सुपरिचित लेखक। अब तक ‘भावत्रयी’ और ‘तमन्ना’ काव्य-संग्रह, ‘सपना’, ‘श्यामा’, ‘स्पर्श’, ‘हिस्से का सूरज’ और ‘सुनहरी साँझ’ कहानी-संग्रह, ‘दर्द न जाने कोय’ उपन्यास एवं ‘कहानी प्रसंग’, ‘समकालीन गजल और विनय मिश्र’ तथा ‘डॉ. मिथिलेश दीक्षित के साहित्य में मूल्य बोध’ संपादन, ‘वर्णों का अनुनाद’ (हाइकु संग्रह), ‘गांधी-दर्शन स्वातंत्र्योत्तर हिंदी काव्य’ (शोधग्रंथ) प्रकाशित। संप्रति प्रधानाचार्य एवं ‘अनुगुंजन’ त्रैमासिक पत्रिका के संपादक।
क्या हुआ?
“...”
“लो, चाय पी लो।”
“अब जो होना था हो गया, इतना सोचने से और खुद को परेशान करने से क्या फायदा?”
“...”
“जब अपना ही सिक्का खोटा निकल गया तो...” उनकी आवाज भर्राने लगी। उन्होंने स्वयं को संयत कर चाय की चुस्की ली।
“हमें नहीं पता था कि अपनी औलाद ही हमसे इतना बड़ा छल करेगी...” कहते-कहते सुधा रोने लगी।
“शांत हो जाओ...” उन्होंने कहा, लेकिन खुद उनका मन भी कहाँ शांत था। कल शाम जब से उन्हें यह बात पता चली कि यह काॅलोनी वास्तव में वृद्धजनों के लिए बनी है तो उनके पैरों से जमीन खिसक गई। रामसरनजी को तो जैसे साँप सूँघ गया था। मस्तिष्क सुन्न हो गया था। कुछ सोचने-समझने की शक्ति क्षीण-सी हो गई थी। जैसे-तैसे वे लिफ्ट में चढ़कर अपने फ्लैट तक आए और काफी देर तक गुमसुम बैठे रहे। उनकी पत्नी सुधा ने बहुत पूछा, लेकिन उन्होंने कोई जबाव नहीं दिया।
रात में जब वे बेडरूम में गए तो सुधा के सब्र का बाँध टूट गया। टी.वी. देखती सुधा ने झट टी.वी. बंद किया और रामसरन का हाथ अपने हाथ में लेकर बोलीं, “क्या बात है, शाम को जब से टहलकर आए हो, तुम्हारा चेहरा उतरा हुआ है। आखिर बात क्या है, बताते क्यों नहीं?”
स्नेह के स्पर्श से उनके सब्र का बाँध टूट गया। सुबकते हुए वे बोले, “अमित ने हमें धोखा दिया”, भर्राई आवाज उनके गले में ही अटक गई इसके आगे वे न बोल पाए।
सुधा को कुछ समझ नहीं आया। उसने घबराते हुए पूछा, “सीधे-सीधे बताओ क्या बात है? धोखा कैसा? मुझे घबराहट हो रही है, जल्दी बताओ, हुआ क्या है?”
स्वयं को सँभालते हुए वे बोले, “यह कॉलोनी वृद्धों के लिए है...यानी इसमें केवल बूढ़े ही रह सकते हैं।”
“केवल बूढ़े रह सकते हैं, मतलब? साफ-साफ बताओ न।” सुधा ने मनुहार की।
“मतलब नए तरह का वृद्धाश्रम है यह कॉलोनी...अमित ने नया फ्लैट लेने की बात झूठ कही थी, सच तो यह है कि उसने हमें वृद्धाश्रम में ला पटका है और खुद हमेशा के लिए कनाडा चला गया।” कहकर वे रो पड़े।
सुधा भी यह सुनकर एकदम सन्न हो गई। उसका मन चीत्कार कर उठा। वह रो रही थी, लेकिन उसकी आँखों से आँसू नहीं निकल रहे थे। उसने सिर्फ इतना ही कहा, “यह आप क्या कह रहे हैं?” और शून्य में कहीं खो गई।
मन हलका होने के बाद रामसरन ने अपनी आँखें पोंछीं और सुधा की ओर देखते हुए बोले, “आज जब मैं टहलने गया तो चौकीदार से मैंने पूछा कि हमें आए हुए तीन महीने हो गए इस कॉलोनी में, लेकिन कोई दिखता नहीं है, इक्का-दुक्का लोग ही यहाँ-वहाँ दिखते हैं। क्या यहाँ लोग मकान नहीं ले रहे हैं? तब चौकीदार ने बताया कि ‘यह कोई साधारण कॉलोनी नहीं है, यह वृद्धों के लिए खास बनाई गई है। शहर के एक नामी बिल्डर की नई योजना है। इसमें आपका मकान भी आपका परमानेंट नहीं है, जब तक आप और माताजी हैं, आप यहाँ रहेंगे, इसके बाद आपका मकान किसी और बुजुर्ग को दे दिया जाएगा। यही सिस्टम है।”
उन्होंने चौकीदार से फिर पूछा, “और जो हमने पैसा दिया है वह?” चौकीदार ने कहा, “बाबूजी, घर बैठे राशन, दूध, अखबार, दवाई आदि, जो आपको मिल रहा है, वह उसमें खर्च होगा और कुछ आपके फ्लैट के मेंटिनेंस में...वरना क्या बीस लाख रुपए में इस शहर में मकान मिलता है?”
“मतलब...मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा है?” रामसरन ने चौकीदार के पास पड़ी कुरसी पर बैठते हुए कहा।
“देखिए बाबूजी, जो बच्चे विदेशों में जाकर बस जाते हैं, उनके लिए इस कॉलोनी के बिल्डर ने एक योजना बनाई है कि वे अपने माता-पिता को यहाँ एक फ्लैट दिलवाएँ। उम्र के हिसाब से फ्लैट की कीमत होती है, यानी कि यदि माता-पिता की उम्र पैंसठ से सत्तर के बीच है तो बीस से पच्चीस लाख रुपए, पचहत्तर से अस्सी के बीच है तो पंद्रह लाख रुपए और पचासी से नब्बे के आसपास है तो केवल दस लाख रुपए। इसमें उनके माता-पिता का खाना-पीना, नौकरानी, दवाई, राशन वगैरह सब शामिल है।...यहाँ तक कि अंतिम संस्कार भी। जब माता-पिता नहीं रहते हैं तो वह फ्लैट साफ-सफाई करवाकर किसी और के लिए दे दिया जाता है।” कहकर चौकीदार ने गहरी साँस ली और आगे बोला, “अजीब दुनिया है अमीरों की, इससे तो हम गरीब लोग ही अच्छे हैं, जो कम-से-कम अपने माता-पिता को अपनी देहरी नहीं लाँघने देते...आखिरी साँस तक सेवा करते हैं उनकी। उन्हें अकेला और बेसहारा नहीं छोड़ते।”
चौकीदार की बातें सुनकर रामसरन का दिल बैठने लगा। उन्हें घबराहट होने लगी। वे जैसे-तैसे अपने फ्लैट में वापस आ गए और एकदम शांत होकर सोफे पर बैठकर अखबार पढ़ने का नाटक करने लगे। सुधा रात के खाने की तैयारी में व्यस्त थी। उसने एक-दो बार पूछा, लेकिन रामसरन की ओर से कोई उत्तर न आने के बाद वह रसोई में चली गई थी, लेकिन अब जब उसे रामसरन की उदासी का कारण पता चला तो वह अपनी सुधबुध खो बैठी। मानो उसके कलेजे पर किसी ने आरी चला दी हो। बार-बार उसके मस्तिष्क में रामसरन के शब्द गूँज रहे थे, ‘अमित हमेशा के लिए कनाडा चला गया।’ वह कुछ सोचने समझने की स्थिति में न रही और चुपचाप मुँह फेरकर लेट गई। जैसे उसने सबसे मुँह मोड़ लिया हो। रामसरन से भी आगे कुछ कहते न बना।
रामसरन और सुधा तीन महीने पहले ही इस कॉलोनी में आए थे। अब तक की पूरी जिंदगी कस्बेनुमा शहर के उनके पुश्तैनी मकान में कट गई थी। हाँ, बड़े शहर में बसने का एक सपना जरूर था, लेकिन एकमात्र पुत्र अमित को बहुत बड़ा आदमी बनाने के सपने ने उन्हें छोटे शहर से बाहर ही नहीं निकलने दिया और बड़े शहर में रहने का उनका सपना धूमिल होता गया। वे जो कुछ करते, सब अपने बेटे अमित की पढ़ाई-लिखाई में ही लगा देते। सरकारी जूनियर हाईस्कूल का मास्टर कर भी कितना सकता है। तीन वक्त की रोटी, साधारण कपड़े और साइकिल, बस इसके बाद जो बचता, वह अमित की पढ़ाई में जाता। इंजीनियरिंग में सलेक्ट होकर अमित ने भी उनके सपनों में रंग भरना शुरू कर दिया था। जब-जब अमित कॉलेज से आता तो माता-पिता का सीना गर्व से फूल जाता था। रिश्ते-नाते तो बहुत थे नहीं, हाँ, आस-पड़ोस वालों में रामसरन की प्रशंसा होती। अमित अन्य बच्चों को लिए एक आदर्श बन गया था। इंजीनियरिंग के बाद अमित ने कई जगह काम किया और अनुभव हासिल करके एक बहुत बड़ी कंपनी में इंजीनियर बन गया। उसने खूब उन्नति की। इधर रामसरनजी भी रिटायर हो चुके थे। जो कुछ पैसा मिला, उससे अमित की शादी कर दी। हालाँकि अमित ने अपनी मर्जी से ही शादी की। करता भी क्यों न, इतना बड़ा इंजीनियर है और फिर वह अपने योग्य लड़की ही ढूँढ़ेगा। रामसरनजी को बाद में पता चला कि वह लड़की शहर के नामी बिल्डर की बेटी है और अमित के साथ ही उसने भी इंजीनियरिंग की है। रामसरन इस मामले में खुले विचारों के व्यक्ति हैं। बेटे की खुशी में ही उन्होंने सदैव अपनी खुशी मानी।
इस बार अमित जब नई कार से घर आया, देखने वालों का मेला जुड़ गया था रामसरन के दरवाजे के आगे। यह तो अच्छा था कि रामसरन के घर के सामने काफी खुली जगह थी, इसलिए कार वहीं खड़ी हो गई, वरना तो घर से दूर ले जाकर कार खड़ी करनी पड़ती। उस रात रामसरन को अपना धूमिल सपना एक बार फिर दिखने लगा, जब खाना खाते हुए अमित ने कहा, “पापा जी, मैंने शहर में एक नया फ्लैट आपके लिए लिया है। चलिए, आप दोनों मेरे साथ चलकर वहीं रहिए। बहुत शानदार कॉलोनी है। वैसे भी रिटायरमेंट के बाद अब आप यहाँ कहाँ रहेंगे?” पानी पीते हुए उसने आगे कहा, “मेरी मानिए तो इस मकान को बेचकर मेरे साथ शहर में चलिए...एक नई कॉलोनी मेरी ही देखरेख में बन रही है, उसमें ही रहिए।” बेटे की बात सुनकर रामसरन के चेहरे पर चमक आ गई। उन्हें लगा कि लायक बेटा इसी को कहते हैं। शायद यह उनके पूर्वजन्म का पुण्य है, जो उन्हें इतना लायक बेटा मिला। वे अपने लायक बेटे पर फूले नहीं समा रहे थे।
उस रात उनकी आँखों में नींद नहीं थी। रह-रहकर अमित की मातृ-पितृभक्ति उन्हें भावविभोर किए जा रही थी। वे सोच रहे थे, ‘इतना पढ़-लिखकर भी अमित में संस्कार कम नहीं हुए। कार से निकलते ही मेरे पैरों पर झुक गया। माँ से लिपट गया। कार की चाभी मेरे हाथों में थमा दी...वरना लोगों से यही सुना था कि बेटा अगर बाप से ज्यादा पढ़-लिख जाए तो बाप को अनपढ़ और गँवार समझता है। इज्जत नहीं करता, लौटकर नहीं आता।’ उनकी आँखें पनीली हो गईं। अमित के प्रति उनके मन में रह-रहकर प्यार उमड़ रहा था। सोचने का क्रम भी नहीं थम रहा था, ‘लोग तो ईर्ष्या करते होंगे कि एक साधारण से मास्टर ने अपने बेटे को हीरे जैसा चमका दिया। हे प्रभु! किसी की नजर न लगे। ठीक ही कहता है अमित, यहाँ रहकर भी क्या होगा? इतने बड़े इंजीनियर का बाप क्या इस छोटे से शहर में रहेगा भला, वैसे भी क्या है यहाँ अब सिवाय इस मकान के?’ मन-ही-मन उस पुश्तैनी मकान से उनका लगाव टूटने लगा।
उस मकान से तो उन्हें कुछ खास लगाव पहले से ही नहीं था। उस समय वे लखनऊ में नौकरी कर रहे थे, जब उन्हें अपने पिता की असमय मृत्यु के कारण वापस आना पड़ा था और न चाहते हुए भी अकेली माँ के कारण इसी शहर में तबादला करवाना पड़ा। कई बार उन्होंने अपनी माँ को अपने साथ चलने और इस मकान को बेचने की बात कही थी, लेकिन माँ थी कि एक ही जिद पकड़े बैठी थी, ‘इस मकान में मेरी डोली आई थी और अरथी ही जाएगी।’ माँ की इसी जिद के कारण बड़े शहर में रहने का उनका सपना सपना ही रह गया। पर आज उनके लायक बेटे ने उन्हें फिर से अपने सपने को साकार करने का अवसर दिया है तो भला क्यों इस खँडहर होते मकान को छाती से लगाए रखना? सुधा तो वैसे ही शुरू से इस मकान को पसंद नहीं करती। लखनऊ से यहाँ आने पर उसने कितनी ना-नुकुर की थी। महीनों तक उनसे बात भी नहीं की।
यों तो उस छोटे शहर की सुबह उन्हें कोई खास नहीं लगती थी, लेकिन उस दिन की सुबह उनके सपनों को पूरा करने के लिए ही आई थी। नहा-धोकर वे अमित की कार से अपने मकान को बेचने की बात करने के लिए एक प्रॉपर्टी डीलर के पास गए। थोड़ा-बहुत ऊपर-नीचे करने पर उसने मकान के साठ लाख रुपए लगा दिए। इतने रुपए की कल्पना भी रामसरनजी ने कभी नहीं की थी। तुरंत ‘हाँ’ कर दी और एक महीने का समय लेकर वे वापस आ गए। महीना पूरा भी नहीं हो पाया था कि अमित आ गया और मकान का सारा हिसाब करके रामसरन और सुधा को अपने साथ ले गया। जाते समय आसपास के लोगों से गले मिलते हुए दोनों भावुक हो गए थे। आँखें पोंछते और नाक का पानी साफ करते हुए दोनों अमित की कार से रवाना हो गए। जब तक दिखता रहा, दोनों अपने पुश्तैनी मकान को मुड़-मुड़कर देखते रहे। उस दिन उन्हें पता चला कि जड़ों से उखड़ना किसे कहते हैं, लेकिन बड़े शहर, नया फ्लैट और बेटे-बहू का साथ उनकी हर भावुकता पर भारी पड़ रहा था। शीघ्र ही दोनों सामान्य हो गए।
‘बड़े शहर की बात ही कुछ और होती है’, रामसरनजी रास्ते भर बड़े शहर में रहने के फायदे और अपने लखनऊ के प्रवास के दिनों की बातें बताते हुए, लगभग डेढ़-दो घंटे में उस महानगर में पहुँच गए, जो उनके छोटे शहर से करीब अस्सी किलोमीटर दूर था। अमित ने कॉलोनी के गेट पर अपनी कार लगा दी। गेट के बराबर एक बड़ा सा बोर्ड लगा था, जिसमें कॉलोनी का नाम ‘आनंद धाम’ लिखा था। नीचे कॉलोनी का मानचित्र बना था और उसके नीचे बाईं तरफ बिल्डर और दाईं तरफ अमित का नाम लिखा। अमित का नाम देखकर रामसरन और सुधा गद्गद हो गए। चौकीदार ने सैल्यूट करते हुए कॉलोनी का गेट खोल दिया। गर्व से सीना फुलाए रामसरन फ्लैट में प्रवेश कर गए। उनका सामान पहले ही आ चुका था। हालाँकि अमित ने बेकार और पुराना सामान उसी पुश्तैनी मकान में छोड़ दिया था, क्योंकि फ्लैट में सारा नया सामान था। कई अन्य सुविधाएँ बिल्डर की ओर से ही उपलब्ध करवाई गई थीं। बस जरूरत का कुछ खास सामान, कपड़े आदि ही थे, जो वे अपने साथ लाए थे। अमित उन्हें फ्लैट और कॉलोनी के बारे में बताकर तथा दो नौकरों को उनका सामान व्यवस्थित करवाने, खाना आदि बनाने का निर्देश देकर चला गया। सुधा के यह पूछने पर कि ‘बहू और बच्चे कहाँ हैं?’ अमित ने कहा कि ‘वे भी जल्दी ही आ जाएँगे, आप लोग सेटल हो जाइए।’
वह दिन और आज का दिन, अमित अभी तक नहीं आया। उसको कई बार फोन किया, लेकिन उसका नंबर या तो ‘नॉट रीचेबल’ या फिर ‘स्विच्ड ऑफ’ ही बताता है। आज जब से चौकीदार ने उन्हें बताया कि ‘विदेश जाकर बसने वाले बच्चों के माता-पिता के लिए ही यह कॉलोनी बनाई गई है। अमित भी हमेशा के लिए कनाडा चला गया है और अब कभी वापस नहीं आएगा’, तब से उनका दिल बैठा जा रहा था। चौकीदार से ही उन्हें पता चला कि यह कॉलोनी भी किसी और बिल्डर ने ले ली और अब इसका नाम ‘वानप्रस्थ’ रखा जा रहा है।
वे फ्लैट में अंदर जा ही रहे थे कि उनके सामने वाले फ्लैट का दरवाजा खुला था और उसके अंदर कुछ लोगों के बात करने की आवाजें सुनाई दे रही थीं। उनका ध्यान और कान उस फ्लैट में हो रही बातचीत पर लग गया। अंदर कोई कह रहा था, ‘अरे ज्यादा नहीं चलेंगे, माँ को दमा है और पिताजी को दो बार हार्ट अटैक आ चुका है। हद-से-हद पाँच साल ही चल पाएँगे...उसी हिसाब से पैसे बताइए।’ इसके आगे रामसरन कुछ नहीं सुन पाए। उन्हें लगा कि अंदर से कोई और नहीं, बल्कि उनका बेटा अमित ही बोल रहा है। अगर नहीं भी है तो भी अमित जैसा ही कोई दूसरा बेटा होगा। न जाने ऐसे कितने अमित होंगे, जो अपने माँ-बाप के मरने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। ‘ज्यादा नहीं चलेंगे...’ यह वाक्य उनके कान के परदे पर बार-बार टकरा रहा था। उनकी कनपटियाँ गरम हो गईं। मन घबरा उठा। भले ही यह आवाज उनके बेटे अमित की न हो, लेकिन अमित ने भी तो फ्लैट बुक करते समय ऐसा ही कुछ कहा होगा। उनके मन की वीणा का तार, जो अब तक अमित जैसे लायक बेटे के गुणगान के स्वर झंकृत करता था, एकदम टूट गया। मन वीणा मौन हो गई। हाथ-पाँवों में कंपन होने लगा। घबराहट से पैर लड़खड़ाने लगे। पीड़ा की लहर मन में उठी, ‘यह कौन सा लोक है, जहाँ बेटे अपने माता-पिता के मरने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। माता-पिता अपने बेटे को सौ-दो-सौ नहीं, हजारो-हजार साल जीते रहने की दुआ देते हैं और ये बेटे...’ आँखें पनीली हो आईं। गला रुँध गया। ‘ज्यादा नहीं चलेंगे...’ वाक्य मानो तीर की तरह उनके कान के परदे फाड़कर उनकी मस्तिष्क की नसों में घुसा जा रहा था और वे कँपकँपाते पाँवों से अपने फ्लैट की ओर जा रहे थे।
वे मन-ही-मन सोचने लगे, ‘ठीक ही रखा जा रहा है कॉलोनी का नाम ‘वानप्रस्थ’। यह जंगल ही तो है, आदमियों का जंगल, जहाँ जब जिसको मौका लगता है, कमजोर पर झपट पड़ता है। कोई छल से घायल करता तो कोई बल से।’ वे स्वयं भी अपने बेटे के छल के वार से इतना घायल हो चुके थे कि उनके पैर लड़खड़ाने लगे थे। उन्हें लग रहा था कि ‘वे एक ऐसे चक्रव्यूह में आ फँसे हैं, जिसमें उनकी मौत निश्चित है। वे ठगा-सा महसूस कर रहे थे। किसी और ने उन्हें धोखा दिया होता तो शिकायत भी करते, लेकिन अपने ही खून ने उन्हें छला है, कहें भी तो किससे कहें? इस कंकरीट के जंगल में तो अपनी आह भी दीवारों से टकराकर खुद को ही घायल करती है। इससे तो अच्छा पुराने समय का वानप्रस्थ था, जहाँ मनुष्य अपने मन की बात पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों, नदी-तालाबों से कहकर मन हल्का कर लेता था। लोग अपनी मर्जी से अपने दायित्वों के निर्वाह के बाद अनासक्त भाव को अपनाते हुए वानप्रस्थ ग्रहण करते थे। उनकी संतानें उन्हें वन में न जाने के लिए हजारों मिन्नतें करती थीं, दु:खी होती थीं और बार-बार उनकी कुशलता भी पूछने आती थीं, लेकिन आजकल तो संतान स्वयं ही अपने वृद्ध और असहाय माता-पिता को जंगल में भेज देती हैं, वह भी ऐसे जंगल में, जहाँ दूर-दूर तक अपना कहने वाला कोई नहीं। औलादें पलटकर यह भी नहीं देखतीं कि उनके माता-पिता जिंदा भी हैं या नहीं।’ अमित के छल से वे बुरी तरह टूट चुके थे। उनका मन अस्त होता जा रहा था। फ्लैट के बाहर चहल-पहल हो रही थी, कोई कह रहा था, ‘सुबह वानप्रस्थ वाला नया बोर्ड गेट पर लगवा देना।’
शिवछाँह १६५ बी,
बुखारपुरा, पुराना शहर,
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