पेड़ की पीड़ा

पेड़ की पीड़ा

शहर के प्रतिष्ठित और जाने-माने जनसेवक ने देश की महती सेवा करते नगर के पास के जंगल का विनाश करके वहाँ एक उपनगर बना लिया। उन्होंने जन-कल्याण का एक और काम किया। शहर के नामी बिल्डर्स से साँठ-गाँठ कर वहाँ प्लॉट कटवाए, आवासीय सुविधा के लिए सरकार से आवेदन कर एकाध दशक में सड़क-बिजली, पानी की व्यवस्था भी कर दी। इस उपनगर का विकास उनका मिशन था। जाहिर है कि सियासी दल का प्रश्रय पाकर और शहर-विकास की स्थापित संस्थाओं तथा विभागों के अधिकारियों को पर्याप्त इस नए काम को करने का पर्याप्त नामा देकर उन्होंने अपना निर्धारित लक्ष्य प्राप्त किया। महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि उनमें चींटी सी लगन और जोंक सी प्रतिभा थी चिपकने की, जिस दफ्तर से चिपके, अपना लक्ष्य हासिल करके ही दम लिया।

यह दीगर है कि नई बस्ती बसने की प्रक्रिया में उनकी जेब भी भरती गई। बिल्डर्स की तो लेन-देन की महारत है। उन्होंने भी उन्हें उपकृत किया। स्वाभाविक है कि धर्मचंद्र के नाम पर यह उपनगर भी ‘धर्म बस्ती’ कहलाई। एक बिल्डर ने तो इनको वहाँ बड़ा सा आवास भी भेंट कर दिया। तीन बेडरूम, स्टडीरूम, लॉन और सेवक की रहने की व्यवस्था। इसके अलावा विनम्रता का नाटक करने वाले विनम्र धर्मचंद्र को चाहिए ही क्या था? भेंट और खान-पान के प्रबंध से शहर के अखबार और सोशल मीडिया उनकी सेवा-भावना के गुण गान की होड़ में लगे रहे।

जैसे-जैसे लक्ष्मी की कृपादृष्टि बढ़ी, उनके निजी कर्मचारी भी बढ़ते गए। उनके जन-संपर्क अधिकारी का दायित्व था कि वह समाचार-पत्र और सोशल मीडिया पर उनकी निस्स्वार्थ सेवा तथा जन कल्याण की लगन का बढ़-चढ़कर प्रचार करे। वह नगर और जिले के सारे सम्मानों से अलंकृत किए गए। शहर के सांसद को उन्होंने फ्री प्लॉट दिलवाया था। वह सूबे के शासकीय दल का प्रभावी और महत्त्वपूर्ण सदस्य था। शहर की संख्या में प्रमुख जाति के नेता होने के कारण ही उसे टिकट ही नहीं मिलता, वह विजयी भी रहता। धर्मचंद्रजी निजी सेवा से प्रसन्न होकर एक दिन उसने कहा भी था कि ‘आप तो किसी पद्म सम्मान के योग्य हैं।’

फिर क्या था! धर्मचंद्र के प्रचार अधिकारी इसी मुहिम में जुट लिये। शहर के पचास महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों के हस्ताक्षर से धर्मचंद्र को पद्म पुरस्कार से सम्मानित करने का प्रतिवेदन सांसद को प्रस्तुत किया गया। वह भी अपने जातभाई को अलंकृत करवाने से क्यों पीछे रहता? उसने राज्य सरकार से न केवल आग्रह किया, बल्कि हठ भी किया। हठ-योग का परिणाम सुखद रहा। राज्य सरकार ने धर्मचंद्र के नाम की अनुशंसा केंद्र सरकार को भेज दी। वहाँ भी सांसद ने भरपूर सफल प्रयास किया और एक दिन इस धर्म नगरी के संस्थापक ‘पद्मश्री’ हो ही गए।

अपने नाम के आगे पद्श्री लगा देख वह गद्गद हो उठते। उन्होंने पद्मश्री धर्मचंद्र के कई परिचय-पत्र भी छपवाए, जिनपर वह उदारता से दूसरों के पद, प्रमोशन, नियुक्ति आदि की अनुशंसा लिखते और अपनी छवि चमकाते। रोज घर के आगे उनका जनता-दरबार लगता और वह हर प्रार्थी की सिफारिश कर जन-जन का मन मोहते। हर दल उन्हें चुनाव में अपना प्रत्याशी बनाने को उत्सुक था। बिल्डर उन्हें अपने प्रतिनिधि के बतौर फंड आदि की प्रमुख समस्या से जूझने को प्रस्तुत थे, “आप मैदान में उतरिए तो। धन और प्रचार का जिम्मा हमारा है।”

“सियासत में कोई किसी का सगा नहीं है।” इसे चरितार्थ कर धर्मचंद्र ने अपने उपकृत करने वाले सांसद का टिकट हथिया लिया। सार्वजनिक रूप से सांसद की इस अनदेखी पर ढोंग के आँसू भी बहाए। सांसद भी इनके टिकट पाने से विचलित नहीं हुआ, उल्टे उसने धर्मचंद्र को बधाई दी और चुनाव में सफलता की शुभकामनाएँ भी। दूसरे दल से वह चुनाव का प्रत्याशी भी बन बैठा। उसका जन-समर्थन और संपर्क क्षेत्र व्यापक था। धर्मचंद्र उसके सन्मुख नौसिखिया थे। चुनाव प्रचार के समय उन्हें अपने अज्ञान का आभास होता रहा, पर उनका अहं इस स्वीकारोक्ति के आड़े आ जाता। आर्थिक सहायता का वादा करने वाले हजारों तक उनके साथ रहे, पर जब लाखों के व्यय की बात आई तो मुकर गए।

राजनीति एक नशा है, कतई ड्रग्स ऐसा। एक बार लत लगी तो छूटने की संभावना कम हो जाती है। धर्मचंद्र को इस नशे ने बरबाद कर दिया। प्रचार में उन्होंने क्या-क्या नहीं किया? पोस्टर निकाले, धर्मनगरी की स्थापना और लाखों को आवास उपलब्ध करवाने का ढिंढोरा पीटा। आस-पास की सुलभ और सस्ती भूमि लेकर राज्य सरकार ने भी वहाँ एक विशेषज्ञता का बड़ा अस्पताल भी स्थापित किया था। धर्मचंद्र इसका श्रेय लेने से भी नहीं चूके। सियासत में सच और झूठ का अंतर कठिन है। शीर्षस्थ नेता भी अवसर के अनुरूप कटा-छँटा सच बोलते हैं। पकड़े गए तो जुबान फिसलना एक आम वारदात है।

फिर चुनाव चुनाव है। जनमत का क्या भरोसा? किसे हराए किसे जिताए? इसीलिए चुनाव एक सट्टा है। कुछ व्यक्ति आपस में सट्टा लगाते हैं जीत-हार के। कई विद्वान् नेतागीरी के सिर्फ सत्ता के स्वार्थ की काया पर आदर्श और उसूल का मुलम्मा चढ़ाते हैं, अपनी निजी सुविधानुसार। कुछ भयंकर जातिवादी सैक्युलर हो जाते हैं, कुछ कट्टर बेईमान, ईमानदार। जनतंत्र के चुनाव का कुछ जन्मजात शंकालु मखौल भी उड़ाते हैं। “असली चुनाव तो बाहुबल का है, कई आते हैं और पाते हैं कि उनका वोट तो पहले ही पड़ चुका है।” पहले वामपंथ के दल, उसूलन अपनी प्रजातांत्रिक आस्था का प्रदर्शन ऐसे ही करते थे। हर बूथ का ‘दादा’ इसी वोट-प्रबंधन में निष्णात था। लोकप्रियता का मापदंड वोट की ठगी से दादा बदल देते। जनप्रिय नेता चुनाव भूले-भटके ही जीत पाता। वह भी दादा की कार्यक्षमता के अभाव से। कौन कहे, आज भी वहाँ लोकतंत्र का यही सफल प्रयोग चलता हो? एक बार कहीं दादा-कल्चर का प्रवेश हो गया तो उसकी विदाई कठिन है। हो तो कैसे हो? नेता को इस में सुभीता है। उसके समर्थकों की एक ही टेक है, दादा से टकराएगा, चूर-चूर हो जाएगा।

जब से चुनाव लड़ने का निश्चय लिया, धर्मचंद्र को भी कानों में एक अजीब, अजानी सनसनाहट सुनाई देती। कई विशेषज्ञों ने उनके कानों की जाँच की। कुछ ने महँगे कैप्सूल भी दिए। पर परिणाम सिफर का सिफर रहा। उनका पुराना परिचित डॉक्टर कहता भी कि यह ‘साँय-साँय’ आपके मन का भ्रम है। वास्तविकता में ऐसा कुछ है नहीं। पर धर्मचंद्र उस पर कैसे विश्वास करते? जो भुगतता है, वह जानता है। यह साँय-साँय की ध्वनि उनके कानों में शहर के कोलाहल तक में भी गूँजती। वह अकेले बैठने से भयभीत रहते। उन्हें लगता कि साँय-साँय जैसे सामूहिक क्रंदन का स्वर है? रात के सन्नाटे में जैसे दूर कहीं आँधी आई हो। आज के सभ्य समाज का तकाजा है कि कोई रोए भी तो प्रतीक के बतौर रूमाल आँख पर लगाकर। जोर-जोर से रोना असभ्यों की पहचान है। दिखने-दिखाने को घनीभूत समान पीड़ा के बावजूद सब प्रसन्न क्यों न दिखें? सभ्य समाज में जो रहते हैं? यह निरंतर की ‘साँय-साँय’ जनसभा से लेकर जनता-दरबार तक धर्मचंद्र का पीछा न छोड़ती।

गोपनीयता की शर्त पर जब नामी विशेषज्ञ भी उनकी समस्या के समाधान में असफल रहे तो उन्हें शंका हुई कि कहीं यह मन के भ्रम का कोई काल्पनिक रोग तो नहीं है? जब बैठे-ठाले किसी का कान बजने लगे तो वह सोचे तो क्या सोचे? एक मित्र ने उन्हें शहर के एक प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक का नाम सुझाया। मरता क्या न करता? वह विवशता में इस अनजान प्रक्रिया के लिए भी सहमत हो गए। चुनाव प्रचार से बमुश्किल उन्होंने एक दिन चुराया। यह साँय-साँय का संकट किसी से बताते भी तो कैसे बताते? क्या भरोसा कि यह निजी रोग सार्वजनिक न हो जाए।

डॉक्टर से वह उसकी निजी क्लीनिक में मिले, वह भी गुपचुप, लुुक-छिपकर। उन्होंने फीस से अधिक रुपए उसे इसी शर्त पर दिए थे कि उन्हें प्रतीक्षा न करनी पड़े। फिर भी वहाँ जाकर वह अपनी गाड़ी में छिपे रहे, जब तक उन मनोवैज्ञानिक डॉक्टर ने उन्हें बुलाया नहीं। डॉक्टर ने उनसे बचपन से लेकर आज तक का इतिहास जाना। फिर उसका एक प्रश्न उन्हें अंदर तक झकझोर गया। आपने जंगल काटकर एक उपनगर बसाया। पेड़ों के प्रति आपकी यह दुर्भावना क्यों है?

उन्होंने दिमाग पर जोर डाला कि वृक्षों का क्या गुनाह है कि बैठे-ठाले उन्होंने सैकड़ों पेड़ कटवा डाले? बहुत सोचने के बाद वह इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि इसका कोई प्रत्यक्ष कारण तो नहीं है। उन्होंने डॉक्टर से भी यही बताया, “मुझे तो हरियाली से प्रेम है। पेड़ों से दुश्मनी या उनके उन्मूलन सी कोई वजह ध्यान नहीं आती है।” डॉक्टर ने उन्हें एक कप चाय पिलाई और चुस्की लेते जानना चाहा, “कुछ तो जरूर है। अपने बचपन का ध्यान करिए। कोई पेड़ विषयक दुर्घटना-घटना याद आती है क्या?”

धर्मचंद्र ने फिर अपनी स्मृति पर जोर डाला। उन्हें अचानक याद आया कि एक बार उनके पिताजी ने क्लास में फेल होने पर उन्हें डाँटते हुए कहा था, “लिखाई-पढ़ाई में तो तुम्हारी कतई अरुचि है। स्वभाव और प्रवृत्ति से तो तुम लकड़हारे हो। शहर में रहने से बेहतर है कि तुम जंगल में बसकर लकड़ी काटने का अभ्यास करो।” वह तो उनकी माँ ने उन्हें पिटाई से बचाया।

उन्होंने डॉक्टर को यह प्रारंभिक घटना सुनाई तो वह चुप हो गया। उसने उन्हें सुझाया कि “घर में बगीचा लगाएँ। पिताजी की उस फटकार को भूलने का भरसक प्रयास करें। यह साँय-साँय अपने आप ठीक हो जाएगी।”

धर्मपुर एक दशक बाद भी हरियाली-विहीन स्थल दिखता था। लोगों ने पेड़ लगाए थे, जो धीरे-धीरे बड़े हो रहे थे। उनका तो यही हाल है कि एक पीढ़ी लगाए तो दूसरी उसका सुख भोगे। उधर उपनगर धर्मपुर के विषय में धर्मचंद्र भी डॉक्टर से मिलकर चिंतन की प्रक्रिया से गुजर रहे थे। आखिर पेड़ों ने उनका क्या बिगाड़ा है? उन्होंने ने तो समाज के विकास में उपयोगी भूमिका निभाई है। सड़कों के रेगिस्तान में वह प्राण-वायु के संवाहक हैं। जलवायु के सुधार और प्रदूषण के नियंत्रण में उनकी प्रशंसनीय भूमिका है। धर्मचंद्र को याद आया कि कागज भी तो वृक्ष से ही बनता है। एक पढ़े-लिखे समाज के निर्माण में उनका अहम योगदान है, वरन् इनसान कब तक भोजपत्र का इस्तेमाल करते? शुरू-शुरू में निवासियों को धर्मपुर भी ऐसे ही सामूहिक विलाप और क्रंदन के स्वर सुनाई देते थे। आश्रयहीन चिड़िया को घोंसले की शरण पेड़ देते हैं। पसीना सुखाने को थके-हारे रिक्शवाले या ठेले के मजदूर को इन्हीं के शीतल साये और बयार का सहारा है। धर्मचंद्र के मन की अपराध भावना गहरा गई।

उनके अंतर में प्रश्न उठा, क्या आधुनिक सभ्यता ही ऐसे गुनाहों में पनपी है कि अपने से कमजोर, कमतर और बेजुबान का विनाश करो। क्या मानव जाति लाखों वृक्षों के उन्मूलन के अनुचित अन्याय का दोषी नहीं है? आज भी यही हनन क्या जारी नहीं है? यदि सड़क का चौड़ीकरण करना है तो सबसे आसान विकल्प है। दोनों तरफ के पेड़ काट दो। लकड़ी के ग्राहकों की कमी नहीं है। उसके बने फर्नीचर को ‘एंटीक’ का दर्जा हासिल है। लोग उसका प्रयोग बैठने-लेटने के लिए नहीं, दूसरों को दिखाने के लिए करते हैं। फलाने के पास अस्सी साल पहले की कुरसी है या मेज है या फिर ‘बेड’ है। अब तो यह इतिहास की सामग्री है। उस समय का रहन-सहन, उपयोग और प्रसाधन के साधन कैसा था? ड्रेसिंग टेबल की बनावट कैसी थी? कहीं उस पर नक्काशी तो नहीं थी? आज के आधुनिक फैशन-डिजाइनर इन सबका अध्ययन करते हैं। बढ़ई और लकड़ी के माध्यम से उस युग की इन लुप्त वस्तुओं की हूबहू नकल, जो असल सी लगे तो औने-पौने दाम से बाजार में उतारकर धनपति ठगों को ठगने की जुगाड़ लगाते हैं, वह भी सफलता से। इस महारत को कुछ आधुनिक मार्केटिंग तकनीक का नाम देकर उसकी इज्जत बढ़ाते हैं। हम केवल यही जानते हैं कि एक पैसा कमाने वाले ठग को दूसरा बेचने वाला डकैत उल्लू बनाता है। पेड़ अहिंसक है। रेल की पटरी से लेकर आधुनिक आयुध के निर्माण में इनकी लकड़ी का उपयोग होता है।

कोई इनके योगदान का सम्मान नहीं करता है, उल्टे इनका अपमान ही होता है। जैसे रेल दुर्घटना में पटरी से छेड़छाड़ इनसान करे, दोष कोई पटरी को दे। ठीक उसे ही जैसे सियासी दल गांधी के नाम का जाप करें, उनके उसूलों और सिद्धांतों को ठेंगा दिखाकर।

पेड़ों की दुर्दशा है। न उनका इनसानों की तरह जातिवाद में विश्वास है, न आर्थिक असमानता में। वह आदमी से कहीं अधिक संवेदनशील हैं, अपने प्रति की गई हर नाइनसाफी चुपचाप सहते आए हैं। पर हर अन्याय की भी सीमा है। आदमी घर का चूल्हा जलाते हैं, उनकी डालें काटकर। तब भी वह सिर्फ साँय-साँय ही हाय ही भरते हैं। न छोटों को सताते हैं, न बड़ों से डाह करते हैं।

हमें लगता है कि कहीं वृक्ष विनाश ही तो धर्मचंद्र के चुनाव में हार का कारण तो नहीं बन गया? कमजोर की हाय क्या-क्या न कर दे? तभी तो कबीर कह गए हैं, “निर्बल को न सताइए, जाकी मोटी हाय।” कौन कहे कि धन, जन-संपर्क, साधन, पैसा-रुपया और उपनगर बसाने का श्रेय और यश क्या-क्या उनके पास नहीं था? कहावत है कि “लक्ष्मी चंचल होती है।” पर यह आभास किसे है कि इतनी चंचल होती है। एक चुनाव उनके वृक्ष-हनन की एक-एक कौड़ी ले डूबा और उन्हें पैसे-पैसे का मोहताज बना गया।

९/५, राणा प्रताप मार्ग,

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