सामंती संस्कार बनाम आधुनिक तकनीक

सामंती संस्कार बनाम आधुनिक तकनीक

में आज भी कनॉट प्लेस का किनारे का वह कोना याद है, जहाँ वह तथाकथित ज्योतिषी पिंजड़े के तोते को साथ-साथ लेकर बैठते थे। न कोई बोर्ड, न विज्ञापन। बस सामने एक कपड़े पर कुछ लिफाफों की ओर ध्यान जाता। जिसके मन में उत्सुकता हो, वह रुके, नियत फीस चुकाए, पिंजड़े से श्रीमान तोते बाहर पधारें और चोंच से एक लिफाफा उठाएँ, ज्योतिषी को सौंपे और अपने शरण्य-स्थल में लौट लें। एक से अधिक ग्राहक हों तो लिफाफा जिज्ञासु को ही सौंप दिया जाता था। कहीं उसकी निजी सूचना सार्वजनिक न हो जाए? यह भी संभव है कि तोता-स्वामी काला अक्षर भैंस बराबर रहे हों? तोते को पालने और प्रशिक्षित करने में कौन डिग्री की दरकार है? यों डिग्रीधारी भी रोजगार दफ्तर की शोभा बनने के अलावा कौन से अन्य तीर मार रहे हैं? उनके माता-पिता ने भी डिग्री ‘खरीदने’ में उनका पूरा सहयोग किया है। बी.ए., एम.ए. से दहेज की राश‌ि में इजाफा जो होता है। कौन कहे, सरकारी नौकरी का जुगाड़ भी ‘फिट’ हो जाए, नहीं तो खानदानी परचून की दुकान या चाय का पुश्तैनी ठेला तो है ही रोजगार का
सहारा।

भविष्य जानने की उत्सुकता एक मानवीय दुर्बलता है। बड़े-से-बड़े और छोटे-से-छोटे इनसान में इसका पाया जाना कोई अजूबा नहीं है। बस माध्यम और पैसे का अंतर है। कुछ फटेहाल तोते पर निर्भर हैं, कुछ समृद्ध प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्यों पर। ऐसे आवश्यक नहीं है कि दोनों में से एक भी सही भविष्यफल बताए? यह उन दिनों की दुघर्टना है, जब हम पढ़ते थे। कोई कॉलेज में पढ़ाई करे और इश्क से बचा रहे, ऐसा कम ही होता है। हम भी कोई अपवाद न थे। कोई भी सुंदर लड़की दिखी नहीं कि हम उससे इकतरफा प्रेम में आबद्ध हो जाते। जैसा स्वाभाविक है, बहुधा हमें निराशा ही हाथ लगती। यह तो बाद में खयाल आया कि पेशेवर मजनू बनने के पहले आदमी को अपनी शक्ल शीशे में देख लेनी चाहिए। दिक्कत यही है कि आईना तो झूठ नहीं बोलता है, पर उसमें झाँकनेवाले का आकलन वस्तुनिष्ठ नहीं होना संभव है। हमें न अपनी पिचकी नाक नजर आती, न इधर ताकती उधर निशाना लगाती आँखें। एक बार हमें खयाल आया कि न सही कैंटीन की चाय, तोते से ही इश्क का नतीजा क्यों न पूछ लें? हमने तोता-स्वामी के यहाँ हाजरी लगाई। तोते ने जो लिफाफा उठाया, उसका भविष्य रोचक था, ‘आपके छह कन्या-रत्नों के पिता बनने की संभावना है।’ हमने अपना सिर पीट लिया।

वक्त के साथ विज्ञान और तकनीक ने तरक्की की है। अब न तोता भविष्य बाँचता है, न ज्योतिषाचार्य। आजकल ‘लैप-टाॅप’ का जमाना है। वर्तमान पंडित कंप्यूटर-सज्जित हैं। वह उसी में ग्रह, दशा की गणना कर ‘कल’ का हिसाब लगाते हैं। ऐसा नहीं कि भविष्य-वक्ता की गुणवत्ता में कोई अंतर पड़ा है। अतीव की भाँति अब भी ज्योतिष संभावनाओं का सौदा है। जो फर्क पड़ा है, वह सिर्फ इतना है कि तोता और उसके स्वामी तथा पारंपरिक ज्योतिषी की जीविका जाती रही है। तोता स्वामी चिड़‌ियों की खरीद-फरोख्त के धंधे में हैं और ज्योतिषी सस्ते ग्राहक फँसाने की तलाश में। उनके परिवारों के बुरे दिन आ गए हैं। दूसरों का क्या, वह अपना खुद का भविष्य आँकने में असफल रहे हैं। जैसे कोई डाॅक्टर दूसरों का इलाज करे और अपने असाध्य रोग से अनजान रहे।

हमें लगने लगा है कि यह जो अतीत की कंप्यूटर क्रांति है, उसने रोजगार पर दुष्प्रभाव डाला है, जहाँ फैक्टरी में सौ की दरकार थी, इधर दस से काम चल जाता है। सरकार में भी परिवर्तन आ रहा है। उसके दफ्तर अरसे से कामचोरों की आरामगाह रहे हैं, अब कर्मचारियों के सामूहिक संतोष में खलल पड़ा है। वह अचानक मेज पर खर्राटे भरते-भरते चौंक जाते हैं, कहीं कंपू कंबख्त न आ जाए? उनके कल्याण को प्रतिबद्ध कर्मचारी-यूनियन अभी से राष्ट्रव्यापी आंदोलन छेड़ने पर उतारू है। हर दिन जो नई-नई तकनीक आ रही है, यह भविष्य की भर्तियाँ न चौपट कर दे? ऐसे भी देखने में आया है कि रिक्त पदों को भरना सरकार आवश्यक नहीं समझती है। इन खाली पदों के चलते भी कार्य-कुशलता में कोई फर्क नहीं पड़ा है। जैसी पहले थी, वैसी ही बेढंगी चाल अब भी है। कुछ का निष्कर्ष है कि बदतरी की भी एक सीमा होती है, अब उससे अधिक बदतर होना मुमकिन नहीं है। कुछ को डर है कि सरकार में काहिली के ऐसे कीटाणु हैं कि उन्होंने तकनीक को समन्वित किया तो उससे भी कामचोरी का खतरा है? वह भी बिना बख्शीश के टस-से-मस न हो तो कार्य-निष्पादन का क्या होगा? जब भी कोई काम आए, वह रख-रखाव का खर्चा माँगे? आजकल भारत में न मौसम का भरोसा है, न इनसान का तो मशीन का कैसे हो? कौन कहे कि भारत का बाबू इतना प्रभावी है कि मशीन को भी प्रदूषित करने में समर्थ है।

यह जो एक खोज है, जिसे ‘आर्टिफिशियल इंटैलिजेंस’ (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) कहते हैं, उसके खतरे हर कार्यलाय पर मँडरा रहे हैं। क्या पता, कोई ऐसी तकनीक बने जो टैंडर से लेकर प्रमोशन तक के निर्णय, तय मानकों के अनुसार लेने में समर्थ हो? इस खतरे के बारे में अधिकारियों को सतर्क रहने की आवश्यकता है, कहीं उनके रहे-सहे अधिकारों की भी अचानक कटौती हो जाए और उन्हें खबर तक न लगे? यों हमें यकीन है कि अगर ऐसा हुआ तो पदोन्नति न मिलने पर अधिकारियों पर व्यक्तिगत पसंद-नापसंद की तोहमत लगानेवाले और दुखी होंगे। हमें उनसे हार्दिक हमदर्दी है। हर असफलता के लिए ऐसों ने दूसरों को दोष दिया है। उन्हें इस स्वर्णिम अवसर का न उपलब्ध होना हद दर्जे की नाइनसाफी है। दुखद है कि इस अन्याय का कोई प्रतिकार भी नहीं है। हमें विश्वास है कि वह कृत्रिम बुद्ध‌िमत्ता को दोष देने से चूकेंगे नहीं, पर मशीन तो मशीन है। उसके कौन दिल है, जो उसकी पसंद-नापसंद का सवाल हो? कृत्रिम बुद्धिमत्ता को अपराधी ठहराना उनकी अपनी विश्वसनीयता को ही घटाएगा। हमारे एक मित्र हैं। आजतक वह विवाह हो या जन्मदिन का समारोह, कहीं भी समय से नहीं पहुँचे हैं। आते ही वह मेजबान से पीड़‌ित मुद्रा में फरमाते हैं कि क्या करें, सारी गलती स्कूटर की है। पता नहीं, इसमें क्या तकनीकी समस्या है, हर दस मिनट बाद खुद-ब-खुद ठप्प हो जाता है? हर मेकैनिक कोशिश करके हार चुका है। समस्या है कि वहीं की वहीं टिकी है, अंगद के पाँव की तरह।

अब तक अपनी अक्ल में आ गया है कि ऐसे लाइलाइज हैं। एक बार जो बहाना बनाया तो वह स्थायी हो जाता है। कौन बार-बार नए बहाने के लिए बुद्धि पर जोर दे। जैसे प्रश्न तकनीकी समस्या का है, वहाँ मेकैनिक कर ही क्या सकता है? ऐसे यह तो उन्हें कोई समझाने से रहा कि वह निर्माताओं को इस तकनीकी खामी की सूचना दे, शायद वह ही अपने निर्माण में कुछ सुधार कर सकें। गौबेल्स का सिद्धांत है कि झूठ बार-बार दाेहराने से सच लगने लगता है, बहानेबाजी पर भी लागू है। स्कूटर के साथ तकनीक जोड़ देना उनकी लेट पहुँचने की बहानेबाजी को स्तरीय बनाता है। कोई उनकी बहानेबाजी पर विश्वास करे न करे। न करे तो कर ही क्या सकता है, जब भारत सरकार उनके लेट आगमन को वर्षों से बर्दाश्त करती आ रही है, बिना उफ किए? असलियत यह है कि सरकार में बहाने बनाने के विशेषज्ञ हैं। कभी उनका पेट पिराता है, कभी मुंडी। कभी-कभार तो उन्हें यह संशय है कि फाइल से संबद्ध एक और फाइल है, जो न जाने कहाँ गायब है? वह पूरे एक सप्ताह से कैंटीन के रिकॉर्ड रूम में उसकी खोज में लगे हैं, पर वह गुम की गुम है। यानी वह औपचिरक बहानेबाजी में रिकॉर्ड रूम गए हैं, और असलियत में कैंटीन में। उन्हें संदेह है कि कहीं उस फाइल के पैर तो नहीं लग गए हैं और वह इंडिया गेट घूमने जाकर उसके पश्चात् किसी कर्मचारी के साथ, उसकी चार्टर्ड बस पकड़कर, सरोजनी या नेताजी नगर तो नहीं सिधार गई है? यह विशिष्ट बहानेबाजी है। इसमें सब संभव है। ऐसे हमें प्रतीत होता है कि लेट-लतीफी और बहानेबाजी के अध्याय सरकारी मशीन को मानवीय बनाते हैं, वरना मशीन तो केवल मशीन है। न उसमें इनसान की गुजर है, न इनसानियत की।

दुनिया की मान्यता है कि भारत एक ऐसा विकासशील देश है, जो विकसित होने की दिशा में अग्रसर है। जाहिर है कि यदि ऐसा है तो जीवन के हर क्षेत्र में तकनीक की तादाद और बढ़ेगी। अभी तो हम केवल स्मार्ट सिटी की चर्चा सुनते हैं, इससे क्या होगा, यह एक ऐसा रहस्य है, जो शायद ही किसी को ज्ञात हो? सरकार हो या उसके कर्मचारी-अधिकारी, सब बहुत ही ज्ञानी अंदाज में ‘स्मार्ट सिटी’ का नाम सुनकर सिर हिलाते हैं। कोई उनसे कैसे पूछें कि इसके मानक क्या-क्या हैं? फिलहाल तो लगता है कि एल.ई.डी. की लाइट लगाना शहर में रोशनी के लिए या चौराहों की सजावट करना ही स्मार्ट सिटी के अनिवार्य अंग हैं। हमें यह भी शक होता है कि शहर की सफाई स्मार्ट सिटी का अंग है कि नहीं? हर महत्त्वपूर्ण चौराहे पर कूड़े का ढेर है। धीरे-धीरे उसने टेकरी की हैसियत हासिल कर ली है। कहीं नगर निगम का यह इरादा तो नहीं है कि धीरे-धीरे कूड़े का पहाड़ बनाया जाए? क्या पता, उनकी महत्त्वाकांक्षा कचरे का एवरेस्ट सृजित करने की हो? कौन कहे, राम मंदिर के समान अलौकिक पर्यटक आकर्षण के साथ वह कूड़े के गँधाते हिमालय का बदबूदार नमूना भी पेश करना चाहते हों? कहीं उन्हें यह भय तो नहीं सता रहा कि शहर की सफाई सफाईकर्मियों के वश की नहीं है? इसके लिए लंदन, न्यूयाॅर्क से सफाई की मशीनों की दरकार है? ऐसी मशीनों का आयात ही सफाई का इकलौता निदान है। हमारे शहर सुविधाओं में भले नहीं, पर आबादी में कौन लंदन, न्यूयाॅर्क से कम हैं? जाहिर है कि इस आयात से सफाईकर्मियों की संख्या का भी सफाया होगा। तब भी कचरे के पहाड़ समतल नहीं हुए तो इस विषय में सोचा जाएगा। अभी तो मशीनों के आयात का इंतजार है। तकनीक की तरक्की से कर्मचारियों की तादाद घटना-ही-घटना। इनके भविष्य का सोचना नगर-निगम का दायित्व नहीं है। सरकार का कोई ज्ञानी तक यह भी नहीं जानता है कि यह किस का दायित्व है?

हर प्रधानमंत्री इतिहास में स्थान पाने को कोई पहल करता है। जवाहरलालजी ने सार्वजनिक निगम बनाए, बड़े उद्योगों का सूत्रपात किया। इंदिराजी ने ‘गरीबी हटाओ’ की प्रेरक घोषणा की। यदि गरीबी कांग्रेस की कोई लीडर होती तो उनके आह्व‍ान पर शर्तिया अमल करती। दुर्भाग्य से इसका ताल्लुक अर्थशास्त्र से है। वह बेरोजगारी और नियत दर से कम मजदूरी जैसे शोषण पर निर्भर है। अर्थशास्त्र सियासत की कम ही सुनता है। लिहाजा गरीबी हटी नहीं, उल्टे मुल्क की बड़ी आबादी की नियति बन गई है। कुछ का कहना है कि व्यापक निर्धनता की नियति सरकार में फलते-फूलते भ्रष्टाचार का नतीजा है। ऐसा मानना न मानना व्यक्ति की दलीय निष्ठा पर आधारित है। जब देश में सामंतवादी दृष्टिकोण हो, तब प्रजातंत्र में परिवारवाद का प्रचलन स्वाभाविक है। जनता को एक परिवार के राजा, युवराज, रानी वगैरह की आदत है, तो वह सामान्य को भी शाही परिवार बनाने से नहीं चूकती है। कोरोना के समान यह पारिवारिक प्रदूषण माहौल में तैरता है। आज देश के प्रजातंत्र में ऐसे ही परिवार छाए हुए हैं। कुछ उभर चुके हैं, कुछ उभरने की प्रक्रिया में हैं।

बहरहाल इंदिराजी के सियासी वारिस संजय गांधी एक हवाई दुघर्टना के श‌िकार होने के बाद प्रजातांत्रिक सिंहासन पर कोई-न-कोई गांधी को ही विराजना था। यही इकलौता कारण था कि श्रीमती गांधी के बड़े पायलेट पुत्र राजीव गांधी को इस पद के लिए चुना गया। सामंती मानसिकता का यह एक उत्कृष्ट उदाहरण है कि संसदीय चुनाव में कांग्रेस को अभूतपूर्व सफलता मिली राजीव गांधी के नेतृत्व में। देश की सत्ता के कंपूकरण में उनके योगदान से कोई इनकार नहीं कर सकता है।

तकनीक की तरक्की उनके समय से ही प्रारंभ हुई है और देखते-देखते बचपन से जवान हो चुकी है। उनके वंशज जो सरकारी नौकरी के घटने की व्यथा-कथा सुनाते हैं, वह स्वयं अपने खानदान के निकट इतिहास से अपरिचित हैं। यों उनके अपरिचय के इतने दायरे हैं कि उनकी बात करना उतना ही व्यर्थ है जितना किसी व्यक्ति का समुंदर को चुल्लू में खाली करने का प्रयास। अगस्त्य मुनि होना सबके बस में नहीं है। ऐसे कहने को वह एक महान् नेता हैं, जिनकी चुनाव हारने में महारत है। वर्तमान शासन की चुनौती है कि वह देश को विकसित करे। केवल विकासशील से संतुष्ट न होकर वह मुल्क को विकसित देशों की अग्रणी पाँत में लाए। इन हालात में तकनीक का बढ़ता प्रयोग लाज‌िमी होता जा रहा है, साथ ही सरकारी रोजगार की घटती संख्या भी। निजी रोजगार का यह आलम है कि वर्तमान में निर्माण क्षेत्र में भी कुशल व प्रशिक्षित कर्मियों की ही गुजर है।

खेती-किसानी की प्रधानता से भारत एक ऐसा जनतंत्र है, जिसे ‘हलतंत्र’ भी निरूपित किया जा सकता है। ट्रैक्टर, पानी के पंप आदि से वहाँ भी नए प्रयोग का जोर है। गाँवों से शहर का पलायन एक अनिवार्य विवशता है। खेती-किसानी से सबकी गुजर नहीं है। कुछ के पास जमीन है, कुछ की फसल सबका पेट पालने में समर्थ है। शहर उनका स्वागत अपने अंदाज में करते हैं, उनके शोषण में व्यस्त होकर। ऐसों में कुछ मेहनत-मजदूरी करते-करते चल बसते हैं, कुछ रिक्शा चलाते-चलाते। फिर भी पेट पालना एक स्वाभाविक विवशता है। वरना कहाँ गाँव की खुली हवा, कहाँ शहर का जहरीला वातावरण!

देश के चिंतक-वर्ग को आज के हालात हलतंत्र को प्रजातंत्र में बदलना है। कैसे तकनीकी प्रगति भी हो और आम आदमी को रोजगार भी मिले, वह भी ऐसा कि उससे उसका ही नहीं, परिवार का पेट भी पले। यदि कहीं बेरोजगारी में वृद्धि हुई तो सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न कानून व्यवस्था पर ही लगता है। कल के शांति के पुजारी आज के शातिर चंकू-किंग के हिंसक अवतार में नजर आते हैं, जिनसे मोहल्ला ही नहीं, पूरा शहर भी थर-थर काँपे।

इसे भारत का ही कमाल कहेंगे कि यहाँ अतीत के सामंतवाद की सौगात, परिवारवाद और आधुनिकतम तकनीक साथ-साथ पल ही नहीं रहीं, प्रगति भी कर रही हैं।

गोपाल चतुर्वेदी
९/५, राणा प्रताप मार्ग, लखनऊ-२२६००१
दूरभाष : ९४१५३४८४३८

 

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