रंग-बिरंगी होली

सुपरिचित बाल-साहित्यकार। अब तक बाल-साहित्य की बाईस पुस्तकें तथा देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख, कहानियाँ आदि प्रकाशित। अनेकानेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त। वर्तमान में विद्या भारती शिक्षा संस्कृति संस्थान कुरुक्षेत्र की अखिल भारतीय कार्यकारिणी की सदस्य एवं आकाशवाणी प्रयागराज में उद्धघोषक।

मुझे तो होली बिल्कुल भी पसंद नहीं है।” इशिता ने अपने दोस्तों से कहा। दोस्त थे—पूसी बिल्ली, शेरू कुत्ता, नानू बँदरिया और चुन्नू कबूतर। उसके दोस्त भी उसकी बात कितनी समझे या नहीं समझे, पर वे एकटक इशिता को देखे जा रहे थे। याद है, पिछली बार किसी ने शेरू के ऊपर ठंडा पानी डाल दिया था, बेचारा कितने दिनों तक डर के मारे इधर-उधर छिपता फिर रहा था। शेरू को समझ में आ गया कि उसके बारे में बात हो रही है, इसलिए वह खुशी के मारे अपनी पूँछ हिलाने लगा।

इशिता ने आगे कहा, “और पूसी तो पेड़ के नीचे चुपचाप बैठी थी, तब भी किसी शैतान बच्चे ने पूसी के ऊपर पानी भरा गुब्बारा इतनी जोर से फेंककर मारा था कि वह दर्द के मारे बिलबिला गई थी। अब बारी थी पूसी के खुश होने की। उसे इशिता पर बड़ा प्यार आया। उसे तो लगा था कि इशिता उसके गुब्बारे वाली बात भूल गई है। वह उछली और सीधे जाकर इशिता के कंधे पर कूद गई। 

“और चुन्नू कबूतर तो गोलू के फ्लैट की बालकनी के कोने में कितना डरा हुआ बैठा था, तब भी कुछ शैतान बच्चों ने उसे ढूँढ़ निकाला और उसके ऊपर ठंडा रंगीन पानी डाल दिया।”

इशिता चुन्नू को दयाभाव से देखते हुए बोली, “होली तो कितनी सारी खुशियाँ लेकर आती है, पर कुछ लोगों ने इसे सिर्फ जानवरों को सताने और हुड़दंग मचाने का ही त्योहार बना डाला है।”

नानू बँदरिया इशिता के पैरों के पास उदास सी बैठ गई। पिछली होली में उसको कमरे में बंद करके लोगों ने खिड़की से इतने गुब्बारे फेंककर मारे थे कि कई दिन तक उसके पूरे शरीर में दर्द रहा था। उसे इनसानों से इतना डर लगने लगा था कि वह कई दिनों तक भूखी-प्यासी पड़ी रही, पर कूड़े के ढेर में खाना ढूँढ़ने नहीं गई। 

इशिता आँसू भरी आँखों से बोली, “कितना अच्छा होता, अगर तुम सब बोल पाते और उनके साथ वैसा ही कर पाते, जैसा उन लोगों ने तुम्हारे साथ किया है। उन्हें भी तो पता चलना चाहिए कि सच्ची खुशी दूसरों को सताने में नहीं, बल्कि दूसरों का दर्द दूर करने में होती है।” पेड़ पर बैठी झिलमिल परी बहुत देर से इशिता की बातें बड़े ध्यान से सुन रही थी। उसने चमचमाते हुए सितारों से जड़ी हुई छड़ी को हवा में लहराया।  

रोशनी से दमकते सितारे हवा में बिखर गए और इशिता के दोस्तों के ऊपर गिर गए। उन्हें ऐसा लगा, जैसे बर्फ के नन्हे फाहों ने उन्हें छुआ हो। उन्होंने एक-दूसरे को आश्चर्य से देखा और खिलखिलाकर हँस दिए और खुशी के मारे उछलने-कूदने लगे।

इशिता को समझ में नहीं आया कि सब अचानक इतने खुश क्यों हो गए। पर उसे यह देखकर अच्छा लगा कि सब खुश हैं।

उसने शेरू की पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा, “कल होली है और मुझे तुम सबकी बहुत चिंता हो रही है।” शेरू इशिता का प्रेम देखकर भावुक हो गया और पूँछ हिलाता हुआ इशिता का हाथ चाटने लगा।

इशिता बोली, “अब मैं घर जा रही हूँ और तुम सबका खाना मैं रात को ही ज्यादा सा रख दूँगी, क्योंकि कल होली है और तुम लोगों के बाहर निकलते ही सब लोग तुम्हें परेशान करेंगे।”  

इशिता के जाते ही नानू बोली, “वे शैतान बच्चे इस समय एक साथ इकट्ठा होकर गुब्बारे भर रहे होंगे, हम चलकर उन्हें मजा चखाते हैं।”

चुन्नू बोला, “अगर मार खाने का मन हो तो चलो।” 

“डरपोक कबूतर, चुपचाप हमारे साथ चलो, वरना कल फिर तुम्हारे ऊपर कोई ठंडा पानी डालेगा।”

पिछली होली के बर्फ के ठंडे पानी की याद आते ही चुन्नू चुपचाप उनके साथ चल दिया।

वे सभी मोनू के घर के सामने जा पहुँचे। गेट के बाहर ही कुछ साइकिलें खड़ी थीं। चुन्नू बोला, मैं अभी देखकर आता हूँ। ये बच्चे अब क्या शैतानी करने वाले हैं और यह कहकर चुन्नू तेजी अपने पंख फड़फड़ाता हुआ उड़ चला। कुछ ही पलों बाद वह लौट आया और घबराते हुए बोला, “इस बार तो पिछली बार से भी ज्यादा गुब्बारे हैं।”

वे आपस में बात कर रहे हैं कि चाहे बड़ा हो या छोटा, इस बार वे किसी को भी नहीं छोड़ेंगे और कुत्तों व बिल्लियों को तो दौड़ा-दौड़ा कर गुब्बारे मारेंगे, क्योंकि जानवर तो उनकी शिकायत किसी से कर नहीं सकते।”

पूसी का डर देखकर सभी को बहुत दुःख हुआ। शेरू ने पूसी को समझाते हुए कहा, “तुम डरो मत। हम अपने साथियों को भी आगाह कर देंगे, ताकि उन्हें कोई चोट न पहुँचे।”

शेरू की बात सुनकर पूसी का डर कुछ तो कम हुआ, पर तब भी रह-रहकर वह काँप उठती थी। “चलो, अब गेट के अंदर कूदते हैं, वरना कोई आ जाएगा।” शेरू बोला। नानू उछलकर गेट के अंदर चला गया, पूसी दीवार पर छड़ी और सीधा गेट के अंदर, शेरू ने एक ऊँची कूद लगाई और सीधा गेट के अंदर और चुन्नू उड़ता हुआ उनके पीछे चला गया।  वहाँ कोई नहीं था। गेराज का दरवाजा खुला था। गेराज के अंदर सफेद रंग की कार थी और एक कोने में बहुत सारी किताबें और पुराने कपड़े पड़े हुए थे। चारों दोस्त कपड़ों के ढेर के पीछे छुपकर बैठ गए। वे जानते थे कि पिछले साल की तरह पानी के गुब्बारे और रंग गेराज में ही लाकर रखेंगे। उस रात चारों दोस्तों ने डर के मारे खाना नहीं खाया।

वे जानते थे कि इशिता उनका रास्ता देख रही होगी, पर उन्हें डर था कि अगर वे गेट से बाहर जाएँगे तो शायद वापस अंदर न आ पाएँ। इसलिए पूरी रात भूखे-प्यासे बैठे रहे।

अगली सुबह चारों तरफ से कानफोड़ू गानों की आवाज आने लगी। सड़क पर जैसे भगदड़ मची हुई थी। लोगों के चिल्लाने की आवाजें आ रही थीं। “अरे, उसे जल्दी से रंग डालो, वो बचकर भागना नहीं चाहिए।” दूसरी आवाज आई, “इस बार कोई बचना नहीं चाहिए।”

लोगों के हँसने-बोलने की भी आवाज गेट के पास से आ रही थी। पर इन चारों को तो इंतजार था मोनू और उसके दोस्तों का, और तभी गेट खुला और पाँच लड़के अंदर आ गए। उनको देखकर ही चुन्नू का दिल धड़क उठा। वे सभी ऊपर से नीचे तक रंग में सराबोर थे। पर शेरू पहचान गया कि ये वही लड़के हैं, जिन्होंने पिछले साल उन सबको बहुत सताया था। उन लड़कों ने गेट के अंदर आते ही मोनू का नाम लेकर चिल्लाना शुरू कर दिया। पल भर में ही मोनू ने बालकनी से झाँका और हँसते हुए बोला, “आ रहा हूँ।” सीढ़ियों से मोनू उतरकर आया या उड़कर आया, क्योंकि पलक झपकते ही वह उन दोस्तों के पास खड़ा था। मोनू को देखकर सभी के चेहरे खुशी से चमक उठे।

सभी खुशी के मारे चीखते-चिल्लाते हुए गेराज के अंदर चले गए। पूसी ने डर के मारे आँखें बंद कर लीं। नानू तो अपनी चोट याद करते ही रोने लगी। शेरू ने धीरे से उसकी पीठ पर अपना पंजा रख दिया। चुन्नू तो डर के मारे एक छोटे से कपड़े के अंदर घुस गया। तभी मोनू बोला, “इस बार तो हमारे पास पिछली बार से बहुत ज्यादा गुब्बारे हैं।”

लाल रंग से पुता हुआ एक लंबा सा लड़का बोला, “पिछली बार वो बड़े वाले काले कुत्ते पर गुब्बारे फेंकने के बाद तो मजा आ गया था।”

“कैसे कूँ-कूँ करता हुआ भागा था।” मोनू हँसा।

 “हाहा, कैसे दुम दबाई थी न!” हरे रंग से रँगा हुआ लड़का बोला। पहली बार शेरू ने स्वयं को इतना असहाय महसूस किया। न चाहते हुए भी उसकी आँखों से आँसू टपक पड़े।

वह रुँधे गले से बोला, “मेरे भी बहुत सारे भाई-बहन थे। हम सब अपनी माँ के साथ एक नाली के नीचे रहते थे। कुछ बच्चों ने मुझे प्यार करने के लिए उठाया और उसके बाद कहीं बहुत दूर ले जाकर छोड़ दिया। कितना डरता था मैं अकेला!”

मोनू बोला, “ऐसा करते हैं, एक झोले में सिर्फ वे गुब्बारे रखते हैं, जो पशु-पक्षियों को फेंककर मारने वाले हैं।”

अब नानू से नहीं रहा गया। वह रोते हुए बोली, “क्या बिगाड़ा है हमने इनका। हमारे माँ-बाप भी हमारे साथ नहीं हैं। बेचारे तार का करंट खाकर मर गए। इन्हीं इनसानों ने हमारे जंगल काट डाले और अब उनके बच्चे हमें सताकर खुश हो रहे हैं। हम यहाँ-वहाँ छुपकर रहने के लिए कितना मजबूर हैं। हम कहाँ जाएँ? ये हमें मारकर खुश होते हैं, क्या हमें दर्द नहीं होता, क्या हमें चोट नहीं लगती?”

पुन्नू बोला, “मैं भी अपने मम्मी-पापा के साथ एक फ्लैट में रहता था, पर उन लोगों ने एक दिन नुकीले पतले तार जैसे लगा दिए। शाम को जब हम सब लौटे तो मेरे मम्मी-पापा सीधे उन तारों में बिंध गए। मैं बहुत रोया और तब से अकेले ही इधर-उधर रहने की जगह ढूँढ़ा करता हूँ।” 

तुम चाहो तो अभी इन सबको जाकर काट सकते हो। जब सबको दर्द होगा, तब पता चलेगा कि बेजुबानों को बिना कारण सताना नहीं चाहिए। नानू बोली, “नहीं, हम तो सबको बहुत प्यार करते हैं। अगर हम भी इन्हें तकलीफ पहुँचाएँगे तो इनमें और हममें क्या अंतर रह जाएगा?” शेरू ने भर्राए स्वर में कहा। चारों दोस्तों की बात सुनते हुए गुब्बारों के पास बैठे लड़के सन्न बैठे थे। वे जमीन देख रहे थे और शर्म से उनकी आँखें झुकी जा रही थीं।

टप-टप करते आँसू उनकी आँखों से होते हुए उनके चेहरों को भिगो रहे थे। उन आँसुओं में जैसे वे सब धुले जा रहे थे, जैसे एक नए रूप में आने के लिए। उन्होंने सारे गुब्बारे फोड़ दिए और बाल्टी का रंगीन पानी फेंक दिया।

मोनू बोला, “हम अबीर और गुलाल से होली मनाएँगे। मैं अभी घर से लेकर आता हूँ।” चारों दोस्त खुशी के मारे गले लग गए।

मोनू जब उतरा तो उसके हाथ में एक प्लेट थी, जिसमें रोटियाँ, दूध, दही और अनाज के दाने थे। उसने गेराज में थाली रख दी और धीरे से बोला, “हो सके तो हमें माफ कर देना।”

गेराज में एक साथ ही गुलाबी, हरा, पीला, नारंगी, लाल और भी न जाने कितने रंग अचानक ही बिखर गए, दूर खड़ी झिलमिल परी मुसकारा रही थी।

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