लोक-स्वर में स्वाधीनता की तड़प की गूँज

लोक-स्वर में स्वाधीनता की तड़प की गूँज

विद्या विंदु सिंह

लोक-साहित्य की आधिकारिक लेखिका। कहानी, उपन्यास लोक-साहित्य, नाटक, निबंध, बाल-साहित्य आदि विषयों पर शताधिक कृतियाँ तथा अनेक संपादित कृतियाँ प्रकाशित। आकाशवाणी एवं दूरदर्शन के विभिन्न केंद्रों से रचनाओं का निरंतर प्रसारण। अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मान एवं पुरस्कार।

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आज पूरा राष्ट्र स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव मना रहा है। यह समय है आत्मालोचन का कि हम यह जाँचें कि कितने संघर्ष और बलिदानों के बाद मिली आजादी की रक्षा हम कितना कर सके और कितना खो दिया, कितना अभी उसके लिए प्रयास करना है?

विदेशी सत्ता से मुक्ति के संग्राम में जिन बलिदानियों ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए, वे अविस्मरणीय और सर्वदा पूजनीय हैं। इसी के साथ साहित्यकारों-पत्रकारों ने इस संघर्ष में जो प्रेरक की भूमिका निभाई, वह भी अविस्मरणीय है।

स्वतत्रंता आंदोलन में कवियों के प्रेरक ओजस्वी गीत एक ओर उत्साह का संचार कर रहे थे तो दूसरी ओर लोककंठ अपनी लोकधुनों में गीतों की स्वर-लहरी प्रसारित करके विदेशी शासन की दमन नीति के विरोध में स्वर गुँजा रहे थे। राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष में लोक स्वर की आहुति ने मातृभूमि के लिए प्राण न्योछावर करने के संकल्प का जो शंखनाद किया, उसे युग-युग तक राष्ट्र याद रखेगा।

अनाम रहकर लोकस्वर को अपने शब्दों की ऊर्जा देनेवाली इन विभूतियों के योगदान के प्रति राष्ट्र कृतज्ञ है। स्वाधीनता के अमृत महोत्सव के अवसर पर इनका स्मरण, नमन और उनके बारे में खोज करके उनके योगदान को रेखांकित करना भी आवश्यक है। ये गीत चाहे स्वराजी गारी के रूप में लोकप्रिय हुए या चरखा आंदोलन के साथ जुड़े या संस्कार गीतों में रचे-बसे, उनके ओज की आँच ने सत्ता को संतप्त किया। इन गीतों ने न केवल भारत, वरन् प्रवासी बहुल देशों में भी जाकर अपनी ज्योति जलाई।

किसी भी राष्ट्रीय चेतना की पहचान उसकी लोक-विरासत की परंपरा और संस्कृतिक चेतना से होती है। इतिहास में प्रायः बहुत कुछ छिपा दिया जाता है। यह छद्म आचरण कभी-कभी सत्ता के भय से या प्रलोभन से किया जाता रहा है, किंतु लोकमन ने सदैव अन्याय का विरोध करते हुए अन्यायी सत्ता को चुनौती दी। इतिहास का कालपात्र इस चुनौती के समक्ष अपना अस्तित्व बचाए रहने का प्रयास करता रहा है।

लोकमन निर्भय रहते हुए अपने अनुभव गाता आया है और अपनी स्मृति में इतिहास को सँजोता रहा है तथा अपनी भावी पीढ़ियों को सौंपता रहा है। ये गीत समय से प्रभाव ग्रहण करते हैं और काल-कवलित होते-होते भी उसके बीज मन की धरती में सँजो देते हैं। मैंने अपने शोध के दौरान ऐसे अनेक लुप्तप्राय गीतों की कुछ कड़ियाँ सँजोकर लोकधुनों में गीतों को पूरा करते हुए रचा और वे गीत लोक को सौंप दिए, इनमें मेरा नाम नहीं है और ये लोक-परंपरा में लोकगीतों के रूप में गाए जा रहे हैं। लोकगायकों ने उसमें अपनी रुचि और ज्ञान के साथ कुछ-न-कुछ जोड़ा-घटाया भी है।

आजादी के रणबाँकुरों और वीरांगनाओं की कीर्ति-गाथा को भी मैंने अपने शब्द और स्वर दिए, जो आज लोकगीतों के रूप में उदाहरणार्थ शोधार्थी और लेखक प्रस्तुत कर रहे हैं। मुझे इस बात का संतोष है कि मैंने लोक की थाती को आँचल पसारकर लिया और उसमें अपने अनुभव तथा श्रद्धा के शब्द जड़कर लोक को वापस अर्पित कर दिया।    

 एक ओर लोकभाषाओं में आजादी की तड़प के स्वर गूँज रहे थे तो दूसरी ओर स्वतंत्र भारत के हिंदी साहित्य में ग्राम्य चेतना का समेकित विकास झलक रहा था। भारत को ग्रामों का देश कहा गया है। कविवर सुमित्रानंदन पंत ने लिखा है—

भारत माता ग्राम वासिनी।

खेतों में फैला है श्यामल

धूल भरा मैला सा आँचल।

ग्रामवासिनी भारत माँ का प्राकृतिक परिवेश, उसकी सहजता, सादगी और मुक्त जीवन-शैली साहित्यकारों को सदैव प्रभावित करती रही है। परतंत्र भारत में देश और विशेषकर ग्रामीण समाज के उत्कर्ष के जो स्वप्न साहित्यकारों ने देखे थे, वे आजादी के बाद टूट गए। इस स्वप्नभंग से साहित्य में आक्रोश, हताशा, सत्ता के प्रति विरोध और असंतोष के प्रभाव उभरकर आने लगे। ग्राम और नगर, दोनों की समस्याओं को साहित्य में व्यक्त किया जाने लगा।

स्वातंत्रयोत्तर शब्द गढ़ा गया और खूब प्रचलित हुआ। पर यह शब्द कुछ भ्रामक लगता है। इससे यह अर्थ ध्वनित होता है कि स्वतंत्रता मिली और बीत गई। हाँ, एक प्रकार से इसमें ध्वनित अर्थ व्यंग्य के रूप में स्वीकार किया जा सकता है कि हम स्वतंत्र तो हुए, पर दूसरी तरह की परतंत्रता में घिर गए। यह परतंत्रता बाहरी नहीं, हमारी भीतरी है। स्वाधीनता का अर्थ है—अपने अधीन होना, अर्थात् आत्मानुशासन। इसी प्रकार मुक्ति का अर्थ है अपने निजत्व का विस्तार, ‘स्व’ को ‘सर्व’ में समाविष्ट कर देना। इस विवेक को जगाने की जितनी कोशिश करनी थी, वह नहीं हुई।

वर्चस्व की अवधारणा ही दमन के भाव को जन्म देती है, उस दमन को मौन सहमति देना ही गुलामी है। आज भी हम उस गुलामी के शिकार हैं। आजादी के बाद सरकार की परियोजनाओं का विरोध या समर्थन होता रहा है और जनता के इस स्वर को हिंदी के लिखित और वाचिक दोनों प्रकार के साहित्य ने बराबर रेखांकित किया है। इस विरोध और सहमति के कारण जो विघटन हुए, असंगतियाँ आईं, उनको भी साहित्य की आँख से देखा-समझा जा सकता है। आधुनिकीकरण तथा धर्मनिरपेक्षता के नाम पर समाज में बहुत कुछ परिवर्तन लाने की कोशिश हुई। जातीय और क्षेत्रीय तथा सांप्रदायिक अस्मिता के लिए संघर्ष भी हुए और लगातार हो भी रहे हैं। उसी के साथ सांस्कृतिक और सामुदायिक  एकता के प्रयास हेतु कई मंच भी बने, जहाँ से सद्भाव और प्रेम का संदेश प्रसारित करने का प्रयास भी हुआ। इस प्रकार सांस्कृतिक, जातीय और सांप्रदायिक विमर्श भी साहित्य का विषय बने।

परतंत्र भारत में जनजागरण के बढ़े हुए जोश आजादी मिलने पर शांत हो चुके थे, किंतु स्वतंत्र भारत में अपेक्षाएँ न पूरी होने के कारण सत्ता के विरुद्ध जनमे असंतोष ने धीरे-धीरे विरोध का स्वर उठाना शुरू किया। यह स्वर सबसे पहले साहित्य में उभरा।

इक्कीसवीं शताब्दी की परिवर्तन की आकांक्षा और ग्रामीण जीवन में आए राजनीतिक प्रभाव स्वरूप हुए अवमूल्यन, चारित्रिक पतन आदि को साहित्य में रेखांकित किया गया। साहित्य की विशेषता यह है कि अपने वर्तमान के प्रति सजग दृष्टि रखे, विषमताओं के प्रति आक्रोश और विद्रोह का स्वर दे तथा बेहतर समेकित विकास के लिए मार्ग प्रस्तुत करे। इसीलिए आजादी मिलने पर दुष्प्रभावों से उत्पन्न आक्रोश के फलस्वरूप विरोध का स्वर नए तेवर के साथ आया। अपने युग की बैचेनी ने सदैव की तरह अपना आक्रोश व्यक्त किया। संवेदना से लबालब साहित्यकारों और लोकगायकों ने सपनों और वायवी कल्पनाओं के रंगीन परिदृश्य से मुख मोड़कर यथार्थ की तपती भूमि का दर्द कहा।

यह परिवर्तन साहित्य की हर विधा में हुआ। गद्य पद्य दोनों विधाओं में ग्रामीण परिवेश, प्रकृति की गोद में पलनेवाले नैसर्गिंक सौंदर्य आदि के तथ्य विषय नहीं रहे, बल्कि ग्रामीण परिवेश की गरीबी, भुखमरी, प्रतिस्पर्धा के दाँवपेंच, ईर्ष्या-द्वेष के कलुष उभरकर आए। साहित्य की सुदीर्घ परंपरा में ग्राम्य जीवन के सर्वाधिक चित्र हैं। स्वतंत्र भारत में गाँव के आम आदमी का जीवन मुख्य भूमिका में उतर आया। परंपरा और विरासत से प्राप्त संस्कारों के विघटन से उत्पन्न टूटन, विखंडन के चित्र उभरकर आए। संयुक्त परिवार एक छोटी इकाई एकल परिवार के रूप में सिमट गए। वे भी लगातार व्यक्तित्व के टकराव के कारण टूटने लगे। तलाक, दहेज, पारिवारिक हिंसा, असुरक्षा की भावना आज अधिक मुखर होकर साहित्य के विषय बने। संबंधों का आधार अर्थ या संपत्ति हो गया। संबंध जहाँ भी हैं, वहाँ भी साथ रहने का दिखावा भर है। भीतर से सब ईर्ष्या-द्वेष से ग्रस्त हैं। एक-एक आँगन में कई-कई दीवालें खड़ी हो गई हैं। न तो ये दीवालें पारदर्शी रहीं न दिल। बड़े-बड़े आँगन और अहातों में पड़ी चारपाइयों पर लेटकर खुला आकाश देखने का सुख छिन गया। एक साथ बैठे, लेटे बच्चों को अब बुजुर्गों से कहानियाँ, लोरियाँ सुनने का सुख सपना हो गया।

आंचलिक उपन्यासों ने गाँव के दर्द को व्यक्त किया। यथार्थ का अंकन करके मूल्यों के क्षरण की बात करके साहित्य को प्रासंगिक और समसामयिक बनाया। आज किस तरह हिंसा का नंगा नाच हो रहा है, मानवीय संवेदना मुर्दार हो रही है, उसके प्रति चिंता व्यक्त की गई। किसी कवि ने लिखा है—

सूख गई संवेदना, मरी मनों की टीस।

अब कोई रोता नहीं, एक मरे या बीस॥

हिंदी की लोकभाषाओं के वाचिक परंपरा के साहित्य में आजादी के लिए तड़प पैदा करनेवाले गीत मिलते हैं। उसी प्रकार आजाद होने पर बदले हुए परिवेश में रचनाकारों ने लोकभाषाओं में अपनी अभिव्यक्ति दी। औद्योगिक विकास तथा अन्य विकासशील परिवर्तनों के क्षेत्र गीतों, कहावतों में रच बस गए। संवेदनशून्य होने का दर्द पारंपरिक विरहा लोकगीतों में है—

महँगी के मारे विरहा बिसरि गै, भूलि गई कजरी कबीर।

देखि के गोरी कै मोहिनी सुरतिया, उठे न करेजवा म पीर॥

(महँगाई के कारण विरहा गाना हम भूल गए, ऋतु गीत कजली और होली का कबीर भूल गए। अब तो सुंदरी का मोहक रूप देखकर भी कलेजे में पीर नहीं उठती)।

सबसे अधिक प्रहार हुआ लोक-संस्कृति पर। लोकगीत, लोककथाएँ, लोककलाएँ और प्रथाएँ तथा लोक-विश्वासों को रूढ़ियाँ कहकर उपेक्षित किया गया। लोकधुनें लुप्त होने लगी। लोकनाट‍्य जो गाँव की व्यथा कथा कहते थे, व्यंग्य के तीखे प्रहार करते थे, वे लुप्त होने लगे। किंतु पाश्चात्य विद्वानों ने इनकी ओर इंगित किया, तब हमारी ग्राम्य चेतना के प्रति कुछ लोगों की रुचि उन्मुख हुई।

पर्व-त्योहारों के प्रति उपेक्षा ने एक बार अनुभव कराया कि सांस्कृतिक ह्रास पूरी तरह से हो जाएगा। पर्व-त्योहारों की सांस्कृतिक चेतना ने उसे डूबने से बचा लिया। इस लोक-विरासत की जिजीविषा शक्ति ने उसे मरने नहीं दिया। अपनी परंपरा के प्रति आस्थावान लोकमन ने उसे सँजोया, सहेजा और समय की आहट सुनकर उसके अनुरूप अभिव्यक्ति भी दी।

लचर कानून व्यवस्था और शासकीय कार्य पद्धति की अक्षमता, रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार आदि साहित्य का बहुचर्चित विषय बन गया। प्रजातंत्र में प्रजा नेपथ्य में चली गई और तंत्र हावी रहा। नेता और शासकों के प्रति असम्मान की भावना उभरती गई। निम्न और मध्यम वर्ग पिसता रहा। वर्ग-संघर्ष, जाति और धर्म के नाम पर बँटवारे आदि से त्रस्त जनता तंत्र के सुरसा मुख में समाती कराहती रही। रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की प्रसिद्ध पंक्ति है—

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है...

अंग्रेजों ने तो इस तरह की ललकार सुनकर सिंहासन खाली कर दिया, पर उस पर बैठनेवाले स्वदेशी शासक यह भूल गए कि यह सिंहासन जनता का है और जनता ने हमें दिया है।

गँवई गाँव का आदमी नगरों-महानगरों की चकाचौंध को और उसमें रहनेवाले सत्ताधारियों को भौचक होकर देखता रहा। व्यक्ति का स्थान और महत्त्व भौतिक संपन्नता के आधार पर तय किया जाने लगा। खादी, जो अहिंसा और सादगी का प्रतीक थी, वह खद्दरधारियों के आचरण के कारण व्यंग्य का पात्र बन गई। गाँव के छुटभइया नेताओं ने तिकड़म करना शुरू किया। ग्राम पंचायतों पर से विश्वास उठता गया। सीधे सरल ग्रामीण जनों में भी चालाकी की आँखें उग आईं। ये सारी विसंगतियाँ स्वतंत्र भारत के साहित्य में उजागर होती रहीं।

सरकार की ओर से जनकल्याण की जो योजनाएँ चलाई गईं, उनका लाभ जन की अपेक्षा बिचौलियों को अधिक मिला, यह जानते हुए भी लोग चुपचाप सहते रहे कि यही नियति है, यही व्यवस्था है।

साहित्य ने नई दृष्टि से देखने और दिखाने की पहल की। अपनी जागरूकता का परिचय देते हुए आधुनिकता के परिप्रेक्ष्य में इन विसंगतियों और विडंबनाओं को उभारा। पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव भूमंडलीकरण के परिणाम औद्योगिक क्रांति के प्रभाव से आई संपन्नता और उस संपन्नता से आई नैतिक मूल्यों के ह्रास के चित्र उकेरे।

साहित्य में कई विमर्श उभरे, जैसे दलित-विमर्श, नारी-विमर्श और पर्यावरण चेतना आदि। दलितों के अधिकार और उनके भीतर अन्याय के प्रतिकार की चेतना जगाई गई। नारी शिक्षा और नारी के अधिकारों को लेकर बहुत कुछ लिखा गया। नारी-मुक्ति के नाम पर कुछ अच्छी बातें आईं, किंतु उसी के साथ उसे ‘देह’ मात्र के रूप में प्रस्तुत करने की स्पर्धा भी जगी। कुछ लेखिकाओं ने भी उसे देह मात्र बनाकर प्रस्तुत किया। व्यक्तिगत स्वतंत्रता सामूहिक चेतना पर हावी हुई। नारी को आत्मरक्षा के लिए तैयार करने की बातें हुई, साथ ही उसे विज्ञापन की वस्तु भी बना दिया गया। गाँव में भी ब्यूटी पार्लर खुल गए और देशी प्रसाधनों का सहज शृंगार उपेक्षित होता गया। व्यक्तिगत स्वतंत्रता उसे मिली, अधिकारों का ज्ञान कराया गया, साथ ही कर्तव्य-बोध में कहीं कमी भी आई, किंतु सुशिक्षित नारी ने अपनी शक्ति को पहचाना। उसने घर-बाहर दोनों मोर्चों को सफलता के साथ सँभाला भी।

ग्रामीण लड़कियों की शिक्षा के प्रति अभिभावकों की उदासीनता और असुरक्षा का भय आज भी एक समस्या है, किंतु जागरूकता भी आई है। परिवार नियोजन के प्रति उनकी नकारात्मक भावना में भी अब परिवर्तन आया है। बुजुर्गों के प्रति उपेक्षा का भाव वहाँ भी बढ़ा है। कन्या जन्म को लेकर निम्न और मध्य वर्ग में अभी भी उत्साह में उतनी वृद्धि नहीं हुई है, जितनी होनी चाहिए। पर शिक्षित वर्ग सचेत हुआ है। आज भी लोकगीतों में कन्या की माँ का दर्द उजागर होता है।

आज नगरीय प्रभाव गाँव पर भी हावी हुआ है और ग्रामीण संस्कृति संकट में है। ग्रामीण संस्कृति मानवीय संस्कृति है, उसमें नदी का प्रवाह है, गतिशीलता है। उस प्रवाह में लोकमन है, लोक की कर्म के प्रति आस्था है। इस संस्कृति का सहज रूप जितना हिंदी के लिखित साहित्य में व्यक्त हुआ है, उससे कहीं अधिक वाचिक साहित्य में है। नारी के स्वाभिमान, उसकी सहनशीलता और त्याग का सहज चित्र वहाँ मिलता है, साथ ही उसके स्वाभिमान और शौर्य का भी प्रमाण मिलता है।

ग्राम्य जीवन में संबंधों का ऐसा ताना-बाना है, जो न केवल मनुष्य, वरन् जड़ चेतन सबको एक सूत्र में बाँधे रखता है। वहाँ सेवक और स्वामी में भी पारिवारिक रिश्तों के संबोधन हैं। वहाँ हर जाति धर्म के लोग पारिवारिक रिश्तों में बँधे हैं।

आर्थिक विषमता और आर्थिक स्वावलंबन पर बहुत कुछ लिखा गया। वर्ग संघर्ष वर्तमान शिक्षा नीति और राजनीति पर भी चर्चाएँ हुईं। परंपरा बनाम आधुनिकता पर बहसें छिड़ीं तथा जीवन के बदलते प्रतिमान लेखन के विषय बने। समसामयिकता और समकालीनता के बारे में भी विद्वानों ने जमकर लिखा और ग्राम्य जीवन के बदलते परिवेश पर टिप्पणियाँ की गईं।

परिवर्तन समाज की उन्नति का लक्षण है। जड़ता या स्थिरता को तोड़कर साहित्य ने एक नई पहल भी शुरू की। महाभारत में कहा गया है कि जल को प्रवाह में रहना चाहिए। ठहर जाने से सड़ाँध पैदा हो जाती है। हमारी परंपरा भी परिवर्तन का संदेश देती है। पुराण कहते हैं कि विष्णु भगवान् छह महीने के लिए शयन करते हैं। देवशयनी एकादशी को सोते हैं, परिवर्तनी एकादशी को करवट बदलते हैं और कार्तिक के देवउठान (देवोत्थान) एकादशी को जागते हैं। यह परिवर्तन समाज की उन्नति के लिए हो, यह विवेक जगाने की जरूरत है, वरना परिवर्तन की आँधी में बहुत कुछ कूड़ा-कचरा भी आ जाता है।

हम विदेशी सत्ता से मुक्त हुए पर दास बने रहे स्वार्थ, लोभ और सुविधाओं के। शासक स्वदेशी हो गए पर व्यवस्था वही चलती रही, जो अंग्रेजो ने बनाई थी। यहाँ तक कि शिक्षा पद्धति भी वही चलती रही। हमने यह जाँच भी नहीं की कि भारतीय मिट्टी, हवा, पानी और संस्कृति के लिए वह कितनी अनुकूल है और कितनी प्रतिकूल। शिक्षा तकनीक औद्योगीकरण, नगरीकरण, भूमंडलीकरण का प्रभाव गाँव पर भी तेजी से पड़ा। सादगी और श्रम के प्रति नई पीढ़ी में उदासीनता आई। फैशन और पाश्चात्य सभ्यता की चकाचौंध के प्रति आकर्षण बढ़ता गया। भौतिक सुखों की प्रतिस्पर्धा में ग्रामीणजन भी जीवन-मूल्यों के प्रति उदासीन होने लगे। बेरोजगारी ने युवकों को हतोत्साहित किया। निराश युवा शक्ति ने गलत मार्ग भी पकड़ा। आजादी मिलने के बाद सबसे ज्यादा हताश नई पीढ़ी हुई। उसके सपने टूटे, वह जातिवाद, आरक्षण नीतियों के कारण अध्ययन और रोजगार दोनों से वंचित होकर कुंठित है। छोटी-छोटी इच्छाओं की भी पूर्ति न होने पर युवा वर्ग अकेलेपन और आत्मघात का शिकार हुआ। अनास्था और आत्मरति को लोग आधुनिकता का पर्याय मानने लगे। इन स्थितियों को हिंदी साहित्यकारों ने बखूबी उकेरा है।

ग्राम्यजन और संस्कृति के बीच गहरा अंतर्संबंध है। एक तरह से गाँव की जनता ही सांस्कृतिक परंपरा को आगे बढ़ाती रही है।

समाजशास्त्रीय दृष्टि से देखें तो लेखक और उसका समय परस्पर गुँथे दिखते हैं। रचना की पाठकीय प्रतिक्रिया और पाठकों की माँग भी उद्वेलन पैदा कर प्रेरक की भूमिका निभाती रही। लेखक यदि गाँव की मिट्टी से जुड़ा है, उसके सुख-दुःख, आशा-आकांक्षा से परिचित है तो वह अधिक मर्मस्पर्शी साहित्य दे पाएगा।

परंपरा और आधुनिकता को सदैव विपरीत देखने की दृष्टि रही है, परंतु परंपरा में ही आधुनिकता के बीज विद्यमान रहते हैं। परंपरा स्वयं अपने को छानती रहती है युग की माँग के अनुसार। आधुनिकतावादी परंपरा को रूढ़ि मानकर नकारते हैं तो परंपररावादी आधुनिकता के नाम पर होनेवाली नकल को देखकर दुःखी और चिंतित होते हैं, दोनों को ही समझने की जरूरत है कि परंपरा केवल रूढ़ि नहीं है, वह एक प्रवाह है। दूसरी और आधुनिकतावादियों को सोचना होगा कि हम अपनी खिड़कियाँ तो खुली रखें, पर पछुआ अंधड़ के साथ आनेवाले कूड़ा-करकट को न लेकर जो उपयोगी है, उसे लें। आधुनिक चेतना के साथ संस्कृति बोध की भी जरूरत है। वही आधुनिकता ग्रहण करनी है, जो संतुलित और जागरूक दृष्टि दे। अतिवाद की हमेशा वर्जना की गई है।

स्वतंत्रता की कितनी बड़ी कीमत हमने चुकाई, कितना नरसंहार हुआ, देश विभाजन की त्रासदी और विभाजन के बाद की समस्याओं से देश अभी तक मुक्त नहीं हुआ। धर्म और संप्रदाय के नाम पर विद्वेष झेलता समाज अब गाँव में भी दिखाई देता है, जबकि वहाँ सांप्रदायिक सौहार्द भाव और भाईचारा अनायास था। उसे राजनीति ने विद्वेष में बदल दिया। इतने वर्षों से साथ रहनेवाले, छूतपाक का विचार रखते हुए भी परस्पर सभी संवेदनात्मक अपनत्व से जुड़े थे। उनके बीच अब खाइयाँ बना दी गईं। वोट की राजनीति ने संप्रदाय और जाति के नाम से ग्राम समाज को कितने टुकड़ो में बाँट दिया, यह हिंदी साहित्य में निरंतर चित्रित हुआ है।

प्रेमचंद का कथा साहित्य ग्राम्य जीवन का जीवंत दस्तावेज है। आंचलिक उपन्यासों में ग्रामों के सजीव कसमसाते चित्र हैं।

डॉ. शिवप्रसाद सिंह के अनुसार आंचलिकता की प्रवृत्ति स्वातंत्रयोत्तर हिंदुस्तान की एक सांस्कृतिक प्रवृत्ति है, जिसके भीतर भारतीयता को अन्वेषित करने की सूक्ष्म अंतःधारणा काम कर रही थी। रेणु का ‘मैला आँचल’ अपनी नई भंगिमा के कारण एक अंचल विशेष के सूक्ष्म अध्ययन की अभिव्यक्ति देता है। ‘मैला आँचल’ के पहले खंड में आजादी के पहले की स्थितियाँ हैं और दूसरे में बाद की। इसमें राजनीति के दंद-फंद, षड‍्यंत्र और गंदी मानसिकता के चित्र उभरे हैं। पर डॉ. प्रशांत नामक पात्र के माध्यम से आस्था का संदेश भी दिया गया है, जो आँसू से भीगी धरती पर मानवता के बीज बोने की पहल करता है और ग्रामवासिनी भारत माँ के मैले आँचल के नीचे प्रेम पनपाने का संकल्प लेता है।

इसी प्रकार नागार्जुन के ‘रतिनाथ की चाची’, ‘वरुण के बेटे’, ‘दुख-मोचन’ और ‘बलचनमा’ में मिथिला के ग्रामीण अंचल का यथार्थ प्रस्तुत है। वे मछुआरों के जीवन का सजीव चित्र देते हैं। जमींदारों के शोषण के विरुद्ध उनमें राजनीतिक चेतना जगाने की बात है।

उदयशंकर भट्ट ने ‘सागर, लहरें और मनुष्य’ आंचलिक उपन्यास में बरसोवा के मछुआरों और महिम के ढोलियों का जीवन, उनकी लोक विरासत और साथ ही उनकी नशाखोरी आदि का खाका खींचा है।

रांगेय राघव का उपन्यास ‘कब तक पुकारूँ’ नट जनजाति पर केंद्रित है, जिसमें उनकी आर्थिक पराश्रयता और उनकी परंपरागत लोकविरासत के प्रति आस्था आदि का सजीव चित्रण है। हिमांशु जोशी की ‘कगार की आग’ पहाड़ के ग्रामीण अंचल की करुण कथा के साथ विद्रोह की आग प्रस्तुत करती है।

शिव प्रसाद सिंह का उपन्यास ‘अलग-अलग वैतरणी’ सवर्ण और पिछड़ी तथा दलित जातियों के परिवार की कहानी है, जिसमें प्रेम के कुत्सित रूप, गरीबी की विवशता की व्यथा है। वहाँ आजादी के बाद का परिवर्तन नकारात्मक भूमिका में आया है।

राही मासूम रजा का ‘आधा गाँव’ भारत-पाकिस्तान विभाजन के पूर्व और बाद की परिस्थितियों का खुलासा है। इसमें मध्यवर्गीय शिया मुसलमानों की व्यथा-कथा है। अंधविश्वास, पारिवारिक टूटन, अशिक्षा आदि का यथार्थ चित्रण है। शैलेश मटियानी के ‘चिट्ठी नसैन’ और ‘हवलदार’ में कुमाऊँ अंचल के गाँव के सुख-दुःख की कहानी है।

मनहर चौहान का उपन्यास ‘हिरना साँवरी’ छत्तीसगढ़ के गाँव का दर्द कहती है। जगदीश चंद्र का उपन्यास ‘धरती धन न आपनो’ में पंजाब के गाँव का दर्द है। ‘यशपाल का झूठा सच’ में विभाजन की त्रासदी का कच्चा-चिट्ठा है। श्रीलाल शुक्ल का प्रसिद्ध उपन्यास ‘राग दरबारी’ अवध अंचल के गाँव की कथा है, जिसमें पैना व्यंग्य है।

उषा किरण खान की कहानियों में गाँव की गहन संवेदना है। उनकी दूब-धान कहानी चर्चित हुई, जिसमें गाँव के सांस्कृतिक परिवेश के विघटन के बीच एक आशा की किरण वहाँ की आत्मीयता है। सूर्यबाला की कहानियों में पूर्वांचल के गाँव हैं। ममता कालिया का उपन्यास ‘दुक्खम सुक्खम’ की दादी की बातें गाँव की सहज मानसिकता का उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। चित्रा मुद‍्गल का उपन्यास ‘आवाँ’ गरीब तबके की उन स्त्रियों के सुख-दुःख से जुड़ा है, जिनका मन गाँव का मन है। दीपक शर्मा की कहानियाँ संबंधों के बीच की संवेदन शून्यता की ओर संकेत करती है। अखिलेश, सुशील सिद्धार्थ आदि की कहानियों में स्वतंत्र भारत के गाँव की स्थिति सहज रूप से व्यक्त हुई है। मेरे अवधी उपन्यास ‘लड्डू गोपाल क माई’ में गाँव की बदलती मानसिकता और महात्मा गांधी के सपनों की ग्राम पंचायतों के माध्यम से गाँव में पहुँचे राजनीति के विष को दूर करने की सकारात्मक पहल है।

विस्तार भय से सभी का नामोल्लेख कर पाना कठिन है। कथा- साहित्य के अतिरिक्त हास्य व्यंग्य की कविताओं में सियासत का चेहरा दिखाया जाता रहा है। गंभीर काव्य कृतियों में भी स्वतंत्र भारत के गाँवों की सही छवि प्रस्तुत करते हुए गाँव के सपने दिए गए हैं।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि स्वतंत्र भारत की यथार्थ स्थितियों को ज्यों-का-त्यों प्रस्तुत करने की भूमिका हिंदी साहित्य ने निभाई है, किंतु अभी भी बहुत कुछ उजागर करने की जरूरत है, जिससे कि साहित्य आज की राजनीति को उसका असली चेहरा दिखाते हुए उसका मार्गदर्शन कर सके और समेकित विकास की राह दिखा सके।

यह अमृत महोत्सव केवल उत्सव न रहे, हमारा आगे का मार्ग प्रशस्त करते हुए हमारे भीतर राष्ट्र के प्रति दायित्व और गौरवबोध जागता रहे।

 

४५, गोखले विहार मार्ग,
लखनऊ-२२६००१
दूरभाष : ९४५१३२९४०२

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