बाल-कविताएँ

बाल-कविताएँ

जे.पी. रावत: सुपरिचित रचनाकार। हास्य, सामाजिक, आध्यात्मिक, पर्यावरण, व्यंग्य, कविता, गद्य लेख, कहानी और नाटक विधा में लेखन! ‘काव्य सागर’ पुस्तक प्रकाशित। अनेक काव्य गोष्ठी और कुछ कवि सम्मेलनों में सहभागिता। संप्रति परिधान और आई.टी. निर्यात के व्यवसायी!

 

प्रेम

जब लिखूँ में गीत कोई,

प्रेम पूरित भाव लेकर!

हो रहे अहसास मन में,

प्रेम मधुरिम साधना है!

रंग भी हैं द्वंद्व भी हैं,

प्रेम पूरित छंद भी हैं!

हो कठिन जितनी डगर,

प्रेम तो आराधना है!

अब कभी नीरस न हों,

प्रेम पूरित शब्द मेरे!

है यही शाश्वत जगत् में,

लिप्त इसमें भावना है!

जब पुलक अहसास होगा,

तो सतत विश्वास होगा!

इस जगत् से उस जगत् तक,

गूँजती सी कल्पना है!

लहर सागर की निनादित,

झील में है मौन पल्वित!

दिव्यता का भान लेकर,

कह रहा क्यों अनमना है!

एक मधुरिम रागिनी सी,

हो रही झंकृत हृदय में!

दूर चाहे हो कहीं भी,

चित्र ज्यों मन में बना है!

कुछ नहीं इसमें ठिकाना,

दर्द की गहराइयों का!

महक बन दिल में समाया,

प्रेम हर दिन दो गुना है!

ले समाधी लीन रहना,

इस जगत् से कुछ न कहना!

प्रेम की माला पिरोना,

अन्यथा सब वर्जना है!

 

गुमसुम गुड़िया

गुड़िया तुम क्यों गुमसुम हो,

क्या बात है बात बता हमको!

जो चाहो सो ला देंगे,

या मम्मी से मँगवा देंगे!

आँसू से पलकें न भिगा,

सबकुछ पापा को समझा!

किसने डाँटा इतना बता,

देंगे उसको आज सजा!

उँगली जो उठी मैं चौंक गया,

था टी.वी. पर एक हाल नया!

अब दिल मैं एक तूफान उठा,

मैं समझ गया क्यों छाई घटा!

कुछ जलती आग के घेरे थे,

कुछ जलते घर कुछ डेरे थे!

एक मौत का मंजर छाया था,

खुद मेरा मन घबराया था!

हरियाली पर कालिख देखी,

कुछ जिस्मों की हालत देखी!

सब राज धमाके ने खोला,

ऊपर से गिरा एक बम गोला!

कुछ जिस्म के बिखरे टुकड़े थे,

कुछ रक्त सने कुछ मुखड़े थे!

एक बहुत भयावह मंजर था,

ये इंसानों का खंजर था!

मैं समझ गया चैनल बदला,

देखा एक मंजर फिर अगला!

मारो-मारो कह भीड़ भगी,

मैं चुप था गुड़िया भी थी ठगी!

कहीं पत्थर आग के गोले थे,

काले धुएँ के शोले थे!

उन्मादी भीड़ तो गायब थी,

बस खत्म हुए जो भोले थे!

मैं देख सका न दिखा पाया,

फिर आगे दृश्य नजर आया!

फिर रोते-बिलखते लोग दिखे,

पर थे सबके अरमान लुटे!

कुछ कह न सका चुप रह न सका,

गुड़िया को उठा झट छत पे गया!

थी मेरी नजर सितारों पर,

गुड़िया की नजर इशारों पर!

कहा तुमको चाँद दिला देंगे,

हम दुनिया नई बसा देंगे!

टी.वी. दिखलाना बंद किया!

घर में उग आया चाँद नया!

सीने से लगाया चुनमुन को,

गुड़िया तुम क्यों गुमसुम हो?

 

बंद गली

हँसती-गाती इस बस्ती में,

चंद खुली खिड़की दिखती हैं!

दूर नजर फैलाता हूँ तो,

दिखती है बस बंद गली!

हरे-भरे थे बाग जहाँ पर,

अब ऊँची मीनार खड़ी हैं!

सिर्फ मुँड़ेरों पर दिखती हैं,

कहीं-कहीं कुछ फूल कली!

कुछ हरे पेड़ तो देख रहा हूँ,

सर धरती पर टेक रहा हूँ!

जड़ के नीचे धरा कहाँ है?

पक्का गमला सिर्फ वहाँ है!

जम पाएँगी जड़ें कहाँ तक,

फैलेंगी ये शाख कहाँ तक!

इनका वो विस्तार कहाँ है,

चिड़ियों का संसार कहाँ है!

क्यों फूलों में महक नहीं है,

क्यों चिड़ियों की चहक नहीं है!

केवल शोर-शराबा भर है,

समझ न आता अजब शहर है!

भरा हुआ है शहर ये सारा,

मगर आदमी हारा हारा!

कहीं-कहीं इतनी खामोशी,

ज्यों मरघट के अंदर होती!

माना परिवर्तन तो होना है,

मगर खुशी को क्यों खोना है!

क्या वक्त के आगे नहीं चली,

मुझे न लगती बात भली!

कोई बात समझ तब आती,

नियति संतुलन स्वयं सिखाती!

सच्ची लगन असर जब लाती,

रस्सी खुद रस्ता बन जाती!

क्यों बोझिल बस्तों के नीचे,

दबती है मासूम कली!

दूर नजर फैलाता हूँ तो,

दिखती है बस बंद गली!

जे.पी. रावत
ए-९१, प्रथम तल, सेक्टर-३३
नोएडा-२०१३०१
गौतमबुद्ध नगर (उ.प्र.)

हमारे संकलन