Prabhat Books
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सितम्बर 2016

IS ANK MEN

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संपादकीय

राजभाषा-राष्ट्रभाषा हिंदी
'हिंदी राजभाषा है, हिंदी राष्ट्रभाषा है, हिंदी विश्वभाषा है'; जिन लोगों के रोजगार या सरोकार हिंदी से जुडे़ हैं, वे वैचारिक द्वंद्व के बाद सरल ढंग से इन निष्कर्षों तक पहुँचते हैं या उनसे असहमत होते हैं। साहित्यिक और महादेश की संपर्क भाषा के रूप में या किसी भी दृष्टिकोण से देखें तो असल में हिंदी जनभाषा है। ...और आगे

प्रतिस्मृति

हिंदीमय जीवन हिंदीमय जीवन
पुण्यश्लोक श्रद्धेय भैया साहब (पं. श्रीनारायण चतुर्वेदी) एक संपूर्ण युग की दास्तान थे, वे हिंदी की संघर्ष-यात्रा के अपराजेय योद्धा थे। मरते दम तक उन्होंने हिंदी के स्वाभिमान की लड़ाई लड़ी और किसी भी सत्ता के आगे हिंदी के प्रश्न पर झुके नहीं। मैं उन्हें हिंदी का मूर्तिमान स्वाभिमान मानता हूँ। ...और आगे

लघुकथा

संवेदनाएँ मर रहीं
अमर अपनी बाइक से ऑफिस जा रहा था। वह बहुत ही सँभालकर ड्राइविंग करता था, पर एक लॉरी वाले ने ओवरटेक के प्रयास में ढेर कर दिया। अमर एक झटके से रोड के किनारे जा गिरा और बाईक दूसरे किनारे। लॉरीवाला पल भर के लिए रुका, ...और आगे

आलेख

डेढ़ दशक बाद भी कितने लोग जानते हैं यूनिकोड को! डेढ़ दशक बाद भी कितने लोग जानते हैं यूनिकोड को!
हिंदी में पिछले एक दशक के आसपास की अवधि में सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में हुई ज्यादातर तरक्की शायद नहीं हो पाती, अगर यूनिकोड नाम की सौगात हमारी भाषा को न मिली होती। यूनिकोड ने देवनागरी लिपि में पाठ इनपुट करने, सहेजने, डिजिटल माध्यमों से एक से दूसरी जगह भेजने, ...और आगे

बाल-संसार

पापा बोलो तो! पापा बोलो तो!
मुश्किल हो गई पापाजी की टाँग टूट गई, अब तो भाई मुश्किल हो गई! ...और आगे

कहानी

कम्मो कम्मो
"मैडम, आप मुझे बंगालन काहे बुलाती हैं। मैं बंगालन नहीं हूँ।" "अच्छा, तो क्या कहूँ?" मालकिन ने पूछा। "मेरा नाम है कामिनी, आप कम्मो बुला सकती हैं।" मैंने कहा तो मालकिन मेरे पास आ गई। ...और आगे

गीत

हिंद देश की भाषा हिंदी
हिंद देश के प्रांत-प्रांत में जो जानी-पहचानी है। कीर्ति राष्ट्रभाषा हिंदी की, इस जग में फैलानी है॥ रग-रग में अंगार जगाते थे, इससे चारण रण में, आल्हा की गाथाएँ मुखरित अब भी कण-कण में, ...और आगे

लोक-साहित्य

साँझी पर्व संजा सहेलड़ी साँझी पर्व संजा सहेलड़ी
ग्रामीण लोक संस्कृति की सोंधी महक बिखेरता हुआ संजा सहेलड़ी पर्व नारी के अंतर्मन की भावनाओं और आकांक्षाओं को अभिव्यक्त करता है। भाद्रपद मास की पूर्णिमा से शुरू होकर आश्विन मास की पितृमोक्ष अमावस तक चलने वाला १६ दिवसीय पर्व संजा श्राद्ध पक्ष में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, ...और आगे

राम झरोखे बैठ के

बेहतर श्वान या इनसान बेहतर श्वान या इनसान
काफी अंतर है श्वान और इनसान में। एक चौपाया है दूसरा दो पाया। इस के अलावा दोनों को खंभों से चिढ़ है। एक खंभे को देखते ही टाँग उठाता है, तो दूसरा सामने पड़ने पर भले ही जुबानी दुम हिलाए, पीछे-पीछे मन की भड़ास निकालता है। ...और आगे

साहित्य का भारतीये परिपार्श्व

अब दुःख नहीं है
राजेश आज बहुत परेशान है, क्योंकि जिस माँ ने उसे पैदा किया व लालन-पालन कर इतना बड़ा आदमी बनाया, आज वह माँ मरणासन्न अवस्था में पड़ी परेशान हो रही है। उसे वह सहन नहीं कर पा रहा है। उसने उनके हाथों को पे्रम से पकड़ा। ...और आगे

साहित्य का विश्व परिपार्श्व

एक माँ की कहानी
माँ छोटे बच्चे के पास बैठी थी। वह बहुत उदास थी और डर रही थी कि कहीं मर न जाए। उसका नन्हा चेहरा पीला पड़ गया था और आँखें बंद थीं। बच्चा कठिनाई से साँस ले पा रहा था। कभी इतनी गहरी साँस लेता था जैसे वह आहें भर रहा हो। तब माँ पहले से और अधिक उदास हो जाती थी। ...और आगे

यात्रा-वृत्तांत

अथ श्रीगोवर्धन तीर्थ-कथा अथ श्रीगोवर्धन तीर्थ-कथा
तेईस जनवरी स्वातंत्र्य समर के अद्भुत योद्धा नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जन्मजयंती के साथ-साथ एक और विभूति, मेरे मित्र आनंद शर्मा की भी जन्मतिथि है। भाईजी ने नियम सा बना लिया है कि अपना जन्मदिन किसी तीर्थस्थल पर ही मनाते हैं। ...और आगे

व्यंग्य

सास की अटकी साँस सास की अटकी साँस
अब तो भैया साँस भी अटक-अटककर आने लगी है। सास के नाम की ऐसी साँस चुभी है कि निकालो तो दर्द, न निकालो तो दर्द ही दर्द। सोचा तो था कि बहू को ही बेटी बना लूँगी, ...और आगे

संस्मरण

मेरे पिता का संगीत प्रेम मेरे पिता का संगीत प्रेम
जब से होश सँभाला। प्रातः नींद खुलते ही एक धीर-गंभीर कंठ से उतरी भैरवी की स्वर लहरी कानों में उतरती चली जाती- जागिये रघुनाथ कुँअर पंछी बन बोले चंद्र किरन सीतल भई, चकई पिय से मिलन गई त्रिविध मंद चलत पवन, पल्लव द्रुम डोले। ...और आगे