लोकभाषाओं में लोकजीवन

लोकभाषाओं में लोकजीवन

सुपरिचित लेखिका। विभिन्न राष्ट्रीय शोध-पत्रिकाओं एवं पुस्तकों में शोध-पत्रों का प्रकाशन, विभिन्न समाचार-पत्रों एवं पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन। संप्रति सहायक प्राध्यापक (हिंदी), शा. नवीन महाविद्यालय, बेरला (बेमेतरा)।

 

मनुष्य जैसे-जैसे सभ्यता की ओर बढ़ता गया, प्रकृति से दूर होता गया। प्रकृति का नैसर्गिक सौंदर्य आँखों से दूर होता चला गया और भौतिकता उस पर हावी होती जा रही है, लेकिन शांति की तलाश उसे बराबर रहती है। वह हमें मिलती है हमारी लोक-संस्कृति में। लोक-साहित्य किसी राष्ट्र की संस्कृति के दर्शन का माध्यम होता है। भगवान् राम को देखकर शबरी भाव-विभोर हो जाती है, दुनियादारी से परे होकर चख-चखकर बेर खिलाती है। प्रेम और भक्ति में डूबी शबरी के प्रेम व सरलता को देखकर वे भी अभिभूत हो जाते हैं। उसके निर्मल, निष्कपट प्रेम को देखकर वे नवधा भक्ति का उपदेश देते हैं—

नवम सरल सब सन छलहीना। मम भरोस हियँ हरष न दीना॥

नव महुं एकउ जिन्ह कें होई। नारि पुरुष सचराचर कोई॥

लोकाचार से दूर अभिमान रहित, मिथ्या आडंबर से दूर स्वाभाविकता लिये यही तो है लोकमानस की पहचान। लोकमानस में ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ का भाव रहता है। कबीरदास ने कहा है—‘कबीरा खड़ा बाजार में, सबकी माँगे खैर, न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर।’

हमारा विशाल जनमानस जो स्वार्थ से परे आपस में सुख-दुःख बाँटता, सामाजिक और सांस्कृतिक सूत्र से आपस में जुड़ा रहता है। किसी से अत्यंत निकटता दिखाए बगैर सभी की खैरियत की दुआ करता है।

‘लोक’ शब्द का अर्थ

‘लोक’ शब्द से ही ‘लोग’ शब्द की व्युत्पत्ति मानी जाती है, जिसका तात्पर्य है—सर्व साधारण जनता। डॉ. वार्कर ने ‘फोक’ अर्थात् ‘लोक’ शब्द की व्याख्या करते हुए लिखा है कि फोक शब्द से सभ्यता से दूर रहने वाली किसी पूरी जाति का बोध होता है। महाभाष्यकार पतंजलि ने भी जनसाधारण के अर्थ में ‘लोक’ शब्द का व्यवहार किया है। महर्षि व्यास ने महाभारत ग्रंथ को सामान्य जनता के ज्ञान चक्षु खोलने वाला ग्रंथ कहा है। हिंदी के सुप्रसिद्ध विद्वान् हजारीप्रसाद द्विवेदीजी ने ‘लोक’ शब्द का अर्थ जनपद या ग्राम्य में सीमित न करके नगरों व गाँवों की समस्त जनता से लिया है, जो व्यावहारिक ज्ञान से सरोकार रखती है।

हिंदी व लोकभाषाओं में निहित लोकजीवन

विष्णु खरे ने अपने साक्षात्कार में कबीर की ठेठ भाषा का उदाहरण देते हुए कहा है, “लोकभाषा में लिखकर ही आप लोक-संस्कृति से जुड़ पाते हैं और उसी से कविता जिंदा भी होती है।” आगे उन्होंने यह भी कहा, “लोकभाषा ही जीवित रहेगी और लोकभाषा में लिखा साहित्य ही जीवित बचेगा।” हिंदी के प्राचीन कवि तुलसी सूर, कबीर, घनानंद हों या आधुनिक कवि नागार्जुन आंचलिक कथाकार फणीश्वर नाथ रेणु, सभी का साहित्य हमें लोकजीवन से जुड़े ज्ञान का अनुभव कराता है। कबीर के दोहे हों या मानस गान, घर-घर में गाए जाते हैं। पं. रामनरेश त्रिपाठी ने सन् १९२९ ई. में अपनी कविता कौमुदी भाग-५ (ग्राम गीत) में लोकगीतों का संग्रह किया था। प्रसिद्ध साहित्यकार केदारनाथ सिंह ने भोजपुरी के संबंध में कहा कि ‘भोजपुरी हमारा घर है और हिंदी देश’। हिंदी की विभिन्न बोलियाँ (उपभाषाएँ) है जैसे पूर्वी हिंदी में अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी, पश्चिमी हिंदी में ब्रजभाषा, बाँगरू, कन्नौजी, बुंदेली इनके अलावा भोजपुरी, राजस्थानी, मैथिली, मगही, कुमाऊँनी आदि। सभी हिंदी की शक्तियाँ हैं। हिंदी की ये लोकभाषाएँ, जहाँ विभिन्नता लिये हुए हैं, वहीं अनेकता में एकता लिए हुए हैं, ऐसा हमें कहना चाहिए, क्योंकि भाषिक संरचना में भले भिन्न हो, कहीं समानता लिये भी हैं, लेकिन सांस्कृतिक रूप से ये आपस में जुड़ी हुई हैं। क्षेत्रगत इनका रूप अलग भले है, लेकिन तीज-त्योहार, रीति-रिवाज आदि में अलग-अलग नामों से हम एक ही तरह से मनाते हैं। वही कहावतें हिंदी में हैं, वही छत्तीसगढ़ी में, बुंदेली, अवधी में, वही सोहर गीत, विवाह-गीत सभी में है। इसलिए भारतीय संस्कृति विभिन्नता में एकता लिये हुए है। विशाल जनमानस के अनुभव उनके लोक-विश्वास को और भी गहरा बनाते हैं। लोकभाषाएँ उस क्षेत्र के लोकजीवन की झलक अपने लोकगीतों, लोककथाओं, लोक मान्यताओं के माध्यम से देती है।

प्रकृति में लोकजीवन

प्राचीन काल में मनीषियों ने सृष्टि की रचना में पंचतत्त्व आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी के महत्त्व को स्वीकार किया है। किंतु प्रकृति की गोद में पैदा हुआ मनुष्य उसकी देन को भूल जाता है। अपने लाभ के लिए जैसे-जैसे उसने प्रकृति को नुकसान पहुँचाया, वैसे-वैसे संतुलन बिगड़ता गया। यही कारण है कि आधुनिक मनुष्य की स्वार्थ लोलुपता ने जैसे-जैसे पर्यावरण को नजरअंदाज किया, वैसे-वैसे प्रकृति का प्रकोप किसी-न-किसी आपदा के रूप में हमारे सामने आया है। ऋग्वेद में प्रकृति का मानव से साहचर्य व उसके उपागमों, जैसे ग्रहों, बादल, जलस्रोतों, वृक्ष, पशु-पक्षी, वन की महिमा का गुणगान मिलता है। लोकमानस प्रकृति के महत्त्व को समझता है, इसलिए प्रकृति के विभिन्न रूपों के प्रति भक्ति-भाव से ओतप्रोत रहते हुए प्रकृति की रक्षा का भाव उसमें होता है। सूर के काव्य में वनदेवी गाँव वालों की रक्षा करती है। पहाड़ी और जनजातीय क्षेत्र में बूढ़ा देव या ठाकुर देव की पूजा की जाती है।

ग्रहों का पूजन : उत्तर प्रदेश और बिहार का खास त्योहार छठ पूजा पूरी श्रद्धा व धूमधाम से मनाया जाता है। सूर्य को पुत्र प्रदान करने वाले देवता के रूप में पूजा जाता है और उनके नाम से छठ का व्रत रखा जाता है फिर अर्घ्य देते हुए गाती हैं—‘हाली-हाली ठग ए अदिल मल, अरघ दियाउ’।

वृक्षों के प्रति सम्मान : पेड़-पौधे, वृक्ष हमारे लिए जीवदायक माने जाते हैं। शुद्ध वायु के लिए ये अत्यंत आवश्यक है। पेड़-पौधों से ही फल, वस्त्र, आवास, ईंधन विभिन्न प्रकार की उपयोगी वस्तुएँ हमें प्राप्त होती हैं। वैज्ञानिक रूप से पीपल का वृक्ष सबसे अधिक ऑक्सीजन देने वाला होता है। लोकमानस इसमें देवता का वास मानकर इनकी पूजा करते हैं और इस वृक्ष को नुकसाान पहुँचाना, यानी देवता को कष्ट देना मानते हैं। इसी प्रकार तुलसी वर्षों से घरों में पूजी जाती है, जिसके औषधीय महत्त्व से हम अनभिज्ञ नहीं हैं। वटवृक्ष की पूजा पति की लंबी उम्र के लिए की जाती है। आँवला नवमी की पूजा मोक्ष-प्राप्ति के लिए की जाती है। हमें यह ज्ञात है कि आरोग्य प्रदान करने में वृक्षों का महत्त्व है।

पशु–पक्षियों संबंधी विश्वास : कौए का मुँड़ेर पर बैठकर बोलना अतिथि के आगमन की सूचना देता है। गाय को भारतीय संस्कृति में माता का रूप मानते हैं। धार्मिक और आर्थिक दृष्टि से गाय का अत्यंत महत्त्व है। स्वप्न में भी गाय और बछड़े का दर्शन शुभ माना जाता है। कहा जाता है, पहले आपदा का संकेत पशु और पक्षियों की हलचल और उनको इधर से उधर भागने की बचैनी से लोगों को हो जाता था। ऋग्वेद में पक्षियों से शुभ वचन बोलने के कामना ऋषि-मुनियों की वाणी में मिलती है। जायसी के पद्मावत में नागमती विरह का संदेश देने काग और भौंरे को पुकारती है ‘पिउ से कहेहु सन्देशडा, हे भौंरा! हे काग! सो धनि बिरहे जरि मुई, तेहि क धुवाँ हम्ह लाग’

कहावतों में लोकजीवन

पुरखों द्वारा अपना अनुभव या सहज रूप से सीख देने या गुस्से में बहुत कम शब्दों में कह दिया जाता था, वही आगे चलकर कहावतें बनती गईं। जैसे झूठे लोगों को छत्तीसगढ़ी में लबरा कहते हैं, इसी लबरा शब्द पर एक कहावत बनी ‘लबरा के नौ नागर’, जिसका अर्थ होता है सफेद झूठ। को कहावतों में मुझे घाघ की कहावतें याद आती हैं। भारत के कृषक वर्ग के लिए उनकी कहावतें पथ-प्रदर्शन करती हैं। उनकी लोकजीवन पर आधारित कहावतें आज भी समाज में प्रचलित व चरितार्थ होते दिखती हैं। घाघ की स्वास्थ्य संबंधी कहावत है—

रहै निरोगी जो कम खाय, बिगरे न काम जो गम खाय।

घाघ व भड्डरी की कृषि व मौसम संबंधी कहावतें तो किसानों को मुखाग्र रहती हैं—

शुक्रवार की बादरी, रही सनीचर छाय।

तो यों भाखे भड्डरी, बिन बरसे ना जाए।

अरवै तीज तिथि के दिना, गंरू होवे संजूत।

नो भारवैं यो भड्डरी, उपजै नाज बहुत।

अर्थात् बैसाख में अक्षय तृतीया को गुरुवार पड़े तो खूब अन्न पैदा होता है।

लोकसंगीत में लोकजीवन

आधुनिक दौर में मनोरजंन के साधन इंटरनेट, टी.वी., फिल्म, मॉल-संस्कृति आदि है। लेकिन प्रचीन काल से आज तक आधुनिकता के इस दौर में भी लोक संगीत और लोक गीतों की धुन हमें सम्मोहित करती है। ग्रामीण क्षेत्रों में गाय चराते हुए चरवाहों को गीत गुनगुनाते, खेतों में व विभिन्न अवसरों पर महिलाओं द्वारा गाए जाने वाले गीत कितने मनमोहक लगते, लोकसंगीत के सामंजस्य से मनमोहक हो जाते हैं। लोकसंगीत में एक ही वाद्य पर निकली लोकधुन भी मधुर और आडंबरहीन होती है। कृष्ण की मुरली की तान पर पूरे गाँव की गोपियाँ दौड़ पड़ती थीं। इकतारा, चिकारा, तुरही, मांदर, ढोलक, बाँसुरी यही तो लोकजीवन के वाद्ययंत्र हैं, जिन्हें वह स्वयं तैयार करता है।

लोकगीतों में लोकजीवन

भारतीय संस्कृति का सहज और आत्मीय चित्रण हमें लोकगीतों के माध्यम से मिलता है लोकगीत लोकमानस के मनोरजंन का साधन होता है। लोकगीतों को एकल रूप से या सामूहिक रूप से प्रस्तुत किया जाता है। विभिन्न अवसरों पर विभिन्न प्रकार से इसे गाया जाता है—संस्कार संबंधी गीत, व्रत-त्योहार संबंधी गीत, ऋतु संबंधी गीत, जिन्हें भिन्न-भिन्न अवसरों पर गाया जाता है।

सोहर गीत : भोजपुरी, मैथिली, ब्रज, छत्तीसगढ़ी, अवधी, पूरे भारतवर्ष में शिशु के जन्म पर सोहर गीत गाया जाता है। भाई के घर शिशु जन्म के अवसर पर बहन बधाई देने जाती और काजल लगाने का नेग करती है। खुशी के अवसर पर मायके जाने की लालसा वह इस प्रकार व्यक्त करती है—

हमारो भाई के होय हवै लाले हम काजर आँजे ल जावो हो।

विवाह संबंधी लोकगीत : विदाई के समय माता-पिता, भाई-भाभी सभी दुःखी है, रो रहे हैं, लेकिन अलग-अलग संबंधों के दुःख दरशाने वाले इस गीत में भाभी को कठोर हृदय बताया जा रहा है—

दाई मोर रोव थे नदिया बहत हे

ददा रोवय छाती फाटय हो, हाय-हाय मोर दाई

भाई रोवय समझाये, भौजी नयन कठोरे हो।

भोजली गीत : भोजली पर्व भारत के विभिन्न प्रांतों में धूमधाम से मनाया जाता है। कृषक वर्ग के उल्लास का प्रतीक यह पर्व भोजली तैयार होने फिर उसके विसर्जन तक चलता है। विसर्जन के समय महिलाएँ भोजली गीत गाते हुए गंगा मैया से सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। भोजली गीत किसान जीवन के हर्षोल्लास के साथ ही कृषक बालिका की खुशी, उसके भाई के प्रति स्नेह व सामाजिक सद्‍‍व्यवहार को व्यक्त करने के साथ ही नदी, तालाब आदि जल स्रोतों के प्रति श्रद्धा का भाव रखते हुए उसके दाय के प्रति सम्मान व्यक्त करता है—

देवी गंगा/देवी गंगा लहर तुरंगा

हमरो भोजली देवी के/भीजे आठों अंगा।

लोकनृत्य में लोकजीवन

मनुष्य श्रम के बाद विश्राम के क्षणों में उल्लास के साधन ढूँढ़ता है। ग्रामीण हों या जनजातीय लोक, लोक नृत्य उनके उल्लास को व्यक्त करता है। लोकनृत्य में विभिन्न वाद्ययंत्र हो या वेशभूषा या फिर शृंगार के साधन सभी वह खुद ही प्रकृति से सृजित करता है। फसल तैयार होने पर, त्योहार के अवसर पर या श्रम के दर्द को भूलने हेतु ये लोकनृत्य लोक की सामूहिकता को व्यक्त करता है। सुआ नृत्य, गौर नृत्य, करमा नृत्य, सरहुल नृत्य, डंडा नृत्य आदि। पति के वियोग का चित्रण सुआ नृत्य के माध्यम विशेष रूप से आकर्षित करता है—

पहिली गवन के डेहरी बईठारे

छांड पिया जाथे बनिज ब्योपार

काकर संग खईहंव, काकर संग खेलिहँव

का देख रइहंव मन बांध, रे सुअना...!

लोकगाथा में लोकजीवन

लोकगाथाओं में भरथरी के साथ चनैनी, पंडवानी, लोरिक चंदा, बाँस गीत, ढोलामारू, अहिमन रानी, रेवा रानी, फूलबासन लोकप्रिय हैं। नारी मन की भावनाओं के चित्रण के साथ ही क्षेत्र विशेष से जुड़ी मान्यताओं की सफल अभिव्यक्ति लोकगाथाओं के माध्यम से होती है। भरथरी के जन्म के पहले उनकी माता संतान की लालसा लिये अपने दुःख को इस प्रकार व्यक्त करती है—

मोर ले छोटे अउ छोटे के/सुंदर गोदी मा ओ

देख तो दीदी बालक खेलते हैं/मोर अभागिन के ओ

मोर गोदी मा राम/बालक नइये गिंया

मोर जईसे विधि कर रानी ओ/बाई रोवय ओ, बाई ये दे जी।

तरिया बैरी नदिया मा/संग जंवसिहा ओ

देख तो दीदी ताना मारथे हे...

निष्कर्षतः कह सकते हैं कि लोकसाहित्य की किसी भी विधा चाहे वह लोकमान्यताएँ हों, लोकसंगीत हो, लोकगीत हो, लोकनाट्य हो या लोकगाथा हो उनमें हमें लोकजीवन के चित्रण मिलते हैं। जिन्हें असंस्कृत, अशिक्षित या असभ्य की श्रेणी में रखते हैं, वे वास्तव में प्रकृति के नजदीक रहा करते हैं। लोकमानस अपने अंदर छिपे नैसर्गिक गुणों को लोकगीतों, लोकधुनों के द्वारा व्यक्त करते हैं। अपना दुःख, उल्लास, खुशी वह आडंबरहीन होकर सहज रूप से व्यक्त करते हैं। लोकभाषाएँ क्षेत्र विशेष की पहचान कराने वाली वहाँ की विशेषताएँ जैसे रहन सहन, वेशभूषा, आभूषण, बोली, प्रकृति से साहचर्य, रीति-रिवाज आदि बयाँ करने में अधिक सक्षम होती है। लोकभाषाएँ उस क्षेत्र विशेष की पहचान विश्वपटल पर कराती हैं। लोरिक चंदा भारत के विभिन्न प्रान्तों खासकर मध्य प्रांत में प्रसिद्ध है।

भारत में विभिन्न संस्कृति के लोग रहते हैं, लेकिन सभी एक सूत्र होकर भारतीय संस्कृति को गढ़ते हैं, चूँकि भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि अपनी संरचना में समूची संस्कृति को प्रकट करती है। हिंदी और उसकी लोकभाषाओं का भारतीय संस्कृति को एकसूत्र में पिरोए रखने में अमूल्य योगदान है। अतः भूमंडलीकरण और व्यावसायिकता के प्रभावों के प्रति जागरूक करता वर्तमान परिदृश्य हिंदी और लोकभाषाओं के संरक्षण के प्रति गंभीरतापूर्ण विचार करने का संकेत दे रहा है।

 

आस्था तिवारी

पं. दीनदयाल उपाध्याय नगर,
श्रीराम पार्क के पास सेक्टर-3,
रायपुर-492010 (छ.ग.)

दूरभाष : 8770186487

जुलाई 2022

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