गजलें

गजलें

:  एक :

सागर-नदियाँ

करते बतियाँ

नीली-पीली

उड़ती परियाँ

जीवन बगिया

आशा कलियाँ

गीत सुनातीं

नन्ही चिड़ियाँ

सारी दुनिया

देखें अ‌ँखियाँ

बुनतीं सपने

सूनी रतियाँ

गलियाँ छूटीं

बिछुड़ी सखियाँ।

 

:  दो :

घर में होकर जैसे बेघर लगते हैं,

दिल पर जब शब्दों के खंजर लगते हैं।

चलने की आजादी जिन पर होती है,

रस्ते ऐसे मुझको बेहतर लगते हैं।

सीखा मैंने जीवन जीना जिनसे भी,

सचमुच मुझको वे सब रहबर लगते हैं।

डूबी रहती जिन आँखों में हरपल ही,

वो उल्फत के मुझको सरवर लगते हैं।

छोड़ मीरा ने महलों के सुख-वैभव,

प्यारे उसको केवल गिरधर लगते हैं।

आँखों से गिरते हैं जो हँसते-हँसते,

आँसू वे तो मुझको निर्झर लगते हैं।

वो कहता है ‘प्रीति’ तुम्हीं से है लेकिन,

बदले-बदले उसके तेवर लगते हैं।

 

:  तीन :

ताजगी से भरी पाँखुरी के लिए,

फूल हमने चुने आरती के लिए।

चाँद को जब कभी बादलों ने ढका,

वो भटकता रहा चाँदनी के लिए।

खाक फसलें हुईं बिजलियाँ जब गिरीं,

पेट भर अन्न दो तुम सभी के लिए।

आ गया अब जमाना यहाँ कौन सा,

साँस भी बिक रही जिंदगी के लिए।

साथ दे जो कड़ी धूप में भी सदा,

प्रीति है बस समर्पित उसी के लिए।

 

:  चार :

बात इस दिल की बताने हम भला जाते कहाँ,

आप जैसा जिंदगी में हमसफर पाते कहाँ?

दिल सुनें दिन-रात केवल जब सदाएँ प्यार की,

रंग फीकी महफिलों के तब हमें भाते कहाँ?

अंजुमन उजड़ा हुआ था शाख भी गमगीन थी,

गीत उस माहौल में हम प्रीत के गाते कहाँ?

वक्त कुछ देना मुनासिब भी नहीं समझा मुझे,

फिर भला नजदीक दिल के वो कभी आते कहाँ?

बस यही तो सोच पल-पल मुसकराते हम रहे,

भीड़ में ये जख्म अपने प्रीति दिखलाते कहाँ?

 

:  पाँच :

गुनगुनाया है गजल को जब कभी अवसर मिला,

इक पुरानी झील को बहता हुआ सरवर मिला।

उम्र के इस ताल में जैसे कमल-सा खिल गया,

साथ चलने को उसे जब धूप में रहबर मिला।

गीत गजलों छंद कविता संग कुछ ऐसा लगा,

ये शहर अंजान था मुझको नया सा घर मिला।

जिंदगी का एक ये भी ख्वाब अब पूरा हुआ,

अश्क अपने पोंछने को ‘प्रीति’ को दिलबर मिला।

प्रीति चौधरीप्रीत
११ फ्रेंडस कॉलोनी
गजरौला, अमरोहा-२४४२३५
दूरभाष : ९६३४३९५५९९

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