विडंबना

विडंबना

उषाकिरण खान: सुपरिचित लेखिका। हिंदी में चार उपन्यास, पाँच कथा-संग्रह, सौ से अधिक लेख एवं रिपोर्ताज (असंकलित), तीन पूर्णकालिक नाटक मंचित, दो बाल नाटक, कई नुक्कड़ नाटक मंचित, बाल उपन्यास एवं कथाएँ प्रकाशित। राष्ट्र-भाषा परिषद्, बिहार का ‘हिंदी-सेवी सम्मान’, ‘महादेवी वर्मा पुरस्कार’ तथा ‘राष्ट्रकवि दिनकर पुरस्कार’ से सम्मानित। संप्रति स्वतंत्र लेखन।

१०० नं. मकान का अहाता लगभग एक एकड़ का है। उसके ठीक बीचोबीच विशाल मकान अवस्थित है। पहले उसके सामने बड़ा सा लॉन था, लॉन में क्यारियाँ थीं, क्यारियों में रंग-बिरंगे फूल थे। धरती से सटे पैंजी के फूल भाँति-भाँति के, डालिया के पौधे, हॉलिहॉक्स के सतर फूलों से भरे गाछ गमलों में गुलदाऊदी तथा लक्ष्मण बूटी। पीछे आम अमरूद के पेड़, करौंदे की झाड़, बेर और शहतूत। दरअसल मकान के ऊपरी हिस्से का दो कमरा किराएदार को दे दिया था। किराएदार केरल के दंपती थे। उन्होंने एक स्कूल निकट के किसी मकान में खोल रखा था। इस मकान में छात्रावास बना रखा था। छात्रावास में सभी ग्रामीण छात्र-छात्राएँ आते थे। पहले दिन सारे बच्चे झबरे बालोंवाले तेल चुपड़े आते; लड़कियाँ काजल बिंदी और कलाई भर काँच की चूड़ियाँ पहले आतीं। छह माह के बाद बच्चों के अभिभावक झटके से उन्हें पहचान भी न पाते। बाल प्रायः करीने से कटे-छँटे होते, चूड़ियाँ, नेलपॉलिश, काजल बिंदी नदारत होते। प्रतिदिन सुबह और रात ब्रश करने की आदत बन गई होती सो चमचमाते दाँत होते।

अकसर बच्चे मगही, भोजपुर और मैथिली बोलना ही जानते, पर छह माह में वे हिंदी बोलने लगते, अंग्रेजी के कुछ शब्दों से भी उनका परिचय हो चुका होता। छह माह से लेकर सालभर बच्चे छात्रावास में ही पढ़ते सीखते, बाद में उनके स्कूल जाने लगते। अभिभावकों को बच्चों के विकास देखकर आश्यर्चमििश्रत संतोष होता। कुछ बच्चे जो ग्रामीण निर्धन होते उन्हें स्कूल के संचालक ने मात्र शिक्षा देने लाया होता, उनसे इन्हें किसी प्रकार की फीस नहीं मिलती, परंतु जब वे बच्चे गाँव जाते, तब उसके बदले हुए रूप और संस्कार देख संपन्न लोगों को धक्का लगता। कुछ परिवार अपने बच्चों को उस स्कूल में दाखिल करने को उत्सुक हुए। पर उन्हें यों ही नहीं रखा गया, बल्कि उनसे मोटी फीस ली गई।

विनीता और संगीता वैसी ही किसी मोटी फीसवाले असामी की बच्चियाँ थीं। दस और बारह साल की इन बच्चियों को अक्षर-ज्ञान तो था ही अन्य तरीकों से अनभिज्ञ भी नहीं थीं। ये राज्य के एक मंत्रीजी की बेटियाँ थीं। मंत्रीजी दो बार विधायक रह चुके थे। गाँव में पक्का घर और पक्के शौचालय बन गए थे। दो बेटों को उन्होंने साथ रखकर स्कूल भेजना शुरू कर दिया था, पर बेटियों को गाँव के स्कूल में ही पढ़ाया। गाँव में अव्वल तो किसी स्कूल में बच्चे रुटीन के अनुसार पढ़ नहीं पाते; फिर अगर पढ़ भी लेते तो घर में कोई बतानेवाला न होता। मास्टरजी पहाड़ा रटने को छोड़ कुरसी पर खर्राटे लेने लगते। बच्चों को पढ़ने की रुचि नहीं जागती। इधर एम.ए. पास मंत्रीजी अपने कुछ मित्रों के परिवार की लड़कियों को देख मन-ही-मन अपने बेटियों के लिए भी यह कल्पना करने लगे। तभी उन्हें इस आवासीय शिक्षण केंद्र का पता चला। लड़कियाँ हिंदी बोलना नहीं जानती थीं, न ही वे ठीक से केरल कन्या की हिंदी समझ पातीं, ऐसे में उसने मुझे बुलवा भेजा आदर सहित। मैं लगभग एक सप्ताह तक उनके बीच सहर्ष दुभाषिया बनी रही। लगभग दो वर्ष वे लड़कियाँ वहाँ रहीं। उनमें आमूलचूल परिवर्तन आ गया था। जब वे लाल हरे चटक फूलोंवाली कुरती-सलवार में नहीं, बल्कि नीले स्कर्ट में रहतीं। तेल से चिपकी चोटियाँ नहीं बल्कि शैंपू से धुले लहराते घनेरे केश थे। वे हाय और बाय करना सीख गई थीं। इन दो वर्षों में मैं भी वहाँ से चली आई थी।

वर्षों बीत गए। सरकारें जनसंत्र में बदलती रहती हैं। जिनको जनादेश प्राप्त होता है, वे ही सत्ता पर काबिज होते हैं। कई बार के विधायक दो बार मंत्री बने संगीता-विनीता के पिता ने अकूत संपत्ति अर्जित कर ली, पर जनता ने और मौका न दिया। तब तक संगीता विनीता स्कूल पास कर चुकी थी। दोनों बहनें अंग्रेजी जीभ ऐंठकर बोलना सीख गए थे, जिसे देख मन मंत्रीजी आनंदित होते। दोनों बहनों का ब्याह धनाढ्य लड़कों से हो गया। शहरी धनाढ‍्य व्यापारी। मंत्रीजी के चोर धन को छुपाने के सौ जतन करनेवाले। मैं संगीता के विवाह में गई थी, विनीता के विवाह के समय नहीं थी।

चूँकि हमारा तथा मंत्रीजी का कार्यक्षेत्र अलग था सो मिलना-जुलना संभव ही नहीं था। जीवन में कई प्रकार के लोगों से भेंट मुलाकात होती है, सब अपने अपने रास्ते चले जाते हैं। रह जाती है यादें। कोई प्रसंग उठ जाता है। तब पुनः देखने की कसक उठती है। मंत्रीजी वगैरह पर तरह तरह के केस-मुकदमे चलते रहते हैं और कुछ दिनों की अखबारी सुर्खियाँ बटोर अकसर अपनी मौत मन जाती हैं। उन मंत्रीजी पर भी छींटाकशी हुईं, पर तुरंत ही दब गई बात।

एक दिन एक पड़ोसी युवक मुझसे मिलने आया और एक स्कूल के पुरस्कार वितरण करने को चलने का आग्रह करने लगा। शहर में बड़े-बड़े स्कूल खुल गए थे। राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय डिग्री बाँटनेवाले स्कूल। भव्य बिल्डिंगें, ए.सी. बसें। इस गरीब प्रदेश में जहाँ बच्चे हर कूडे़दान पर कूड़ा बीनते नजर आते, वहाँ ए.सी. बस में लदकर ए.सी. क्लास रूम में बच्चे पढ़ते हैं। जहाँ स्कूल कॉलेजों में शिक्षकों का अकाल है वहाँ सजी-धजी शिक्षिकाएँ और सजीले नवयुवकों की भरमार है। ऐसे ही स्कूल में चलने की पेशकश कर रहा था बाजूवाले घर का नवयुवक। वह नवयुवक जिस स्कूल का ड्रिल मास्टर था, वह भव्य था। चारों ओर हरा-भरा मैदान था, फूलों से लदे वृक्ष, लताएँ, पौधे थे। छोटा सा कमल फूल का चह बच्चा था। मुख्य मार्ग पर लड़कियाँ एक ही रंग की साड़ी पहन खड़ी थी। फूलों भरी लचीली शाख सी लड़कियाँ। हाथों में फूलों की पँखुड़ियाँ लिये मुझ पर वारतीं मुख्य दरवाजे पर टीका, अच्छत और आरती का प्रबंध था। मैं गुलाब की पँखुड़ियों की खुशबू में सराबोर एस्कोर्ट कर निदेशक के कमरे में पहुँचा दी गई। भव्य कमरा था। खूबसूरत सोफा सेट कीमती कालीन पर रखा था। नाश्ते-चाय का इंतजाम भी वैसा ही नायाब।

निदेशक महोदया लंबी गुदगुदी सी खूबसूरत शख्स‌ियत वाली थीं। उनके कटे आधुनिक केश गरदन के दोनों ओर बिखरे थे। स्लीवलेस ब्लाउज और शानदार शिफॉन साड़ी में सजी बेलौस सी थी। अपने सहयोगियों से अंग्रेजी और मुझे हिंदी में बातें करती वे हौले-हौले मुसकरा रही थीं। स्कूल के कार्यक्रम प्रसाद वितरण के बाद उन्होंने मुझसे लंच करने का आग्रह किया। मैं उनकी मेहमान थी, मेजबान का जादू मुझ पर चल गया था।

लंच के समय मुझसे डायरेक्टर ने हौले से मुझसे पूछा, “मैम, आपने मुझे नहीं पहचाना, मैं संगीता हूँ।” मैंने क्षणांश लिया सोचने में फिर पहचान गई।

“मैम, मैंने सोचा बच्चों को शिक्षा देने, सही राह दिखलाने से बड़ा कोई पुण्य कार्य नहीं। सो स्कूल खोल लिया।” उसने विस्तार से स्कूल खोलने की प्रक्रिया, भारी रकम खर्च कर फ्रेंचायजी लेने की प्रक्रिया का वर्णन किया। मैं सुनती रही। मैं सुनती रही कि उसने मुझे याद किया कि कभी मैंने उसकी शिक्षा आसान कर दी थी। उसीकी ए.सी. गाड़ी में लौटती हुई सोच रही थी कि वह एक गँवई लड़की थी, जिसे केरल से आनेवाली सेवाभावी शिक्षिका मनुष्य बना रही थी, नागर बना रही थी, परंतु इसका ध्यान गाँव की ओर नहीं गया। इसने चौगुने फीसवाला भव्य शिक्षा केंद्र खोल लिया है, जो तिजोरी भर सके। इसने बखूबी शिक्षा का व्यापर करना सीख लिया है। यही विडंबना है।

उषाकिरण खान
१, आदर्श कॉलोनी,
कृष्ण नगर, पटना-८००००१ (बिहार)
दूरभाष : ०९३३४३९१००६

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