RNI NO - 62112/95
ISSN - 2455-1171
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यों गूँजी राष्ट्रीय चेतनातब न हर हाथ में मोबाइल फोन था, न फेसबुक, व्हाट्सएप्प या एक्स (ट्विटर) जैसे सोशल मीडिया के मंच, न सैकड़ों एफ.एम. रेडियो चैनल। अखबार तथा कुछ पत्रिकाएँ अवश्य थीं, किंतु उनका प्रसार नगरों, महानगरों के एक सीमित वर्ग तक ही था। नब्बे प्रतिशत आबादी गाँवों में थी और साक्षर नहीं थी। टी.वी. चैनल भी नहीं थे, रेडियो कुछ संपन्न घरों में हुआ करता था तथा ब्रिटिश सरकार के अधीन था। यह परिदृश्य उन दिनों का है, जब भारत पराधीनता की बेड़ियों में जकड़ा था। व्यापार करने आई ईस्ट इंडिया कंपनी ने धीरे-धीरे अपना शिकंजा कसा था और शासन करने लगी थी। अठारह सौ सत्तावन के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के बाद भारत पर कंपनी सरकार की जगह सीधे ब्रिटिश सरकार का नियंत्रण हो गया था। अंग्रेजों द्वारा प्रथम स्वाधीनता संग्राम को जिस निर्ममता के साथ कुचला गया था, उसने एक निराशा का वातावरण बना दिया था। ब्रिटिश सरकार ने इन स्थितियों का लाभ उठाकर भारत का आर्थिक शोषण तेज कर दिया था। भारतीय बाजारों में विदेशी माल बढ़ने लगा था। भारत के कुटीर उद्योगों को भयंकर नुकसान पहुँचाया गया था। बिहार-बंगाल के लाखों किसान नील की खेती से बरबाद हो रहे थे। महात्मा गांधी के दक्षिण अफ्रीका से भारत आने के पहले तक तत्कालीन कांग्रेस प्रस्ताव पारित करने तक सीमित थी। दक्षिण अफ्रीका में अश्वेतों और भारतीयों के साथ पशुओं से भी बुरा बरताव हो रहा था। महात्मा गांधी ने जनजागरण, जनशक्ति और सत्याग्रह के माध्यम से शक्तिशाली ब्रिटिश सरकार को झुकने पर विवश कर दिया था तथा करोड़ों प्रवासी भारतीयों एवं अश्वेतों को सम्मान का जीवन जीने का रास्ता दिखाया था। भारत आने पर उन्होंने महसूस किया कि स्वाधीनता के लिए राष्ट्रीय चेतना जगाने का कार्य अत्यंत कठिन था। देश में राजाओं, नवाबों का शासन था, जिनमें कुछ अपवादों काे छोड़कर ब्रिटिश सरकार के प्रशंसक थे। बुद्धिजीवी ब्रिटिश सरकार द्वारा डाक व्यवस्था या रेल व्यवस्था या कुछ अन्य सुविधाएँ लाने के लिए उनके प्रशंसक थे। भारत का एक बड़ा वर्ग ब्रिटिश सरकार का इसलिए समर्थक था कि उसने वर्षों से चले आ रहे मुसलिम शासन से मुक्ति दिलाई थी। भारत के करोड़ों आम लोग गाँवों में थे, निरक्षर थे तथा अपनी आजीविका के लिए संघर्षरत थे। शहरों में भी गरीबों की संख्या कम नहीं थी। ऐसे परिदृश्य में राष्ट्रीय चेतना का प्रसार करना एक बहुत बड़ी चुनौती थी। ऐसे भयावह परिदृश्य में कवियों ने राष्ट्रीय चेतना जगाने का दायित्व सँभाला था। ब्रिटिश सरकार ने पत्रिकाएँ जब्त कीं, उन्हें जलाया, छापाखाना जब्त किए, किंतु कवियों की लेखनी न रुकी, न झुकी। कवियों द्वारा ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत के विकास तथा विविध सुविधाओं के प्रसार-प्रचार की आड़ में किए जा रहे शोषण और दमन पर कविताएँ लिखकर समाज को जागरूक करने का प्रयास किया। छोटे-छोटे परचे छपवाकर आम जनता में बँटवाए गए। इन कविताओं में देशप्रेम की भावनाएँ जगाना, पराधीनता के अपमान के प्रति प्रतिरोध जगाना, देश के लिए त्याग और बलिदान को प्रेरित करना, भारत के स्वर्णिम अतीत के गौरव की याद दिलाना, आशा और उत्साह जगाना आदि को पिरोया गया। लोककवियों ने अपनी-अपनी बोलियों में यही कार्य किया। एक ओर जहाँ स्वाधीनता सेनानियों, क्रांतिकारियों के बलिदानों की राष्ट्रीय चेतना जगाने में महती भूमिका है, वहीं कवियों तथा उनकी कविताओं का भी महत्त्वपूर्ण योगदान है। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने ब्रिटिश सरकार के शोषण पर लिखा— अंग्रेज राज सुख साज सजे सब भारी पै धन विदेश चलि जात इहै अति ख्वारी...! इस ‘सुख साज’ में भारतेंदुजी ने उन्हीं डाक-तार, रेल या अन्य सुविधाओं की ओर संंकेत किया है, जिन पर बुद्धिजीवी वर्ग मोहित था। इसी बुद्धिजीवी वर्ग का कोई बेटा यदि स्वाधीनता संग्राम की राह पर चल पड़ता तो वे अखबार में विज्ञापन दे देते कि इस युवक से हमारा कोई संबंध नहीं है। भारतेंदुजी ने कहमुकरियों (अमीर खुसरो द्वारा प्रतिपादित एक पद्य विधा) के माध्यम से अंग्रेजी सरकार के शोषण पर तीव्र प्रहार किए— भीतर-भीतर सब रस चूसै हँसि-हँसि के तन, मन, धन मूसै जाहिर बातन में अति तेज क्यों सखि साजन? नहिं अँगरेज॥ अंग्रेजों ने ऐसा प्रचारित किया था, जैसे उन्होंने भारत को पिछड़े देश से आधुनिक, सभ्य, सुसंस्कृत देश बनाया है। भारतेंदुजी ने लगान-वसूली की क्रूरता हो या अकाल, महामारी के समय भारतीयों के प्रति संवेदनहीनता हो...अत्यंत क्षुब्ध होकर ये मार्मिक पंक्तियाँ लिखीं— रोवहु सब मिलि आवहु भारत भाई हा-हा! भारत दुर्दशा न देखी जाई। बद्रीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ भी भारतीय बाजारों में विदेशी माल की खपत पर चिंता व्यक्त करते हैं— देस-नगर बानक बनौ, सब अंग्रेजी चाल हाटन में देखहु भरो, सब अंग्रेजी माल॥ (हाट—देशी बाजार) प्रताप नारायण मिश्र अंग्रेजी मानसिकता पर कटाक्ष करते हुए लिखते हैं— जग जानै इंग्लिश हमें वाणी बस्त्रहि जोय! मिटे बदन कर श्याम रंग जन्म सुफल तब होय!! अपने देश की संपदा की रक्षा के लिए महावीर प्रसाद द्विवेदी ने स्वदेशी अपनाने का आह्वान किया— स्वदेशी वस्त्र को स्वीकार कीजै विनय इतनी हमारी मान लीजै शपथ करके विदेशी वस्त्र त्यागो न जावो पास, उनसे दूर भागो राष्ट्रीय चेतना के प्रसार में कविवर मैथिलीशरण गुप्त की कविताओं ने भी व्यापक प्रभाव डाला— हम कौन थे, क्या हो गए और क्या होंगे अभी आओ विचारें आज मिलकर ये समस्याएँ सभी यह ‘पाप’ पराधीनता का भी है और पराधीनता को न पहचानने का भी। इसी पराधीनता से मुक्ति का आह्वान रामनरेश त्रिपाठी भी अपना शासन आप करो तुम यही शांति है, सुख है पराधीनता से बढ़ जग में नहीं दूसरा दुःख है। कविवर माखनलाल चतुर्वेदी ने मात्र कविताएँ ही नहीं लिखीं, वे स्वयं जेल भी गए। उनकी ‘पुष्प की अभिलाषा’ कविता को अंग्रेजी हुकूमत ने जब्त कर लिया था, फिर भी उसका जादू करोड़ों दिलों तक पहुँचा। इस कविता में एक पुष्प ईश्वर की मूर्ति पर अर्पित होने या राजा के गले का हार बनने आदि से बढ़कर बलिदान होने की राह पर चलने वालों की डगर पर बिखरना चाहता है— मुझे तोड़ लेना वनमाली उस पथ पर देना तुम फेंक मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ जावें वीर अनेक महात्मा गांधी के एक आह्वान पर लाखों की संख्या में जुटने वाले सत्याग्रहियों के लिए उन्होंने लिखा— कंठ भले हों कोटि-कोटि तेरा स्वर उनमें गूँजा हथकड़ियों को पहन राष्ट्र ने पढ़ी क्रांति की पूजा ‘त्रिशूल’ उपनाम से कविताओं को रचने, प्रचारित करनेवाले कवि गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ से अंग्रेज सरकार इतनी परेशान थी कि उन्हें खोजने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। शुक्लजी की कविताओं ने देशप्रेम एवं राष्ट्रीय चेतना फैलाने में बड़ा योगदान दिया— अगर देश को है उठाने की इच्छा विजयघोष जग को सुनाने की इच्छा व्रती होके कुछ कर दिखाने की इच्छा व्रती बनके व्रत को निभाने की इच्छा असहयोग कर दो!! असहयोग कर दो!! कविवर बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ भी केवल कविताएँ लिखने तक सीमित नहीं रहे, वरन् स्वयं भी सत्याग्रही बनकर जेल गए। उनकी रचनाओं ने राष्ट्रीय चेतना की ज्वाला को खूूब धधकाया— कवि कुछ ऐसी तान सुनाओ जिससे उथल-पुथल मच जाए एक हिलोर इधर से आए एक हिलोर उधर से आए प्राणों के लाले पड़ जाएँ त्राहि-त्राहि स्वर नभ में छाए जयशंकर प्रसादजी की ‘अरुण यह मधुमय देश हमारा’ अथवा ‘हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती स्वयं प्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती’ जैसी कविताओं से हम सब परिचित हैं। निरालाजी की ‘वीणावादिनि वर दे’ एक प्रार्थना से अधिक स्वाधीनता का आह्वान है— काट अंध उर के बंधन स्तर बहा जननि ज्योतिर्मय निर्भर निरालाजी की ‘जागो फिर एक बार’ भी राष्ट्र जागरण का स्वर गुँजाती है। सुभद्राकुमारी चौहान की कविता ‘खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी’ देशप्रेम की मशाल बन गई। उनकी अनेक रचनाएँ राष्ट्रीय चेतना जगाने में मील का पत्थर बनीं। सोहललाल द्विवेदी, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, शिवमंगल सिंह ‘सुमन’, भवानी प्रसाद मिश्र, कितने ही नाम हैं, जिन्होंने राष्ट्रभाव जागरण का महती दायित्व निभाया। ये कुछ उदाहरण तो जैसे समुद्र में से दो अँजुरी भर पानी लेने जैसे हैं। भारत की न केवल हर भाषा में वरन् सैकड़ों बोलियों में हजारों कविताओं ने जनमानस को उद्वेलित किया। सैकड़ों उर्दू शायरों ने राष्ट्रीय चेतना जगाने वाली नज्में-गजलें लिखीं। स्वाधीनता आंदोलन के हर पहलू पर आपको हर भाषा या बोली में प्रेरक कविताएँ मिल जाएँगी। सैकड़ों ऐसे गीत-कविताएँ हैं, जिनके रचनाकार गुमनाम रहे, किंतु उनकी कविताओं-गीतों ने भरपूर राष्ट्रीय चेतना जगाई। निश्चय ही स्वाधीनता आंदोलन में जहाँ हजारों सत्याग्रहियों, क्रांतिकारियों, पत्रकारों आदि का योगदान है, वहीं राष्ट्रीय चेतना को गाँव-गाँव, घर-घर पहुँचाने में कवियों और लोककवियों का योगदान भी कम नहीं है। (लक्ष्मी शंकर वाजपेयी) |
जनवरी 2025
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