सिक्किम के उत्सवधर्मी लोकगीत और लोकनृत्य

सिक्किम के उत्सवधर्मी लोकगीत और लोकनृत्य

सुपरिचित लेखक। ‘अरुणाचल का लोकजीवन’, ‘अरुणाचल के आदिवासी और उनका लोकसाहित्य’, ‘हिंदी सेवी संस्था कोश’, ‘राजभाषा विमर्श’ एवं ‘कथाकार आचार्य शिवपूजन सहाय’, ‘डॉ. मुचकुंद शर्मा : शेषकथा’ संपादित ग्रंथ प्रकाशित। संप्रति उपनिदेशक राजभाषा।

 

तिब्‍बत, नेपाल, भूटान की अंतरराष्‍ट्रीय सीमा पर अवस्‍थित सिक्‍किम एक लघु पर्वतीय प्रदेश है। यह भारत का २२वाँ राज्य है। इसके पश्चिम में नेपाल, उत्तर में तिब्बत, दक्षिण में प. बंगाल और पूरब में भूटान है। यह सम्राटों, वीर योद्धाओं और कथा-कहानियों की भूमि के रूप में विख्‍यात है। पर्वतों से आच्‍छादित इस प्रदेश में वनस्‍पतियों तथा पुष्‍पों की असंख्‍य प्रजातियाँ विद्यमान हैं। सिक्किम राज्य की स्थापना १६ मई, 1975 को हुई थी। इसकी राजधानी गंगटोक है। तीस्ता नदी सिक्किम की जीवनधारा है। यह सिक्किम की एकमात्र नदी है, जिसकी अनेक उपनदियाँ हैं। सिक्किम में 150 से अधिक प्राकृतिक झील हैं, जिन्हें अत्यंत पवित्र माना जाता है। मौसम की दृष्टि से सिक्किम अत्यंत खूबसूरत प्रदेश है। इस प्रदेश की गणना भारत के उन चुनिंदा राज्यों में होती है, जहाँ हर साल नियमित तौर पर बर्फबारी होती रहती है। यहाँ के निवासी हमेशा नियंत्रित और सुहाने मौसम का आनंद लेते हैं। सिक्किम को रहस्यमयी सौंदर्य की भूमि व फूलों का प्रदेश जैसी उपमा दी जाती हैं। नदियाँ, झीलें, बौद्धमठ और स्तूप बाँहें फैलाए पर्यटकों को आमंत्रित करते हैं। विश्व की तीसरी सबसे ऊँची पर्वत चोटी कंचनजंगा राज्य की सुंदरता में चार चाँद लगाती है। सिक्किम में लोकगीतों की समृद्ध परंपरा है। सिक्किमवासी अपने संस्कार गीतों, उपासना गीतों, त्योहार गीतों, फसल गीतों आदि के द्वारा अपनी कोमल भावनाओं को अभिव्यक्त करते हैं। यहाँ के लोकगीतों में विषय विविधता और भावनाओं का प्राबल्य है। प्रेम, विवाह, संस्कार, प्राकृतिक घटनाएँ आदि इन लोकगीतों के विषय होते हैं। लोकगीतों में सिक्किम का सांस्कृतिक वैशिष्ट्य प्रतिबिंबित होता है। लिंबू समुदाय लोकगीतों के विषय–वैविध्य के कारण अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। लिंबू समुदाय के लोकगीतों को निम्नलिखित पाँच वर्गों में विभक्त किया जा सकता है—

१. खयाली—खयाली लिंबू समुदाय का प्रेमगीत है, जिसमें लड़के–लड़कियाँ काव्यात्मक भाषा में धुन के साथ अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हैं।

२. प्रेम गीत—शोरोक्पा पल्लम सम्लो, पल्लम सम्लो और तमके उकमा पल्लम सम्लो प्रणय गीत के विभिन्न प्रकार हैं। लड़के–लडकियाँ नृत्य करते समय या खेतों में कार्य करते समय प्रेम गीत गाते हैं। यह प्रणय गीत लड़के–लड़कियों के लिए विवाह की पृष्ठभूमि के रूप में कार्य करते हैं। यह गीत कुछ घंटों से लेकर कई दिनों तक चलते हैं।

३. हकपारे सम्लो—बुजुर्ग लोगों के मनोरंजन गीत को ‘हकपारे सम्लो’ कहा जाता है। यह युगल गीत है।

४. निसाम्मंग सेवा सम्लो—सिक्किम के उत्सव गीत को ‘निसाम्मंग सेवा सम्लो’ कहा जाता है, जो यहाँ बहुत लोकप्रिय है। किसी उत्सव के आरंभ होने के समय जवान लड़के–लड़कियों द्वारा निसाम्मंग सेवा सम्लो गाए जाते हैं।

५. के लंग सम्लो—यह नृत्य के समय गाया जानेवाला मनोरंजन गीत है।

खस समुदाय के लोकगीतों को दो वर्गों में विभक्त किया जा सकता है—

१. बारामासी गीत—यह सदाबहार गीत हैं, जिन्हें बारहों महीने गाया जाता है। सिक्किम के गाँवों में रहनेवाले नेपाली लोग काम करते समय यह गीत गाते हैं। खेतों में कार्य करते समय, पशुओं के लिए घास काटते समय, जंगल से लकड़ियाँ एकत्र करते समय बारामासी गीत गाए जाते हैं। इस गीत में प्रत्येक महीने के महत्त्व को रेखांकित किया जाता है।

२. जुवारी गीत—जुवारी गीत खस समुदाय की पारंपरिक संस्कृति का महत्त्वपूर्ण अंग है, लेकिन अब सिक्किम के समस्त नेपाली समुदाय ने इन गीतों को अपना लिया है। इन गीतों को दोहरी भी कहा जाता है। यह स्त्री-पुरुषों के बीच प्रश्न और उत्तर के रूप में गाए जाते हैं। इन गीतों के केंद्रीय भाव में स्त्री–पुरुष प्रेम होता है।

सिक्किम का नेवार समुदाय संगीत प्रेमी है। शिक्षित युवक आधुनिक संगीत और शास्त्रीय संगीत सुनते हैं। प्रत्येक नेवार घर में सितार अथवा हारमोनियम अवश्य होता है। इस समुदाय का लोकगीत भी अत्यंत उन्नत है। इस समाज में मुख्यतः तीन प्रकार के लोकगीत पाए जाते हैं—

१. सिंहाजया—यह कृषि संबंधी गीत है, जिसे धान की खेती करते समय गाया जाता है।

२. यात्रा-त्योहार संबंधी गीत—यह यात्रा त्योहार के अवसर पर गाया जाता है।

३. फागु गीत—यह भावप्रधान गीत है। इन गीतों में तर्क नहीं बल्कि भावना की प्रधानता होती है।

लोकगीत की दृष्टि से भूटिया समुदाय बहुत समृद्ध है। इस समुदाय में दो प्रकार के लोकगीत प्रचलित हैं—

(अ) झुंग–ल्हू लोकगीत—यह भूटिया समुदाय का सामूहिक लोकगीत है, जो विवाह, गृह प्रवेश और लोसूंग त्योहार के समय नृत्य के साथ गाए जाते हैं।

(ब) ते–ल्हू लोकगीत—यह एकल या समूह में गाए जानेवाले लोकगीत हैं।

लोकगीत की दृष्टि से लेपचा समुदाय अत्यंत समृद्ध है। इस समाज में लोकगीतों की समृद्ध विरासत है। इनके लोकगीत बहुआयामी, विचारपरक और सारगर्भित होते हैं। इनके लोकगीतों को हम सामान्यतः दो वर्गों में विभाजित कर सकते हैं—पारंपरिक लोकगीत और आधुनिक लोकगीत। पारंपरिक लोकगीत विभिन्न त्योहारों एवं संस्कारों के अवसर पर पुजारियों द्वारा गाए जाते हैं, जबकि आधुनिक लोकगीत नई पीढ़ी द्वारा गाए जाते हैं, जिनमें नए विचार व नई धुन होती है। लेपचा समुदाय के लोकगीतों को मुख्यतः आठ वर्गों में विभाजित किया जा सकता है—

१. लेनछयोवोम–प्रणय गीत, २. थनुंग सवोम–हास्य गीत, ३. अस्योत वोम–उत्सव गीत, ४. रूम कत वोम–कृषि संबंधी गीत, ५. बिवोम–विवाह गीत, ६. ल्यांग–निरो-चिको–वोम–देशभक्ति गीत, ७. अपार्त-अपोक–वोम–फसल गीत, ८. अपर्या–वोम–प्रार्थना गीत।

सिक्किम के सभी समुदायों का अपना विशिष्ट नृत्य है। सितंबर महीने में सिक्किम में दो दिवसीय कंचनदी जोड़ा नृत्य उत्सव आयोजित किया जाता है। इस अवसर पर कंचनजंगा की पूजा-अर्चना की जाती है। लोस्सूंग (नव वर्ष) के अवसर पर काली टोपी नृत्य प्रस्तुत कर हर्ष प्रकट किया जाता है। इस नृत्य के द्वारा बुराई पर अच्छाई, अंधकार पर प्रकाश एवं पाप पर पुण्य की विजय दिखाई जाती है। इस नृत्य की प्रस्तुति पुरुषों द्वारा की जाती है। नर्तकगण विभिन्न प्रकार के मुखौटे पहनकर बौद्ध धर्म से संबंधित कथाएँ सुनाते हैं। लिंबू समुदाय के लोग धान की खेती के उपरांत ढोल नृत्य द्वारा अपना हर्ष प्रकट करते हैं। लेपचा समुदाय के लोग भी फसल कटने के बाद समूह नृत्य करते हैं। सिक्किम का लोकनृत्य प्रदेश की लोक संस्कृति, लोकगीत, लोकजीवन और लोक वाद्ययंत्रों की मिश्रित प्रस्तुति है। यहाँ अनेक प्रकार के संस्कार नृत्य भी प्रचलित हैं। पुजारी द्वारा प्रस्तुत संस्कार नृत्य का उद्देश्य रोगी को स्वस्थ करना है। प्रदेश के अधिकांश लोकनृत्य संस्कार अथवा उत्सव से संबंधित हैं। सिक्किम में मुखौटा नृत्य भी प्रचलित है। नर्तकगण विभिन्न पशु–पक्षियों का मुखौटा धारण कर पारंपरिक नृत्य करते हैं। बरसिंगा नृत्य, कंकाल नृत्य, दंपू नृत्य भी सिक्किम में अत्यंत लोकप्रिय हैं।

इस प्रदेश का लोकनृत्य लोकगीतों, वाद्ययंत्रों, लोक-संस्कृति, पारंपरिक परिधान और साज-सज्जा का समुच्चय है। सिक्किम के लोकनृत्य को निम्नलिखित वर्गों में विभक्त किया जा सकता है—

१. संस्कार नृत्य—सिक्किम के संस्कार नृत्य को निम्नलिखित चार वर्गों में विभक्त किया जा सकता है—

(अ) खाईनजरी भजन—यह खस समुदाय (बाहुन और छेत्री) का नृत्य है, जो रामायण और महाभारत पर आधारित है। किसी धार्मिक अथवा समाजिक उत्सव के अवसर पर पाँच से लेकर पंद्रह पुरुष सदस्यों द्वारा यह नृत्य प्रस्तुत किया जाता है। इस नृत्य को प्रस्तुत करने के पहले देवी–देवताओं का आह्व‍ान किया जाता है। आँगन में एक लंबे बाँस को गाड़ दिया जाता है। पवित्र पपीते के फल पर मिट्टी के दीप जलाए जाते हैं, जिसे बाँस पर लटका दिया जाता है। नर्तकगण जोड़ा बनाकर बाँस के पोल के चारों ओर घूमते हुए नृत्य करते हैं और ढोलक की धुन पर भजन गाते हैं।

(ब) साक्यो रूम फाट—साक्यो रूम फाट लेपचा समुदाय का त्योहार है। इस त्योहार में सामूहिक नृत्य प्रस्तुत किया जाता है तथा ईश्वर से धन–धान्य की कामना की जाती है। इस त्योहार में सात अमर दंपतियों की उपासना की जाती है। लेपचा समुदाय के लोगों की धारणा है कि इन सात दंपतियों की अनुकंपा से ही फसलों की रक्षा होती है। यह लेपचा जनजाति का संस्कार नृत्य है, जिसकी प्रस्तुति नवंबर माह में की जाती है। सात अमर दंपतियों ‘मयेल क्योंग’ की पूजा में यह नृत्य प्रस्तुत किया जाता है। लेपचा समुदाय का विश्वास है कि खेती संबंधी सभी प्रकार के बीज सात अमर दंपतियों द्वारा लाए गए थे। इस नृत्य में सभी स्त्री-पुरुष भाग लेते हैं। वे पंक्ति में घूमते हुए नृत्य करते हैं।

(स) तेनदोंग ल्हो रूम फाट—तेनदोंग ल्हो रूम फाट भी लेपचा जनजाति का संस्कार नृत्य है, जिसकी प्रस्तुति प्रत्येक वर्ष ८ अगस्त को की जाती है। इस त्योहार नृत्य का संबंध एक प्राचीन आख्यान से है। एक कथा है कि एक बार सिक्किम में महाप्रलय आया था, जो सिक्किम की भूमि को निगलनेवाला था, लेकिन ईश्वर (रूम) ने सिक्किम को डूबने से बचा लिया। यह नृत्य टेनडोंग पर्वत की पूजा के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

(द) यगरंगसिंग लंग—यगरंगसिंग लंग लिंबू जनजाति का संस्कार नृत्य है। माघ पूर्णिमा (दिसंबर) के दिन इस नृत्य की प्रस्तुति की जाती है। देवी–देवताओं की पूजा के रूप में यह नृत्य प्रस्तुत किया जाता है। समस्त लिंबू समुदाय देवी–देवताओं को नया अनाज और स्थानीय मदिरा अर्पित करता है और उनका आभार व्यक्त करता है। लिंबू जनजाति के लोग इस नृत्य के द्वारा विभिन्न देवी–देवताओं की उपासना करते हैं। देवी–देवताओं को नवान्न का भोग लगाया जाता है तथा मांस, मदिरा आदि वस्तुएँ अर्पित कर उनकी उपासना की जाती है। इस नृत्य उत्सव में पूरा समुदाय सम्मिलित होता है। यह नृत्य उत्सव एक, तीन, सात अथवा नौ रातों तक चलता है। इस नृत्य में लिंबू समाज की ऊर्जा, मस्ती एवं उत्साह देखने को मिलता है।

२. उत्सव नृत्य–उत्सव नृत्य के दो प्रकार हैं—(अ) मरुनी नृत्य और (ब) कग्येद मुखौटा नृत्य।

(अ) मरुनी नृत्य—मरुनी नृत्य नेपाली समुदाय के सबसे पुराने और लोकप्रिय समूह नृत्य रूपों में से एक है, जो आमतौर पर तीन पुरुष और तीन महिला नर्तकियों द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। पुराने दिनों में मरुनी नृत्य में पुरुष ही महिला की भूमिका का निर्वाह करते थे, लेकिन रीति-रिवाजों और परंपराओं में बदलाव के बाद अब महिला नर्तकी केंद्रीय भूमिका निभाती है। इसे तिहार त्योहार के अवसर पर प्रत्येक घर के आँगन में प्रस्तुत किया जाता है। हारमोनियम, मादल, बाँसुरी और घुँघरू जैसे वाद्ययंत्रों के साथ गीतों की पृष्ठभूमि में नर्तकियों के कदमताल मन को मोह लेते हैं।

(ब) कग्येद मुखौटा नृत्य—‘कग्येद’ का अर्थ गुरु के आठ उपदेश है, जिसे इस नृत्य के द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। लोसूंग त्योहार आरंभ होने से पूर्व बौद्ध भिक्षुओं द्वारा मठों में इस नृत्य का प्रदर्शन किया जाता है। यह नृत्य रूप ‘गुतोर समारोह’ का महत्त्वपूर्ण अंग है। इसका आयोजन चौथे महीने की २८वीं तिथि (दिसंबर–जनवरी) को होता है।

३. ऋतु संबंधी नृत्य—ऋतु संबंधी नृत्य के दो प्रकार हैं—(अ) संगिनी नाच और (ब) तमके ऊकमा नाच।

(अ) संगिनी नाच—‘संगिनी’ का शाब्दिक अर्थ मित्र होता है। इस नृत्य के उद्भव के पीछे शिव और पार्वती का एक आख्यान है। अनेक जवान विधवाओं के दुःख को देखकर पार्वतीजी अत्यंत दुखी और उदास हो गई थीं। इन महिलाओं ने जवानी में ही अपने पतियों को खो दिया था। पार्वतीजी ने शिवजी से आग्रह किया कि वे कुछ ऐसा उपाए करें, जिससे जवान महिलाएँ वैधव्य के अभिशाप से मुक्त हो सकें। शिव ने पार्वतीजी से कहा कि यदि स्त्रियाँ पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ उनकी पूजा करें तो वैधव्य के अभिशाप से मुक्त हो सकती हैं। उसी समय से महिलाओं द्वारा तीज व्रत किया जाता है। इस व्रत के अवसर पर नेपाली महिलाएँ अपने आँगन में संगिनी नृत्य करती हैं। संगिनी एक प्रमुख नेपाली नृत्य है, जो विवाहिता महिलाओं द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। उसके साथ उसकी विवाहिता पुत्री भी होती है। इस नृत्य द्वारा ससुराल में हो रही कठिनाइयों को प्रदर्शित किया जाता है।

(ब) तमके ऊकमा नाच—तमके ऊकमा लिंबू समुदाय का ऋतु संबंधी नृत्य है। चैत्र–बैसाख माह में मानसून के पहले इसका प्रदर्शन किया जाता है। जवान लड़के–लड़कियाँ इस नृत्य में भाग लेते हैं। वे नृत्य के साथ प्रेमगीत भी गाते हैं। इस नृत्य में १०–१५ नर्तक शामिल होते हैं। सांस्कृतिक कार्यक्रम में भी इस नृत्य की प्रस्तुति की जाती है।

चाबरुंग या केलंग—यह लिंबू समुदाय का नृत्य है, जो किसी विशेष अवसर पर अथवा विवाह के समय प्रस्तुत किया जाता है। इस नृत्य में प्रकृति के सौंदर्य को रेखांकित किया जाता है।

महाकाली और लखी—यह नेवार लोगों का मुखौटा नृत्य है, जिसमें असत्य पर सत्य और पाप पर पुण्य की विजय दरशाई जाती है। महाकाली नृत्य में देवी महाकाली और उनकी आठ साथियों द्वारा राक्षसों को दंडित करने का भाव प्रदर्शित किया जाता है।

सकेवा सिली—यह राई समुदाय का कृषि संबंधी नृत्य है, जिसमें धरती का आभार प्रदर्शन किया जाता है।

चंडी पूजा—देवी चंडी सुनुवार समुदाय की सबसे जाग्रत देवी मानी जाती हैं। बैसाख शुक्ल पूर्णिमा को नर्तक आठ अलग–अलग ढोल की धुन पर पूरी श्रद्धा और समर्पण के साथ चंडी नृत्य करते हैं।

चुटकी—यह उत्सव नृत्य है। फसल कटाई के समय और कुछ अन्य खुशी के अवसरों पर पुरुषों और महिलाओं के इस समूह नृत्य के माध्यम से हर्ष और जोश का प्रदर्शन किया जाता है।

दोहरी—यह गुरुंग समुदाय का समूह नृत्य है, जो आमतौर पर तीन पुरुष और तीन महिला नर्तकियों द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। यह एक पारंपरिक नृत्य है। पहले कठिन परिश्रम करने के बाद नर्तक ‘रोडीघर’ में एकत्र होकर गीत-नृत्य के माध्यम से अपने विचारों का आदान-प्रदान करते थे। इस नृत्य में मादल, बाँसुरी और घुँघरू जैसे वाद्ययंत्रों का इस्तेमाल किया जाता है।

जेरुम सिल्ली—यह राई समुदाय का समूह नृत्य है, जो एक पुरुष और चार महिलाओं द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। इसके द्वारा लड़की के विवाह के अवसर पर परिवार के सदस्यों और दोस्तों की भावनाओं को व्यक्त किया जाता है। नर्तकियों का लक्ष्य घर की लक्ष्मी (समृद्धि) की रक्षा करना है। जवान, वृद्ध सभी उम्र के लोग इस नृत्य में शामिल होते हैं। इसमें ढोल और झमता दो वाद्ययंत्रों का प्रयोग किया जाता है।

तमांग सेलो—यह तमांग समुदाय का समूह नृत्य है, जो खुशी के अवसरों पर प्रस्तुत किया जाता है। इस नृत्य द्वारा समुदाय के पराक्रम और जीवनी शक्ति पर प्रकाश डाला जाता है। तमांग लोकगीतों को ‘हवाई’ कहा जाता है, जो मानवीय भावनाओं से लबरेज होते हैं। ये गीत इतने लोकप्रिय हैं कि कोई भी नेपाली उत्सव बिना तमांग गीत के पूर्ण नहीं होता है।

लखी (मुखौटा) नृत्य—यह नेवार (प्रधान) समुदाय का समूह मुखौटा नृत्य है, जिसका उद्देश्य बुरी आत्माओं को दूर करना और शांति व समृद्धि लाना है। इस नृत्य में खे (ढोल), झाली और धीमे आदि वाद्ययंत्रों का उपयोग किया जाता है।

नौमाटी—दमाई समुदाय के इस खूबसूरत समूह नृत्य में नौ प्रकार के वाद्ययंत्रों का उपयोग किया जाता है। इसमें दो प्रकार की शहनाई, छोटी और बड़ी तुरही, दो प्रकार के दमाहा (नगाड़ा), दो प्रकार के तुयुमको (छोटे ढोल), ढोलकी और झिमता (झाझ) का प्रयोग होता है। शादी और अन्य शुभ अवसरों पर नौमती बाजा अनिवार्य रूप से शामिल होता है।

च्याप-ब्रुंग नृत्य—च्याप-ब्रुंग लिंबो समुदाय का पारंपरिक वाद्ययंत्र है। यह ढोलक की तरह होता है, लेकिन आकार में बहुत बड़ा है। समूह नृत्य के दौरान पुरुष नर्तक रस्सी के सहारे अपने गले में इस वाद्ययंत्र को लटकाते हैं और ढोलक को एक तरफ हथेली से और दूसरी ओर छड़ी से मारते हैं। ढोलक पर इस तरह मारने से दो अलग-अलग ध्वनियाँ निकलती हैं, जो दर्शकों में उत्साह का संचार करती हैं।

धान नाच-चार पुरुषों और चार महिलाओं द्वारा हारमोनियम, मादल, बाँसुरी और घुँघरू की थाप के साथ किया गया, यह समूह नृत्य किसानों की सद्भावना और दृढ़ इच्छाशक्ति का प्रतीक है। काम की एकरसता को तोड़ने और किसानों में उत्साह व ऊर्जा का संचार करने के लिए धान नाच प्रस्तुत किया जाता है। इसमें पुरुष, महिलाएँ, युवा और बूढ़े सभी भाग लेते हैं तथा गीत-नृत्य के माध्यम से वातावरण में सकारात्मकता का संचार करते हैं। यह प्राचीनकाल से पारंपरिक वेशभूषा में प्रस्तुत किया जानेवाला एक आनुष्ठानिक नृत्य है। लिंबू समुदाय के लोकनृत्य तीन प्रकार के हैं—

१. प्राकृतिक नृत्य—इस नृत्य में स्त्री–पुरुष सभी भाग लेते हैं। प्राकृतिक नृत्य में नर्तकगण पद संचालन द्वारा पशु–पक्षियों की नकल करते हैं।

२. कृषि संबंधी नृत्य—मक्के और धान के खेतों में कार्य करते समय युवक–युवतियाँ इस प्रकार के नृत्य करती हैं। यह नृत्य मंद गति से आरंभ होकर देर तक चलता है। युवक–युवतियाँ नृत्य के साथ प्रेम गीत भी गाती हैं। मंचों पर भी इस नृत्य का प्रदर्शन किया जाता है। तमके ऊकमा, यिलकमा आदि नृत्य रूप इसमें शामिल हैं।

३. युद्ध नृत्य—लिंबू समुदाय में युद्ध नृत्य की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। इसका उद्देश्य युवकों में जोश और उत्साह का संचार करना एवं समुदाय के लोगों में गौरव बोध जाग्रत करना है।

भूटिया लोकनृत्य को निम्नलिखित दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है—

(अ) झुंग–से नृत्य—यह एक समूह नृत्य है, जिसमें नर्तक गोलाकार घूमते हुए देशी गीत की धुन पर नृत्य करते हैं। विवाह, गृह-प्रवेश और लोसूंग त्योहार के अवसर पर यह नृत्य किया जाता है।

(ब) ते–झे नृत्य—लोकगीतों की धुन पर एक नर्तक द्वारा या समूह में आगे–पीछे घूमते हुए यह नृत्य प्रस्तुत किया जाता है। ‘ते–ल्हू’ लोकगीतों के साथ इस नृत्य की प्रस्तुति नयनाभिराम होती है। ‘ते–ल्हू’ लोकगीतों की धुन हिंदी कौवाली जैसी होती है।

लेपचा लोकनृत्य के छह प्रकार हैं—१. प्राकृतिक नृत्य, २. जोमल-लोक–कृषि संबंधी नृत्य, ३. फेन–लोक–युद्ध नृत्य, ४. गुरु-लोक–ऐतिहासिक नृत्य, ५. याबा–लोक–आध्यात्मिक नृत्य एवं ६. मिथक संबंधी नृत्य।


वीरेंद्र परमार
103, नवकार्तिक सोसाइटी, प्लाॅट नं.–13,
सेक्टर-65, फरीदाबाद-121004 (हरियाणा)
दूरभाष : 9868200085

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