सम्पादकीय

प्रथम प्रधानमंत्री पं. नेहरू का १२५वाँ जन्मोत्सव - कुछ निर्मूल शंकाएँ प्रथम प्रधानमंत्री पं. नेहरू का १२५वाँ जन्मोत्सव - कुछ निर्मूल शंकाएँ
पं. जवाहरलाल नेहरू का १२५वाँ जन्मदिवस सभी देशवासियों के लिए अत्यंत प्रसन्नता का विषय है। 'साहित्य अमृत' परिवार बड़ी श्रद्धा से उनके व्यक्तित्व और कृतित्व का स्मरण करता है। उनका ...और आगे

प्रतिस्मृति

अग्निसंभवा अग्निसंभवा
द्रौपदी यज्ञ-अग्नि से जनमी थी, धृष्टद्युम्न भी यज्ञ-अग्नि से ही जनमा था। आग से लपट भी जनमती है और धुआँ भी। दोनों ही बलखाते हुए ऊर्ध्वोन्मुखी होते हैं। धुआँ एक क्षण के लिए आँखों में कड़वाहट छोड़कर हवा के झोंकों से तार-तार हो जाता है, बिला जाता है। ...और आगे

गजल

मन में उठती चाह यही
थामे हुए कमजोर सी पतवार हम कैसे करें अब पार ये मझधार हम, मतभेद ये मनभेद अपना क्यूँ बने कब तक सहें ये रोज की तकरार हम, काँच की दीवार है अब बीच में उस पार तुम हो हैं मगर इस पार हम ...और आगे

कहानी

क्रिसमस का पेड़ क्रिसमस का पेड़
यह चमत्कार कैसे हुआ, मैं नहीं जानता। सुबह जब मैं यहाँ आया था तब तो यहाँ नहीं था। धवल हिम की चादर को चीरकर यह शानदार पेड़ यहाँ कैसे उग आया? दूर से तो यह किसी विशाल कैनवास पर बना एक तैलचित्र सा लगता था ...और आगे

आलेख

आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी : बहुआयामी लेखन
रेलवे का एक उच्च पदाधिकारी अच्छे वेतन की नौकरी छोड़कर बीस रुपए मासिक पर किसी पत्र का संपादक बनेगा, इस पर सहसा विश्वास नहीं किया जा सकता, किंतु है यह यथार्थ घटना! रायबरेली जिले के दौलतपुर गाँव का एक युवा महावीर प्रसाद द्विवेदी सामान्य शिक्षा प्राप्त कर जी.आर.पी. रेलवे में सिग्नेलर का पद प्राप्त कर लेता है ...और आगे

डायरी-अंश

वास्तव में घर एक पाठशाला है... वास्तव में घर एक पाठशाला है...
कुछ दिन पहले श्री लक्ष्मी शंकर वाजपेयी का फोन आया था, "मिश्रजी, बहुत दिन हो गए आपको आकाशवाणी आए हुए। कहिए, किस दिन गाड़ी भेज॒दूँ?" मैंने उन्हें धन्यवाद दिया और कहा, मैं तो अब प्रायः घर ही रहता हूँ। आप लोगों को जब ...और आगे

कविता

सपनों में आती रहीं मेरे...
पढ़ती रही तेरी सुरीली चिट्ठियाँ मैं रात भर, भरती रही तेरी याद में सिसकियाँ रात भर। क्या तू भी खयालों में खोया था मेरे, आती रही तेरे नाम की हिचकियाँ रात भर। अकेली नहीं तन्हाई में साथ सखियाँ हैं मेरी, बजती रही कलाई में चूडि़याँ रात भर। ...और आगे

राम झरोखे बैठ के

भारत भिक्षा शिक्षा संस्थान भारत भिक्षा शिक्षा संस्थान
दुनिया के हर धर्म में दान या भिक्षा का प्रावधान ही नहीं, प्रतिष्ठा भी है। सबका लक्ष्य निर्धन का कल्याण है। समर्थ का काम असमर्थ को भीख देना है, वह भी अपने खुद के भले के लिए। ...और आगे

लघुकथा

भाग्य-चक्र भाग्य-चक्र
घर में पानी की कमी नहीं थी। हमेशा पानी से हौज भरा रहता था, फिर भी उस दिन अचानक माँजी ने जब हौज का ढक्कन उघाड़ा और बालटी को सहेजे हौज की तरफ झुकी ही थी कि वह भौचक्क रह गई ...और आगे

ललित निबंध

करील-कानन में कूकती कोयल
वसंत की अग्रदूत कोयल की कूक कानों में जैसे अमृत घोल देती है, हृदय में अनिर्वचनीय आह्लाद भर देती है, मन-वीणा उसकेस्वर में स्वर मिलाती स्वयमेव झंकृत हो उठती है और कांत-कल्पना को जैसे पंख लग जाते हैं। किंतु आज उसी कोयल की कूक से मेरे हृदय में हूक उठ रही है ...और आगे

साहित्य का भारतीये परिपार्श्व

एक किसान का निर्वाण एक किसान का निर्वाण
बिलास पांड्या एक किसान था। जीवन के प्रति उसमें कोई वैरागी भाव नहीं था। ऐसे क्या हालात थे, जो वह यह कदम उठाने को मजबूर हुआ, मेरी समझ में कुछ नहीं आया। लेकिन आजकल ऐसी खबरें आम हैं, इस देश के किसान लगातार आत्महत्या कर रहे हैं। ...और आगे

साहित्य का विश्व परिपार्श्व

गिटजे
उस समय यदि कोई हमारे बचपन और लड़कपन के वर्षों की बाबत-ब्रगीटा वान डर प्लास के नाम और रूप की बाबत पूछता तो हम उत्तर देते-'तुम्हारा किससे मतलब है? हमें किसी ऐसी महिला को जानने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ।' यदि इसका प्रत्युत्तर होता-क्या, तुम ब्रगीटा वान डर प्लास को नहीं जानते? ...और आगे

व्यंग्य

धरती पर एक दिन धरती पर एक दिन
महीने की पहली तारीख थी। वेतन मिलने में अभी दो-चार दिन लग सकते थे, अतः भक्त सच्चे मन से भगवान् को याद कर रहा था। उसे मालूम था ...और आगे

लोक-साहित्य

बस्तर का लोकपर्व 'दियारी'
छत्तीसगढ़ राज्य का आदिवासी बहुल बस्तर अंचल कई मायनों में शेष छत्तीसगढ़ से भिन्न है। सबसे पहली भिन्नता है, यहाँ की भौगोलिक संरचना और दूसरी है, भाषा। छोटी-बड़ी पहाडि़यों, घनघोर जंगलों, नदियों और नालों तथा खनिज-संपदा से भरपूर बस्तर अंचल की आदिवासी एवं लोक-संस्कृति इसीलिए शेष छत्तीसगढ़ से अलग-थलग है। ...और आगे

यात्रा-वृत्तांत

रंगपट्टम से बेंगलुरु रंगपट्टम से बेंगलुरु
मैसूर से बस द्वारा हम श्रीरंगपट्टम पहुँचे। कावेरी नदी के मध्य बने टापू पर यह शहर बसा हुआ है। श्रीरंगपट्टम ऐतिहासिक तीर्थ है। अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में मैसूर राज्य के शासक हैदरअली एवं टीपू सुल्तान के अधिकार क्षेत्र में था ...और आगे

बाल-संसार

मरसी किलिंग
हिमांशु का परिवार सरकारी कॉलोनी में रहता था। परिसर का वातावरण बहुत सुखद था। कभी गाँव से दादा-दादी आ जाते तो वह उनके साथ दूर तक घूम आता। कॉलोनी से कुछ दूर ऊँचे-ऊँचे पेड़ोंवाला घना जंगल था, जो पशु-पक्षियों की चहचहाहट से गूँजता रहता। दादी को बहुत भला लगता ...और आगे

साहित्य अमृत मासिक का लोकार्पण

साहित्य अमृत मासिक का लोकार्पण साहित्य अमृत मासिक का लोकार्पण
तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. शंकार दयाल शर्मा को 'साहित्य अमृत' का प्रवेशांक भेंट करते हुए प्रबंधक संपादक श्यामसुंदर, साथ में हैं पत्रिका के संस्थापक संपादक प. विद्धयानिवास मिश्र एवं प्रतिष्ठित साहित्यकार ...और आगे

हमारे संकलन

November 2014 December 2014 January 2015