गेट्लिनबर्ग : एक रोमांचक अनुभव

गेट्लिनबर्ग : एक रोमांचक अनुभव

सुपरिचित लेखक एवं अनुवादक। हिंदी में १२ काव्य-संग्रह, एक यात्रा-वृत्तांत ‘धुंध और आकार’, अंग्रेजी में २ काव्य-संग्रह प्रकाशित। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त मेमोरियल ट्रस्ट, दिल्ली का ‘राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार’ सहित अनेक पुरस्कारों से सम्मानित।

 

गेट्‍‍लिनबर्ग आकर पता चलता है कि जीवन को पूरे उल्लास के साथ किस तरह जीया जाता है। यह एक बहुत छोटा सा कस्बा है अमेरिका के टेनेसी प्रांत के पहाड़ी क्षेत्र में। यह मुख्य मार्ग के दोनों ओर फीते की तरह लंबाई में बसा हुआ है। हम पिजनफोर्ज नामक स्थान पर एक होटल में ठहरे हैं। यह स्थान गेट्‍‍लिनबर्ग से सात मील की दूरी पर है। संध्या समय भोजनोपरांत यह सोचकर बाहर निकले कि पंद्रह-बीस मिनट बस यों ही आसपास कहीं घूम लेंगे और वापस आ जाएँगे। किंतु गेट्‍‍लिनबर्ग के सम्मोहन में इस तरह बँध गए कि घंटों सड़क पर घूमते रहे। यह कस्बा टेनेसी प्रांत की दिशा से आते हुए अमेरिका के सबसे बड़े राष्ट्रीय उद्यान ‘ग्रेट स्मोकी माउंटेन नेशनल पार्क’ के निकट है। इसे नेशनल पार्क का प्रवेश द्वार कहा जा सकता है। नेशनल पार्क आने वाले पर्यटक इस स्थान की भी जीवंतता का भरपूर आनंद उठाने अनिवार्य रूप से यहाँ आते हैं।

आज शनिवार अवकाश का दिन है। अत: सड़क पर भीड़भाड़ बहुत अधिक है। हजारों की संख्या में पर्यटक रास्ते के दोनों ओर फुटपाथों पर आवाजाही कर रहे हैं। सभी देशों के लोग हैं भारतीय भी, जिनमें अधिकतर दक्षिण भारत के हैं। इनमें बच्चों, प्रौढ़ और वृद्ध स्त्री-पुरुषों के साथ ही अमेरिका में अध्ययन अथवा नौकरी कर रहे युवक-युवतियाँ हैं। यह भीड़ फुटपाथ पर उद्वेलित जलधारा की तरह एक दिशा से दूसरी दिशा में जाती है, फिर कुछ किलोमीटर चल कर वापस लौटती है और विपरीत दिशा में जाने लगती है। खूब उल्लसित लोग...खूब उत्साहित लोग...आवाजें-ही-आवाजें...हम भी धारा के प्रवाह में इधर से उधर, उधर से इधर आ रहे हैं, जा रहे हैं। मैं, पत्नी, बेटी, दामाद और तीन व छह वर्षीय दो नातिनें हैं। पार्किंग की समस्या है। कार बहुत दूर खड़ी की है। बच्चियाँ कभी पैदल चलती हैं कभी शिशु गाड़ी में बैठ जाती हैं।

गेट्‍‍लिनबर्ग पर्यटन उद्योग पर ही पूर्णत: आश्रित कस्बा है। अत: पर्यटकों के मनोरंजन हेतु आवश्यक सभी साधन रास्ते के दोनों ओर की छोटी-छोटी दुकानों में उपलब्ध हैं। बच्चों के खिलौनों की दुकानें, उपहारों की दुकानें हैं, जादू के करतब दिखाते लोग हैं, खाद्य सामग्री की गुमटियाँ, छोटे-छोटे रेस्त्राँ और पब हैं, खूब ऊँची आवाज में संगीत बज रहा है। मनोरंजन और थकान मिटाने के सारे साधन इस एक सड़क पर उपलब्ध।

रात आकाश से उतरने लगी है। रंगीन रोशनियाँ बढ़ती जा रही हैं और उनके साथ लोगों की भीड़ और शोर भी। इस स्थान पर आकर लग रहा है जैसे पृथ्वी पर दु:ख है ही नहीं, आनंद-ही-आनंद है। जीवन-अमृत का भरपूर पान कर लेने की अदम्य इच्छा है चारों ओर। एक छोटे से पहाड़ी कस्बे के अनुरूप दुकानें छोटी-छोटी, किंतु चमक-दमक से भरी हुई हैं। कोई इमारत तीन मंजिल से ऊँची नहीं है। अधिकांश एक या दो मंजिली ही हैं। चलते-चलते एक इमारत में लंबे-तगड़े मनुष्य की प्रतिमा दिखाई देती है। ऊँचाई सामान्य मनुष्य से लगभग डेढ़ गुनी। रुक कर देखते हैं। यह विश्व के सबसे ऊँचे मनुष्य की प्रतिमा है और वह स्थान एक छोटा सा गिनीज म्यूजियम है। हम कुछ देर उसे बाहर से ही कर देखकर आगे बढ़ जाते हैं।

अँधेरा और गहरा गया है। हम चलते-चलते ‘स्काइ लिफ्ट’ के स्टेशन पर आ गए हैं। सामने बिल्कुल काले आकाश की पृष्ठभूमि पर दो समानांतर पंक्तियों में एक दूसरे से विपरीत दिशाओं में धीरे-धीरे सरकती हुई सैकड़ों छोटी-छोटी लाल बत्तियाँ दिखाई दे रही हैं। वे सामने पहाड़ पर बहुत ऊँचाई तक जा रही हैं। लगता है, जैसे सीधे आसमान में जा रही हों। ये स्काईलिफ्ट की बत्तियाँ हैं। एक साथ एक दिशा में चल रही लिफ्टों की संख्या लगभग सवा सौ होगी। दो लिफ्टों के मध्य अंतर लगभग पंद्रह फीट होगा। अंधकार में यह दृश्य भयभीत कर देने वाला है। बच्चों की इच्छा थी कि स्काईलिफ्ट से पहाड़ पर चला जाए। मुझे वह बहुत भयानक प्रतीत हो रहा था। एक तो निरंतर चलते रहने से बुरी तरह थक चुका था दूसरे मुझे कभी भी चक्कर आ जाने की समस्या है। अचानक लिफ्ट में चक्कर आ गए तो क्या होगा, यह आशंका मन में बार-बार आ रही थी। बाद में पता चला कि यह आशंका निर्मूल नहीं थी। किंतु यदि मैं नहीं जाता तो कोई भी नहीं जा पाता। बच्चों की इच्छा अधूरी रह जाती। कुछ देर विचार कर अंतत: मैंने जाने का निर्णय कर ही लिया। हमने टिकटें खरीदीं और अपनी बारी की प्रतीक्षा करने लगे। हमारी बारी आती है। हम स्काईलिफ्ट में बैठते हैं। स्काईलिफ्ट और जो कुछ भी हो, केबल कार के रूप में तो उसकी कल्पना नहीं ही कहा जा सकती जो हम उसे देखने के पहले कर रहे थे। देखकर आश्चर्य और भय हुआ कि यह तो बिल्कुल ही असुरक्षित है। स्टील के पाइप को मोड़कर कुरसी का आकार दे दिया गया है। बैठने और पीठ टिकाने के लिए छिद्रों वाले दो पतरे लगा दिए गए हैं बस। सुरक्षा संबंधी किसी तरह की कोई व्यवस्था है ही नहीं। यहाँ तक कि व्यक्ति को कुरसी से बाँधे रखने के लिए भी कोई पट्टा तक नहीं है। सहारे के लिए सामने केवल स्टील का एक पाइप है। वह भी पक्का स्काईलिफ्ट से जुड़ा हुआ नहीं है। कुरसी पर बैठने के लिए उसे उठाकर पीछे की ओर कर दिया जाता है। बैठने के बाद वापस सामने ले आया जाता है। सहारे के लिए व्यक्ति उसी पाइप को हाथों से पकड़ सकता है बस। सबसे अधिक डराने वाली बात यह है कि स्काईलिफ्ट ऊपर से, दाएँ-बाएँ, आगे-पीछे, हर तरफ से बिल्कुल खुली है। प्लास्टिक या केन्वास तक का कोई आवरण नहीं है। केबलकारें तो कारों की तरह हर तरफ से बंद होती हैं और यात्री उसमे सुरक्षित महसूस करते हैं। यहाँ ऐसा कुछ भी नहीं है कि कोई सुरक्षित महसूस कर सके। मैंने उत्तराखंड में परवानू में दो पहाड़ों के मध्य पौने दो किलोमीटर लंबे पथ पर घाटी के ऊपर से केबलकार में यात्रा की है। वहाँ सुरक्षित महसूस हो रहा था तो घाटी के ऊपर हवाई यात्रा का बहुत आनंद आया था। यहाँ स्थिति बिल्कुल विपरीत है। केवल भय और रोमांच है। स्काईलिफ्ट छोटी है। एक स्काईलिफ्ट में केवल दो व्यक्ति ही बैठ सकते हैं, जैसे झूले पर बैठते हैं। मुझे आश्चर्य हुआ कि अमेरिका जैसे देश में जहाँ नागरिकों और विशेष रूप से, बच्चों की सुरक्षा के लिए अत्यंत कठोर नियम हैं वहाँ इतनी असुरक्षित स्काईलिफ्ट चलाने की अनुमति कैसे दी गई? हम लोग तीन स्काईलिफ्टों में हैं। एक में मैं और पत्नी, दूसरी में दामाद बड़ी बेटी के साथ हैं और तीसरी में हमारी बेटी अपनी छोटी बेटी के साथ बैठी है। बार-बार मुझे लग रहा है कि यदि कोई छोटा बच्चा मचल गया और अभिभावक के हाथ से छूट गया तो वह सीधा नीचे गिर जाएगा जैसे-जैसे अँधेरा बढ़ता जा रहा है वातावरण अधिक भयावह होता जा रहा है। कुछ देर प्रतीक्षा करने के बाद स्काईलिफ्टें चल पड़ती हैं। हम मुख्य सड़क के ऊपर से पहाड़ की ओर जा रहे हैं। सड़क पर खूब गाड़ियाँ चल रही हैं। हम अभी सड़क से बहुत ऊपर नहीं हैं। नीचे से गाड़ियों में बैठे लोग हाथ हिला-हिलाकर स्काईलिफ्ट में जा रहे लोगों का अभिवादन कर रहे हैं और प्रत्युत्तर में वे भी वैसा ही कर रहे हैं। सड़क और पहाड़ के बीच सड़क के समानांतर छोटी सी नदी बह रही है। हम नदी के ऊपर से गुजरते हैं। अब पहाड़ आरंभ होता है। पहाड़ भूमि से लगभग सौ अंश के कोण पर सीधा ऊपर गया है। अब तक हम भूमि से बहुत ऊपर नहीं थे, अब पहाड़ के समानांतर चढाई आरंभ हो गई है। ऊपर से ट्यूबलाइटों, लट्टुओं, नियान लाइटों और गाड़ियों की बत्तियों से जगमगाता मुख्य रास्ता दूर तक पसरा हुआ दिखाई दे रहा है किसी रत्नजटित विशाल सर्प की तरह। स्काईलिफ्ट चारों ओर से एकदम खुली होने के कारण ऐसा लग रहा है कि हम पंछी की तरह आकाश से पृथ्वी का विहंगम दृश्य देख रहे हैं। आनंद और भय का रोमांचक मिश्रण है मन के अंदर।

जैसे-जैसे स्काईलिफ्ट ऊपर जा रही है, डर बढ़ता जा रहा है। नीचे झाँकना उतना ही कठिन होता जा रहा है। यद्यपि, स्काईलिफ्ट पहाड़ की सतह से बहुत ऊपर नहीं है पहाड़ भूमि से लंबवत होने के कारण ऐसा लग रहा है जैसे हम खूब गहरी घाटी के ऊपर हों और पूरी तरह असुरक्षित हों। एक केबल पर स्काईलिफ्टें ऊपर की ओर जा रही हैं, उसके समानांतर दूसरी केबल पर विपरीत दिशा से वापस लौट रही हैं। जाने और वापस आने वाले लोग परस्पर हाथ हिला-हिलाकर अभिवादन कर रहे हैं। पहाड़ के शीर्ष पर पहुँचकर यात्रा समाप्त होती है। यहाँ स्काईलिफ्ट से उतरते ही पास के केबिन में बैठी एक लड़की स्काईलिफ्ट में बैठे हुए मेरा और पत्नी का छायाचित्र सामने कर देती है। पता नहीं यह चित्र कब, कैसे लिया गया होगा। आज की उन्नत तकनीकी में वैसे सबकुछ संभव है। हमें वह चित्र बहुत स्पष्ट नहीं लगा और मूल्य भी अधिक बताया जा रहा था। हम चित्र लिए बिना आगे बढ़ जाते हैं।

यहाँ भोजन सामग्रियों और छोटे-मोटे उपहारों की दुकानें हैं। तीन-चार भारतीय लड़के, जो हमारे साथ ही स्काईलिफ्टों से उतरे हैं, अभी-अभी हुए अनुभव को साझा कर रहे हैं। एक कह रहा है, “बाप रे! इतना डर लग रहा था कि अगर मेरी चप्पल भी गिर जाती तो मैं झाँककर नीचे नहीं देखता।” मुझे संतोष हुआ कि मेरा भय अकारण नहीं था। अन्य लोगों ने भी, किशोरों और तरुणों ने भी वैसा ही भय महसूस किया था। हम लगभग घंटा भर पहाड़ की चोटी पर रहे फिर वापसी यात्रा आरंभ हुई। जब स्काईलिफ्ट से जमीन पर उतरे तब जान में जान आई।

आज हम दिन में भी खूब चले थे। कुछ देर फुटपाथ पर चलने के बाद शरीर ने चलने से इनकार कर दिया। चक्कर आने लगते हैं। मैं फुटपाथ के किनारे बनी दो-ढाई फुट ऊँची दीवार पर बैठ जाता हूँ। सामने पब है। पीना-पिलाना चल रहा है और खूब ऊँची आवाज में संगीत बज रहा है। दामाद अमित बच्चों के साथ बहुत आगे निकल गए हैं। पंद्रह मिनट विश्राम करने पर लगा कि अब चल सकता हूँ। चलता हूँ तो चार कदम बाद लड़खड़ा जाता हूँ। अब पैदल चलना संभव नहीं है। अमित को फोन करते है। थोड़ी देर में गाड़ी आ जाती है और हम पिजनफोर्ज की ओर चल देते हैं।

गेट्‍‍लिनबर्ग की मुख्य सड़क, उसकी चमक-दमक, शोर और उल्लास को अंतिम बार प्रणाम कर होटल में आ जाते हैं। होटल एक नदी ‘लिटिल पिजन रिवर’ के किनारे स्थित है। बालकनी से दूर-दूर तक नदी का आकर्षक दृश्य दिखाई देता है। नदी के किनारे पर दूर तक कारें और बड़ी गाड़ियाँ खड़ी हैं। इनमे सप्ताहांत में प्रकृति के साथ समय व्यतीत करने शहरों के लोग आए हैं। हर आयु वर्ग के स्त्री-पुरुष और बच्चे हैं। बहुत अधिक आयु के वृद्ध भी हैं। ये सारा आवश्यक सामान गाड़ियों में भरकर अपने साथ लाते हैं। तंबू तानते हैं। दरियाँ, चटाइयाँ बिछाते हैं। आराम कुरसियों पर दिन में धूप में आराम करते हैं। खेल खेलते हैं। नदी में मछलियाँ पकड़ते हैं। इस तरह अपने दैनिक जीवन की व्यस्त गतिविधियों में वापस लौटने से पहले जीवन का भरपूर आनंद लेते हैं। रात्रि के समय अलाव जलाकर उसके आसपास गाते-बजाते हैं।

गेट्‍‍लिनबर्ग आकर ऐसा लगता है, जैसे दुनिया में दुःख-दर्द कहीं है ही नहीं, बस आनंद-ही-आनंद है।


राजेंद्र नागदेव
डी के 2-166/18, दानिशकुंज
कोलार रोड, भोपाल-462042 (म.प्र.)
दूरभाष ः 8989569036

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