हिमगिरि, तुम मौन ही रहना!

हिमगिरि, तुम मौन ही रहना!

सुपरिचित लेखिका। अब तक सुप्त वीणा के तार, अनछुए अहसास (काव्य-संग्रह), चकम छकाई (बाल-कविता-संग्रह), अग्निगंधा (ललित-निबंध), सप्तरथी का प्रवास (यात्रा-वृत्तांत) एवं अन्य पुस्तकें प्रकाशित। आकाशवाणी से काव्यपाठ का प्रसारण। अखिल भारतीय साहित्य संगम द्वारा ‘काव्य कुसुम’ की मानद सम्मानोपाधि सहित अनेक सम्मानों से सम्मानित। संप्रति माध्यमिक शिक्षा विभाग राजस्थान में कार्यरत।

कभी-कभी मेरे रोम-रोम पर अछोर मरुस्थल उग आता है, मैं नहीं जानती, ऐसा क्यों होता है? शायद जीवन की विद्रूपताओं, जटिलताओं से बौराया मेरा मन एक अनछुई चादर चाहता है, जिसके तले उनींदी पनियाली अँखियों को ढाँपकर कुछ पल ऐकांतिक सुस्ता सके, नव ताजगी पा सके। ऐसे में मेरी यह चादर बनता है नगराज हिमालय। मैं नहीं जानती क्या नाता है मेरा हिमालय से, किंतु इतना जरूर लगता है कि कोई पूर्व का नाता ही रहा होगा, जो मैं पूरी दुनिया की घुमक्कड़ी को छोड़ सदा हिमालय को ही चुनती रही हूँ। आत्मा की भी अपनी घुम्मकड़ी होती है, आत्मा की अपनी यात्रा होती है और जीवन उसका पड़ाव मात्र है, यह यात्रा तो जीवन के आद्योपांत चलती है। जीवन के उपरांत पुनश्च जीवनचक्र के इस क्रम का ही मेरा कोई नाता रहा होगा हिमराज से, जो वहीं जाकर मेरी तृषा तृप्त होती है। मेरे रोम-रोम पर उमगा मरुस्थल खामोशियों की हिम वादियों की अनछुई चादर ओढ़कर मेरे पोर-पोर में हरीतिमा का उपवन महका देती है।

हिमालय से मेरा नाता तब जुड़ा था, जब मैं दसवीं कक्षा में थी। प्रथम दर्शन में ही वह मेरे इतने गहरे पैठा कि प्रतिपल उसका संग पाने को मैं लालायित हो उठी। तब से अब तक लगभग प्रतिवर्ष मैं उसकी शरण में जाती हूँ, वहाँ से वापस लौटने का मन तो नहीं करता, पर जगत् की इस भूल-भूलैया में लौटना ही पड़ता है। प्रशांत नीरवता, प्रफुल्ल वातावरण, नीरव समीर, पर्वत और सैलाबों का अधीश, सुवर्णमयी ज्योत्स्ना के अमृतपुंजों का स्वामी, झर-झर निर्बाध बहते अक्षय निर्झरों का जनक, नीलवर्णी गगन के चँदोवे पर तैरते कपासी मेघों के वृंदसमूहों का पालना हिमालय। स्वयं को ‘मैं’ से विलग करता मखमली कोहरा, निचली तराइयों में पड़ने वाले ऊँचे देवदार, प्लम, चीड़ के वन प्रांतरों की झूलती श्रावणी डगर पर चिहुँकते, मादक कलरव करते पाँखी, सूर्य के आतप में नवोदित प्रकाशित हिमाच्छादित शिखर, हिमगिरि शृंगों से पथगामिनी हुई रुनझुन पगरव करती कल्लोलिनीया और इन सबके बीच उच्चस्थ शिखरों पर एकाकी कंदराओं तक की दुर्गमता को नापकर जीवन के मर्म को उद्घाटित करने को आतुर हुए कुछ मुट्ठी भर मुमुक्षुओं की शरणस्थली बना हिमालय, सबकुछ इतना अद्भुत, इतना गतिमान और इतना ओजमयी कि जी चाहता है, समय कुछ घड़ी ठहर जाए तो मैं विधु की इस सर्वोत्कृष्ट अभिव्यक्ति को सदा-सदा के लिए अपने अभ्यंतर में उतार लूँ। इन क्षणों को जीवन का पाथेय बनाकर कण-कण में अभिव्यक्त होती विराट् के इस शुचि-अस्तित्व की छवि में स्वयं को घोलकर तो मेरी समस्त जड़ता, अल्पज्ञता तत्क्षण विलीन हो जाती है। श्वास-प्रश्वास घुलते हिमशिखर मुझमें एक शीतल शून्य को भरते जाते हैं और तब मैं नतमस्तक हो कह उठती हूँ हे दिव्यात्मा! हे योगिराज! तुम से ही यह भूमि देवभूमि है, हे महात्मन! तुम भारत का गौरवगान हो, तुम हमारे पुरखों के पुण्यों का प्रसाद हो, तुम महर्षियों की मनश्चभूमि का आदि प्रमाण हो, तुम सचमुच ही रुद्र महाकाल का अतुल्य भाल हो, हे नगराज! तुम अनंत अपार हो।

पूरी दुनिया में अनेकानेक स्थल पर्यटन के लायक है, फिर भी क्यों हिमालय ही बार-बार मुझे बुलाता है, मुझे लगता है कि वह मुझे पुकारता है, जैसे गड़रिया अपनी खोई हुई भेड़ों को पुकारता है और उसकी एक पुकार पर दूर कही वन्य प्रांत में अपनी मस्ती में मग्न चरती भेड़ सबकुछ भूलकर आवाज की दिशा में व्याकुल हो दौड़ पड़ती है, वैसे ही मैं भी दौड़ पड़ती हूँ। और जब उस तक पहुँच जाती हूँ तो अवाक् सी, ठगी सी खड़ी रह जाती हूँ। कुछ पल के लिए कुछ भी नहीं सूझता, बस एक अपलक निहोरा, कोई चेत नहीं, कोई सुधि नहीं निस्पंद, निर्वात, निर्निमेष ठगी सी आत्मविस्मृत अपलक ठहरी, शेष कुछ भी नहीं रहता मुझ में। शायद मेरी अस्थिरता हिमवान की स्थिरता में समा जाती है। मैं मैं नहीं रहती शायद हिमांश हो जाती हूँ। हर बार यही होता है, अनोखी अनुभूति जिसे शब्दों में बाँधना दुश्वार है, जिसका स्वाद उसी प्रकार अव्यक्त रह जाता है, ज्यों गूँगे को गुड़ का स्वाद। अनायास मैं अपने जीवनसाथी द्वारा झिंझोड़कर जगाई जाती हूँ और उँगली से इंगित कर ये कह उठते हैं—“देखो तो कहाँ खोई हो? देखो उधर कितना सुंदर दृश्य है।” मैं अपनी चिर अभीप्सित चंद्रशिला की चोटी पर खड़ी हूँ। मेरे समक्ष खुले आसमानी वातायन में झाँकती गगनचुंबी चौखंबा, नंदादेवी, त्रिशूल और केदार डैम की हिम शृंखलाएँ हैं। मेरे पैरों तले हिम, समक्ष हिम, चतुर्दिक् रुपहली आभा लिये हिमगिरि का मौन साम्राज्य, आकाश की ओर शीश उठाए एकमिक होती धवल चोटियाँ नीरवता में बोलती ठंडी हाड़ कँपा देने वाली मंद वायु से बातें कर रही है। मेरा रोम-रोम वायु स्नान कर रहा है। इस वक्त मेरा अंतर तर हो चुका है। मेरे समक्ष विशाल हिमालय खड़ा है। हिमालय अर्थात् अनजानी डगर, अधखुली पगडंडियाँ और मौन का निर्वासित साम्राज्य। जब भी कहीं घूमने की बात होती है तो मैं सुदूर हिमालय के तलहटी के प्रांतर को ही क्यों चुनती हूँ? अकसर घर में सभी पूछते हैं कि हर बार वही क्यों? और मैं हँसकर कहती हूँ, क्योंकि वह मेरा आत्मीय है, सगा लगता है।

कितना अनुपम, स्वाभाविक, सजीव, संवेदनात्मक, चित्रोपम, रोमांचक और रमणीय है हिमालय, बताओ तो कोई और दूजा है उसके जैसा? जगत् के जटिल रागात्मक संबंध सुख की सृष्टि तो कर सकते हैं, पर आनंद का वर्षण नहीं कर सकते, किंतु आत्मीय संबंधों की प्रगाढ़ता में मेरा परम-आत्मीय हितैषी हिमालय मुझे अपने दुर्गम थका देनी वाली यात्रा के बावजूद सुख, सुकून और आनंद सब देता है। आखिर क्या है ऐसा हिमालय में, जो दुनिया में अन्यत्र नहीं?

दुनिया की भीड़ में कितना शोर-शराबा, कितना कोलाहल, कितना बकझक है। वहाँ कर कोई बोल रहा है, सब सिर्फ कहना चाहते है, किंतु कोई किसी को सुनना नहीं चाहता। हर कोई स्वयं को सत्यार्थी समझता है, अभिव्यक्ति के नैसर्गिक प्रवृत्ति में लीन मनुष्य यह भूल चुका है कि बोलने के लिए सिर्फ एक मुँह और सुनने के लिए दो कान दिए गए हैं। हर कोई सिर्फ अभिव्यक्त होने को आतुर है, ज्यों भरा हुआ गुब्बारा हो, छूते ही फट पड़ेगा। मनुष्य के भीतर का कोलाहल जब बाहर फूटता है तो बाहर भी गुलाब तो नहीं उगाएगा सिर्फ शैवालों को ही जन सकता है। सार्थक संवाद की गुंजाइश भी तभी हो सकती है, जब भीतर के घड़े में शांत जल हो। मानसी सरोवर की अशांति के उथले मलिन जल पर सिर्फ शैवाल ही जन्म ले सकते हैं, कमल नहीं। मनुष्य के भीतर की विषाक्त जलकुंभी का जाल इतना गहन, इतना विस्तीर्ण हो चुका है इतना कीच युक्त दलदली होता है कि वह जलकुंभी बाहर आने को उतावली हुई बैठी है, भीतर जो बीज है, वही नाल ही तो बाहर आएगी न? भीतर जलकुंभी हो तो बाहर कमलनाल कैसे आ सकती है? इसलिए दुनिया के कोलाहल में सिर्फ विष है, विषधर है जो डसने के लिए शिकार की घात लगाए बैठा है और कोई भी नीलकंठ यहाँ उपलब्ध नहीं, जो लोकहितार्थ उस विष को कंठस्थ करने को उद्यत हो।

जगत् का कोलाहली जहरीला धुँआ सबको पार्थिव, क्षुब्ध कर देता है, छिन्न-भिन्न हुआ, आहत मानसिक-क्षयरोगी हुआ मनुज नीरव सन्नाटे और शांति को तलाशता दूर-दूर बहुत दूर किसी नीरव चुप्पी में जाना चाहता है। स्वयं मनुष्य के द्वारा पैदा किए तमाम आडंबरी संसाधन उसे अल्प जान पड़ते हैं और असुविधाओं में, दुर्गमता में अगम शांति को खोजता किसी हिमगिरि शृंग की सन्निद्धि तलाशता हिमालय की गोद में आ पहुँचता है। हिमालय स्वयं भी मौन है और उसके मौन साम्राज्य में प्रवेश करते हैं, सबकुछ मौन हो जाता है। सारे प्रश्न तिरोहित हो जाते हैं, वह किसी भी क्रिया की कोई प्रतिक्रिया कभी नहीं देता। मौन शीतल होता है, ठंडेपन का द्योतक है, इसलिए दुनिया के उपद्रवों, हो हल्ला से विदीर्ण हुए मन का मानसोपचार कर अपनी मौनी सीवन देता हिमालय वर्षों से दुनिया से संत्रस्त हुए मनश्च का साक्षी चिकित्सक वैद्य रहा है। इसलिए हिमालय की सन्निद्धि में भोगी भी आते हैं और योग चाहने वाले उपासक भी। हिमालय उफ किए बगैर दोनों को बराबर छाँव देता है। कश्मीर से अरुणाचल तक विस्तृत देही से छाता बनकर भारत को छाँव देता, प्राचीर बनकर सुरक्षा देता हिमालय अपनी विशालता का गुमान नहीं करता, अपनी सर्वोच्च ऊँचाइयों पर उसे कभी तनिक भी दंभ नहीं हुआ। दिव्यता और पुण्य के प्रवाह का सेतु हुआ हिमालय देव, गंधर्व, यक्ष, किन्नरों के साथ मनुष्यों का भी उतने ही प्रेम से आतिथ्य सत्कार करता रहा है, कभी कोई भेद नहीं करता। जो जिस भाव से उसके पास आता है, वह वैसा ही पाता है। वह अपनी गोद में जितने प्रेम से ऋषियों की तपोवन संस्कृति को पालता है, उतनी ही प्रियता से देवों की रमण संस्कृति और मनुष्यों की रोमांच संस्कृति को भी पोषित करता है।

जिसकी जैसी पिपासा उसके लिए वैसा ही हिमालय। हिमालय यानी प्रेम का देवालय। प्रेम अर्थात् देहोपरि उद्गार, सहजीवन का अमृत आधार, चेतन्य-अचेतन्य के मिलन का अंतरद्वार, आकाशोन्मुखी सौम्य प्रवास, अंतर्मन का जीवंत तेजोमयी संवाद, परिमल का तरंगित नाद, आत्मसम्मोहन की तंद्रा से उन्मुक्त हुआ वाक, प्रेम, अर्थात् संवेदना के शिखर का अनुपम उपहार। कभी-कभी मैं सोचती हूँ कितने विपरीत गुणों को धारण किए हुए है हिमालय। स्पंदन रहित पर संवेदनशीलता का चरम, निशब्द होकर भी बहुभाषी, अटल अभेद्य होकर भी कितना ऋजु और मृदुल, आर्द्र होकर भी कितना अनाविल, प्रेमिल होकर भी निःस्वं, एकाकी होकर भी कितना सहिष्णु, ऐंद्रजालिक होकर भी इंद्रियातीत, अगम्य और दुर्बोध होकर भी दर्शनीय व आद्योपांत जानने योग्य। दिनांत की टहनी पर मुसकराते हुए हिमगिरि को देखकर आत्मलीन होना कितना स्वाभाविक हो जाता है। चतुर्दिक् परिवेश अत्यंत सुनसान और दिव्य है और जब इनसान निपट अकेला हो तो स्वयं से जुड़ना, आत्मलीन होना, आत्मसंवाद कर पाना सहज सरल हो जाता है। दुनिया की बकबक, चिल्लाहट, कोलाहल से जीर्ण-शीर्ण हुआ मन हिमालय के सन्नाटों में इतना ऐक्य भाव में रम जाता है कि द्वैत रह ही नहीं जाता, संभव है, इसलिए हिमालय अनादि काल से ही ऋषियों, महर्षियों, मुनियों की प्रिय शरणस्थली और कर्मभूमि रहा है। अद्भुत तथ्य यह भी है कि ऊँचाई पर खड़े व्यक्ति को नीचे की दुनिया कितनी निम्न और छोटी दिखाई पड़ती है शायद यही कारण है कि उच्च भूमा पर खड़े मनस्वियों को जगत् के प्रपंचों में लीन संसारियों के स्वार्थी कुकृत्यों पर क्रोध नहीं आता अपितु उनकी मूर्खताओं पर दया ही आती है। शायद हिमालय को भी हम सब मूर्खों पर जरूर दया ही आती होगी।

ऊँचाइयों पर विराजे हिमगिरि की दिव्यता तक पहुँचना उतना आसान भी कहाँ है? क्योंकि बने बनाए सहज सुविधाजनक मार्ग उस तक नहीं पहुँचा सकते हैं, उस दिव्यता तक पहुँचने के लिए अनेक दुर्गम चढ़ाइयाँ बड़े जीवट से ऐकांतिक ही पार करनी होती हैं, अबूझ हिमवंत की देह पर अपनी पगडंडियाँ स्वयं बूझनी, गढ़नी होती हैं और लुढ़कनों, उतराइयों पर सभ्य, शालीन, समदर्शी एव विनम्र बने रहना होता है, महातपा हिमालय के दिव्य पथ का राही अपने शुष्क होंठों पर जुबान फेरकर गिला तो कर सकता है, पर बिल्लोरी झरनों के गमकते पानी को पीने की लालसा में उसे संयमित भी रहना पड़ता है। प्यास चाहे कैसी भी, किसकी भी हो, इंद्रियों का संयम आवश्यक है, प्रतिपल फिसलनों पर पैर जमाकर रखते हुए दृढ़ प्रतिज्ञ हुए बगैर, मृत्यु के आसन्न भय पर विजय प्राप्त करके ही उस दिव्यता को प्राप्त हुआ जा सकता है। पीछे पुकारते संसार के आकर्षणों से मुक्त और बेखबर हुए बिना उस दिव्यात्मा को प्राप्त करना असंभव है। दुस्साहसी और फकीर हुए बिना हिमालय से मिलना असंभव है। अगर इतना आसान होता हिमालय होना तो कितने ही उससे हिमगिरि होते और इतना सरल होता हिमगिरि से मिलना तो प्रत्येक व्यक्ति पहुँच चुका होता, पर विरले कदम ही मुमुक्षु होते हैं, कुछ तो पथ की विकटता से मध्य से ही लौट जाते हैं और जो नहीं पहुँच पाते, उनके लिए हिमगिरी-शृंग खट्टे अंगूर होते हैं और प्रायः उन्हें ही यह कहते हुए सुना जाता है कि आखिर वहाँ रखा ही क्या है? मुमुक्षत्व इतना सरल नहीं होता और बिना मुमुक्षु हुए हिमालय कभी नहीं मिलता। पर आश्चर्य की बात यह है कि मुमुक्षुओं की कोई कमी किसी युग में भारत में नहीं रही, क्योंकि शायद अगम्य को पाने की नैसर्गिक इच्छा मानव कभी मार नहीं पाया है। अव्यक्त का सौंदर्य सदा मनुष्य को आकर्षित करता आया है, प्राप्य की कद्र करना इनसान के कभी बस में नहीं रहा और अप्राप्य का आकर्षण उसे लुभाता है।

हिमालय भी हिमालय ही है, ज्यों-ज्यों उसकी ओर बढ़ते जाते हैं, वह और भी दूर सरकता प्रतीत होता है, अपनी ओर आते कदमों की आहट सुन चौकन्ना हो जाता है, कभी हुंकार भरकर डराता है तो कभी बर्फीले तूफान भेजकर परीक्षा लेता है, कभी उसकी देह की दरारें निगलने का प्रयास करती हैं तो कभी हाड़ कँपाने वाले शीत अस्थियों की गरमाहट खींच लेती है। पर जो अपनी पगडंडियाँ खुद गढ़ते हैं, वह कदम कब रुकते हैं! दूसरों के बनाए सहज-सरल रास्ते सुख-सुविधाएँ तो दे सकते हैं, परंतु जीवट और आनंद नहीं दे पाते। खुद की गढ़ी, चाहे छोटी ही सही, अपनी पगडंडियाँ आत्मसम्मान का भाव पैदा करती हैं, जीवट से चुनौतियों का सामना करने की हिम्मत देती है। इन टेढ़ी-मेढ़ी वक्र पगडंडियों पर हुनर और हौसले के पग रखते वे हिमालय को औचक जा मिलते हैं। उस ऊँचाई पर पहुँचने पर अपने पराए राग द्वेष का भेद तो दृष्टव्य ही नहीं होता, बस विराट् के समूचे अस्तित्व में घुल के हिमालय हुए मन को पूरी धरती ही अपना नन्हा सा घर लगती है। वहाँ पहुँचकर ही वह समझ पाता है कि ऊँचाइयों पर तमाम क्षुद्रताएँ विलीन हो जाती हैं और समरूप एकता ही दृष्टव्य होती है। वसुधैव कुटुंबकम् की अनुभूति ऊँचाइयों पर ही संभव है, क्योंकि वहाँ कुछ भी लघु व्यापक नहीं रह जाता, सब मिलाकर पूरी पृथ्वी ही एक कॉलोनी नजर आती है। हालाँकि यह मार्ग बहुत कठिन और अनजाना है, किंतु मार्ग की विप्लवी कठिनाइयों, चुनौतियों को जो सहज गले लगाता जाता है, अपना मान आलिंगन कर लेता है, फिर उसे वे नहीं सताती, नहीं डराती, उसके लिए मार्ग प्रशस्त कर देती है और हिमालय तक पहुँचा देती है।

नगराज हिमगिरि की धवलता लकीर के फकीरों के लिए अप्राप्य ही है, पर नवोन्मेषी साहसियों को वे सद्भावना से गले लगाती है। पवित्र हुए बगैर पवित्रता को न तो समझा जा सकता है और न ही पाया जा सकता है, इसलिए हिमालय आर्द्र होकर भी मलिन नहीं होता। हाथ के स्पर्श से छू भर लेने से भरभराकर गलने की संवेदनशीलता हिमगिरि की महानता है। वह सदियों से खड़ा है, सदियों से गला है फिर भी अशेष है, क्योंकि संवेदना का शिखर गलता जरूर है, क्योंकि उसके गलने से ही देवपगा भगीरथी मंदाकिनियों की जीवनदायी प्रार्थनाएँ लिखी जा सकती हैं, परंतु जो परोपकार में गलने का हुनर जानता हो, उसकी अचल छवि कभी धूमिल नहीं हो सकती, इसलिए कटकर, छँटकर, बँटकर, गलकर भी हिमालय आज भी सम्मुख खड़ा है। उसकी अस्थिरता में भी धीर थिरता है और स्थिरता में भी एक वक्र गति है, जिसे समझना टेढ़ी खीर है। उसका अस्फुट सौंदर्य यही है कि उसमें हर विपरीत गुण का चरम संयमित सामंजस्य है। वे अबोला भी बहुत कुछ अभिव्यक्त करता है और मौलीक अभिव्यक्तियों के बाद भी सघन खामोश है। कभी-कभी मैं सोचती हूँ कि अगर हिमालय बोलना शुरू कर दे तो हमारा क्या होगा? छोटी-छोटी उपलब्धियों पर आत्मप्रवंचना में रत होकर स्वयं के गुणगान करते हम मनुष्यों का क्या होगा? किसी का थोड़ा सा हित करके बरसों तक उस पर अहसान जताते हम मनुष्य किस प्रकार उसे मुँह दिखा पाएँगे? आत्मश्लाघा में तत्पर अपनी डफली कूटते हम मनुष्य किस प्रकार उस नगराज का सामना कर पाएँगे? किसी को चार आने दान में देकर हम अपनी स्व प्रशंसा के गीत गाते नहीं अघाते, स्वयं को दानवीर समझ भामाशाह सम्मानों से लेस होने का जतन करते हैं, उस महान् दाता का हम निर्लज्ज हुए मनुज कैसे ऋण उतार पाएँगे, जबकि हम सभी सदियों से उसके ऋणी हैं? हम किसी की एक कमजोरी, एक बात तक को कभी गुप्त नहीं रख पाते उसे भी भुनाने का जतन कर स्वयं लाभ उठाने के कोशिश करते हैं, ऐसे में सदियों से हमारे अतीत की संपूर्ण गाथाओं को अपने सीने में दबाकर बैठा हिमालय अगर बोलने लग जाए और हमारी ही औकात पर उतर आए तो हमारा क्या होगा?

और सब से बड़ी बात मनुष्य छलावों और झूठ के व्यूह गढ़कर अपनी जिन भ्रमित ऊँचाइयों का जी भर बखान करता है, सुविधाओं के अंबार में दोगले चरित्र को जीता उपलब्धियों का जीना चढ़ने, जाने कितने दरवाजे खुद गढ़ता है, कितनी ही दीवारें बनाता है और दरवाजे बंद मिलें तो अनजान खिड़कियों से भी कूद जाता है। हाँ, खुद की बनाई दीवारों को खुद गिराने में वह अल्प समर्थ होता है और उन्हीं दीवारों से घिर उन्हीं में सिर पटकता रहता है, वे दीवारें भी उसके झूठ को नहीं छुपा पाती है, क्योंकि मनुष्य भूल जाता है कि सच को झूठ तो आसानी से बनाया जा सकता है, पर झूठ को सच कभी नहीं बनाया जा सकता। सत्य को गहरे कही जमीन में दफन कर दो, गाड़ दो तब भी एक-न-एक दिन वह जमीन खोदकर बाहर आ ही जाता है, सत्य मुखरित होता है, तब मनुष्य की बनाई कोई दीवार न तो उसे पनाह देने में समर्थ होती है और न ही कोई दरवाजा, खिड़की उसके काम आती है। सत्य अवधूत शिव की भाँति स्वयं भी नग्न होता है और आदमी को भी तमाम ओढ़े हुए चोलों को एक-एक कर अनावृत करता नग्न करता जाता है। इस प्रकार एक-न-एक दिन खुद के बनाए चक्रव्यूह में मनुष्य खुद ही कुंठित हो फँसकर उलझ जाता है, तब इस बेतुके कोलाहल में उसे बचाने कोई नहीं आता और तब रोगी मनो-मस्तिष्क को चिकित्सक द्वार हिमगिरि याद दिलाया जाता है। जिसे जीवन भर हिमालय कभी याद न आया उसे भी नगराज तुम सहलाकर सहारा देते नजर आते हो। तब भी तुम कुछ नहीं बोलते, मौन ही मुसकराते हो। हे मौनी नगराज! तुम सचमुच अद्भुत हो, बेजोड़ हो, दिव्य हो!

हिमालय तुम पर न तो कोई दीवार है, न ही कोई दरवाजा, न ही कोई खिड़की, न ही कोई प्राचीर, तुम विधाता के मुक्त आँगन की चिहुँकती खिलखिलाहट हो, मौन के तटस्थ द्वंद्वरहित, निरपेक्ष प्रांगण में बर्फ की शीतलता के बीच अगन के ज्वालामुखी बरसों से दबाए हिमालय, यदि तुमने मुँह खोला तो हमारी अति वाचाल तृषा कहाँ जाकर तृप्त होगी? फिर हम सब का क्या होगा, यह विचारणीय है? इसलिए हे हिमराज! तुम सबके राज जानकर भी जो मौन खड़े हो, वही श्रेयस्कर है, तुम ऐसे ही मौन बने रहना, क्योंकि मौन और चुप्पी में बड़ा भारी अंतर होता है, कुंठाओं में घिरा मनुष्य चुप तो रह सकता है, पर मौन नहीं हो सकता और दुनिया के इस अजब-गजब खेले में एक तुम्हें छोड़कर सब अपना-अपना राग गाने में व्यस्त, मस्त है और फिर एक दिन थके हारे, टूटे, हताश, पस्त होकर वे तुम्हें निहारकर ही शांति पाते हैं, क्योंकि मौन के विटप पर ही शांति के फूल खिलते हैं, अतः हे हिमालय! तुम सदा मौन ही रहना, यहाँ बोलने वाले महारथी बहुत हैं, तुम कभी न बोलना, इसी में हम सबका हित है। तुम्हारी दुर्गमता ही तुम्हारा अभेद्य कवच है, जिसमें तुम्हारी अवधूत निर्मलता दुनिया के मायावी फरेबी जालसाजियों से अक्षुण्ण रही है, उसका रंग तुम पर न चढ़ सका है। पगडंडियों की विषमताओं ने तुम्हें भ्रष्ट नजरों से सदा बचाए रखा है। जिन विरल मुमुक्षुओं को तुम प्रिय हो, वे तो बिन शिकवा-शिकायत उसे नाप ही लेते हैं, जिन कामियों को तुम प्रिय हो, वे तुम्हारी तलहटियों में ही पहुँचकर खुश हैं, जिन जिज्ञासुओं को तुम्हारी देह नापनी है, वे मृत्यु से खेलकर भी तुम तक आ ही जाते हैं और तुम निरपेक्ष साक्षी मौन हुए सबको सहारा देते हो, कुछ नहीं कहते। दुनिया के बकवादी सर्कस में पथभ्रष्ट हुई मनुजता को राह दिखाते हिमगिरि तुम मौन ही रहना, तुम्हारा निष्ठुर निस्तब्ध अनिश्चित गंतव्य तुम्हारी मौन हुई अनिश्चित संभावनाओं का ऊर्जस्वित द्वार है, दुनिया के मायावी निस्तेज दस्युओं के विक्षिप्त कोलाहल से दूर अनभिज्ञ निश्छल है, हे महामना! हिमगिरि तुम कभी न बोलना, मौन ही रहना, तुम्हारी वक्तृता पर हमें तनिक भी संदेह नहीं।

नीता चौबीसा

‘सर्वमंगला’ 73,
वृंदावन कॉलोनी, सुभाष नगर,
बाँसवाड़ा-327001 (राज.)

दूरभाष : 9414567748

जुलाई 2022

   IS ANK MEN

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