अपने जीवन के अमृतकाल का आनंद लें

अपने जीवन के अमृतकाल का आनंद लें

सुरेश जैन : कलेक्टर एवं जिला दंडाधिकारी, होशंगाबाद, विदिशा एवं बैतूल, संचालक, लोक शिक्षा, मध्य प्रदेश, महाप्रबंधक, मध्य प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम, अपर आयुक्त, मध्यप्रदेश, अनुसूचित जाति एवं जनजाति कल्याण। भारत में पर्यावरण विधि (अंग्रेजी), मध्यप्रदेश नगर विकास विधि संहिता (हिंदी) मध्यप्रदेश शिक्षा विधि संहिता (हिंदी), अल्पसंख्यक समुदाय विधि संहिता (हिंदी) एवं बड़े भाई की पाती (हिंदी) पुस्तकों का लेखन एवं शताधिक शोध-पत्रों एवं ३०० से अधिक लेखों का प्रकाशन। विभिन्न संस्थाओं का संस्थापन, संचालन एवं संरक्षण।

म अपने ऐसे वरिष्ठ नागरिकों का सम्मान करें, जो क्रियाशील रहते हैं, अपने समय, अनुभव, ज्ञान और कौशल का सदैव सदुपयोग करते हैं। स्वस्थ तथा प्रसन्न रहते हैं। सांध्यप्रकाश में पावन गोधूलि को प्रणाम करते हुए अपने अमृतकाल का आनंद लेते हैं। अस्सी के दशक में यात्रा करते हुए हम अपने जीवन के अमृतकाल के तृतीय वर्ष में अपनी आत्मा के अंतिम लक्ष्य की ओर अग्रसर हैं।

७५ वर्ष पूर्ण होते ही हमारे जीवन का अमृतकाल (७५-१००) शुरू होता है। इस काल का आध्यात्मिक महत्त्व है। यह अपनी आत्मा के सन्निकट रहकर आत्मा की उपासना का काल है। पर्व है, महापर्व है। अद्भुत समय और विशिष्ट अवसर है। जन-जन के समक्ष विविध आदर्श समुपस्थित करने का अच्छा अवसर है। अलौकिक आध्यात्मिक आनंद प्राप्त करने का काल है। क्रोध, मान, माया और लोभादिक कषायों के प्रशमन का काल है। क्षमा और समतापूर्वक जीवन जीने का काल है। अपने मन में उलझी हुई राग और द्वेष की ग्रंथियों को सुलझाने का समय है। सबकी भूलों का क्षमा कर अपने जीवन को पवित्र बनाने का समय है। ‘गीता’ में दिए गए श्रीकृष्ण के उपदेश को आत्मसात् कर प्राण‌िमात्र को अपने तुल्य समझने का अवसर है। सभी प्राणियों के साथ हमारी मित्रता है, किसी के साथ वैर नहीं है—महावीर के इस सिद्धांत को आत्मसात् करने का पर्व है। हिंसक प्रवृत्तियों को त्यागकर अहिंसक जीवन-शैली अपनाने का काल है। विविध अहिंसक प्रयोग करने का अवसर है। पीछे मुड़कर स्वयं को देखने का स्वर्णिम अवसर है। अहंकार और ममकार के विसर्जन का काल है। आत्म-शोधन और आत्मोत्थान का पर्व है। आत्म-चेतना को जाग्रत् करने का महापर्व है।

हम अपना उद्देश्यपूर्ण जीवन प्रसन्नतापूर्वक जिएँ। धीरे-धीरे भौतिक जगत् से ऊपर उठते हुए आध्यात्मिक जीवन जिएँ। हम अपने शरीर को सही ढंग से संचालित करते रहें। घड़ी को टिक-टिक करने दें। बढ़ती आयु की चिंता न करें। अपनी धारणा के अनुरूप ही अपनी आयु का मूल्यांकन करें। उम्र के सूचक समंक के प्रतीक संख्यावाची वर्ष की ओर ध्यान न दें।

अपनी जीवटता के कौशल को सीखें और निरंतर अभ्यास से निखारें। अपनी कमजोरियों को दूर करें। अकेलापन महसूस होने पर अपने मित्रों से चर्चा करें। सामाजिक मेल-मिलाप बढ़ाएँ। स्वयं से मित्र की भाँति बात कर अकेलेपन को दूर करें। अपनी इंद्रियों पर अपना ध्यान केंद्रित करें। विषम परिस्थितियों का डटकर मुकाबला करें।

यह उल्लेखनीय है कि अपनी आयु के सत्तर के दशक में इस्कॉन मूवमेंट के जनक श्रील प्रभुपाद ने भगवत-गीता की विशद व्याख्या की। अत: जीवन पथ में आगे बढ़ते हुए उम्र के किसी भी पड़ाव पर हम नया कार्य चालू करने में तनिक भी संकोच न करें। ऐसे कार्य में हमें सफलता निश्चित ही प्राप्त होगी। अपने उत्तराधिकारियेां को अपनी संपत्ति का हस्तांतरण करते समय यह ध्यान रखें कि वारेन बफे ने अपनी १०० बिलियन डालर से अधिक संपत्ति में से ९९ प्रतिशत दान कर दी और केवल १ प्रतिशत अपने बच्चों को दी। बफे ने बताया कि उन्होंने अपने बच्चों को इतनी संपत्ति प्रदान की है, जिससे कि वे कुछ भी कर सकते हैं  किंतु इतना अधिक नहीं दिया कि वे कुछ न कर सकें। हममें से अनेक वरिष्ठ नागरिक सौभाग्यशाली है कि हमारे पुत्र और पुत्रियाँ अपने माता-पिता की दौलत प्राप्त करने की अपेक्षा ही नहीं रखती है।

हम अपने परिवार के सदस्यों में संस्कारों का बीजारोपण और संवेदनाओं का संपोषण करें। उन्हें अपनेपन, त्याग और सहजीवन की सीख दें। परिवार में रहकर ही सुघड़ व्यक्तित्व का निर्माण होता है। सर्वाधिक भावनात्मक संतुष्टि हमें अपने परिवार से ही मिलती है। अनेक परिवार मिल-जुलकर समाज का निर्माण करते हैं। प्रत्येक समाज की स्थिरता और प्रगतिशीलता सभी परिवारों की एकता पर टिकी रहती है। अत: हम स्वच्छंदतावादी सोच से ऊपर उठकर पारिवारिक टूटन से बचें और सभी को बचाएँ। अपने परिवार और समाज को संगठित करें। पारिवारिक मूल्यों के संस्थापन, पुनर्संस्थापन और संधारण के लिए ठोस प्रयास करें। परिवार के लोगों को अपने घर के आसपास बसाने का प्रयास करें। इससे सभी के बीच एकजुटता बढ़ती है। समय पर सभी तुरंत ही एक दूसरे के काम आते हैं।

वृद्धजन प्रतिदिन हल्की सी कसरत करें। हल्का-फुल्का व्यायाम करें, इससे हमारा दिमाग स्वस्थ और दुरुस्त रहता है। भूलने की बीमारी कम हो जाती है। मस्तिष्क की सिकुड़न रुक जाती है और मस्तिष्क में खून के प्रवाह में वृद्धि हो जाती है। नियमित भ्रमण के साथ-साथ प्राय: एक पैर ९० डिग्री मोड़कर दूसरे पैर के सहारे खड़े होने का अभ्यास करें। हर बार और सायंकालीन भोजन के बाद नियमित रूप से १० मिनिट टहलें। इससे ब्लड शुगर लेवल कम हो जाता है। अधिक मानसिक श्रम से बचें। इससे हमारे सोचने की प्रक्रिया धीमी हो जाती है। थकान इस बात का संकेत है कि हम जो काम कर रहे हैं, अब उसे बंद कर दें। संतोषजनक और आरामदेह काम की ओर बढ़ें। अपने आँगन में पोषण वाटिका बनाएँ। उसमें प्राकृतिक तरीके से सब्जी उगाएँ।

आजकल धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में और कुछ पर्यटन स्थलों पर पैदल यात्रियों की भीड़ की दिन-प्रति-दिन बढ़ती जा रही है। यह बड़ी आपदा बनती जा रही है। परिणामत: भीड़ से उत्पन्न भगदड़ जैसी अप्रिय स्थितियों के कारण जन-धन की हानि बढ़ती जा रही है। अत: अब ऐसी स्थिति से बचना आवश्यक होता जा रहा है। ऐसी भीड़ से होनेवाली जोखिम के प्रबंधन की जरूरत बढ़ती जा रही है। ऐसी आपदाओं में समूहों के अमर्यादित और अनुशासनहीन व्यवहार से बड़ी गंभीर परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। अत: वृद्धजन ऐसी परिस्थितियों से बचने का प्रयास करें। इस संदर्भ में यह उल्लेखनीय है कि प्रत्येक वर्ष में दिल्ली एयर पोर्ट पर ७ करोड़, बंबई में ५ करोड़ और बंगलुरु पर ३ करोड़ ओर हैदराबाद एयर पोर्ट पर २ करोड़ यात्री आते-जाते हैं। वरिष्ठ नागरिक यात्रा करने का निर्णय लेते समय इन तथ्यों को सदैव ध्यान में रखें।

कोविड के बाद बढ़ती महँगाई बुजुर्गों को प्रभावित कर रही है। बढ़ती महँगाई से बचत कम होती जा रही है और जीना मुश्किल हो रहा है। उनकी दूसरों पर निर्भरता बढ़ गई है। उनकी हर दिन की लाइफ स्टाइल बदल रही है। वे एल्डर-एव्यूज के शिकार हो रहे हैं और उनके अधिकारों का हनन हो रहा है। बजुर्गों की देखभाल करनेवालों ने उनसे दूरी बना ली है। अत: अनेक वृद्ध व्यक्ति अब निराशा और उदासी में जीने लगे हैं। बेचैनी और हाइपर टेंशन के शिकार हो रहे हैं।

वृद्धजन अपने आपको गंभीरता से लें। अपने बारे में सोचने का समय निकालें। नई भाषा सीखने का प्रयास करें। किसी नए शौक को आगे बढ़ाएँ। अपनी उम्र के सबसे आजाद दौर का पूरा आनंद लें। अपने मन की बात सुनें। कुछ-न-कुछ नया सीखते रहें। स्वस्थ आदतें अपनाएँ। अपने ऊपर भरोसा रखें। कुछ-न-कुछ नया कर दुनिया को दिखाएँ। आत्मनिर्भरता के पथ पर साहसपूर्वक आगे बढ़ते चलें। हमारे जीवन में जटिलताएँ बढ़ने से अनेक चुनौतियाँ उपस्थित हो रही हैं। अत: वृद्धजन उलझनों से निकलने के रास्ते स्वयं बनाएँ। अपने असंतोष को परखें। असंतुष्टि के विविध पहलुओं की पहचानकर उनमें बदलाव लाएँ। बदलाव लाने में हिचकें नहीं। बच्चों के बाहर और परिवार से दूर जाने से हुए अलगाव के कारण, अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए वृद्धजनों को अनेक संघर्ष झेलने पड़ते हैं। परिणामत: चिंता, उत्तेजना और निराशा जन्म लेने लगती है। ऐसी निराशा से बचें और खुश रहें। खुश रहने से वृद्धजनों का हृदय स्वस्थ रहता है। प्रतिरोधक क्षमता और इम्युनिटी बढ़ जाती है। खुश रहने से बीमारियाँ कम हो जाती हैं।

भविष्य में अच्छी घटनाएँ होंगी, ऐसी आशा और विश्वास बनाए रखें। छोटी-छोटी बातों में उत्सुकता बनाए रखें। उनमें खुशी प्राप्त करें। इससे हमारा तनाव कम होता है। हमारा मूड़ बेहतर होता है। छोटी-छोटी खुशियों के विचार आते ही हम बेहतर महसूस करने लगते हैं। भविष्य में होनेवाली घटनाओं की अच्छी तसवीर बनाएँ और खुद को बार-बार दिखाएँ।

खुशहाल बने रहने के लिए महीने में कम-से-कम एक बार आउटडोर एक्ट‌िविटी करें। परिवार के सदस्यों के साथ प्राकृतिक स्थलों के भ्रमण पर जरूर जाएँ। पिकनिक पर जाएँ। पिकनिक पर जाने के पहले खुशियों की कल्पना करें। पिकनिक की अच्छी स्मृतियों को अपने मस्तिष्क में रखें। अपने परिवार और मित्रों के साथ समय बिताएँ। छोटी-छोटी चीजों का आनंद लें। पारस्परिक विश्वास को मजबूत करें। यह विश्वास रखें कि दुःख में कोई दूसरा मुझे सहारा देकर अवश्य ही उबार लेगा।

सुरेश जैन
३०, निशात कॉलोनी,
भोपाल-४६२००३ (म.प्र.)
दूरभाष : ९४२५०१०१११

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