जनश्रुतियों से पता चलता है कि पहले-पहल इस मंदिर का निर्माण बप्पा रावल ने करवाया था। इतिहासकारों ने बप्पा रावल का राज्यकाल ७३४ से ७५३ ई. ठहराया है, अत: इसी काल को भगवान् एकलिंग की पुन: प्रतिष्ठा का समय मान सकते हैं। मेवाड़ के संस्थापक भगवान् एकलिंग के परम भक्त थे। कैलाशपुरी में कुल १०८ मंदिर हैं, इसे मंदिरों का गाँव कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। परंतु मुख्य मंदिर भगवान् एकलिंग महादेव का ही है। भगवान् एकलिंग के मंदिर का शिखर लगभग ५० फीट ऊँचा है। मंदिर का व्यास ६० फीट है। दूर से ही दिखाई देने वाला इसका शिखर श्वेत पत्थरों से बना है। शुरू में यहाँ केवल शिवलिंग ही था; पर वर्तमान भगवान् एकलिंग की मूर्ति काले पत्थर की और चतुर्मुखी है। इसका पश्चिमी मुख ब्रह्मा का, उत्तर का मुख विष्णु का, पूर्व का मुख सूर्य का तथा दक्षिण का मुख रुद्र का मानकर ही इनका पूजन-अर्चन किया जाता है। हाँ, इन चारों मुखों के बीच में शिवलिंग है। इस स्वरूप का निर्माण महाराणा रायमलजी ने करवाया था।
इतना ही नहीं, चारों मुखों की ओर चार द्वार हैं। पूरबी द्वार की ओर माता पार्वती की प्रतिमा, पास की ताख में गणपतिजी, इसके ठीक सामने दक्षिणी द्वार पर गंगाजी की मूर्ति तथा पास में ही कार्तिकेय की मूर्ति स्थापित है। इस तरह से भगवान् भोलेनाथ का पूरा परिवार मंदिर में विराजमान है। वास्तु की दृष्टि से देखा जाए तो मंदिर में अंदर प्रकाश आने के लिए पूर्वी द्वार के बाहर दीवारों में पत्थर की जालियाँ लगी हैं, जिनके नीचे यमुनाजी और सरस्वतीजी की मूर्तियाँ स्थापित हैं। मंदिर की किवाड़ों पर एक ओर स्वामी कार्तिकेय तथा दूसरी ओर गणेशजी हाथ में चँवर लिये हुए हैं, जो उनकी पितृभक्ति को प्रकट कर रही हैं। मूल मंदिर के बाहर पश्चिम और दक्षिण द्वार की ओर सभामंडप है, जिसमें बैठकर भक्तजन प्रभु के दर्शन किया करते हैं। इस मंडप के बीच में ही चाँदी के नंदी विराजमान हैं। दक्षिण द्वार के बाहर सामने ताख में विक्रम संवत् १५४५ (सन् १४८८) चैत्र शुक्ल दशमी, दिन गुरुवार को महाराणा रायमलजी के समय की सौ श्लोकों की एक प्रशस्ति लगी हुई है, जिसमें महाराणा हम्मीर से लेकर रायमल तक के महाराणाओं के बारे में जानकारी तथा मंदिर के प्राचीन होने का विवरण उल्लिखित है। यह शिलालेख पुरातत्त्व की दृष्टि से बड़े ही महत्त्व का है।
टेढ़ी-मेढ़ी सर्पीली, ऊँची-नीची सड़क पर सरपट दौड़ता हमारा ऑटो भी अब मंदिर के निकट पहुँच गया है। आज यहाँ काफी भीड़ है। भैंरूभाई बोले, मैं यहीं पर ऑटो लगाता हूँ, आप दर्शन करके आओ। सड़क किनारे प्याऊ पर हाथ धो, हम दर्शनार्थ मंदिर की ओर बढ़े। पहले-पहल मंदिर के विशाल फाटक ने हमारा स्वागत किया। प्रवेश द्वार पर ही चेतावनी लिखी है कि मंदिर में फोटो खींचना या वीडियोग्राफी करना सख्त मना है। दर्शनार्थियों की सुविधा के लिए रेलिंग लगाकर आने-जाने का रास्ता बना दिया गया है। सुरक्षाकर्मी जगह-जगह मुस्तैदी से खड़े हैं। इनकी वरदी अलग ही पहचान में आती है। दो जाँच पोस्ट पर जाँच भी की जा रही है। जाँच करवाकर हम भी आगे बढ़े। पूरा मंदिर किलेनुमा मजबूत प्राचीर से रक्षित है। इस प्राचीर का निर्माण महाराणा मोकल ने कराया था। मंदिर के वास्तु को देखकर लग रहा है कि मंदिर बहुत प्राचीन है।
पंक्ति में लगे हम सबने धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए भगवान् एकलिंग महादेव के दर्शन किए। मंदिर का फर्श काले-सफेद पत्थरों का डिजाइनदार है। यहाँ पर अलौकिक वातावरण है, भगवान् एकलिंग के दिव्य तेजोवलय की अनुभूति हो रही है। भगवान् एकलिंग की ओर मुख किए चाँदी के नंदी को रस्सियों की जाली से ढक रखा है। सुरक्षाकर्मी तीर्थयात्रियों को आगे बढ़ाते जा रहे हैं, ताकि अव्यवस्था न हो। चूँकि यहाँ पर मंदिरों की एक पूरी शृंखला है, सो हम मंदिरों के दर्शन करते हुए आगे बढ़ते जा रहे हैं। आगे रस्सी का अवरोध लगाकर रास्ता रोक दिया गया है। लेकिन मैं देख पा रहा हूँ कि मुख्य मंदिर के पीछे, थोड़ी ऊँचाई पर अंबा माता, गणपति तथा माता कालिका के अलग-अलग मंदिर हैं। हम तो दूर से ही इन मंदिरों के दर्शन कर रहे हैं। यहाँ पता चला कि जब भगवान् एकलिंग के दर्शन खुलते हैं तो इन तीनों मंदिरों के भी दर्शन खुलते हैं। अंबा माता की मूर्ति सफेद संगमरमर की बनी है, जो बेहद सम्मोहक है, भक्तजन अपलक देखते ही रह जाते हैं।
मैं देख पा रहा हूँ कि अंबा माता के दाईं ओर गणपतिजी का मंदिर है। यहाँ गणपति की मूर्तियाँ भी श्वेत संगमरमर की हैं। इस विग्रह की विशेषता है कि इसमें गणपति की सूँड़ दाहिनी ओर है, जबकि गणेश प्रतिमाओं में सूँड़ बाईं ओर दरशाई गई होती है। अंबा माता के बाईं ओर कालिका माता का मंदिर है। इसमें दसमुख वाली प्रतिमा काले संगमरमर की है। इस मंदिर के ठीक सामने श्वेत संगमरमर के ऐरावत हाथी पर इंद्रदेव विराजमान हैं। इन मंदिरों के ठीक पीछे कुछ दूरी पर पश्चिम में नाथों का मंदिर है। यह महाराणाओं के कुलगुरु हरितवंशियों द्वारा बनवाया गया है। एकलिंग महादेव के मंदिर के बाहर पीछे की ओर तुलसी कुंड और करज कुंड नाम के दो सुंदर कुंड हैं, इनमें बारहों महीने पानी भरा रहता है। इन दोनों कुंडों से कुछ ऊँचाई पर उत्तर दिशा में पातालेश्वर महादेव मंदिर है। करज कुंड में दक्षिण मंे महाराणाओं के कुलगुुरुओं का समाधि-स्थल है। यहाँ छोटी-बड़ी पाँच छतरियाँ दिखाई पड़ रही हैं। मुख्य मंदिर के बाईं ओर गिरधर गोपालजी का मंदिर है। इसे मीरा का मंदिर भी कहा जाता है। इसमें श्वेत पत्थर की श्रीकृष्ण की चतुर्भुजी प्रतिमा है। इस मंदिर के अलावा यहाँ गोवर्धननाथजी, लक्ष्मीनारायणजी, सीता-रामजी, सोमनाथजी, देवेश्वरजी मंदिर भी दर्शनीय हैं। इसके आगे रस्सी से रास्ता बंद है, तब हम वापस लौट पड़े।
लौटते हुए हम देख रहे हैं कि प्राचीर के साथ-साथ पत्थर के छोटे-मोटे मंदिर बने हैं। पता चला कि नागदा के भग्न मंदिरों से प्राप्त प्रतिमाओं को इन छोटे-छोटे मंदिरों में पथरा दिया गया है। पूरा मंदिर ऊँची-ऊँची तीन पहाड़ियों से घिरा है। जहाँ तक जाना संभव हुआ, सब मंदिरों के दर्शन कर अब हम मंदिर से बाहर आ गए हैं। आज यहाँ भक्तों की लंबी-लंबी कतार लगी है। भगवान् भोलेनाथ की यह नगरी कैलाशपुरी बेहद दर्शनीय है, पूजनीय है। गरमियों में यहाँ प्रात: ४ बजे से साढ़े छह बजे तक, दुपहर में १०:३० से १:३० बजे तक तथा सायंकाल ५:३० से ७:३० बजे तक दर्शन किए जा सकते हैं। सर्दियों में आधा घंटा देर से पट खुलते हैं।
भगवान् एकलिंग मंदिर के पूरे परिसर के दर्शन कर अब हम अंदर के छोटे रास्ते से हल्दीघाटी के लिए निकल पड़े हैं। यह रास्ता गाँवों से होकर जाता है। धूप का ताप विचलित करने वाला है। ऑटो के पीछे वाली सटी पर बैठा मैं अच्छी तरह से तप गया हूँ। हल्दीघाटी पहुँच पहले तो हमने महाराणा प्रताप म्यूजियम देखा। यहाँ दरशई गई झाँकियों के माध्यम से राजस्थान की लोक-संस्कृति के दर्शन किए। हमारे साथियों ने स्थानीय उत्पादों की खरीदारी भी की। यहीं के एक होटल में दाल-बाटी का भोजन कर नाथद्वारा की ओर लौटते हुए पहले चेतक की समाधि, हल्दीघाटी और खमनोर, जहाँ इतिहास प्रसिद्ध हल्दीघाटी का युद्ध हुआ, देखे। रक्त तलैया यहीं पर है। इस सड़क का चौड़ीकरण हो रहा है, सो रास्ता काफी खराब हो गया है। पहाड़ी क्षेत्र में बरसात में रास्ते वैसे भी खराब हो जाते हैं। नाथद्वारा पहुँचते-पहुँचते सायं के पाँच बज गए हैं। पहले ऑटो स्टैंड पर हम सबने चाय पी। कमरे पर लौट थोड़ा आराम कर सायं को भगवान् श्रीनाथजी के दर्शन किए। मधुसूदन भाई से मिले। उन्होंने अपने परिचित की दुकान से हमें प्रसाद खरीदवाया।
कल कुंभलगढ़ जाने का मन था, पर खराब रास्तों के चलते कोई वाहन वाला वहाँ जाने को तैयार न हुआ, तब नाथद्वारा घूमने के लिए कल सारा दिन के लिए भैंरूभाई को ही तैयार कर लिया। भैंरूभाई नाथद्वारा के ५-६ पाॅइंट दिखाकर हमें मावली जं. छोड़ देंगे। हम जितने भी दिन रहे, भगवान् श्रीनाथजी के भोजनालय में ही भोजन किया। रोटी-सब्जी, दाल, झोल, िखचड़ी और सलाद—सब परम स्वादु, सुपाच्य-सात्त्विक भोजन मात्र ५० रुपए में, वह भी भरपेट।
आज १७ सितंबर, मंगलवार है। हम सब मित्र साढ़े पाँच बजे प्रात: भगवान् श्रीनाथजी के मंगलादर्शन करने गए और भगवान् सुदर्शनजी को इत्र का भोग लगवाया। यहाँ से लौट नहा-धो नाश्ता किया। भैंरूभाई सवा आठ बजे ही ऑटो के साथ हाजिर हो गए। हमने सामान सब पैक कर ही लिया था। धर्मशाला का हिसाब चुकता किया। धर्मशाला के केयरटेकर श्रीमान गिरधर चतुर्वेदीजी ने हम सबको तिलक लगा, आशीर्वाद दे विदा किया। अब हमारा ऑटो नाथद्वारा-दर्शन के लिए चला पड़ा है। पहले हम यहाँ का गोवर्धन पर्वत देखने आए हैं। वाहन से घूमने पर २० रुपया भाड़ा (शुल्क) लगता है, मगर पैदल परिक्रमा करना निशुल्क है। पर्वत की जड़ (िनकट) से बनास (यहाँ की यमुना) बह रही है। गोवर्धन पर्वत इतना हरा-भरा है कि लगता है—हम राजस्थान में नहीं, बल्कि उत्तराखंड के पहाड़ों पर घूम रहे हैं। पहाड़ के ऊपर से पूरे नाथद्वारा का अवलोकन बड़ा नयनाभिराम लगता है। ऊपर परिक्रमा-पथ में हनुमानजी का एक छोटा सा मंदिर है। यहाँ हम सबने खूब फोटोग्राफी की और वाहन में बैठ लाल बाग आ पहुँचे हैं। यहाँ प्रति दर्शनार्थी २० रुपया प्रवेश शुल्क है। लाल बाग संग्रहालय में उन रथों का दर्शन किया, जिसमें बैठ भगवान् श्रीनाथ और उनके सेवक रातोरात सुरक्षित ठिकानों की तलाश में जतीपुरा से निकल पड़े थे। यहाँ पर मंदिर की बैलों से चलने वाली आटा चक्की भी रखी है, जिसके आटे से भगवान् का भोग बनता था, उन दिनों की मंदिर की प्रिंटिंग मशीन भी यहाँ प्रदर्शित है। यहीं पर एक बड़े हॉल में वल्लभाचार्यजी के वंशजों के चित्र लगे हैं, साथ ही तीन कमरों में महाप्रभुजी की बैठकों को चित्र सहित दरशाया गया है। यहाँ पर अष्टछाप के कवियों की अच्छी जानकारी मिलती है। यहीं बाहर के परिसर में जमीन पर रहने वाले बड़े-बड़े कछुए हैं, यहाँ के सेवक ने बताया कि ये कछुए सब्जियाँ खाते हैं, यहाँ आने वाले तीर्थयात्री इनके लिए कुछ-न-कुछ दे जाते हैं, सो हमने भी कुछ राशि इस निमित्त दी। यह पार्क भी बहुत सुंदर है, इसमें झूले लगे हैं और तरणताल भी है।
यहाँ खूब घूम-फिर, फोटोग्राफी करके हम अपने वाहन में बैठे श्रीनाथजी की गौशाला देखने आए हैं। सड़क के मोड़ पर से हमने गायों के लिए एक बोरा खली-चूना ले ली। गऊशाला बहुत विशाल है। यहाँ पर अलग-अलग नस्ल के नंदी अलग-अलग हवादार कमरों में बंद हैं, उनके ऊपर बिजली के पंखे चल रहे हैं। यहाँ सबकी सब देसी गाएँ हैं, इन गायों का सारा दूध श्रीनाथजी मंदिर में उनकी भोग-सामग्री बनाने के लिए जाता है। इसके अलावा मंदिर की और भी गौशालाएँ हैं। पूरी गौशाला घूम अब हम गणेश टेकरी पर आ गए हैं। यहाँ पर सफेद संगमरमर का गणेशजी का भव्य मंदिर है। पहाड़ी के ढलान को इस सुंदरता के साथ बनाया गया है कि यह एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल बन गया है। यहाँ कई तरह के झूले हैं, झरना है, तरणताल तथा छोटे-छोटे मंदिर हैं। यहाँ हम काफी देर बैठे, स्थानीय लड़के छोटे से तालाब में पेड़ों पर से छलाँग लगा-लगाकर किलोल कर रहे हैं। बड़ा ही सुंदर और सुकून देने वाला स्थान है यह।
यहाँ के झूूलों का भरपूर आनंद ले अब हम इसके पास में ही और लगभग हाल में ही बने म्यूजियम ऑफ ग्रेस देखने आ गए। यह मोटो स्पोर्ट पार्क का ही एक यूनिट है। यहाँ प्रवेश शुल्क १२० रुपए प्रति व्यक्ति है। यह बड़ा ही शानदार म्यूजियम है। छोटी-छोटी वीडियो क्लिपों के द्वारा यहाँ के गाइड बहुत भक्तिभाव और बड़े अपनेपन से चित्रों के बारे में बताते और समझाते हैं। यहाँ वल्लभाचार्य और श्रीनाथजी के प्राकट्य, अष्टछाप के कवियों, भक्त कवियों के बारे में सटीक जानकारी मिलती है। पूरे नाथद्वारा को न घूमकर केवल इस म्यूजियम का अवलोकन कर लिया जाए तो जानने-देखने के लिए कुछ बचा नहीं रहता। सच में यहाँ पर हमें बड़ा आनंद आया। यहाँ से बाहर निकलने को मन ही नहीं कर रहा है। मन बेहद प्रसन्न और पुलकायमान है। इस म्यूजियम के आनंद की अनुभूति यहाँ आकर ही हो सकती है। उसे शब्दों में अभिव्यक्त करना आसान नहीं है।
फिर भी यहाँ से बाहर निकले। गणेश टेकरी पर ही स्थित भगवान् भोलेनाथ की सबसे ऊँची मूर्ति स्टैच्यू ऑफ बिलीफ यानी विश्वास स्वरूपम् देखने के लिए निकल पड़े। दुपहर हो गया है। भैंरूभाई ने हमें इसके विशाल गेट के आगे उतार दिया, फिर कहा—इसे देखने में आपको ढाई-तीन घंटे लग जाएँगे। आप देखकर आइए, मैं यहीं पेड़ की छाया में आपको मिल जाऊँगा। मैं मुख्य प्रवेश द्वार के बाईं ओर स्थित टिकट काउंटर से पाँच टिकट ले आया। गेट से अंदर प्रवेश इस टिकट से मेट्रो की तरह होता है, टिकट टच करने पर द्वार खुल जाता है। अच्छा, नीचे पूरा पार्क घूमने का टिकट दो सौ रुपए का और शिवमूर्ति में अंदर जाने का टिकट चार सौ रुपए का है। हम तो बाहर ही घूमना था, मैं दो सौ रुपए वाले टिकट ले आया था; लेकिन मित्र आनंद शर्मा नाराज हो गए, बोले कि मुझे तो मूर्ति के अंदर जाना था। मैंने कहा कि आपने पहले बताया होता तो मैं आपकी चार सौ वाली टिकट ले आता। हम सब ही ऊपर जाने के अनुच्छिक थे। मुख्य द्वार से अंदर जाने के लिए काफी चलना पड़ता है। हालाँकि अंदर जाने के लिए मुख्य द्वार से खुली बस चलती है, जो यात्रियों को पूरे परिसर का एक चक्कर लगाकर यहीं पर छोड़ देती है। इसका किराया प्रति यात्री ७० रुपया है। अंदर बीड़ी-सिगरेट-गुटका कुछ भी ले जाना मना है।
हम बातें करते हुए पैदल ही आगे बढ़ चले हैं। चूँकि अब हम आस्था की प्रतिमा के दर्शनार्थ जा रहे हैं तो में इसके बारे में कुछ बताता चलता हूँ। शिव की इस विशालकाय प्रतिमा को विश्वास स्वरूप यानी ‘आस्था की प्रतिमा’ कहा जाता है। यह प्रतिमा प्रसिद्ध व्यवसायी श्री मदन पालीवाल की कल्पना की उपज है। इस कल्पना को साकार किया प्रसिद्ध मूर्तिकार नरेशजी कुमावत ने। परंतु इसका निर्माण श्री शापूरजी पलनोनजी ने कराया है। यह प्रतिमा बीस किमी. दूर से ही दिखाई देने लगती है। ‘विश्वास की प्रतिमा’ दुनिया में भगवान् शिव की सबसे ऊँची प्रतिमा है। इतना ही नहीं, यह दुनिया की चौथी सबसे बड़ी प्रतिमा है। इसकी ऊँचाई ३६९ फीट यानी ११२ मीटर है। भगवान् शिव जिस शिला पर बैठे हैं, वह ११० फीट यानी ३४ मीटर ऊँची है, जिस पर भगवान् भोलेनाथ अपना बायाँ पैर दाएँ पैर के घुटने पर रखे हुए हैं और बाएँ हाथ से त्रिशूल धारण कर रखा है। चेहरे का भाव ऐसा है, जैसे शिव ध्यानमग्न हैं। भोलेनाथ की इस प्रतिमा के अंदर एक प्रदर्शनी हॉल है, वहाँ तक लिफ्ट द्वारा ले जाया जाता है। ऊपर से पूरे नगर का मनोरम नजारा लिया जा सकता है। भगवान् शिव के सामने स्थित नंदी की मूर्ति भी २५ फीट ऊँची और ३७ फीट लंबी है। सोलह एकड़ में फैले इस पार्क में पार्किंग सुविधा से लेकर तीन हर्बल उद्यान, एक फूड कोर्ट, एक लेजर वाला संगीत फब्बारा, भूल-भुलैया तथा हस्तशिल्प की दुकानें हैं। भगवान् शिव की इस प्रतिमा के डिजाइन पर सन् २०११ में काम शुरू हुआ था। इसका निर्माण २०१६ में शुरू होकर १७ अगस्त, २०१९ में पूरा हुआ। सब प्रकार से तैयार हो जाने के बाद २९ अक्तूबर, २०२२ को दर्शकों के लिए खोल दिया गया। हजारों की संख्या में यहाँ यात्री वर्ष भर आते रहते हैं। यह नाथद्वारा के सबसे बड़े आकर्षणों में से एक है।
हम चलते-चलते यहाँ की भूल-भुलैया पर आकर रुके, फिर शिवमूर्ति की ओर ऊँचाई पर चढ़ने लगे। प्रचंड गरमी पड़ रही है, जब बादल का टुकड़ा सूरज को ढक लेता है तो कुछ राहत सी महसूस होती है। लोहे की अलग से बनी सीढ़ियों पर चढ़कर हम लोग भगवान् भोलेनाथ के चरणों तक पहुँच गए हैं। उनके पैर पर मत्था टेक भगवान् शिव को प्रणाम किया। फिर धीरे-धीरे उठते-बैठते पूरा पार्क घूमे। पेड़ों की शीतल छाँव में बैठे। जगह-जगह पीने के पानी के आरो लगे हैं, साथ ही सूचना पट भी पग-पग पर लगे हैं। करीब ढाई घंटा हमने इस पार्क में बिताया, फिर बाहर निकास द्वार की ओर लौटे। यहाँ गेट पर स्थित दुकानों से मित्रों ने नमकीन, थेपला आदि खरीदे। बाहर भैंरूभाई हमारा इंतजार कर ही रहे थे। अब भूख भी अपना असर दिखा रही है, सो विचार बना कि लंच में दाल-बाटी खाया जाए।
भैंरूभाई अब हमें खाना खिलाने के लिए नाथद्वारा के बस अड्डा पर ले आए हैं। यहाँ पर एक साधारण से ढाबे में दाल-बाटी, सब्जी, सलाद का आनंद लिया। बाटी और चपाती यहाँ परंपरागत ईंधन कोयला और लकड़ी से ही पकाया जाता है। खाना बेहद स्वादु है, भूख भी चमक ही रही थी, सो भरपेट खाया। अब अपराह्न के तीन से ऊपर बज रहे हैं। आज ट्रैफिक जाम का अंदेशा है। गणपति विसर्जन के लिए झाँकियाँ गाजे-बाजे के साथ निकलने लगी हैं। गानों की तेज धुन पर भक्तजन उछल-उछलकर नाच रहे हैं। भैंरूभाई ने ऑटो अंदर के रास्ते पर ले लिया है। रास्ते में कई गाँवों से होकर हम गुजरे। यहाँ भी रेहड़ी पर गणपति सजा रखे हैं, डीजे बज रहा है, बच्चे-महिलाएँ गाते-नाचते उन्हें विसर्जित करने जा रहे हैं। बेहद गरीब, साधारण लोग भी पर्व का आनंद ले रहे हैं; उन्होंने हमारा वाहन रुकवाकर सूखा प्रसाद हमें दिया। बच्चे बड़े उत्साह में हैं। करीब सवा चार बजे भैंरूभाई ने हमें मावली जं. पर उतार दिया। यहाँ सबके लिए चाय बनवाई गई। चाय पीकर हमने भैंरूभाई के साथ फोटो खिंचवाया और फिर भैंरूभाई को किराया देकर उनके सेवा भाव के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त की और धन्यवाद देकर विदा किया। भैंरूभाई का रोम-रोम खिल उठा, हमारा भी।
भैंरूभाई नाथद्वारा की ओर लौटे, तो हम लोग अपना सामान उठा प्लेटफॉर्म नं. दो पर आ गए हैं। गाड़ी आने में अभी देर है, सो मैं और कृष्णपाल भाई मावली का देहाती बाजार घूमने आ गए हैं। कृष्णपाल भाई ने यहाँ से मीठे पानी की ताजा सब्जियाँ खरीदीं। लौटते वक्त एक ढाबे से रात्रि भोजन के लिए तीन थालियाँ भी पार्सल करवा लीं। गाड़ी की उद्घोषणा हो रही है। अपने नियत समय पर चेतक एक्सप्रेस प्लेटफाॅर्म नं. दो पर आ लगी। हम भी एस-३ बोगी में अपनी सीटों पर बैठ गए हैं। भाई लोगों ने मौसम बनाना शुरू कर दिया है। मौसम तो भाई लोग वहाँ भी हर शाम बनाते रहे। गाड़ी में भीड़ नहीं है। किसी की आरक्षित सीट पर एक नशेड़ी कब्जा करके लेटा है, उसने वहीं पर पेशाब कर दिया है। उसे रेलवे कर्मचारी बुला साफ कराया गया, नशेड़ी भी हटा दिया, लेकिन बाद में वह फिर आ गया और उत्पात मचाने लगा।
भीलवाड़ा पर हम लोगों ने अपना खाना खाया और अपनी-अपनी सीट पर लेट गए। गाड़ी की शंटिंग बड़ी खराब है, बहुत ज्यादा झटके लग रहे हैं। रात को रिंगस से चढ़ने वाले यात्रियों ने खूब चिल्लपों मचाई, सब यात्रियों की नींद खराब कर दी। ज्यादातर लोग केवल अपने बारे में, अपनी खुशी के बारे में, अपनी सुविधा के बारे में ही सोचते हैं, दूसरों की परवाह नहीं करते। अपने अधिकार सबको याद हैं, परंतु कर्तव्यों का बोध बिल्कुल भी नहीं है। आखिर प्रात: सवा चार बजे गुरुग्राम स्टेशन पर हम बर्थ से नीचे उतर सामान समेटने लगे। अंतत: अब उतरने के लिए बिल्कुल तैयार हैं और कैंट स्टेशन के आते ही हम गाड़ी से उतर पड़े। यहाँ से ऑटो पकड़ सबने अपने-अपने घर की राह ली। हर तीर्थयात्रा में कुछ नए साथी जुड़ते हैं तो उनको लेकर कुछ नए स्थानों पर, कुछ पुराने स्थानों पर जाना होता है। पुराने स्थानों का पिष्टपेषण न करते हुए नए तीर्थों के बारे में ही विस्तार से लिखा गया है। भगवान् एकलिंग की धरती पर हम चार दिन बड़े सुख-आनंद से रहे। पुण्य अर्जित किए। मन को शांति तथा तन को ताजगी मिली। जय भगवान् एकलिंग, जय श्रीनाथ और जय मेवाड़!!
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