सुप्रसिद्ध कथाकार शैलेष मटियानी का जन्म १४ अक्तूबर, १९३१ को अल्मोड़ा जनपद के बाड़ेछीना गाँव में। उनकी शिक्षा हाई स्कूल तक हो पाई। श्रेष्ठ कथाकार के रूप में तो उन्होंने ख्याति अर्जित की ही, निबंध और संस्मरण की विधा में भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। उनके तीस कहानी-संग्रह, इकतीस उपन्यास तथा नौ अपूर्ण उपन्यास, तीन संस्मरण पुस्तकें, निबंधात्मक एवं वैचारिक विषयों पर बारह पुस्तकें, लोककथा साहित्य पर दस पुस्तकें, बाल साहित्य की पंद्रह पुस्तकें प्रकाशित हैं। ‘विकल्प’ एवं ‘जनपक्ष’ पत्रिकाओं का संपादन किया। प्रथम उपन्यास ‘बोरीवली से बोरीबंदर तक’ उ.प्र. सरकार द्वारा पुरस्कृत; ‘महाभोज’ कहानी पर उ.प्र. हिंदी संस्थान का ‘प्रेमचंद पुरस्कार’; ‘फणीश्वरनाथ रेणु पुरस्कार’ (बिहार); उ.प्र. सरकार का ‘संस्थागत सम्मान’; कुमाऊँ विश्वविद्यालय द्वारा ‘डी.लिट.’ की मानद उपाधि; उ.प्र. हिंदी संस्थान द्वारा ‘लोहिया सम्मान’; केंद्रीय हिंदी निदेशालय द्वारा ‘राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार’ प्राप्ïत हुए। २४ अप्रैल, २००१ को दिल्ली में स्मृतिशेष।
अब सुबह हो चुकी थी और वह बाजार की ओर बढ़ रहा था, लेकिन कल रात का हादसा उसके अस्तित्व पर से अभी उतरा नहीं था। उसकी उम्र लगभग बारह-तेरह वर्ष होगी। अपनी स्मृति पर जोर देने की कोशिश करता है, तो लगभग सात-आठ वर्ष पहले मर चुकी दादी और तीन वर्ष पहले मरे हुए पिता की आकृतियाँ अंधड़ में उठते धूल के गुब्बारों की तरह अपने भीतर गड्ड-मड्ड होती अनुभव होती हैं। उसका बाप अकसर देसी के नशे में लड़खड़ाता हुआ घर लौटता था और गंदी-गंदी गालियाँ बकता हुआ खटोले पर लुढ़क जाता था। उसकी दादी मक्खियाँ हटाती हुई नजदीक जाती थी और धोती के छोरों से अपने बेटे के नशे में खिंचे हुए बदसूरत होंठों में लगी गंदगी को पोंछ देती थी। चुपके से उसकी जेबें टटोलती थी और बिस्कुट या मीठी गोलियों की पुडि़या निकालकर, उसे कच्चे घर के आखिरी कोने की तरफ खींच ले जाती थी।
इन बातों के अलावा पिता की सिर्फ इतनी सी याद और है कि कुछ दिन वह उसे म्युनिसिपल प्राइमरी स्कूल के बच्चों और अध्यापकों के बीच छोड़ता रहा था, जहाँ से अपनी काली तख्ती लिये वह चुपचाप भाग आता था। अकसर रोता हुआ। स्वर-व्यंजन, बाराखड़ी की त्रिवेणी को पार कर लेने से पहले ही उसका बाप मर गया और स्कूल छूट गया। दादी बाप से पहले मरी थी और सोई हुई सी दिखती थी, डर नहीं लगा था; लेकिन बाप मरा तो उसका खुला मुँह, आगे दाँतों के टूटे होने से बहुत डरावना लगा था और काफी दिनों तक वह इस दहशत से उबर नहीं पाया कि उसका बाप रात के घुप्प अँधेरे में फिर आएगा और उसकी माँ के ऊपर लेटकर ठीक उसी मुद्रा में फिर मर जाएगा। आँखों की पुतलियाँ बाहर को गिरती हुई सी, चेहरे पर की त्वचा खिंची हुई और विकृत ढंग से उघड़ा हुआ मुँह और नंगी टाँगें।
तब तक वह उम्र के उस दौर में था, जहाँ सिर्फ कौतूहल ही संभव हो सकता था। पिटने पर यंत्रणा और बाजार ले जाए जाने पर खुशी हो सकती थी। अपने हमउम्र बच्चों के बीच तरह-तरह के खेल खेलने और गंदी गालियाँ बकने की दीक्षा उसे जरूर मिल गई थी। बाप जिस तरह माँ से झगड़ता, उसे कभी-कभी पीटता और आखिर उसे अपने खटोले में खींचकर तरह-तरह की हरकतें करता रहता था, वह सबकुछ उसके लिए सिर्फ कौतूहल का ही विषय था। उसे खाना और कपड़ा कहाँ से मिलता है, इस बात में उसे कोई दिलचस्पी नहीं थी। सिर्फ एक निहायत अमूर्त किस्म का आतंक-सा कहीं जरूर था, जिसे पहले वह पिता के जीवित होने के कारण और बाद में उसकी मृत्यु हो जाने की वजह से महसूस करता रहा।
उसका पिता पहले रिक्शा चलाया करता था, बाद में अपने खोखल पड़ चुके शरीर के कारण असमर्थ हो गया सौर सेंट्रल पब्लिशर्स में चपरासी की नौकरी पकड़ ली थी। वहाँ वह अकसर कुछ किताबें चुराकर रद्दी के भाव बेचने लगा था, इसलिए निकाल दिया गया। कुछ महीने बाद ही उसकी मृत्यु हो गई। जीविका-विहीन जिंदगी और मृत्यु के बीच इस अंतराल में उसके बाप का चेहरा डरावनेपन की हद तक कारुणिक होता चला गया था और वह अकसर उसकी माँ, यानी अपनी घरवाली सतनरायनी के पाँव पकड़कर वीभत्स स्वर में रोने लगता था।
पिता की इन स्मृतियों के अलावा एक और है। कर्नलगंज की गोश्त की दुकान से एक बार उसके पिता ने आधा किलो गोश्त खरीदा था और अपने गंदे से रूमाल में बाँधकर उसके हाथ में थमा दिया था कि घर ले जाए और खुद बाजार की तरफ निकल गया था देसी शराब की बोतल का जुगाड़ लगाने। रात के अँधेरे में जब वह वापस लौटा था तो नशे में चूर था। आलू की तरकारी के सामने आते ही वह बौखला उठा था। जब माँ ने बताया था कि गोश्त बनने की जगह आलू की तरकारी क्यों बनी है, तो उसने खिलावन को ‘तनिक इधर आव’ कहते हुए दो अंगुलियाँ हिलाते हुए पास बुलाया था और उसकी कनपटी पर झापड़ जड़ा था। तब उसे दुबारा याद आया था कि जब वह गोश्त लेकर लौट रहा था, तो बस्ती में घुसते ही उसे अपने सिर पर तेज अंधड़ का सा झोंका महसूस हुआ था और यह समझ पाने में उसे वक्त लग गया था कि चील रूमाल में बँधा गोश्त लेकर उड़ चुकी है। थोड़े से फासले पर चील से एक बार वह रूमाल गिर गया था, लेकिन जब तक वह अपनी दहशत से उबर पाता, चील दुबारा रूमाल उठा ले गई थी। सिर्फ कुछ बोटियाँ मिट्टी में पड़ी रह गई थीं, जिन पर पास ही लेटा हुआ कुत्ता टूट पड़ा था। तब खिलाबन मुश्किल से दस साल का रहा होगा।
जिस दिन उसके पिता की मृत्यु हुई थी, उसके विकृत और डरावने चेहरे को देखते हुए उसे फिर एकाएक वह गोश्तवाली घटना याद हो आई थी। माँ का चीखना अदृश्य सलाखों की तरह उसके कानों में धँसता रहा था और वह घर के बाहर निकलकर सड़क पर गिरे बीड़ी के ठूँठ को पीता हुआ भारद्वाज आश्रम की तरफ निकल गया था। करीब दो-तीन घंटे बाद उसके पिता की अरथी उसी रास्ते से गई थी और कौतूहल में उचक-उचककर देखनेवाले बच्चों में वह खुद भी शामिल हो गया था।
अपनी बस्ती से निकलकर रामचंदर हलवाई की दुकान तक पहुँचते-पहुँचते उसे अपना अतीत याद आता रहा और उसकी आँखें जमीन पर रेंगती रहीं। बीड़ी-सिगरेट के ठूँठ ही नहीं, कभी-कभार पैसे भी मिल जाते हैं, हालाँकि महीनों में एकाध बार ही ऐसा संभव होता है, लेकिन होता है। एक बार तो उसे अठन्नी मिल गई थी, जिसमें से चालीस पैसे की सौ ग्राम जलेबी वह एक साथ खा गया था, यह पिछले वर्ष की बात है। इसके बाद वैसी तृप्ति फिर कभी मिली नहीं। उसे अब भी याद है, जब जलेबी के दोने को एकांत में वह वैसे ही सतर्कता के साथ ले गया था, जैसे कोई आवारा कुत्ता हड्डी को ले जाता है।
उसकी कमीज का कालर कटकर पीठ की तरफ लटक गया है। माँ अब कितनी असमर्थ हो चुकी है, इस बात का अहसास उसे इधर तेजी से अनुभव होने लगा है।
कल रात ठीक उसके कच्चे घर के सामने शराबी और उचक्के किस्म के लोगों में झगड़ा हो गया था और उसका अंत अत्यंत भयावह हुआ था। जिसको छुरा भोंक दिया गया, वह मरे हुए ढोर की तरह उलटा पड़ा था और उसकी अँतडि़याँ मिट्टी में सन गई थीं। जहाँ वह गिरा था, खून के थक्के से जम गए थे। उसके घर के बाहर अँधेरा तालाब में पड़ी भैंसों की तरह पसरा रहता है, लेकिन जहाँ कत्ल हुआ, वहाँ लेंपपोस्ट की रोशनी थी। उसकी माँ सख्त बीमार है, नहीं तो शायद वह भी बाहर जरूर निकलती और कौतूहल के बाद दहशत में धँसते हुए उसके कंधों पर धीमे से हाथ रखती हुई तेजी से घर वापस चली आती और बड़ी देर तक चुपचाप उसके सिर पर हाथ फेरती रहती।
माँ को लेकर वह अपने भीतर एक तरलता-सी अनुभव करता है। वह रोता नहीं है, लेकिन अपने संपूर्ण अस्तित्व में उसे यह तरलता पसीने की तरह पसीजती हुई सी महसूस होती है।
अब वह सड़क पर था और उसकी आँखें रामचंदर हलवाई के जलेबी के थाल के इर्द-गिर्द चक्कर काटने लगी थीं और भूख इतनी तीखी हो चुकी थी कि वह बदहवासी अनुभव कर रहा था। अपनी इस तरह की बदहवासी से रामखिलावन को डर लगता है। ऐसे में अकसर उसे चोरी सूझती है और कई बार बुरी तरह पिट चुका है।
इस बार खाट पकड़ लेने से पहले उसकी माँ निरंतर कई घरों में बरतन माँजने और झाड़ू लगाने की नौकरी करती रही थी। फटे-पुराने कपड़ों के अलावा बचा-खुचा खाना और त्योहारों पर कभी पूरी-मिठाई। लगभग डेढ़ महीने से माँ काम पर नहीं जा पाई है और ए.जी. ऑफिसवाले शुक्ला साहब के यहाँ वह अकेले गया था। किसी बड़ी चीज के लिए गुंजाइश नहीं रहती। दरवाजे से बाहर निकलते वक्त शुक्लाइन उसके पूरे जिस्म पर अपनी भेंगी आँखों को अंगुलियों की तरह फिराती रहती थी। सिर्फ दो छोटी चम्मचें उसने जाँघिए की जेब में डाल ली थीं, हालाँकि खुद उसके दिमाग में कुछ तय नहीं था कि उनका वह क्या उपयोग कर पाएगा और जाने की उतावली में वह ‘बहूजी, हम जाइत हैं’ की आवाज लगाने के साथ-साथ तेजी से दरवाजे तक पहुँच गया था। तभी शुक्लाइन का चटख लाल चूडि़यों से भरा हुआ पंजा उसके जाँघिए की जेब पर पड़ा था और बदहवासी में उसके मुँह से चीख निकल गई थी।
रामचंदर हलवाई की भट्ठी पर कड़ाही चढ़ी हुई है और जलेबी बनानेवाले कारीगर का हाथ गोल-गोल चक्कर काट रहा है। वह लयबद्धता में अपने सिर को हिलाता है और उसकी लंबी सी चुटिया भी वृत्ताकार नाच रही है। तली हुई जलेबियों को वह चाशनी में डुबो रहा है और खिलावन को लग रहा है कि उसकी जीभ इतनी चिपचिपी हो चुकी है कि लार बहने लगेगी। वह तेजी से कई बार थूक गटकता है और जोरों से एक सुट्टा खींचता है—
अपनी इस कम उम्र में सीखा हुआ विशेष शब्द वह जलेबी उतारते हुए पंडित की तरफ थूक की तरह उछालता है और उसे याद आता है कि शुक्ला साहब ने भी चम्मचों को उसके जाँघिए के पिछले हिस्से में लगाते हुए इसी किस्म की गाली दी थी। बड़ी बेटी पद्मा दरवाजे पर से भीतर को चली गई थी और शुक्लाइन ने झिड़कते हुए कहा था, “इन कमीने लोगों की खातिर तुम बच्चों के सामने गालियाँ मत बका करो। तुम्हारी आदत दिन-पर-दिन गंदी होती जा रही है...”
पति-पत्नी के इस उलझने में से उसने अपने हाथों को डैनों की तरह फैला लिया था और चार-पाँच सीढि़याँ एक साथ कूद गया था। काफी दूर-दूर तक दौड़ने में वह हाँफता-हाँफता बेदम हो गया था और ‘चोर-चोर’ की आवाजें उसके भीतर से निकल-निकलकर बाहर के वातावरण में फैलती चली गई थीं। ऐसे अवसरों पर वह निरुद्देश्य बाजार में एक सिरे से दूसरे सिरे घूमता रहा है और बीड़ी या सिगरेट के अधजले ठूँठों को पीते हुए उसे अपनी दयनीयता घिनौनेपन की हद तक महसूस होती है। ऐसे तमाम अवसरों पर खिलावन को बाप याद आता है और गालियाँ भी। रामी जमादारन सुबह-सुबह बस्ती के गंदे नालों को जिस तरह साफ करती है, बू से उसकी नाक भर जाती है। माँ की बीमारी के बाद से लगभग भुखमरी और लावारिसी के बीच का जिंदा रहना उसके अस्तित्व पर मक्खियों की तरह भिनभिनाने लगा है।
उसकी माँ सतनरायनी—टाट और बुरादे में लपेटी हुई बर्फ की सिल्ली की तरह धीरे-धीरे गलती आई हुई एक औरत! वह उसके बारे में सोचने की कोशिशें करता है तो दारू के नशे से चूर पिता याद आने लगते हैं और एक-एक कर मर जानेवाले छह-सात छोटे-छोटे बच्चे पिल्लों की तरह जनती हुई वह औरत—सतनरायनी! शुक्र है, राम खिलावन के अलावा उनमें से कोई भी जीवित नहीं रहा।
सुभाष जनरल स्टोर्स के सामने पहुँचकर वह फिर खड़ा हो गया। काँच के मर्तबानों में भरे हुए बिस्कुट और टॉफियों को घूरते हुए जैसी हलचल वह महसूस कर रहा है, अगर कहीं किसी ने देख लिया तो तुरंत समझ जाएगा कि चोरी करने की आदतें उसके भीतर किसी सड़े हुए फल में पड़े रहनेवाले कीड़ों की तरह भरी हुई हैं। ये कीडे़ जब कुलबुलाने लगते हैं तो वह बदहवास होने लगता है और अपने आपको बरदाश्त नहीं कर पाता। ऐसे में अकसर उसे बहुत तेज पेशाब लगती है और उसे महसूस होता है कि इसके अतिरिक्त वह कुछ नहीं कर सकता।
बड़ी देर वह पेशाब करने में जुटा रहता है और छोटे-छोटे लड़के-लड़कियों को अपनी ओर देखते हुए पाकर वह तरह-तरह की हरकतें करने लगता है।
थोड़े से समय के इस अंतराल में ही रामखिलावन बाजार के कई चक्कर काट चुका था। भूख उसकी आँखों में रतौंधी की तरह पसरने लगी थी और हलवाइयों, चाटवालों तथा बिस्कुट-टॉफीवालों की दुकानों को अपनी आँखों से चाटते-चाटते वह थक चुका था।
शायद उसकी माँ उसे कहीं बरतन माँजने को कहती, लेकिन शुक्लाइन दोनों चम्मचों को लेकर सतनराइनी के पास परसों ही पहुँच गई थी। उसकी बीमार माँ बार-बार रोती और माफी माँगती रही थी और जिंदगी में पहली बार उस औरत ने खिलावन को बहुत बुरी तरह गालियाँ बकी लीं, जिनमें से एक वह भी थी, जिसको वह अपने अस्तित्व से चिपका हुआ सा पाता है।
शुक्लाइन के वापस जाते ही, उसने अपनी संपूर्ण आक्रामकता में यह प्रश्न माँ की ओर उछाला था, “तो हम का करी? भूक्खे मर जाई?”
“मर जाव। मर नहीं सके तो...”
माँ से उतनी भद्दी गाली सुनकर उसे लगा था, शायद उसे फिर बिस्तर पर ही कै या दस्त हो गई होगी। जिस तरह अपना मुँह ढाँप-ढाँपकर उसकी माँ सतनराइनी ईश्वर को भी ठीक वैसी ही गालियाँ देती चली गई थी और उसके बाप को भी। कहना चाहता था कि वह बात उसने साथ के छोकरों से सुन रखी थी कि आश्रमवाले बाबाजी छोकरों को अपने कमरे में बुलाते हैं और ढेर सारी मिठाई देते हैं, पैसे भी। वह कल कई बार आश्रम के आस-पास चक्कर काटता रहा था और जब बाबाजी ने बहुत डाँटकर उसे भगा दिया, तब जाकर उसे अनुभव हुआ था कि वह भी अपने बाप की तरह बदसूरत है और सिर के बाल इतने बढ़ चुके हैं कि भुतहा लगता होगा।
रामखिलावन कल्पना करने की कोशिश करता है कि माँ को पता चल गया होगा, वह कल सुबह से ही भूखा है और घर के सामने के लैंपपोस्ट के नीचे हुए कत्ल की दहशत में भी। खून के थक्कों और मिट्टी में सूखी पड़ी अँतडि़यों में उसे अपना प्रतिबिंब दिखाई देता रहा होगा और रात भर वह माँ की उँगलियों के स्पर्श को तरसता रह गया होगा।
सिर्फ माँ पर ही उसे भरोसा है। वह मर भी जाएगी तो भूतनी बनकर बस्ती में घूमेगी और रात के अँधेरे में चुपचाप उसके सिरहाने खाने को रख जाएगी।
अब वह रो रहा था। उसके शरीर पर की त्वचा प्रार्थना की सी लय में काँप रही थी। किसी तरह माँ अच्छी हो जाए तो वह फिर से उसके साथ काम पर जाना शुरू कर देगा और चोरी नहीं करेगा। इससे अधिक उसे कुछ नहीं सूझ रहा था और रुलाई रोकने की कोशिश करने में उसे हिचकियाँ आने लगी थीं।
इस वक्त वह रामचंदर हलवाई की बगलवाली गली में खड़ा था और बाजार की तरफ जाते, वहाँ से चीजें हाथों में लिये घर वापस लौटते हुए लोगों को वह अपनी पीठ पर पाँव रखकर गुजरता हुआ सा अनुभव कर रहा था। परसों रात के बाद वह टट्टी नहीं गया है। कल रात पेट में मरोड़ें-सी उठ रही थीं, लेकिन न वह माँ को उठा पाया और न उस कत्ल की दहशत ने उसे बाहर निकलने दिया।
हो सकता है माँ किसी तरह उठी हो या पड़ोस की कोई औरत उसके पास आई हो तो उसने खिलावन के खाने-पीने के लिए कुछ माँगने की कोशिश की हो। इससे पहले भर पेट भले ही न मिलता रहा हो, लेकिन कभी ऐसा नहीं हुआ कि वह लगातार दो दिन भूखा रह गया हो और माँ ने चिंता नहीं की हो। माँ इतनी क्रूर क्यों हो गई है। कुछ ही दिन पहले की बात है कि वह बीमार माँ के पास बैठा था, तभी उसे बिस्तर पर ही कै हो गई थी। खिलावन माँ से बिल्कुल नहीं घिनाता है। हाथ से ही पोंछने लगा था, तो माँ फूट-फूटकर रो पड़ी थी और यह कहते हुए उसके होंठ काँप रहे थे कि ‘तू घबराना मत रे खिलावन! तनिक खटिया पर से उठें तो तेरी परवरिश तो, बेटवा, हम...’
पहले तो माँ इस तरह की गंदी बातें नहीं करती थी। वह इतनी घबरा क्यों गई है? इस बार खिलावन उसके पास होता तो क्या वह अंदाजा लगा लेती कि अगर रामचंदर हलवाई के यहाँ से जलेबी चुराने का अवसर उसे मिल जाए तो कुछ जलेबियाँ वह माँ के लिए भी जरूर बचा ले जाएगा!
उसका मन हुआ, रामचंदर हलवाई के यहाँ जाकर बरतन माँजने की नौकरी माँग ले।
अभी धूप नहीं चढ़ी है। जिस वक्त वह बाहर निकला था, माँ गहरी नींद में थी। कहीं कुछ मिल जाए तो उसे जल्दी घर लौट जाना चाहिए।
काफी देर तक वह रामचंदर हलवाई की दुकान के आगे खड़ा रहा इस प्रतीक्षा में कि शायद वह खुद पुकार ले कि ‘क्यों बे लौंडे, यहाँ क्यों खड़ा है?’ लेकिन धीरे-धीरे उसने रामचंदर हलवाई के उत्तर को कुत्तों की तरह अपने ही भीतर सूँघ लिया और पीछे हट गया। अब उसे घर लौट जाना चाहिए।
बस्तीवाली गली में वह मुड़ने को ही था कि सामने सब्जी मंडीवाले चौराहे की तरफ से ढोलक-मजीरों का शोर उठता हुआ सुनाई दे गया और उसने एक क्षण में अनुभव कर लिया कि कोई मुरदा आ रहा है। निमिष-मात्र में उसकी कल्पना में उन सारे अवसरों के दृश्य घूम गए, जब अरथी के पीछे बिखेरे गए पैसों को लूटने की होड़ में वह भी शामिल हो जाता था। कितनी उत्तेजना उस समय भर जाती थी और सिक्का मिलते ही कैसी प्रफुल्लता आँखों में चमकने लगती थी। एक-दूसरे से ज्यादा पैसे छीनने की कोशिशों में गाली-गलौज आपस में हो जाती थी और कभी-कभी मार-पीट भी।
उसने दोनों हाथों से अपने सिर को जोरों से खुजलाया और तेजी से चौराहे की तरफ दौड़ गया। इस बड़े चौराहे पर अकसर पैसे बिखेरे जाते हैं। ‘हे, भगवान्, कोई बड़ा मुरदा आया हो!’ वह ईश्वर से प्रार्थना शब्दों में नहीं कर पाता है, सिर्फ पूरे शरीर में एक रोमांचकता-सी उत्पन्न होती है और अपने चेहरे पर की त्वचा उसे छिपकली के गले की कोमल खाल की तरह काँपती महसूस होती है।
वह भूख को भूल गया था और दौड़ रहा था। लगभग आधे फर्लांग भर का फासला अपनी पूरी अनंतता में फैल गया था और उसे सपने में उड़ने की सी चमत्कारिकता की अनुभूति हो रही थी।
कब अरथी कुछ क्षणों को चौराहे पर रुकी, कब पैसे बिखेरे गए और कब उसके साथ के छोकरों ने छलाँगें भरीं और कब दो-तीन पैसे के दो-तीन सिक्कों पर झपट्टा मारा गया, उसे कुछ होश नहीं। उसे थोड़ा सा होश तब आया, जब उसने देखा कि एक दस पैसे के सिक्के पर उसका हाथ और उसके पड़ोसी जमादार के बेटे कल्लन का पाँव साथ-साथ पड़ा है।
‘मेरा है...’
‘हट साले, मेरा है...’
‘तेरा है, तेरी माँ की...’
‘तेरा, है तेरी बहनियाँ की...’
दस पैसे के सिक्के को मुट्ठी में दबोचे हुए उसने देखा, इर्द-गिर्द कई छोकरे इकट्ठे हो गए हैं। कल्लन की तरफ उसने घूरकर देखा, उससे साल-डेढ़ साल छोटा ही होगा। वह जमीन पर से उठकर तेजी के साथ भाग जाना चाहता था।
उसने इतनी जोर से झटका मारा कि कमीज फट गई और कल्लन गिरते-गिरते बचा। उसकी आँखों में रात का कत्लवाला दृश्य उभर आया और पूरी ताकत से एक घूँसा कल्लन के पेट में जड़ दिया। कल्लन एक क्षण चीखने की सी मुद्रा में खड़ा ही रह गया और फिर रोने लगा।
अचानक उसके भीतर यह डर बैठ गया कि हो सकता है, इन तमाशबीन छोकरों में से दो-चार कल्लन की मदद पर उतर आएँ। सिक्के उठाने की होड़ में उसकी कुहनियाँ छिल गई थीं और उन पर खून रिस आया था।
उसने एक क्षण में अपनी पूरी ताकत से भाग जाने की तैयारी कर ली थी कि तभी कल्लन चिल्लाया, “जा साले, ले जा। घर पर तेरी अम्माँ मरी पड़ी है। साले तू भी तो बिखेरेगा पैसे अपनी अम्माँ की लाश पर...”
वह वहीं पर खड़ा रह गया है, या तेजी से भाग खड़ा हुआ है, रामखिलावन को कुछ साफ-साफ अनुभव नहीं हो पा रहा है। उसे लग रहा है, कोई चील तेजी से झपट्टा मारती हुई आई है और उसकी मुट्ठी में बंद गोश्त के टुकड़ों को अपने पंजों में दबोच ले गई है। उसे सिर्फ इतना महसूस हुआ, दहशत और बदहवासी में वह अपने जाँघिए में ही पेशाब करता चला जा रहा है।