Prabhat Books
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नवंबर 2018

IS ANK MEN

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संपादकीय

न्यायपालिका के बदलते आयाम
इस वर्ष की १२ जनवरी से शीर्ष न्यायालय काफी सुर्खियों में रहा है। ...और आगे

प्रतिस्मृति

अमन के रक्षक
दुनिया की सभी तरक्की अमन पर निर्भर है। जहाँ उथल-पुथल, लूटखसोट, मारपीट है, वहाँ क्या सुख, क्या सभ्यता। ...और आगे

कहानी

ईशरदास की वसीयत ईशरदास की वसीयत
ईशरदास मंडी गए थे, शाक-भाजी लाने। ...और आगे

आलेख

दीपों का त्योहार दीवाली दीपों का त्योहार दीवाली
शरद ऋतु अपने आप में सर्वाधिक सुखद होती है। शरद ऋतु का सौंदर्य श्री का सौंदर्य है। ...और आगे

लघुकथा

एकमात्र दिवस
महिला दिवस पर कुछ परिचित साहित्यकारों ने मुझे बधाई देने के लिए फोन किए। ...और आगे

कविता

हुकुम का गुलाम हुकुम का गुलाम
राधे मेरी बाँसुरी जब से तुम मथुरा गए मेरे प्राण पथ पर प्रतीक्षारत आँख की पलकें पथरा गईं पर तुम नहीं लौटे शापित तो नहीं किया था ...और आगे

निबंध

मनुष्य नहीं हुआ पुराना मनुष्य नहीं हुआ पुराना
अरस्तू ने सदियों पहले कहा था कि जितना सोचा जा सकता था, वह सोचा जा चुका। तब फिर आज क्या हो रहा है? ...और आगे

राम झरोखे बैठ के

मौसम के रंग मौसम के रंग
मौसम की भी विविधता है भारत में, जैसे खान-पान, पहनावे और भाषा की। ...और आगे

ललित निबंध

त्योहारों की परिधि में लोक-संस्कृति की ज्योति त्योहारों की परिधि में लोक-संस्कृति की ज्योति
मानव जीवन में सबसे विशिष्ट और तेज गति से खत्म होती चीज है वक्त। ...और आगे

व्यंग्य

हे उलूकवाहिनी! बरसो छप्पर फाड़ के हे उलूकवाहिनी! बरसो छप्पर फाड़ के
इधर जब से सुना है कि लक्ष्मी जब भी बरसती है तो छप्पर फाड़ के बरसती है, मैं सतर्क हो गया हूँ ...और आगे

साहित्य का भारतीय परिपार्श्व

अंतरगंगी
अटारी पर मेरा कमरा है। एक पलंग, एक कुरसी, एक टेबल है। ...और आगे

साहित्य का विश्व परिपार्श्व

समर्पित मित्र
बहुत दिन हुए, हांस नाम का एक साधारण परंतु ईमानदार व्यक्ति था। वह कोई बहुत प्रसिद्ध व्यक्ति नहीं था ...और आगे

लोक-साहित्य

निमाड़ की पारंपरिक दीवाली
पर्व और उत्सवों की प्रकृति नदी के जल जैसी होती है, वे कुछ पीछे छोड़ते हैं, ...और आगे

बाल-संसार

मेरी दीवाली तो आज ही है मेरी दीवाली तो आज ही है
उसका नाम था लावनी। छोटी, बहुत छोटी थी लावनी। होगी कोई सात-आठ बरस की। ...और आगे