सामान्य दिनचर्या से परे...

वर्षों से यही क्रम चला आ रहा है। नए वर्ष के आगमन पर हम अपने जीवन के लिए कुछ नए संकल्प लेकर परिवर्तन की कामना करते हैं। ये संकल्प प्रायः बहुत हलके-फुलके से ही होते हैं कि ‘हम सुबह जल्दी उठा करेंगे’, ‘हम चाय में चीनी लेना बंद कर देंगे’, ‘हम योग करना प्रारंभ कर देंगे’...यह सूची बहुत लंबी है।

कुछ प्रबुद्ध जन इसमें कुछ गंभीर संकल्प भी जोड़ लेते हैं। ये संकल्प कितना और कितने दिन बाद साकार हो पाते हैं या सीधे अगले वर्ष के संकल्प में स्‍थानांतरित हो जाते हैं, वह एक अलग ही कहानी है। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि जिस तरह हमारे मोबाइल फोन पर इस या उस ‘ऐप’ को ‘अपग्रेड’ करने की सूचना आती रहती है, उसी तरह हम अपने संकल्पों को ‘अपग्रेड’ या उन्नत अथवा समृद्ध करने पर विचार करें। व्यक्तिगत आकांक्षाएँ होना या स्वयं के जीवन का परिष्कार आवश्यक है,‌ किंतु हम मनुष्य हैं तो भोजन, निद्रा, परिवार आदि से परे भी बहुत कुछ है, जो हमें करोड़ों जीव-जंतुओं आदि से अलग अथवा श्रेष्ठ बनाता है। हमारे धार्मिक ग्रंथों में भी करोड़ों योनियों में रहने के बाद मनुष्य का जीवन मिलने की बात कहकर उसे अत्यंत मूल्यवान बताया गया है। तुलसीदासजी भी ‘बड़े भाग मानुस तन पावा’ का संदेश देते हैं। अतः मनुष्य होने के नाते कुछ-न-कुछ विशेष करना अनिवार्य सा हो जाता है। स्वाभाविक है कि व्यक्तिगत उपलब्धियों अथवा पारिवारिक कर्तव्यों के निर्वहन के साथ-साथ हम समाज या देश के लिए कुछ विशेष अवश्य करें; और यह किसी भी रूप में संभव है। एक उदाहरण साझा करता हूँ—मुंबई में एक ऑटो रिक्‍शा चलाने वाले दामलेजी हैं। ऑटो रिक्‍शा से परिवार की गुजर-बसर होती है। न उनके पास कोई पैतृक संपत्ति है, न कमाई का अन्य स्रोत। हाँ, उनके पास एक नेक इनसान बनने की आकांक्षा है, एक सजग नागरिक बनने का संकल्प है। दामलेजी ने एक तो अपने ऑटो में ऐसी अनेक व्यवस्‍थाएँ कर रखी हैं, जो सैकड़ों ऑटो रिक्‍शों में नहीं होंगी।

जरूरतमंद सवारियों के लिए पीने के पानी से लेकर आवश्यक दवाइयाँ एवं प्राथमिक उपचार के साधन आदि। दामलेजी दिव्यांग सवारियों से कोई पैसा नहीं लेते, वरिष्ठ नागरिकों को भी अपनी तरफ से कुछ छूट देते हैं। इतना ही नहीं, हर रविवार वे अपनी कमाई से किसी अनाथालय में जाकर बच्चों में जरूरी चीजें बाँट आते हैं। संयोग से कभी उनके ऑटो में कोई पत्रकार बैठ गया और उसने अपने फेसबुक पोस्ट पर उनके बारे में पोस्ट डाल दी तो कुछ लोगों को उनके बारे में पता चल जाता है, अन्यथा दामलेजी वर्षों से अपने तरीके से निस्स्वार्थ भाव से, बिना यश की कामना से सार्थक समाज-सेवा में लगे हुए हैं। दामले की पत्नी और बच्चों को भी साधुवाद देना चा‌हिए कि वे उनके नेक कार्यों में साझेदार हैं। देश के हर प्रांत के हर नगर, कस्बे में ऐसे अनेक खामोश नेक इनसान अथवा समाजसेवी मौजूद हैं। भारत जैसे विराट् देश में सरकारें अथवा संस्‍थाएँ सबकुछ कर भी नहीं सकतीं, यदि वे बड़ी ईमानदारी व दक्षता से करें तो भी।

इसीलिए समाजसेवी संस्‍थाओं, स्वयंसेवी संस्‍थाओं के साथ-साथ हर नागरिक की भागीदारी की महती आवश्यकता है। अभी दिए गए उदाहरण के संदर्भ में ही देखें तो हजारों ऑटो चालकों में कितने दामले मिलेंगे अथवा दो करोड़ से अधिक आबादी वाले मुंबई नगर में कितने ऐसे नागरिक मिलेंगे, जो साधन-संपन्न होते हुए भी अपने तथा अपने परिवार से परे समाज के लिए कुछ सार्थक योगदान कर पा रहे हैं। जब सामान्य नागरिकों में सामाजिक चेतना जाग जाती है तो वे चमत्कार कर डालते हैं। मुंबई से ही एक और उदाहरण साझा करता हूँ। नवी मुंबई के खारगर इलाके में पहाड़ियों वाले क्षेत्र की बड़ी दुर्दशा थी। अवैध कब्जे, अवैध निर्माण, असामाजिक तत्त्वों की गतिविधियाँ, बारिश के दिनों में तरह-तरह की मुसीबतें, पर्यावरण पर गंभीर संकट। कुछ चार-पाँच नागरिकों ने आवाज उठाई, जोखिम उठाए, चेतना जगाई, दूसरे नागरिकों को साथ मिलाया, इस तरह धीरे-धीरे एक अभियान का प्रारंभ हुआ। संस्‍थाएँ जुड़ीं। बात सरकार एवं प्रशासन तक पहुँची। कुछ ही वर्षों में खारगर के उस पहाड़ीनुमा अंचल का कायाकल्प हो गया है। अब वह एक प्रतिष्ठित पिकनिक स्‍थल में बदल गया है। पर्यावरण का संकट टल गया है। बारिश के दिनों में कोई संकट खड़ा नहीं होता। अब वहाँ झीलें हैं, तालाब हैं, मछलियाँ हैं, तरह-तरह के पंछी हैं। कुछ सामान्य नागरिकों की सामाजिक चेतना जाग्रत् होने से अब खारगर पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बन गया है।

धमतरी (छत्तीसगढ़) में एक गाँव में खुली शराब की दुकान अपना दुष्प्रभाव दिखाने लगती है। गाँव के युवक तबाही के शिकार होने लगते हैं। उस गाँव की कुछ महिलाओं में सामाजिक चेतना जागती है। वे गाँव भर की महिलाओं को एकजुट करती हैं, फिर शुरू होता है सत्याग्रह। न कोई संस्‍था, न कोई बैनर, न कोई नारा, न कोई कटुता, न ही इस अभियान का कोई नेता...। महिलाएँ दुकान से कुछ दूरी पर एकजुट होकर बैठ जाती हैं और शराब खरीदने के लिए आनेवालों को हाथ जोड़कर समझाती हैं, उनके बच्चों की दुहाई देती हैं, युवाओं को उनके भविष्य का वास्ता देती हैं।

एक दिन, दो दिन...करते-करते आखिर ३२ दिन तक सत्याग्रह जारी रहता है। आखिरकार दुकान का मालिक, जो बहुत धन-संपन्न ही नहीं, बल्कि प्रभावशाली भी है, महिलाओं की एकजुटता के समक्ष अपनी पराजय स्वीकार कर लेता है और शराब की दुकान बंद हो जाती है। यह थी एक-दो महिलाओं की सोच से ऊपजी सामाजिक जागरूकता की चमत्कारी परिणति। व्यक्तिगत रूप से किए गए प्रयास भी व्यापक परिवर्तन लाते हैं, जो समाज के लिए वरदान बन जाते हैं। पिछले दिनों माननीय राष्ट्रपति द्वारा पद्मश्री पुरस्कार प्रदान करने पर भी ऐसे कुछ उदाहरण हमारे सामने आए थे। मंगलूर बस अड्डे पर फल बेचनेवाले हजब्बा की दुकान पर एक विदेशी पर्यटक उनसे कुछ सवाल पूछता है, किंतु अनपढ़ होने के कारण वे उत्तर नहीं दे पाते और यह छोटी सी बात उनके भीतर उथल-पुथल मचा देती है। स्वयं नहीं पढ़ पाए तो क्या गाँव के बच्चे तो पढ़ जाएँ! यही सामाजिक चेतना उनका जीवन बदल देती है। फलों की दुकान के साथ ही चल पड़ता है शिक्षा के प्रसार का मिशन। हजब्बा अपने गाँव में अपने पैसे से एक छोटा सा विद्यालय प्रारंभ करते हैं, जो कालांतर में बड़ा स्वरूप ले लेता है, फिर उनकी शिक्षा प्रसार की मशाल अपना उजाला दूर-दूर तक फैला देती है और वे ‘अक्षर संत’ के रूप में प्रतिष्ठित हो जाते हैं। यह सामाजिक चेतना नहीं जागती तो ‘हरेकाला हजब्बा’ फल बेचते-बेचते एक दिन दुनिया से विदा हो जाते। लेकिन उनकी सामाजिक चेतना ने उन्हें उसी ‘पद्‍मश्री’ से सम्मानित कराया, जो बड़े-बड़े साहित्यकारों, कलाकारों, विद्वानों को मिलती है।

तेलंगाना में एक सामान्य जीवन जी रहे शेख सादिक अली को पुस्तकों और अध्ययन की महत्ता आकर्षित करती है तो वे पुस्तकों की दुकान भी खोल लेते हैं, लेकिन जब वे महसूस करते हैं कि कितने ही लोगों के पास पुस्तकें खरीदने के पैसे नहीं हैं, जबकि उनमें पढ़ने की ललक है, तो फिर वे पुस्तकें बाँटने का काम शुरू कर देते हैं। इस कार्य में उन्हें इतना प्यार व सम्मान मिलता है कि वे ३,००० किमी. पैदल जाकर गाँव-गाँव में आदिवासियों, गरीबों के बच्चों को पुस्तकें बाँटते हैं; साथ ही छोटे-छोटे पुस्तकालय व वाचनालय भी स्‍थापित करने लगते हैं। इस तरह वे १५० से अधिक पुस्तकालय व वाचनालय स्‍थापित कर देते हैं। इस कार्य में वे अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा समर्पित कर देते हैं। ऐसे कितने ही सामान्य नागरिक कुछ ऐसे कार्य कर रहे हैं, जो बड़ी-बड़ी सरकारी संस्‍थाएँ भी धन एवं कर्मचारी होते हुए भी नहीं कर पातीं। महाराष्ट्र के एक सज्जन अपने बेटे की सड़क दुघर्टना के बाद सड़कों के गड्ढे भरने को ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लेते हैं और अब तक एक हजार से अधिक छोटे-बड़े गड्ढे भरकर हजारों जीवन बचा चुके हैं। जो काम पी.डब्ल्यू.डी. या नगर निगम जैसी संस्‍थाएँ न कर पाईं, वह काम एक अकेले व्‍यक्ति ने कर दिखाया।

काश! हम सब समाज के लिए कुछ-न-कुछ करने का संकल्प कर लें और जहाँ भी, जितना भी अपनी सामर्थ्य के अनुसार कर सकें तो कल्पना करिए कि दर्जनों बुनियादी समस्याओं, चुनौतियों से जूझ रहे देश में कितना सामाजिक बदलाव हो सकेगा! इसे भारी विडंबना ही कहेंगे कि संसद् में दी गई जानकारी के अनुसार कितने ही धनी व्यक्तियों ने भारत की नागरिकता छोड़ी है। काश! वे भारत के लिए सोचते, भारत के हित के लिए योगदान देते!

कम-से-कम इतना तो करें...

हम अपना सामाजिक दायित्व अपनी रुच‌ि, अपनी क्षमता के अनुसार निभाएँ, किंतु कुछ संकल्प ऐसे हैं, जो नए वर्ष में सबके लिए बिना किसी श्रम या खर्च के भी संभव हैं। स्वाधीनता के अमृत महोत्सव वर्ष में यह देश के लिए भी अच्छी सेवा होगी। आप प्रबुद्धजन भी इन सुझावों के प्रसार में भागीदार बनें।

हम सब हिंदी को सशक्त बनाने के प्रयास में भागीदार बनें। अंग्रेजी की मानसिक दासता से मुक्ति प्राप्त करें। करना सिर्फ इतना है कि घर के बाहर लगी ‘नाम पिटका’ यदि अंग्रेजी में है तो उसे हिंदी में करें। विजिटिंग कार्ड यदि अंग्रेजी में है तो उसे हिंदी में या द्विभाषी कर लें। मांगलिक कार्यों, जैसे विवाह आदि के अवसर पर निमंत्रण-पत्र हिंदी में छपवाएँ। हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए सरकार को प्रेरित करें। हिंदी राष्ट्रभाषा बने, संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बने, यह हम सबका लक्ष्य होना चाहिए। लेखकों को चाहिए कि वे हिंदी को ज्ञान-विज्ञान और विमर्श की भाषा बनाएँ। अनुवादक उसे विभिन्न भाषाओं के ज्ञान तथा साहित्य से समृद्ध करें। बच्चों को हिंदी की पत्रिकाएँ एवं पुस्तकें उपलब्‍ध कराएँ। घर में हिंदी के अखबार एवं पत्रिकाएँ अवश्य मँगाएँ। कुछ और भी आसान कार्य हैं, जो नागरिक के रूप में निभाने आवश्यक हैं।

चूँकि हम विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं और लोकतंत्र तभी सच्चा लोकतंत्र बन सकता है, जब उसमें जनता की व्यापक भागीदारी हो। एक नागरिक के नाते हमें अपने जनप्रतिनिधियों, संस्‍थाओं, सरकारों पर भी कड़ी नजर रखनी चाहिए, उनके कार्यों का आकलन करना चाहिए। हमारे टी.वी. चैनल देश की गंभीर समस्याओं पर विचार-विमर्श की जगह फालतू की बहसों में उलझाए रहते हैं और टी.आर.पी. बटोरने के चक्कर में सनसनी फैलाते रहते हैं, घृणा और बँटवारा बढ़ाते हैं। यदि दर्शक उनका बहिष्कार करें तथा चैनलों के प्रति विरोध प्रदर्शित करें तो वे स्वयं रास्ते पर आ जाएँगे। बुद्धिजीवियों की चुप्पी बहुत बड़ी समस्या है। हमारा देश पूरे विश्व में अपने श्रेष्ठ कार्यों के लिए, श्रेष्ठ उपलब्धियों के लिए प्रतिष्ठित हो तो यह हम सबके लिए गर्व की बात होगी। सिर्फ इतना भर करना है कि हम कितने ही व्यस्त हों, पर देश के लिए, समाज के लिए, अपने प्रदेश, अपने नगर, अपने मोहल्ले के लिए थोड़ा समय अवश्य निकालें तथा कुछ और न कर सकें तो नकारात्मक गतिविधियों में भागीदार होने से बचें। जैसे कि कुछ निहित स्वार्थ, झूठ, अफवाह और घृणा फैलाने वाले संदेश सोशल मीडिया पर भेजते हैं तो हम उन्हें बिना जाँचे-परखे आगे न बढ़ाएँ। कहने की आवश्यकता नहीं कि यदि आप अपने टैक्स सही ढंग से चुकाएँ, दुकानदार से पक्का बिल लेने लगें तो फिर तो क्रांति सी हो जाएगी।

 

 

(लक्ष्मी शंकर वाजपेयी)

मई 2022

   IS ANK MEN

More

हमारे संकलन

April 2022