Prabhat Books
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संपादकीय

लालबत्ती की हवश और खुमार
एक मई से तथाकथित वी.आई.पी. की गाडि़यों से लालबत्ती उतर गई है, ...और आगे

प्रतिस्मृति

क्या उसकी मृत्यु हो गई
अब्दुल करीम, जो कि बचपन से ही पूर्वी अफ्रीका में नैरोबी में रहता था ...और आगे

लघुकथा

अनोखी माँग
"बाबूजी, आपने मेरा काम करवाया है, कोई सेवा बताएँ?" ...और आगे

आलेख

विष्णु प्रभाकर : खुले मन के बडे़ लेखक
विष्णु प्रभाकर की जीवन-कथा सहज कदमों से बढ़ते हुए एक संवेदनशील मनुष्य की गुमनाम घाटियों से उच्च शिखर तक पहुँचने की अचरज भरी कहानी है। ...और आगे

कहानी

पंचायत का फैसला पंचायत का फैसला
मैंने पूछा, "पिताजी, आप उदास क्यों हैं?" थोड़ी देर तो उन्होंने आनाकानी की, परंतु फिर बताना पड़ा। ...और आगे

साहित्य का विश्व परिपार्श्व

बूढ़ा बावरची
सन् १७८६ की जाडे़ की शाम थी। काउंटेस तून का भूतपूर्व अंधा बावरची वियना की सीमा पर एक छोटे से लकड़ी के घर में जिंदगी की अंतिम घडि़याँ गिन रहा था। ...और आगे

साहित्य का भारतीय परिपार्श्व

वही लड़की
हीराखंड एक्सप्रेस दक्षिण-पश्चिम दिशा की ओर दौड़ रही थी। ...और आगे

पुस्तक-अंश

शिवाजी व सुराज
आधारभूत मानचित्र (Blue Print) की तरह देखना होगा। ...और आगे

राम झरोखे बैठ के

लाल बत्ती की विदाई लाल बत्ती की विदाई
उनके कान में मच्छर भिनभिना रहा है। वह एक-दो बार हाथ को कान के पास ले जाकर उसे मुट्ठी से पकड़ने का असफल प्रयास कर चुके हैं ...और आगे

स्‍मरण्‍ा

देव, दवे को अभी नहीं बुलाना था
अनिल माधव दवे देव के पास चले गए। अभी नहीं जाना था। जाना तो सबको है ...और आगे

उपन्यास अंश

हमारे हिस्से की छत हमारे हिस्से की छत
छह महीने होने को आए और राजधानी स्थित कार्यालय से प्रभाकरजी की लेखा स्लिप सुधरकर नहीं आई। ...और आगे

व्यंग्य

छुँयाल छुँयाल
यदि ब्रह्मापुत्र नारदजी नर न होकर नारी होते तो निश्चित रूप से वे हमारे पहाड़ के किसी गाँव की छुँयाल ही होते। ...और आगे

लोक-साहित्य

मणिपुर का लोकसाहित्य मणिपुर का लोकसाहित्य
भारत का पूर्वोत्तर क्षेत्र बांग्लादेश, भूटान, चीन, म्याँमार और तिब्बत-पाँच देशों की अंतरराष्ट्रीय सीमा पर अवस्थित है। ...और आगे

बाल-संसार

धूल उड़ाती आती गरमी धूल उड़ाती आती गरमी
गुस्सा खूब दिखाती गरमी, लूएँ भी बरसाती गरमी। आँधी, तूफानों को लेकर, जब-जब भी यह आती गरमी। ...और आगे

कविता

धूप की उष्मित छुवन से... धूप की उष्मित छुवन से...
मेरे दिल में तेरा ही नाम है, शुभ अक्षरों में खुदा हुआ, फिर क्या पता किस हेतु तू चुपचाप मुझसे जुदा हुआ। ...और आगे

यात्रा-वृत्तांत

मेरी कच्छ यात्रा मेरी कच्छ यात्रा
जब भी कभी टी.वी. पर अमिताभ बच्चन को गुजरात टूरिज्म की ओर से बोलते देखता 'कच्छ नहीं देखा तो कुछ नहीं देखा' ...और आगे