शिक्षा 'गुरुकुल' से लेकर 'गृहकुल' तक

शिक्षा 'गुरुकुल' से लेकर 'गृहकुल' तक

जैसा सबको ज्ञात है कि भारत में शिक्षा के केंद्र गुरुकुल होते थे। जातिगत आधार पर ब्राह्म‍ण की भूमिका शिक्षक की थी। तब के राजकुल के होनहार युवराज यहीं शिक्षा ग्रहण करते थे। आज के विपरीत, न तब सर्वशिक्षा अभियान था, न सरकारी और निजी स्कूल। न महविद्यालय थे, न विश्वविद्यालय। ब्राह्म‍ण गुरु अपने आश्रम में गुरुकुल संचालित करता और वहीं क्षत्रिय कुँवर पधारते। इस संदर्भ में महाभारत में वर्णित गुरु द्रोणाचार्य का आश्रम प्रसिद्ध है। कौरव-पांडवो भी अपनी शस्त्र-शिक्षा के लिए वहीं आए। जैसा स्पष्ट है कि राजकुमारों के ज्ञान का क्षेत्र न राजनीति-शास्त्र था, न दर्शन, वह केवल तब के अस्त्र-शस्त्र चलाने की विशेषज्ञता तक सीमित था। गुरु द्रोण को धनुर्विद्या में पांडवों के अर्जुन सबसे प्रतिभाशाली और अपने प्रिय शिष्य लगते। उनकी इच्छा और आकांक्षा थी कि अर्जुन भारत के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धारी बनें। वह इसी दशा में प्रयत्नशील भी थे।

इसी बीच शृंगवेर के निषादराज के पुत्र युवराज एकलव्य को वह धनुर्विद्या का प्रशिक्षण देने से इनकार कर चुके थे। किसी निषाद को शिक्षा देना उनके लिए वर्जित था। एकलव्य स्वभाव से अवश्य हठी रहे होंगे। यों किसी भी विषय के ज्ञान की लगन भी बहुधा हठ का रूप ही ले लेती है। एकलव्य ने द्रोण के आश्रम के निकट ही जंगल में अपना आश्रय बनाया और गुरु द्रोण की माटी की मूरत रचकर, उसी की साधना से धनुर्विद्या के निरंतर अभ्यास में जुट गए।

हमें कभी-कभार आश्चर्य होता है। एकलव्य कैसे गुरु की प्रतिमा का ध्यान कर अपने क्षेत्र के इतने योग्य, कुशल और प्रतिभाशाली धनुर्धर हो गए, जबकि सरकार के गुरु और पुस्तकालय में पुस्तकों के भंडार के बावजूद आज के छात्र बी.ए., एम.ए. की डिग्री प्राप्त कर कहने को शिक्षित कहलाते हैं, पर अपने विषय के क्षेत्र में निरक्षर के निरक्षर ही रह जाते हैं। वर्तमान समय में निष्कर्ष यही निकलता है कि ज्ञान और डिग्री का कोई ताल्लुक नहीं है। कोई हिंदी या अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. करे और तब भी दो-चार वाक्य सही लिखने तक में असमर्थ हो तो अचंभित नहीं होना चाहिए। तभी तो हम छात्रों को सिखाते हैं, “यारो! सब चलता है, बस परीक्षा में तनाव से बचो।” यों भी कौन सी नौकरी डिग्री से सुलभ या संभव है? वर्तमान सफलता का एक ही सूत्र ‘जुगाड़’ है। जिसे इस जुगाड़ में महारत है, कामयाबी उसके कदम चूमती है।

शायद महाभारत काल में जुगाड़ का पर्याय ‘द्यूत-क्रीड़ा’ था। कौन कहे, आमजन में यह जुगाड़ जैसी लोकप्रिय थी कि नहीं? हो सकता है कि शकुनि का शौक केवल राजा-महाराजाओं का व्यसन रहा हो? बहरहाल, बात एकलव्य की चल रही है। एक दिन गुरु द्रोण अपने शिष्यों को लेकर वन-भ्रमण को निकले। आज के समान उस वक्त भी समर्थ और समृद्ध कुत्ता पालते थे। जंगल-भ्रमण में गुरु के साथ उनके शिष्य और उनका पालतू श्वान भी था। कुत्ता दौड़ते-दौड़ते एकलव्य के आश्रम तक जा पहुँचा और स्वभावानुसार अजनबी व्यक्ति को देखकर उस पर भौंकने लगा। कुत्ते की अनचाही भौंक से एकलव्य की साधना में विघ्न पड़ा। उसने अपनी धनुर्विद्या का सार्थक प्रयोग करके अपने तूणीर के तीर से कुत्ते का मुँह ऐसा बंद कर दिया कि उसकी भौंक ही न निकल पाए।

महत्त्वपूर्ण तथ्य इस पूरे प्रकरण में यह रहा कि कुत्ते के शरीर को और कहीं रत्ती भर भी हानि न हुई। जब गुरु द्रोण ने मुँह-सिले कुत्ते को देखा तो वह भी तीरंदाजी की इस अद्भुत प्रतिभा से चकित रह गए। उनके अनुभव में अब तक केवल अर्जुन ही ऐसा धनुर्विद्या का अचूक विशेषज्ञ था कि उसका निशाना कभी न चूके। प्रशिक्षण के दौरान एक बार उन्होंने पेड़ पर बैठी चिड़िया की आँख का लक्ष्य-भेद करने का निर्देश अर्जुन को दिया और उससे जानना चाहा कि ‘शिष्य, तुम्हें क्या-क्या दिख रहा है?’ अर्जुन का ध्यान इतना एकाकी था कि उसे न वृक्ष दिखा, न डाल, न पात, उसकी दृष्टि उस समय केवल चिड़िया की आँख के लक्ष्य पर केंद्रित थी। इस एकाग्र ध्यान से जब उसने अपने धनुष से तीर चलाया तो चिड़िया का आँख का लक्ष्य कैसे बचता? एकाग्र मन से ध्यान और लगन-परिश्रम से लक्ष्य की प्राप्ति ही सफलता का इकलौता गुर है।

गुरु द्रोण का विचार था कि यह गुण सिर्फ अर्जुन में विद्यमान है। धनुर्विद्या का ऐसा सिद्ध कौशल और किसी के पास होना कैसे संभव है? जब उन्होंने एकलव्य को उस वन-आवास में देखा तो वह भौचक्के रह गए। उन्हें उसका चेहरा कुछ परिचित सा लगा। जब तक वह इस दिशा में कुछ और सोच पाते कि एकलव्य ने खुद ही जाटिल पहेली सुलझा दी, “गुरुदेव! मैं आपके आश्रम में गया था, आपका शिष्य बनने। आपने मेरा परिचय जानकर मुझे शिष्य बनाना अस्वीकार कर दिया। इससे अंतर में कुछ प्रारंभिक निराशा तो हुई, पर मेरे मन में आपके शिष्यत्व का दृढ़ निश्चय डिगा नहीं, मैंने आपकी माटी की मूर्ति बनाई और उसकी साधना से धनुर्विद्या का कौशल प्राप्त किया है।”

एकलव्य की बात सुनकर द्रोण प्रभावित तो हुए, किंतु उन्हें अपने प्रिय शिष्य अर्जुन का ध्यान आया। न एक म्यान में दो तलवारें रह सकती हैं, न भारत में दो सर्वोच्च धनुर्धारी। सर्वश्रेष्ठ तो एक ही होता है। यदि एकलव्य ऐसा ही समर्थ और कुशल रहा तो अर्जुन का क्या होगा? भले ही एकलव्य निषादों का राजकुँवर है, पर है तो राजकुमार ही। उसकी प्रतिभा भी भारत में कीर्ति कमाएगी। अर्जुन से उसकी तुलना होनी ही होनी। कुत्ते का मुँह तीरों से सिलकर उसने जो कमाल दिखाया है, वह अर्जुन की निशानेबाजी से कतई कमतर नहीं है। निशाना अर्जुन से बेहतर हो न हो, बराबर तो है ही।

उस समय न फीस का दस्तूर था, न तकनीकी संस्थाओं के प्रवेश में डोनेशन का। गुरु के आश्रम में भोजन रहन-सहन फ्री, बस अंत में गुरु की इच्छानुसार गुरुदक्षिणा का चलन था। गुरुकुल, दान, दक्षिणा और राजा की भक्ति-श्रद्धा से चलते थे। एकलव्य भले ही गुरु की मूरत से सीखे हों, द्रोणाचार्य के शिष्य तो थे ही। वह स्वयं भी इससे इनकार नहीं करते थे। उलटे वह इसे अपना सच्चा सम्मान मानते। इन परिस्थितियों में जब द्रोण ने अपनी गुरु-दक्षिणा की इच्छा जताई तो एकलव्य सहर्ष उसके लिए प्रस्तुत हो गए—“आदेश करें गुरुदेव! क्या गुरुदक्षिणा स्वीकार होगी?” गुरु द्रोण के मन में तब न स्वर्ण मुद्राएँ थीं, न कुछ और इच्छा-आकांक्षा। उनके अंतर में केवल अपने प्रिय शिष्य अर्जुन का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धारी बनने का भविष्य था। उन्होंने तत्काल एकलव्य के दाएँ हाथ के अँगूठे की गुरुदक्षिणा का निर्देश दे डाला। बिना अँगूठे एकलव्य धनुष-बाण कैसे चलाएगा? इससे अर्जुन के प्रतियोगी बनने का प्रश्न ही नहीं उठेगा, न वर्तमान में, न भविष्य में।

एकलव्य भी कोई सामान्य धातु का न बना था। जिसे मन से एक बार माना, बस उसके सच्चे शिष्य थे। एक आज्ञाकारी शिष्य के नाते, बिना किसी हीला-हवाला किए, तत्काल गुरु की आज्ञा का पालन करने, अपना दायाँ अँगूठा काटकर गुरुद्रोण को अर्पित कर दिया। कौन कहे, इतिहास में इस प्रकार के त्याग का यह पहला और अंतिम उदाहरण है? आज शिष्य से ऐसे संबंधों की कल्पना भी कठिन है, वह भी एक ठुकराए हुए शिष्य से।

यों गुरुकुल की शिक्षाप्रणाली आज केवल अपवाद में प्रचलित है। न एकलव्य ऐसे शिष्य हैं, न द्रोणाचार्य ऐसे गुरु। कल-युग की वर्तमान सदी, हर हाल में भौतिकता की सदी है। वर्तमान में ‘गुरुडम’ का क्षेत्र व्यापक है। प्रारंभिक शिक्षा के दौरान गुरु जाति प्रथा का प्रचार पालन कर, प्रजातंत्र की जड़ों में मट्ठा देने का अपना पुनीत कर्तव्य निभाते हैं, बशर्ते वह गाँवों में रहें।

सच्चाई यह है कि इन प्राध्यापकों में से अधिकतर अपने गृहक्षेत्र में स्थापित है, गाँवों के स्कूल में उनकी हाजरी बराबर लगती रहती है। क्या पता, वह वहाँ किसी जात-भाई को अपने स्थान पर, नाम-मात्र के भुगतान पर, नियमित हस्ताक्षर करने के लिए नियुक्त भी कर देते हों? वह स्वयं वेतन लेने के लिए माहवारी दुर्घटना के बतौर गाँव सिधारते हों? इन्हें स्कूल का ‘भूत’ कहना अधिक उचित होगा। विशेष अवसर पर वह हमेशा यहाँ मौजूद है। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में ऐसे आदर्श गुरु सर्वोपरि हैं। वह विधायक के प्रिय हैं। चुनाव के दौरान थोक में गाँव और आसपास के वोट उनका जिम्मा जो ठहरा। स्कूल निरीक्षक के दफ्तर की हर खबर पर उनकी नजर है। निरीक्षण के दौरान स्कूल में उनकी उपस्थिति अनिवार्य हैं। संक्षेप में कहें तो ऐसे गुरु शिक्षा के अलावा हर क्षेत्र को कृतार्थ करते हैं। कुछ की परचून की दुकानें हैं, कुछ की चाय-समोसे की। उनका जीवन एक मुनाफे का धंधा है। वह अनुकरण के हेतु चलते-फिरते, जीते-जागते, इसके साक्षात् उदाहरण हैं। गुरु द्रोण ने तो केवल शिष्य एकलव्य का अँगूठा कटवाया, वह हर संपर्क में आने वाले की और खुद के कर्तव्य की जेब काटते हैं। यह तो केवल जूनियर गुरु है, इनके सीनियर अवतार भी हैं, जो महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों की शोभा बढ़ाते हैं।

सीनियर गुरुओं के कारनामों का किसी लेख के आकार में समाना कठिन है, फिर भी प्रयास करने में क्या हर्ज है? इन्होंने पारंपरिक पीठ-खुजाई को एक कमाऊ धंधा बना लिया है। एम.ए. आदि स्नातकोत्तर परीक्षाओं में लिखित के साथ एक मौखिक परीक्षा भी होती है। दोनों के अंक मिलाकर अंतिम परिणाम बनता है। उससे ही तय होता है कि कौन किस श्रेणी में उत्तीर्ण हुआ—प्रथम, द्वितीय या केवल पास? गुरु एक-दूसरे से सौदेबाजी करते हैं, “तू मुझे परीक्षक बना, मैं तुझे।” मौका मिला तो छात्रों से अपना हिस्सा ऐंठने से भी उन्हें ऐतराज नहीं है। यह उनका सौभाग्य है कि उनके ‘योग्य’ और ‘प्रतिभाशाली’ शिष्य, जो वसूली के बिचौलिए हैं, हर शहर में मौजूद हैं।

हमारे सीनियर गुरु जनता से ऐसे जुड़े हैं कि किराया फर्स्ट क्लास या ए.सी. फर्स्ट का लेकर वह सफर जनता के क्लास में ही करते हैं। कुछ का तो साहसिक आम नागरिक के समान बेटिकट यात्रा में विश्वास है। भारतीय रेल जनता की संपत्ति है तो उसका कैसा भाड़ा और है भी तो क्यों भाड़ा? उनसे कोई तर्क में जीते तो वह टिकट लें। वह तो उनके प्रिय और चुनिंदा शिष्यों को गुरु की इज्जत का ध्यान है। इसलिए वह गुरु के कार्यक्रम के अनुसार, चंदा करके निर्देशानुसार जनता क्लास का टिकट खरीद देते हैं। वह जानते हैं कि सिर्फ और सिर्फ यात्रा के मामले में गुरु आम आदमी के समकक्ष हैं, वरना ज्ञान, कमाई, संपत्ति, संपर्क, लेखन, जुगाड़ आदि में वह अपनी मिसाल खुद हैं। किसी भी सामान्य या साधारण व्यक्ति से उनकी तुलना कैसे संभव है? वह सभ्यता और संस्कृति की ऐसी रीढ़ की हड्डी हैं, जिस पर समाज का ढाँचा टिका है। बाकी सब तो कीड़े-भुनगे हैं? इनका कर्म केवल भिनभिनाना है। गुरु के अनुसार सबके अपने-अपने निर्धारित कर्म हैं। निरंतर अभ्यास उन्हें इनमें पारंगत बनाता है।

इसके अलावा सीनियर गुरुओं का काम प्रश्नपत्र बनाना, उनकी कुंजी लिखना और उसे छात्रों के हित में प्रकाशित करवाना है। कुंजी या गाइड लेखन इनके विपुल रचनात्मक साहित्यिक अवदान का द्योतक हैं। इसमें इनकी सानी नहीं है। यह वरिष्ठ गुरुओं की पारस्परिक प्रतियोगिता का विषय है। यह एक विवादित प्रश्न है कि किसका कुंजी-लेखन क्षेत्र में अधिक योगदान है? इसके सबसे योग्य निर्णायक छात्र हो सकते हैं जिनकी परीक्षा की सफलता, कुंजी-अध्ययन पर निर्भर है। वह भी इस बारे में एकमत नहीं हैं। कैसे हों? सीनियर गुरु ही उत्तर-पुस्तिकाओं के परीक्षक भी हैं। कई ऐसे जुगाड़ू हैं कि उनके पास अंक निर्धारण को सैकड़ों की संख्या में उत्तर-पुस्तिकाएँ आती हैं। सबको पढ़ना सीमित समय में संभव नहीं है। वह एकाध लाइन पढ़कर अपनी जन्मजात गुणात्मक प्रतिभा के आधार पर उत्तर-पुस्तिका को हाथ से तौलकर अंक देने में सक्षम हैं।

कहते हैं कि न्याय की देवी अंधी हैं। हमारे परीक्षक-गुरु दृष्टिधारी हैं। पर आँख को कहाँ-कहाँ कष्ट दें? कुंजी लेखन में या उत्तर-पुस्तिकाओं के परीक्षण में? आँखों के अत्यधिक प्रयोग से वह इनसाफ के अंधे देवी-देवता बनने से बचना चाहते हैं। ऐसे आँख के अन्य प्रयोग भी हैं। सुंदर शिष्याओं और पास-पड़ोस की अनवरत ताक-झाँक भी उनमें से एक है। वह सुंदरता के पारखी बिना बात के थोड़े ही कहलाते हैं। वह एक ओर प्रकृति-प्रेमी हैं, दूसरी ओर मानवीय सौंदर्य के। वह दोनों को सौंदर्य शास्त्र की निजी तराजू पर आँकने में समर्थ हैं। उनकी कई शिष्याएँ उनकी परख की साक्षी हैं। वह आपस में हास-परिहास भी करती हैं। “खूसट, सफल गुरु तो बन नहीं पाया, अब लव-गुरु बनने की ओर अग्रसर है।”

ऐसे लव-गुरु कभी-कभी त्रासदी के शिकार भी होते हैं। दुर्घटनावश, उनकी पिटाई से चतुर शिष्याएँ स्वयं तो बचती हैं, पर अकसर अपने प्रेमियों से करवा देती हैं। दीगर है कि इसके बाद हमदर्दी का प्रदर्शन भी उनका जिम्मा है।

हमारे एक मित्र हैं। वह दो कन्याओं के पिता हैं। उन्होंने ‘आदर्श पति’ के विषय का गहन और गंभीर अध्ययन-मनन किया है। उनकी मान्यता है कि हिंदी के पी-एच.डी. या शोधार्थी आदर्श पति की अर्हताओं की प्रतियोगिता की कसौटी पर पूर्णरूप से खरे उतरते हैं। उनके गाइड-गुरु अतीत की भाँति आश्रमवासी तो नहीं हैं और गुरुकुल के स्थान पर गृहकुल के स्वामी हैं। अपना आश्रम न बनवा पाना वर्तमान समय की विवशता है। आधुनिक शहरों में भूमि की सीमा है, उसके मूल्यों की नहीं। लिहाजा गुरु अपने भाइयों को बेदखल कर पैतृक आवास के फ्लैट में बसे हैं। इस गृहकुल में उनके छात्र शोध का तो कम, दैनिक जीवन के रोजमर्रा के कामों का अधिक प्रशिक्षण पाते हैं। शोध पूरी होते-होते वह झाडू-पोंछे से लेकर चौका-बरतन तक के विशेषज्ञ हो जाते हैं। हमने उनसे प्रश्न किया, “ऐसा क्या हिंदी के शोधार्थियों तक सीमित हैं?” उन्होंने हमारी जिज्ञासा शांत करने को उत्तर दिया, “दरअसल, हमें केवल अपने एक ही दामाद का अनुभव है वह हिंदी का पी-एच.डी. है। पढ़ाने में कैसा है इसका हमें पता नहीं है, पर बिटिया बताती है कि दर के कामों में उसका जवाब नहीं है। बस नाश्ता-खाना हमारी बेटी बनाती है, बाकी के कामों को वह दक्षता से निबटाता है। कौन कहे, दूसरे विषय के पी-एच.डी. भी इतने ही कुशल होते हों?”

हमें खुशी हुई। हमारे सीनियर गुरुओं ने ‘गुरुकुल’ की परंपरा निभाने का व्रत लिया हुआ है। उनके छात्र भी अधिक समय पुस्तकालय आदि में न बिताकर ‘गृहकुल’ में ही बिताते हैं। इतना ही नहीं, गुरुदक्षिणा का पावन कर्तव्य भी बाद के लिए न टालकर वह शोध के दौरान ही निभा लेते हैं। सबको ‘काल करै सो आज कर, आज करें सो अब्ब,’ जैसी कहावतें कंठस्थ हैं। वह इनका पालन करने के कर्तव्य के प्रति सजग हैं।

हमें शिक्षा की वर्तमान स्थिति से कुछ चिंता हुई। हमने अपने एक गुरु-मित्र से चिंता जताई। उन्होंने हमें आश्वस्त किया, “आप शोध के स्तर से न घबराएँ। हमारे साथियों का व्यवहार वर्तमान वक्त का दर्पण है, रग-रग में व्याप्त भ्रष्टाचार, हर क्षेत्र में कामचोरी, अक्षमता का दंश यह देश झेल ही नहीं रहा, उसके बावजूद प्रगति-पथ पर अग्रसर है तो शोध में कौन से सुर्खाब के पर लगे हैं? जीवन के दूसरे क्षेत्रों के स्तर पर आप ध्यान दें। वह सुधरा तो शिक्षा का अपने आप ही सुधर जाएगा।” उनके दिलासे के बावजूद हम फिक्रमंद हैं। इस संस्कारहीन शिक्षा से देश के बच्चे और युवाओं के भविष्य का क्या होगा? पर छात्र और शोधार्थी दोनों समवेत स्वर में हुंकारते हैं—

गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाँय।

बलिहारी गुरु आपकी, डिग्री दियो दिलाय॥

 

गोपाल चतुर्वेदी

९/५ , राणा प्रताप मार्ग, लखनऊ-२२६००१
दूरभाष : ९४१५३४८४३८ 

जुलाई 2022

   IS ANK MEN

More

हमारे संकलन