लॉकडाउन, भ्रष्टाचार और उसके साथी

लॉकडाउन, भ्रष्टाचार और उसके साथी

भ्रष्टाचार एक लंबी अवधि से अपनी कोठरी में दुबका पड़ा था। लॉकडाउन के कारण स्कूल, काॅलेज, बाजार, दुकानें, सरकारी कार्यालय, गाड़ी मोटर, लोगों का आना-जाना, लेन-देन, विवाह-शादी, मिलना-जुलना आदि सब कुछ ही बंद थे, जिसके कारण छोटे-बड़े हर प्रकार के कारोबार भी बंद थे। रोज कमाकर खानेवालों का तो पूछो ही मत। बाजार, दुकानें, कारोबार बंद तो उसके लिए कौन सा कारोबार खुलता? छुटपुट बचत जब तक थी खाते रहे, जब वह भी समाप्त हो गई तो हवा पानी के ही भरोसे। आखिर यह भी कब तक चलता? भूखे पेट के लिए कुछ-न-कुछ भोजन तो चाहिए ही। बेचारा भ्रष्टाचार भी कब तक अपनी कोठरी में भूखा-प्यासा दुबका रहता? आखिर उसे भी तो जीवित रहना है? सोचता है कि आज नहीं तो कल लॉकडाउन हट जाएगा और कोई-न-कोई सरकारी दफ्तर खुल ही जाएगा, लोग आएँगे-जाएँगे, चहल-पहल होगी तभी कुछ काम-धंधा चलेगा पर यह लॉकडाउन तो दिन-प्रति-दिन आगे ही बढ़ रहा है सुरसा के मुँह की तरह। सोचा कुछ व्यापारिक प्रतिष्ठान खुल जाएँगे, पर वे भी वह भी जस-की-तस ही रहे।

बड़े-बड़े व्यापारी तथा कारोबारी सरकार से बाजार इत्यादि खोलने की माँग करने की तैयारी में हैं, भ्रष्टाचार ने सोचा शायद इनके साथ चलने से कुछ बात बन जाए कहीं रुपया-पैसा ले-देकर सरकार में उसके साथी मान जाएँ पर यह क्या? लॉकडाउन के चलते उसके सभी साथी उसका साथ छोड़ते नजर आ रहे हैं। बाजार दुकानें आदि समय कुछ समय के लिए जो खोली तो जाती रही, परंतु कारोबारियों के कारोबार पर सरकारी अधिकारियों की नजर तो थी ही। कहीं-कहीं सी.सी. कैमरे लगे होने से भी उसका काम बनता नजर नहीं आया। सरकार के कुछ कर्मचारी, अधिकारी उसके मित्र तो थे, परंतु वे आजकल उसके मौसेरे भाई कामचोर के ज्यादा नजदीक हो गए थे, इसलिए उसकी इनके साथ दाल न गली।

कामचोर को यदि वैसे देखें तो वह अपने सरकारी मित्रों के साथ हमेशा चिपका रहता था जहाँ वह यदा-कदा अपने मित्रों को अफसरों की डाँट खाते देखता रहता था, परंतु इस बार तो मजे हो गए। कामकाज कुछ नहीं सारा दिन मौज-मस्ती करो और महीने के बाद पूरी तनख्वाह। जब लॉकडाउन है तो लोग नहीं, लोग नहीं तो काम नहीं, काम नहीं तो दाम काहे के? यानी भ्रष्टाचार बेचारा गुमसुम सबकुछ भूखे-प्यासे देखता रहता, सहता रहता तथा मन ही मन ‘करोना’ को गाली देता। परंतु कामचोर के मजे-ही-मजे। मन-ही-मन कभी ‘कोरोना’ को धन्यवाद करता तो कभी सरकार को, कभी-कभी तो अपने भाग्य को कि इस बार उसे बिना माँगे ही मोती मिल रहे हैं। न अफसरों का डर है, न समय की पाबंदी। यानी कि हींग लगे, न फिटकरी रंग चोखा-का-चोखा।

कामचोर की तूती बोलती देख भ्रष्टाचार उससे चिढ़ने लग गया। एक महीना, दो महीना, तीन महीना चार महीना, लॉकडाउन लगातार बढ़ता ही गया। सरकारी दफ्तर, स्कूल, कॉलेज, इत्यादि या तो पूरी तरह बंद या आंशिक रूप से खुले, पर लॉकडाउन के नाम पर बोलबाला तो कामचोर का ही चल रहा था। बेचारा भ्रष्टाचार कामचोर का बोलबाला देखकर अपना मन मसोसकर रह जाता, क्योंकि इस बार कामचोर को खुली छूट जो मिली थी। यानि कि सरकारी मान्यता। भ्रष्टाचार कभी-कभार कामचोर के निकट जाने की कोशिश करता, परंतु वहाँ उसकी सुननेवाला ही कोई नहीं था क्योंकि दफ्तर में केवल छुटपुट कर्मचारी और आम लोग कोई नहीं। चूँकि भ्रष्टाचार का तो संबंध ही आम लोगों व सरकारी कर्मचारियों, अधिकारियों के आपसी तालमेल में रहता है, मगर वहाँ तो बड़ी ईमानदारी के साथ कामचोर का काम हो रहा था। ऐसे दोनों बिरादरी के कारोबारियों में ईर्ष्या या डाह होना तो स्वाभाविक ही था।

भुभुक्षु किं न करोति पापम् की युक्ति को चरितार्थ करते हुए एक दिन भ्रष्टाचार ने कामचोर से कह ही दिया, ‘देखो पहले हम दोनों साथ-साथ ही चलते थे, परंतु लॉकडाउन के कारण अब तुम्हारा काम तो चल रहा है परंतु मेरी तो भूख-प्यास से हाल ही खराब है। मुझे लगता है कि मैं तो ऐसे में कहीं दम ही न तोड़ दूँ? क्यों न हम दोनों मिलकर ही करोबार करें?’

कामचोर ने कहा, ‘चल-चल बड़ा आया उपदेश देनेवाला, कभी-कभी तो ऐसा मौका मिलता है और उसमें भी मैं तुम्हें भागीदार बनाऊँ, यानि अपने पेट में खुद लात मारूँ? ईमानदारी के साथ कारोबार करने का मौका मिला है उसमें भी भागीदारी? न बाबा न? न जाने अब ऐसा मौका फिर कब आएगा?’

भ्रष्टाचार बोला, ‘अरे बड़ा स्वार्थी है? जब मेरा कारोबार अच्छा चल रहा था तो तू भी साथ होता था, पर अब जब मेरा कारोबार मंदा पड़ गया और मुझे भूखे मरने की बारी आई तो अब तू बड़ा बना फिरता है, देखना यह लॉकडाउन ज्यादा दिन नहीं रहेगा, तब तो हर जगह मेरा ही बोलबाला रहेगा और तेरे को कोई नहीं पूछेगा?’

‘अच्छा, कोई नहीं पूछेगा? चल-चल दूर हो जा मेरी नजरों से।’ कामचोर ने ऐसा कहते हुए भ्रष्टाचार को इतने जोर से धक्का मारा कि वह दूर जा छिटका।

इससे पहले कि भ्रष्टाचार जमीन पर गिर पड़ता मक्कारी ने हँसते-हँसते भ्रष्टाचार को सँभाल लिया।

दोनों को समझाते हुए मक्कारी कहने लगी, ‘अरे मूर्खो! कभी-कभी तो ऐसा मौका मिलता है और तुम दोनों आदमियों की तरह आपस में ही लड़ रहे हो? समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता, नीति कहती है कि बुरे वक्त में अपने कट्टर शत्रु से भी मित्रता करनी पड़ती है, नहीं तो न एक रहेगा न दूसरा? क्या तुम्हें पता नहीं है कि देश के सभी नेता एक-दूसरे का सिर फोड़ने के बाद भी अपने स्वार्थ के लिए आपस में मिल जाते हैं? पर हम सब तो नेता नहीं है और हमें एक-दूसरे के सिर फोड़ने की जरूरत भी नहीं है। हमें तो बस मिल-जुलकर अपना काम करना है, सिर तो खुद के खुद फट जाएँगे। इसलिए हमें अभी ही प्रण कर लेना है कि हम तीनों मिलकर अपना कारोबार करेंगे नहीं तो हमारा अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा।’

मक्कारी का यह उपदेश सुन तीनों आपस में गले मिल गए और तीनों ने मिलकर काम करने की कसम खाई।


हरदेव सिंह ‌धीमान
धीमान गृहम बरोली
पत्रालय दनावली, तहसील ननखरी
जिला शिमला-१७२०२१ (हि.प्र.)
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