मुखौटों की महिमा

मुखौटों की महिमा

हमारे शहर के एक ‘अंतरराष्ट्रीय’ लेखक हैं। दरअसल, वह पहले स्थानीय तक न थे। जब से वह एक लोकप्रिय गीतकार का झोला उठाकर उनके साथ विदेश गए, उन्होंने स्वयं को अंतरराष्ट्रीय घोषित कर दिया। हाल ही में उन्हें दिल का दौरा पड़ा। शहर के प्रतिष्ठित सरकारी अस्पताल में उनका इलाज हुआ। जब वह ठीक हो गए तो अचानक सोशल मीडिया पर उनके मित्रों ने उनकी बीमारी का शोक-प्रदर्शन, सोशल मीडिया पर शुभचिंतकों की भीड़ दिखाकर किया। “उनके दिल के दौरे का सुनकर अस्पताल के रास्ते में इतनी आवाजाही बढ़ गई कि वह राह अवरुद्ध हो गई। पुलिस को बुलाया गया, तब रोगियों का प्रवेश संभव हो सका।” लोकप्रियता के इस बखान से ही शोक-प्रदर्शन का काम चल जाता है। 
एक अन्य लेखक अपनी रचनाएँ, कविता या कहानी यू-ट्‍‌‍‌यूब पर बहुधा डालते रहते। परिचित-अपरिचित उन्हें सैकड़ों की संख्या में ‘लाइक’ करते। धीरे-धीरे वह खुद को श्रेष्ठ व उत्कृष्ट लेखक मानने लगे। उन्होंने अपनी कवि-सम्मेलन की फीस बढ़ा दी। आयोजकों ने उन्हें बुलाना बंद कर दिया। तब से उनकी कवि-सम्मेलन की मान्यता बदल गई है। अब उनका विश्वास है कि कवि-सम्मेलन, कविता के लिए न होकर, सिर्फ गवैयों का जमघट है। लोगों को उनके लेखन को ‘लाइक’ करने की ऐसी आदत थी कि जब पत्नी ने उनके स्वर्गवास का समाचार यू-ट्‍‌‍‌यूब पर भेजा, तब सैकड़ों ने उसे भी ‘लाइक’ किया। यह इस तथ्य का द्योतक था कि उनकी रचनाओं की भी यही नियति थी। लाइक करना महज एक औपचारिकता थी। 
जीवन में एक और शोक-प्रदर्शन का तरीका है। लोग मृत व्यक्ति की शवयात्रा में शरीक होकर ‘राम नाम सत्य’ का उद्घोष करते मरघट तक जाते हैं। बीच-बीच में ‘फलाना अमर रहे’ का नारा भी गूँजता रहता है। ऐसा बहुधा तथाकथित जन-नायकों के साथ होता है। वह किसी-न-किसी सियासी दल के सदस्य हैं। कभी जनता की सेवा की होगी, उनके पुरखों ने। अब वह उनके नाम की कमाई खा रहे हैं। दल का नेतृत्व उन्हें विरासत में मिला है। 
भारत कालुओं का देश है। गोरी चमड़ी का यहाँ वैसा ही महत्त्व है, जैसे स्थानीय भाषा की तुलना में अंग्रेजी का। शारीरिक का है, मानसिक दासता का अंत नहीं है। देश को लूटने की प्रवृत्ति अब भी जीवित है, बस उसने वाणी का रूप धर लिया है। उन्हें लाभ है, वह दिल के कैसे भी हों, चमड़ी उनकी गौर-वर्ण है। पूरी पार्टी उनकी जेब में है। चमचों की सेना उनका गुणगान करती है। उनकी मूर्खता की बात पर जब श्रोता ताली बजाते हैं, तब उन्हें भ्रम होता है कि उनकी प्रशंसा हो रही है। उनके ‘कान भराऊ’ चमचे उन्हें यही समझाते हैं। चुनाव हारने का गिनीज बुक में शर्तिया रिकाॅर्ड स्थापित करने योग्य है, फिर भी उनका अपनी महानता का आत्म-विश्वास अडिग है। उसके हर चुनाव-प्रचार से विपक्षी खुश हैं। वह उनकी हारने की सिफत से परिचित हैं। 
अनके दौरे पर आगमन से, दल के पुराने सदस्य और शुभचिंतक, चिंतित हैं; पर उन्हें कैसे बताएँ? इस प्रकार के महानुभाव आलोचना सुनने या वास्तविकता जानने के आदी नहीं हैं। उन्हें सिर्फ ठकुरसुहाती भाती है। पुराने सदस्य भी अंतर का शोक, उनकी ‘जय-जयकार’ के माध्यम से प्रगट करते हैं। इधर शहरों में इनसानों की ऐसी भीड़ है कि गधे-घोड़े कम ही दिखते हैं। इन हालात में, ऐसों की कल्पना उस लीडर जैसे ‘आदर्श’ गधे की है, जो जन-सभाओं में विविधता के स्थान पर, सिर्फ हौंची-हौंची का समान राग अलापता हो। वह मूर्ख है, पर क्या करें? सच बोलें तो दल से निष्कासित होने की आशंका है। केवल प्रशंसा की इजाजत है। वही कर रहे हैं, यह सोचते हुए कि दल डूब रहा है, पर वह उसे बचाने में असहाय हैं। 
उन्हें खयाल आता है कि इक्कीसवीं सदी केवल मुखौटों की सदी है, सच्चाई की नहीं। एक-दूसरे को फूटी आँख न सुहाने वाले भी, सिर्फ हितैषी का मुखौटा लगाकर मिलते हैं। जबकि महँगाई से सब त्रस्त हैं, कीमती मुखौटों की दुकान में क्यों लगा है। सब मुखौटों की तलाश में हैं। पारस्परिक भेंट-मुलाकात इसके बिना कैसे संभव है? आपस में बातचीत बिना मुखौटे के मुमकिन नहीं है। कोई प्रेम का मुखौटा लगाए है, कोई हित-साधक का। मुखौटों की इस भ्रामक प्रदर्शनी में लोग इतने व्यस्त हैं कि शीशे के सामने खड़े होकर अपने असली चेहरे के बारे में शंकित हैं। उनका पूरा दिन मुखौटों की विविधता में बीतता है। अधिकतर, मुखौटे, स्नेह, सौहार्द, सहानुभूति, समरसता जैसे नेक भावनाओं के हैं। जबकि अंतर की असलियत केवल निजी स्वार्थ है, लोकप्रियता है, सफलता के जीवन की चाहत है। मुखौटों की भीड़ में अपने असली चेहरे सबको कैसे दिखें?
मुखौटों का प्रयोग निर्धन और समृद्ध सब करते हैं। हर सरकार अपने अपने अंदाज में जन कल्याण में जुटा है। मुखौटों के मूल्य गरीबों की जेब के परे है। मुखौटों की उपयोगिता से सरकारें भी परिचित हैं। इनके प्रयोग से सौहार्द, स्नेह, समरसता, अमन-चैन बढ़ा है। सरकार ने इस विषय में एक सर्वे करवाया था। उसके अनुसार यह मुखौटा संस्कृति का ही कमाल है कि सामाजिक व्यवहार में लोग हँसते-मुसकराते नजर आते हैं। बहस-विवाद में कमी आई है, आपसी मार-पीट में भी और व्यर्थ के झगड़े-टंटों में भी। उलटे, कल तक के विरोधी आज एक-दूसरे के गले पड़ते हैं। सब सद्भाव और आपसी हित-साधने का मुखौटा लगाए हैं। अतीत में क्रिकेट की गेंद से किसी के घर से काँच टूटने पर उसकी प्रतिक्रिया थी कि गली में क्रिकेट क्यों? खेलना है तो पार्क में खेलें। फिर भी बच्चों की क्रिकेट जारी है काँचों का टूटना भी। मान लीजिए कि रमेश या चुन्नू की हिट से वर्माजी की खिड़की का शीशा चटका तो उनके घर रमेश या चुन्नू के पिता उसे बदलवाने का खर्च देने का प्रस्ताव देंगे तो वर्माजी साफ इनकार कर देंगे। “आपका बच्चा तो हमारा बच्चा, इसमें क्या है? कोई जानबूझकर तो उसने निशाना साधा नहीं होगा। खेल है, हिट लगी तो काँच टूटा। आपका शीशा भी तो ऐसे ही शहीद हो चला है। इसमें क्या? कम-से-कम बच्चों का दिल-बहलाव तो हो जाता है।” भले ही वर्माजी मन-ही-मन मानते हैं कि रमेश या चुन्नू की टाँग टूटे, फ्रैक्चर हो, ऐसी नामाकूल हरकतें तो बंद हों। पर यह सद्भाव के मुखौटे का ही जादू है, जो उनके सिर चढ़कर बोल रहा है। 
कॉलेज-यूनिवर्सिटी के युवाओं पर भी प्यार के मुखौटे का प्रभाव पड़ा है। हर प्रेमिका के चार-पाँच प्रेमी है, वह बिना विवाह की द्राैपदी है। इसी प्रकार, हर लड़के को आधी दर्जन प्रेमिकाओं से निभाना है। कुछ प्राध्यापक भी इसी मुखौटे के शिकार हैं। मुखौटे के कारण सब एक-दूसरे का अस्थाई मनोरंजन करने में समर्थ हैं। नतीजतन, न अब कोई लैला है, न मजनू। बारहवीं सदी की कविता के पन्नों से लैला को अब जाकर छुटकारा मिला है। यह कहना कठिन है कि यह लैला-मजनू क्या केवल कवि की कल्पना के पात्र हैं या असलियत के। फिर भी यह असफल पारस्परिक प्रेम की मिसाल बने हुए हैं। यह हमारे समय की विशेषता है कि अब सफल-असफल प्रेम कुछ नहीं है। बस एक बार विवाह का मुखौटा लगा तो सब कुँवारा अतीत हो जाता है। 
मुखौटों की लोकप्रियता और व्यापक प्रयोग को देखते हुए सरकार ने स्वयं, मुखौटों के कुटीर उद्योग को बढ़ावा देने का निश्चय किया है। पहले किसी ने सुझाया कि मुखौटों की फैक्टरी क्यों न लगाई जाए, पर इससे मुखौटों की एकरूपता बढ़ती है। एक ज्ञानी ने जलेबी की फैक्टरी की बात की थी। न वह व्यावहारिक लगा न यह। बहरहाल, सरकार निर्धनों को रियायती दर से हर भावना के मुखौटे उपलब्ध करा रही है। उसका नेक निश्चय है कि आदमी निजी स्वार्थ को भूलकर, केवल परमार्थ को, जिए। यदि ऐसा असंभव है तो मुखौटों के माध्यम से इसे संभव बनाया जाए। प्रजातंत्र में बहुमत का जमाना है। जो अधिक मत पाता है, वही चुना जाता है। शासकीय दल अपने प्रमुख नेताओं के मुखौटे मुफ्त में बाँटता है। प्रचार-का-प्रचार और मुखौटे-का-मुखौटा। 
कौन कहे, जैसे जनता फ्री के बिजली-पानी में फँसी, वैसे ही मुफ्त के मुखौटों में? फ्री का भेजा ही निराला है। एक ग्राहक ने जूते की दुकान के मालिक से गुजारिश भी की थी कि “भले ही आप दस जूते मार लो, यदि एक जोड़ी फ्री दे दो, तो हमें मंजूर है।” 
सत्ताधारी फ्री की महिमा और मानसिकता से बखूबी परिचित है। लिहाजा वोट पाने को इस अस्त्र का इस्तेमाल करती है। विरोधी लाचार हैं। क्या करें? मन मसोसकर रह जाते हैं। वह वादों के अलावा कुछ और करने में असमर्थ हैं। लिहाजा केवल फ्री सुविधा के वादों से काम चलाते हैं। हालाँकि किसी की जेब से कुछ जा नहीं रहा है। सारा पैसा जनता का है। वह फ्री की योजना के जरिए एक वर्ग का धन दूसरे को दिया जा रहा है। अभी एक हालिया घटना ने मुखौटों के महत्त्व को रेखांकित किया है। वर्तमान राजनीति एक ऐसी चाय है, जो बिना माफिया के दूध के अधूरी है। पहले का बाहुबली कालू उर्फ कालका अब सक्रिय वसूली, हत्या, मारपीट, अपहरण के धंधे से रिटायर हो चला है। फिर भी उसी का नाम चलता है। बाकी अपराधियों के कृत्य उसके इशारे पर हैं। 
पत्रकारों और टी.वी. चैनलों के एंकर-निर्माताओं को भेंट-गिफ्ट देेकर कालका ने अपनी छवि बदली है। समय व्यक्तित्व के सच का न होकर ‘इमेज’ का है। लोग यहाँ तक कहने लगे हैं कि गोरी-चमड़ी के अंग्रेजों के विरुद्ध कालू ने कालुओं के प्रतिनिधि के रूप में अब तक संघर्ष और विद्रोह किया है। प्रजातंत्र की कानून-व्यवस्था के संरक्षक सादा बिना वर्दीधारी या वर्दीधारी पुलिस वाले हैं। वह अपने अफसर से अधिक कालू से खौफ खाते हैं। यदि कालू क्रुद्ध हुआ तो जान का खतरा है। अफसर का क्या? वह तो तबादला कर देगा या लाइन-हाजिर करेगा? अधिक ऊधम मचाया तो उसकी जात के जन प्रतिनिधि, अधिकारी का जीना हराम करेंगे। इधर माफिया ने अपनी छवि जनसेवक की बनाई है। उसने अनुभव से जाना है कि इसके जैसे कई यशधारी चुनाव में जीतकर मंत्री बने हैं। फिर उसमें क्या खामी है? उसने इन सबसे अधिक गंभीर गुनाह करवाए हैं। कोई तुलना करे तो देखे? उसका संख्या-बल कहीं अधिक होगा। 
उसने बाल-कल्याण केंद्र जैसी जनसेवा की संस्था की भी स्थापना की है। यह कई निर्धन बच्चों की शिक्षा और कौशल-विकास का प्रशिक्षण, उपलब्ध करवाकर, उन्हें आत्मनिर्भर बनाता है। इस पावन उद्देश्य से उन्होंने कई स्कूल-कॉलेज खोले है। जमीन सरकारी ‘लीज’ पर है, इमारत दान-चंदे की। स्कूल-कॉलेज आजकल, सेवा का कर्म न होकर बड़े मुनाफे का धंधा है। जनसेवा में भी कालू ने लाभप्रद धंधा चुना है। एक युनिवर्सिटी ने उनकी शिक्षा के क्षेत्र में की गई सेवाओं और योगदान के उपलक्ष में उन्हें डॉक्टर की मानद उपाधि दी है। अब वह डाॅक्टर कालू हैं। शहर के भीख के धंधे पर भी उनका एकाधिकार है। पढ़ने वाले बच्चे भी भीख के पार्टटाइम पेशे से आत्मनिर्भर बनते हैं। डाॅक्टर कालूराम का दावा है कि वह बच्चाें में शुरुआती दिनों से ही आत्म-निर्भरता की भावना जाग्रत् करने को प्रयत्नशील हैं। यदि कोई कारवाला भिक्षा से इनकार भी कर दे तो यह बच्चे गाली बुदबुदाकर चले जाते हैं, पीछे पड़ने से बजाय। कोई पुलिस वाला दिखा भी तो यह रफूचक्कर होने क कला में माहिर हैं। डॉक्टर कालू राम का विचार है कि इसमें वह भविष्य के और धंधों जैसे चोरी-डकैती, लूट, अपहरण आदि में प्रशिक्षित हो रहे हैं। 
अपने स्कूल-कॉलेज से न सिर्फ उनकी छ​िव उभरी है, बल्कि संपर्कों में भी अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। अब सियासती नेताओं से ही नहीं, शिक्षाशास्त्रियों से भी उनकी नजदीकियाँ हैं। उनके हर कॉलेज का एक मैनेजर है, जो उनकी पसंद का है। वह उनके अतीत का साथी है और हर महीने निर्धारित राशि कालू को भेंट चढ़ाता है। यदि चूका तो उसकी नौकरी जाने की पूरी संभावना है। एक महाकवि ने सच ही लिखा है—“भय बिन होय न प्रीति।” कालू पर उनकी आजीविका की पूरी निर्भरता है। लिहाजा, अलिखित इलहनामे के चढ़ाने में चूक का प्रश्न ही नहीं उठता है। जैसे-जैसे स्कूल-कॉलेज का यह मुफीद व्यापार बढ़ता जाता है, उनकी शिक्षाशास्त्री और समाज सेवा की ख्याति और छवि। इधर उन्होंने एक मीडिया सलाहकार भी नियुक्त किया है, जिसका पूर्णकालिक काम जो ‘नहीं’ है, उसी के ‘होने’ को मुखर करना, अर्थात् अशिक्षित कालू के शैक्षिक विचार और जनसेवा के कृत्यों का टी.वी. और समाचार-पत्रों में प्रचार करना है। वह काफी सफल भी रहा है, गुनाहों के पीएच.डी. कालू को जन-कल्याण का मुखौटा लगाने में। 
डॉक्टर कालू हर सियासी दल का समान रूप से सम्मान करते हैं। सबको बराबरी से बिना भूले-माँगे चंदे का चढ़ावा भी चढ़ाते हैं। उसी लगन से, जिससे वह मंदिर-गुरुद्वारे जाते हैं और मुल्ला-मौलवी को गले लगाते हैं। ज्ञान की बातें उनका मीडिया-सलाहकार करता है, वह इस दौरान चुप्पी साधे रहते हैं। इधर शीशे के सामने खड़े होकर वह नीति और ज्ञान की बातों का अभ्यास कर रहे हैं। जिससे मुँह खोलते ही गालियों और धमकियों की स्वाभाविक बौछार रुक सके। परिणाम वही है, जैसा बादल के घिरने के वाबजूद बारिश का न होना। धीरे-धीरे गरज के साथ गालियों की छीटों में, बमुश्किल कमी आ रही है। पर उल्लेखनीय सुधार नहीं हो रहा है। वह अब चुप्पी को अपनी नियति मानने लगे हैं और उसके आदी भी हो गए हैं। 
नश्वरता सब का स्वाभावकि प्रारब्ध है। एक दिन छिपकर दारू सेवन करते, उनका देहावसान हो गया। उनके ‘टें’ बोलने पर उनके पढ़े-लिखे पुत्र ने, मीडिया सलाहकार के साथ उनकी जनसेवा, उदारता, आदर्शवाद, निर्धन-कल्याण आदि के गुण गाए। लेख और उनके चित्र छपे। बाकायदा, ‘कालूराम अमर रहे’ की गूँज के साथ उनको फूलों सजी अरथी के साथ जुलूस निकला। 
सैकड़ों की संख्या में शोक का मुखौटा लगाए टीचर छात्र और मैनेजर ‘अमर रहे’ का उद्घोष करते साथ थे। तमाशा देखना देश का प्रमुख शौक है। मरघट के पूरे रास्ते तमाशबीनों की संख्या बढ़ती रही। पूरा माहौल मातम का था। कालूराम के बैनर-पोस्टर भी शवयात्रा के साथ थे। कसर लाउड-स्पीकर की थी, वरना ‘कालूराम अमरे रहे’ का उद्घोष ज्यादा जोर-शोर से गूँजता। मीडिया सलाहकार ने कालूराम के पुत्र बल्लू से अपनी गलती की स्वाकारोक्ति की, साथ ही भूल की क्षमा भी माँगी। 
मुखौटे असलियत नहीं होते। उनके माध्यम से सच्चाई कुछ समय तक भले छुपी रहे पर एक-न-एक दिन जरूर उजागर होती है। पात्रों की कलई उतरना प्रकृति का नियम है। एक खोजू पत्रकार ने अपने लेखों से कालू का अतीत, उनकी संस्था की वास्तविकता, स्कूलों-कॉलेजों के भ्रष्टाचार और वसूली की पोल खोली। कालूराम के कॉलेजों की शिक्षा विभाग द्वारा जाँच चल रही है। उनका जन-कल्याण केंद्र बंद है। स्कूल-कॉलेज के ज्यादातर मैनेजर फरार हैं। 
हम मुखौटों की करामात से प्रभावित हैं। अनपढ़ को शिक्षामंत्री बनाना मुखौटों का ही करतब है। अब सच का मुखौटा लगाए उस पत्रकार की छवि का प्रश्न है। हमें उत्सुकता है उसकी असलियत जानने की। सवाल समय का है। एक न एक दिन वास्तविकता का असली चेहरा भी नजर आना ही आना। जैसे कालू का उतरा है, पत्रकार का असली चेहरा भी कब तक छुपेगा?
यह एक सर्वकालीन सत्य है कि मुखौटे ही एक-दूसरे का विनाश करते हैं और इसीलिए मुखौटा उद्योग फलता-पनपता रहता है। 

१/५, राणा प्रताप मार्ग, 
लखनऊ-२२६००१
दूरभाष : ९४१५३४८४३८

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