Prabhat Books
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संपादकीय

भारतीय मन का अक्षय प्रकाश पर्व
भारतीय मन बुनियादी तौर पर उत्सवधर्मी है। गहन नैराश्य में भी पर्व-त्योहारों के स्मरण मात्र से ही खुशी के महासागर में तैरने लगता है। लेकिन पर्व-त्योहार मनाने की भारतीय दृष्टि केवल मनोरंजन केंद्रित नहीं है, क्योंकि उसमें तात्कालिकता की बजाय शाश्वतता और सनातनता है। सतही उमंग-उल्लास के प्रदर्शन की बजाय उसमें निजी और सामुदायिक, यानी वैयक्तिक और सामाजिक उत्थान का भाव है। ...और आगे

आलेख

दीवाली आई, रात सुहानी ले आई दीवाली आई, रात सुहानी ले आई
पुरा काल से लेकर आज तक ज्ञान-अज्ञान का जो सतत संघर्ष चलता रहा है, उसी का पावनतम प्रतीक युग-युग से संपोषित और अपनाया जानेवाला दीपावली-पर्व है। वे भारतीय पर्व और उत्सव, जो आनंद की रसधार बहाने में प्रमुख स्थान रखते हैं, उन सब में दीपावली इसलिए और ...और आगे

बाल-कहानी

चल्लो...मुझे औड़ नईं खेलना! चल्लो...मुझे औड़ नईं खेलना!
नॉटी मेरी पोती है। उसका नाम नॉटी क्यों पड़ा, यह तो आप उसकी बातें पढ़कर ही जान पाएँगे। जब से वह इस घर में आई है, पहले दिन से ही ...और आगे

कहानी

हवाएँ चुप नहीं रहतीं हवाएँ चुप नहीं रहतीं
रहीम अब्दुल्ला समय से पहले नई दिल्ली के रेलवे स्टेशन पर पहुँच गया। भीड़ काफी थी। वह सब तरफ देखकर भी कहीं नहीं देख रहा था। यहाँ आकर उसका मन हल्का हो चुका था। जहूर की नमाज के बाद एक मिनट नहीं बैठा। ...और आगे

गीत

एकात्म मानव
एकात्मवाद के मंगलपथ पर, मानव का कल्याण है, अखिल विश्व को यह भारत के चिंतन का वरदान है। मनुज मात्र की गरिमा कुंठित हो न किसी भी तंत्र से, ...और आगे

लघुकथा

आत्मीय
मैं सड़क पर जा रही थी। अपने विचारों में खोई। इतने में सामने से आ रही एक लड़की खुशी से किलकती मेरे गले से आ लगी। कहने लगी, 'अरे, आज मिल रही हैं आप! कितने वर्षों बाद। कहाँ थीं अभी तक? चलो कोई बात नहीं। वर्षों बाद ही सही, आपसे मुलाकात तो हो गई।' ...और आगे

लोक-साहित्य

बेटा विवाह के गीतों में विविध भाव बेटा विवाह के गीतों में विविध भाव
हमारे तीज-त्योहार और सभी संस्कार समारोह पर गाए जानेवाले गीत मनोरंजन के लिए नहीं होते हैं। इन गीतों में देवी-देवताओं, विशेष तिथियों, नदियों, नक्षत्रों से ...और आगे

प्रतिस्मृति

अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए
मधुर-मधुर मेरे दीपक जल! युग-युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपल; प्रियतम का पथ आलोकित कर! ...और आगे

राम झरोखे बैठ के

फुटपाथ के रैन बसेरे फुटपाथ के रैन बसेरे
हमारा एक विकसित नगर है। क्यों न हो, राजधानी जो ठहरी। मुल्क के सबसे पिछड़े सूबे की। अविकसित सूबों की एक खासियत है। वहाँ के मंत्री-अफसर खूब विकसित होते हैं। उनके कोठी-बँगले के हर कमरे में एक अदद एअर कंडीशनर और हीटर होना ही होना। ...और आगे

साहित्य का भारतीय परिपार्श्व

नगीनेवाली अँगूठी
पंजाबी भाषा के सुप्रसिद्ध साहित्यकार, उपन्यासकार और कहानी लेखक। उनके पंजाबी साहित्य में आने से पंजाबी उपन्यास में बुनियादी तबदीली आई थी। उनके उपन्यास 'मढ़ी दा दीवा' का सभी भाषाओं में अनुवाद हो चुका है और इनकी कहानियों पर फिल्में भी बनी हैं। ...और आगे

साहित्य का विश्व परिपार्श्व

शत्रु
सितंबर की एक अँधेरी रात थी। डॉक्टर किरीलोव के इकलौते छह वर्षीय पुत्र आंद्रेई की नौ बजे के थोड़ी देर बाद डिप्थीरिया से मृत्यु हो गई। डॉक्टर की पत्नी बच्चे के पलंग के पास गहरे शोक व निराशा में घुटनों के बल बैठी हुई थी। तभी दरवाजे की घंटी कर्कश आवाज में बज उठी। घर के नौकर सुबह ही घर से बाहर भेज दिए गए थे, ...और आगे

स्‍मरण्‍ा

राष्ट्रीय चेतना के उद्घोषक उदय प्रताप सिंह राष्ट्रीय चेतना के उद्घोषक उदय प्रताप सिंह
समकालीन हिंदी कविता के ऊर्जस्वी कवि उदय प्रताप सिंह के व्यक्तित्व में साहित्य-प्रेम और देश-प्रेम का अत्यंत सुंदर समन्वय है। शिक्षा के क्षेत्र में भी उनकी प्रसिद्धि अभूतपूर्व है। राजनीति के क्षेत्र में अपनी सज्जनता और सद्भाव के कारण यदि ...और आगे

व्यंग्य

दीवाली पर निबंध मत लिखाइए दीवाली पर निबंध मत लिखाइए
जब हम छोटी कक्षाओं में पढ़ते थे तो गधे, घोडे़ और गाय पर निबंध के साथ-साथ दीवाली पर भी निबंध लिखवाया जाता था। इसलिए दीवाली के बारे में हमें बचपन से ही पता है कि ...और आगे

यात्रा-वृत्तांत

एक लंबा अंतराल और 'स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी' एक लंबा अंतराल और 'स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी'
सर जे.जे. कॉलेज ऑफ आर्किटेक्चर, मुंबई से १९६६ में स्नातक होने के बाद सब सहपाठी बिखर गए थे। आजीविका हेतु अलग रास्तों पर निकल गए थे। अविनाश से फिर मुलाकात नहीं हुई। फोन पर भी कभी बात नहीं हुई। ...और आगे