बालमन की खुशबू से महकती लय-ताल में गुँथी बाल-कविताएँ

बालमन की खुशबू से महकती लय-ताल में गुँथी बाल-कविताएँ

सुपरिचित लेखिका। कहानी, कविता, निबंध, बाल-कहानी, बाल-कविता आदि के विविध संकलनों एवं स्कूल के विविध पाठ्यक्रमों में रचनाएँ संकलित। पत्र-पत्रिकाओं में पाँच सौ से अधिक रचनाएँ प्रकाशित। आकाशवाणी से निरंतर रचनाएँ, साक्षात्कार व वार्त्ताएँ प्रसारित। साहित्य मंडल श्रीनाथद्वारा से श्री भगवती प्रसाद देवपुरा बालसाहित्य भूषण सम्मान प्राप्त।

 

उत्तम बालसाहित्य की कसौटी है, उसका बालकों से जुड़ाव। यह जुड़ाव जितना गहरा होगा, जितना अंतरंग होगा, उतनी ही रचना उत्कृष्ट होगी और बच्चों के मन में हमेशा बस जाने वाली। उसकी लोकप्रियता ही उसे सार्थक बनाती है। कौतूहल और जिज्ञासा शांत करने वाली कविताएँ बच्चों को बहुत पसंद आती हैं। जिसमें उनकी समस्या और समाधान हों, ऐसी कविताएँ बच्चे सबसे पहले पढ़ते हैं। स्थापित गीत, गजलकार बालस्वरूप राहीजी ने प्रौढ़ होते हुए भी बालकों की मानसिकता को ग्रहण किया है। उससे जुड़ते हुए उनके सरल मनोभाव, रंगीन सपने, छोटी-छोटी आशाएँ, आकांक्षाएँ, भोले शिकवे, ऊँची कल्पनाएँ, उनके संवेग सबको नजदीक से देखा-समझा और महसूस किया है, ये सब उनकी धड़कन और आँखों की चमक बनकर कागज पर उतर आए हैं। दादी-अम्मा मुझे बताओ, हम जब होंगे बड़े, बंद कटोरी मीठा जल, हम सबसे आगे निकलेंगे, गाल बने गुब्बारे, सूरज का रथ सहित बालस्वरूप राहीजी की अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। अब ये सभी कविताएँ बच्चों के लिए एक जिल्द ‘संपूर्ण बाल कविताएँ’ में संकलित हैं। ये कविताएँ बाल पाठकों को रिझाती हैं। उनके मन को ऐसे छूती हैं कि बच्चे इन कविताओं को कभी भूल ही नहीं पाते। राहीजी की ये कविताएँ उत्कृष्ट हैं। ये बच्चों के मन की और बच्चों के मन में हमेशा बस जाने वाली कविताएँ हैं। ये बच्चों के करीब उनके मन में पैठ कर लिखी गई कविताएँ हैं।

सच बात यह है कि बाल-प्रकृति को जाने बिना, उनके साथ खेलते-बतियाते बिना, सहज, स्वाभाविक और श्रेष्ठ कविता लिखी ही नहीं जा सकती। बच्चे किस स्थिति-परिस्थिति में क्या सोचते हैं, क्या करते हैं। उनकी क्रियात्मकता के पीछे कौन सा मनोविज्ञान है, इसे बालस्वरूप राहीजी जैसा कोई बालमनोविज्ञान का कुशल चितेरा ही पढ़ सकता है। उसके लिए बालक की दृष्टि चाहिए, बालमन चाहिए और बालबुद्धि चाहिए। ये तीनों राहीजी के पास हैं, जिन्होंने उन्हें बच्चों का सिद्धहस्त रचनाकार बनाया है। उन्होंने शिशु वर्ग, बाल वर्ग और किशोर वर्ग तीनों के लिए उनकी रुचि के अनुकूल मनोरंजक, ज्ञानवर्धक, प्रेरक शिशुगीत और बाल-कविताएँ देकर बालसाहित्य को समृद्ध किया है। बालस्वरूप राहीजी ने शिशुओं के लिए सरलतम भाषा में चित्रात्मकता लिये मजेदार, चटपटे, हास्य विनोद के मधुर गीत लिखे हैं। वहीं बालकों और किशोरों के लिए मनोरंजन के साथ मीठी सहज ही समझ आ जाने वाली सीधी उनके हृदय में उतर जाने वाली कविताएँ भी लिखी हैं, जिनमें लय और गुनगुनाहट का जादुई गुण है, जो उन्हें सम्मोहित करता है। राहीजी की ‘स्कूल ड्रेस’ कविता देखिए, जिसमें बेचारे गप्पूजी बेमतलब ही पिट जाते हैं एक तरह की ड्रेस पहनकर—

एक तरह की ड्रेस पहनकर, लगे दूर से एक बराबर।

शोर मचाते हैं पप्पूजी, पर पिट जाते हैं गप्पूजी॥

संदेश के रेशमी धागों में पिरोए राहीजी के छोटे-छोटे मनभावन शिशुगीत देखिए। बारिश ने क्या रंग दिखाया बेचारे मोनूजी की सारी अकड़ ही निकल गई—

बादल गरजे बिजली कड़की, बूँदें बरसी छम-छम-छम।

बड़े अकड़ के निकले घर से, नटखट मोनू फिसले धम॥

अकड़ और अहंकार तो मुर्गे राजा का भी नहीं रहा, जब भाँग पीकर वह यह फैसला करता है—

एक रोज मुर्गेजी जाकर, कहीं चढ़ा आए कुछ भाँग,

सोचा—चाहे कुछ हो जाए, आज नहीं देंगे हम बाँग।

आज न बोलेंगे कुकड़ू-कूँ, देखें होगी कैसे भोर,

किंतु नशा उतरा तो देखा, धूप खिली थी चारों ओर।

बच्चों का संसार भी कितना नटखट है, देखिए बालस्वरूप राहीजी की आँखों से शिशुगीत ‘दीदी’ में—

दीदी के जिम्मे दो भाई, दीदी की तो शामत आई।

दोनों छोटे दोनों चंचल, करते रहते हाथापाई।

तोड़-फोड़ करते जब दोनों, दीदी उनकी करे पिटाई।

बच्चों का अपना खिलौनों का अद्भुत संसार है, जिसमें वे रम जाते हैं। गुड्डे-गुड़ियों का संसार बच्चों को कभी झूठा नहीं लगता। तभी तो वे उनका ब्याह रचाते हैं। मोटरकार हो, छुक-छुक गाड़ी हो, हवाई जहाज हो, वह उसका आनंद वैसे ही लेते हैं, जैसे सब सचमुच की है। वे उनमें बैठकर धरती, आकाश सब जगह की सैर कर लेते हैं। देखिए, अपनी कार का गुणगान करते बच्चे की खुशी—

पापाजी की कार बड़ी है, नन्ही-मुन्नी मेरी कार।

टाँय टाँय फिस उनकी गाड़ी, मेरी कार धमाकेदार।

बच्चों की खाने-पीने की माँगें चाहे कितनी भी बढ़ जाएँ, पर माँ कभी थकने का नाम ही नहीं लेती। उन्हें अनोखी तृप्ति होती है और फिर अगर नानी हो तो कहना ही क्या। मूल से सूद अधिक प्रिय होता है। बच्चों की माँगें पूरी करते-करते हलवाई बनी नानी की खुशी देखिए—

गरमी की छु‌िट्ट‍याँ मनाने, नानी के घर पलटन आई।

कोई माँगे गरम पकौड़े, कोई माँगे दूध-मलाई।

माँगें पूरी करते-करते, नानी बन बैठी हलवाई।

इन कविताओं में राष्ट्रीयता का स्वर भी देखा जा सकता है। ये बच्चों में राष्ट्रप्रेम के संस्कार रोपित करती हैं। जिनके मन में देश के लिए कुछ करने का जज्बा भरा है, वे तोप, रायफल से नहीं डरते। बच्चे हैं तो क्या? इस शान की विशेषता देखिए। इनका विश्वास है कि ये दुश्मनों को मिटाकर ही दम लेंगे—

तोप, रायफल, रॉकेट, बम, नहीं किसी से डरते हम।

अगर कारगिल आओगे, बचकर लौट न पाओगे।

भारत-माँ की कसम हमें, तुम्हें मिटाकर लेंगे दम।

संग्रह में राष्ट्रप्रेम के अनेक गीत भी हैं। जाति, धर्म, भाषा का कोई भेद इनमें नहीं है। देश के लिए कदम-से-कदम मिलाकर चलने के दृढ़ विश्वास के साथ जयहिंद का नारा लगाते हुए बच्चे आगे ही आगे बढ़ने का संकल्प दुहराते चलते हैं—

हम हैं नन्हे-मुन्ने बच्चे, सीधे-सादे, भोले, सच्चे।

भेद-भाव का नाम नहीं है, झगड़ा करना काम नहीं है।

बोलेंगे जयहिंद जोर से, गूँजेगा आकाश शोर से।

कदम मिलाकर साथ चलेंगे, हम सबसे आगे निकलेंगे।

इनके यहाँ बाह्य‍ प्रकृति से जुड़ी ढेरों कविताएँ हैं। इनमें चाँद-तारे तो हैं, पर अलग छटा के साथ। बच्चे जिज्ञासु होते हैं। प्रकृति के प्रति एक रहस्य का भाव बड़ों में रहता है। यह जिज्ञासा कितनी सहज है। सामान्यतः बच्चे नारियल पीने में ही आनंद लेते हैं, किंतु जिनका आई-क्यू तीव्र है, वह प्रकृति का निरीक्षण भी करते हैं और प्रश्न भी—

कौन नारियल के पेड़ों पर, जादू सा कर जाता है।

बंद कटोरी में मीठा जल, चुपके से भर जाता है।

ये शिशुगीत मनोरंजक भी हैं और उपदेश के मीठे स्नेहिल स्पर्श से सिक्त भी। ‘सपना’ गीत देखिए—

मैंने देखा सपना एक,

फूल-पत्तियाँ बनीं टॉफियाँ,

सारा पेड़ बना है केक।

यह सब माल मिलेगा उसको,

जो बच्चा हो सब से नेक।

एक दूसरी कविता ‘दूसरों के लिए’ देखिए, जिसमें प्रकृति की उदारता और जो पास है उसे दूसरों के लिए लुटाने का प्रच्छन्न संदेश देती है—

मधुमक्खी कण-कण कर फूलों से जो मधु ले आती है,

केवल वह ही नहीं उसे तो सारी दुनिया खाती है।

सहकर कष्ट, दूसरों को सुख पहुँचाना है काम बड़ा,

जो ऐसा करते हैं उनका ही होता है नाम बड़ा।

एक और प्यारी कविता देखिए—

जल्दी सोना, जल्दी उठना, नियम बहुत ही अच्छा है।

जो भी इस का पालन करता, वह ही अच्छा बच्चा है।

फिर चाहे यह चुटकी किसी को भी लेकर हो। मेहँदी के लाल रंग से रँगे पापा और पापा के बाल कैसे लगते हैं, देखिए बच्चों की नजर से—

पापा ने रंग डाले बाल, मेहँदी निकली बेहद लाल।

अगर जरा बैठे हों दूर, पापा लगते हैं लंगूर।

बालस्वरूप राहीजी की हास्य-व्यंग्य-विनोद की कविताएँ बच्चों को गुदगुदाती हैं। कहीं-कहीं मीठे व्यंग्य की चुटकी इन कविताओं को इतनी सरसता प्रदान करती है कि बच्चे खुद रस के किसी अदृश्य सरोवर में गोते लगाने लगते हैं—

ठक-ठक करता चौकीदार, चोर पकड़ने को तैयार।

‘जागते रहना’, ‘होशियार’, शोर मचाता बारंबार।

अगर जागना हमको यार, तू काहे का पहरेदार?

सरल हृदय से सरल भाषा में लिखी राहीजी यह कविता बच्चों को कितना आनंद देती है, इसे बच्चों के मुख से ही सुनने पर ही जाना जा सकता है। देखिए निम्न मजेदार कविता ‘मोटूराम’—

चले सैर को मोटूराम, देखा एक लटकता आम।

झटपट चढ़ने लगे पेड़ पर लड़ा ततैया, गिरे धड़ाम।

बच्चे की प्रकृति सर्वत्र एक जैसी है। कुछ चीजें उनमें सामान्य होती है, जैसे वे स्वाद को ही महत्त्व देते हैं। उन्हें चटपटी चीजें ही भाती हैं। स्वास्थ्य के लिए गुणकारी सब्जियाँ उन्हें पसंद नहीं हैं। बेचारे उलझन में रहते हैं। बच्चों के मनोविज्ञान को, उनकी प्रकृति को नजदीक से समझने वाला ही उनके मन को पढ़ सकता है—

एक पहेली समझ न आए, कोई इसका हल बतलाए।

कद्दू, तोरी ताकतवर हैं, स्वाद नहीं है उनमें लेकिन,

भिंडी, अरवी हमें लुभातीं, लेकिन उनमें नहीं विटामिन।

मेरे जैसा छोटा बच्चा, किसको छोड़े किसको खाए?

बाल प्रकृति की एक दूसरी कविता देखिए। क्रिकेट हर बच्चे का प्रिय खेल है और सचिन उनका आदर्श खिलाड़ी। हर बच्चा सचिन बनना चाहता है और सचिन जैसी कैप लगाकर वह न खुद को सचिन समझता है, वरन् सारे बच्चे भी उसे सचिन कहने लगते हैं। बच्चे के अहसास को एक बच्चा बनकर ही समझा जा सकता है—

पहने अपनी कैप पार्क में, क्रिकेट खेलने जाता जब।

सचिन आ गया, सचिन आ गया, शोर मचाते बच्चे सब।

क्रिकेट का दीवानापन तो इस शिशुगीत में देखा जा सकता है—

देख मैच टी.वी. पर आला, बॉबी हुआ बड़ा मतवाला।

पापा से मँगवाकर उसने, पहना दी टी.वी. को माला।

बस्ता बच्चों को भारी लगता है, जिसे लाद-लादकर उनके कंधे दुःखने लगते हैं, इस कारण वे बस्ते के साथ-साथ स्कूल से टीचर से भी नाराज रहते हैं। बच्चों की इस उचित शिकायत पर अनेक कविताएँ लिखी गई हैं। किंतु यह बच्चा सबसे अलग है। उसे अपना बस्ता बहुत अच्छा लगता है और इसे लेकर स्कूल बस पर चढ़कर स्कूल जाना भी बच्चे को बहुत अच्छा लगता है। क्योंकि उसके बस्ते में सारी चीजें उसके मनपसंद की हैं। इस सुंदर कविता में कवि ने खेल-खेल में बच्चों को गणित का पहला पाठ भी पढ़ा दिया है—

एक बैग है खाने दो, जेबें इसमें तीन सुनो।

लंच-बॉक्स में है तैयार, चार पूरियाँ, दही, अचार।

पाँच टॉफियाँ, छह बिस्कुट, सात खिलौने हैं छुटपुट।

देखो जरा हमारा ठाठ, फुट्टा, रबड़, पेंसिलें आठ।

पुस्तक-कॉपी हैं नौ-दस, चलो पकड़ते हैं अब बस।

भाई-बहन में हर बात में मुकाबला चलता रहता है। भला ऐसा भी मुकाबला हो सकता है कि जानबूझकर कोई अपने ही हाथों से अपना नुकसान कर ले। पर बच्चा ऐसा कर सकता है। उसकी शैतानी अकल्पनीय हैं। बड़ों की सोच से परे है—

पानी की बोतल खो लौटे...पुरानी क्यों?

पूरी प्रकृति बच्चों की सहचरी है। पशु-पक्षियों के प्रति जिज्ञासा, कौतूहल का भाव तो रहता ही है, पर इनके प्रति इनका प्रेम भी अनोखा है। वे इनसे बतियाते हैं। फिर चाहे तितली, मिठुराम, खरगोश, मुर्गा कोई भी हो। तितली बच्चों को भाती हैं और तितली को फूल अच्छे लगते हैं। सुंदर रंग-बिरंगे उसके पंख किसी परी के पंखों सरीखे लगते हैं, जो परीलोक से आई हैं—

तितली रानी, इतने सुंदर पंख कहाँ से लाई हो?

क्या तुम कोई शहजादी हो, परी-लोक से आई हो?

फूल तुम्हें भी अच्छे लगते, फूल हमें भी भाते हैं।

वे तुम को कैसे लगते, जो फूल तोड़ ले जाते हैं?

बालस्वरूप राहीजी की कविताएँ केवल तोता, खरगोश, मुरगे की नहीं हैं। आज की बदलती दुनिया की भी हैं। इनकी कविताएँ आज के समय की कविताएँ समसामयिक हैं। देखिए, दादी और पोते की नई-पुरानी दुनिया कैसे एक-दूसरे से अलग है। पोते की दुनिया नई है और दादी की पुरानी पर सबको अपना-अपना समय सुहाता है। बच्चों की पुरानी दुनिया सैर-सपाटे की थी, पर आज टी.वी. ने ऐसा रंग जमाया है कि बच्चे बड़े सभी इसके रंग में रँग गए हैं। देखिए, कविता ‘रंग जमाया टीवी ने’—

फीके पड़े तमाशे सारे, रंग जमाया टी.वी ने।

बच्चा हो या बड़ा सबको खूब रिझाया टी.वी ने।

विषय-वैविध्य बालस्वरूप राहीजी की कविताओं का बहुत बड़ा गुण है। इनमें ‘सरकस का जोकर’ है। ‘बैंड वाले’ हैं। बच्चों का प्रिय ‘चिड़ियाघर’ है। फर-फर करता ‘हेलीकॉप्टर’ है। आज्ञाकारी ‘रोबोट’ है। परिवार के सारे संबंधों की ऊष्मा है। दादा-दादी, नाना-नानी के प्यार से सजी कई तसवीरें हैं। पूरी प्रकृति है। पशु-पक्षी जगत् है। हमारी संस्कृति, हमारे तीज-त्योहार सब इनकी कविताओं में हैं। होली भी है। दीवाली भी है। यह विषय-वैविध्य इनकी कविताओं का बहुत बड़ा गुण है। इनमें बच्चों का कल्पना-जगत् है तो विज्ञान का सत्य भी है। आज की दुनिया में अंधविश्वासों की भी कोई जगह नहीं है। ‘वहम’ कविता में दीदी पप्पू को यही समझाती है—

दीदी बोली—‘पप्पू भैया, ‘वहम’ किसलिए करते हो?

होकर बब्बर शेर जरा सी पूसी से क्यों डरते हो?

देश के ऐतिहासिक स्थान हैं, इनमें—इंडिया गेट, कुतुब मीनार, लालकिला की सुंदर कविताएँ हैं, जो बच्चों से पुराना इतिहास कहती हैं। कवित्व और लयपूर्ण यह जानकारी बच्चों को गाते-गाते कंठस्थ हो जाती है। कविता का प्रभाव ही ऐसा है।

इनकी कविताओं की गूँज, अनुगूँज बनकर पाठकों और श्रोताओं के कानों में ध्वनित होती हुई उनके हृदय में स्थायी रूप से प्रतिध्वनित हो जाती है। बालस्वरूप राहीजी की बाल-कविताओं के कई रंग हैं। उनकी रससिक्त मनोरंजक कविताएँ पाठकों को आनंद के महासागर में ऐसा निमज्जित करती हैं कि पाठक उसी में डूबा रहना चाहता है। बिल्कुल अलग तेवर की लिखी गई बालस्वरूप राहीजी की कविताएँ पाठकों पर भी अपना अलग ही असर डालती हैं। उनकी अलग ही निराले अंदाज में लिखी कविताओं की सहजता बच्चों को रिझाती हैं और उन्हें प्रफुल्लता से भर देती हैं।

बालस्वरूप राहीजी की कविताओं से गुजरते हुए मैं कहना चाहूँगी कि उनके कविता-कोश में अलग-अलग मूड्स की अनेक खूबसूरत कविताएँ हैं। विशेष रूप से बच्चों की शैतानियों की। उनकी कविताएँ इस बात का स्वतः प्रमाण हैं। इनकी कविताओं में भोला नटखटपन है। बालसुलभ चंचलता है। बालमन की मस्ती है। चुहलपन है। उत्फुल्लता है। उन्हें बच्चों की ये सारी शैतानियाँ आनंद देती हैं, जिन्हें अपने शब्दों के कैमरे में वह झट कैद कर लेते हैं।

यही कारण है कि उनकी कविता की भाषा चित्रात्मक है। चित्रात्मकता का गुण उन्हें सजीव बनाता है। भाषा की यही जीवंतता के साथ बालस्वरूप राहीजी की कविताओं की सधी हुई लयात्मकता और ताजगी उन्हें अग्रिम पंक्ति में प्रतिष्ठित करती है। ये कविताएँ बच्चों के साथ बड़ों को भी रिझाती हैं। उनके मन को छूती हैं। बच्चे इन कविताओं को गुनगुनाएँगे।

समास शैली में कहूँ तो बालस्वरूप राहीजी की कविताओं में लय-ताल में गुँथा तरन्नुम का वह जादू है, जो इन्हें बच्चों का कंठहार बनाता है।

 

शकुंतला कालरा

एन.डी.-57, पीतमपुरा,
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