मन का बोझ

मन का बोझ

रंजन सातवीं कक्षा का छात्र था। वह रोज स्कूल से आकर भोजन करने के बाद अपना स्कूल का काम करने लगता। जब वह पढ़ाई का काम पूरा कर लेता तो उसकी माँ उसे बाजार का छोटा-मोटा काम बता देती।

तब रंजन अपनी छोटी सी साइकिल उठाता और बाजार की ओर चल देता।

बाकी घरेलू सामान तो महीने भर का इकट्ठा आ जाता था, लेकिन सब्जी तो रोज ताजी ही होनी चाहिए। हमेशा सब्जी लाने का जिम्मा रंजन का ही था।

सब्जी मंडी के एक कोने में एक बुढ़िया की दुकान थी। न जाने क्यों, रंजन के मन में बुढ़िया के प्रति सहानुभूति थी। वह हमेशा उसी से सब्जी ले आता था। कई बार सब्जियाँ लेते समय पैसे कम भी पड़ जाते, तब भी बुढ़िया उसे पूरी सब्जियाँ दे देती। रंजन बाकी पैसे अगले दिन दे देता। बुढ़िया को रंजन पर पूरा भरोसा था।

रंजन जैसे ही सब्जी मंडी में घुसता, वह दूर से ही पुकारता—‘‘दादी माँ, मैं आ गया हूँ। जल्दी से दो किलो आलू, आधा किलो पालक तौल दो।’’ बुढ़िया कहती—‘‘ले बेटा, सबसे पहले तेरे लिए तौलती हूँ।’’ बुढ़िया को रंजन से लगाव हो गया था।

उस दिन भी रंजन दूर से ही चिल्लाया—‘‘दादी माँ, मैं आ गया।’’ और फिर उसने अपनी साइकिल बुढ़िया की दुकान के पास दीवार के सहारे खड़ी की और टोकरी लेकर बैठ गया। तभी सब्जियों पर नजर दौड़ाई और बोला, ‘‘दादी माँ, आधा किलो लौकी, एक किलो अरबी, ढाई सौ ग्राम हरी मिर्च और दो ताजे नीबू दे दो।’’

बुढ़िया ने एक-एक कर सारी सब्जियाँ तौलकर रंजन की टोकरी में डाल दीं। रंजन ने सब्जियों का भाव पूछकर हिसाब लगाया। कुल चालीस रुपए बने थे। रंजन ने बुढ़िया को पचास रुपए का नोट दिया। बुढ़िया ने उसका नोट अपनी चटाई के नीचे रखा और एक बीस रुपए का नोट निकालकर रंजन को दे दिया।

नोट निकर की जेब में डालकर और टोकरी साइकिल के हत्थे पर लटकाकर रंजन घर की ओर चल दिया। वह बड़ा खुश हो रहा था। वह सोचने लगा—‘कैसी भोली है दादी माँ, दस रुपए के नोट की जगह बीस रुपए का नोट दे दिया। शायद वह भूलकर इसे दस रुपए का नोट समझ बैठी है। इसमें मेरी क्या गलती है? उसको नोट अच्छी तरह देखकर देना चाहिए था। गलती तो उसी की है। मैं कोई जान-बूझकर उससे बीस रुपए का नोट थोड़े ही लाया हूँ।’

लेकिन घर जाकर अपनी माँ को हिसाब देने से पहले यह सोचना भी जरूरी था कि पचास रुपए में से चालीस की सब्जियाँ आ गईं तो फिर बीस रुपए कैसे बचे? उसे बीस रुपए के दस-दस के दो नोट लेना जरूरी हो गया। वह घर जाने से पहले नुक्कड़ वाली पान की दुकान पर गया। पान वाले से बीस रुपए देकर दस-दस के दो नोट लिये।

अब रंजन की खुशी का ठिकाना न था।

वह जल्दी से घर पहुँचा। उसने घर आकर दस रुपए का नोट अपनी माँ को दिया और बता दिया कि चालीस रुपए की सब्जी आई है।

रंजन के लिए बाजार की चीजें खाने की मनाही थी। उसकी माँ ने कह रखा था—‘‘अगर तुझे कोई चीज खानी हो तो तू मुझे बता दिया कर। मैं वह चीज तुझे घर पर ही बना दूँगी। बाजार में चीजें खुली रखी रहती हैं। उन पर मक्खी-मच्छर बैठते हैं। ऐसी चीजें खाने से बीमार हो जाते हैं।’’

लेकिन अगले दिन तो वह स्कूल से लौटते समय श्‍यामू की चाट की दुकान से चाट जरूर खाएगा। दस रुपए का नोट जो है उसके पास। मोहन कहता है कि इस दुकान की चाट इतनी स्वादिष्ट है कि एक बार कोई खा ले तो वह कई दिनों तक याद रखता है, फिर सस्ती इतनी कि बस दस रुपए की एक प्लेट। एक बार में आधी ही काफी है।

फिर माँ और पिताजी को भी पता नहीं चलेगा कि उसने बाजार से कुछ खाया है। उन्होंने पैसे दिए ही नहीं हैं, और अपने जेबखर्च के सारे पैसे तो वह गुल्लक में डाल देता है।

रंजन इस प्रकार सोचता हुआ बहुत खुश हो रहा था। उसने दस रुपए के खर्च का बजट बना लिया था। पाँच रुपए की चाट वह आज खाएगा और पाँच रुपए अगले दिन चाट खाने के लिए रख लेगा। आज उसने खाना खाकर जब पढ़ना शुरू किया तो उसका मन पढ़ाई में नहीं लगा। तभी पढ़ते-पढ़ते उसे नींद आ गई।

अगले दिन सुबह रंजन देर तक सोता रहा।

जब उसकी माँ ने दो-चार आवाजें लगाईं, तब उसकी नींद खुली। उसने रात में बुरे-बुरे सपने देखे थे। जैसे वह कक्षा की सबसे पीछे की बेंच पर खड़ा है। उसके मास्टरजी कह रहे हैं—‘तुमने चोरी की है, इसलिए तुम पूरे पीरियड बेंच पर खड़े रहोगे।’

आधी छुट्टी हुई तो कक्षा के सारे छात्र उसकी तरफ इशारा करके कह रहे थे—‘यह रंजन चोर है। इसने कल बिन्नी का ज्योमेट्री बॉक्स चुरा लिया था। पहले पीरियड में यह पूरे समय खड़ा रहा है।’ उसे रात को इस सपने के बाद काफी देर तक नींद नहीं आई थी।

करीब चार बजे उसकी दोबारा आँख लगी तो उसने देखा कि वह उस सब्जी वाली बुढ़िया के सामने बैठा है। वह सब्जियाँ तौल-तौलकर टोकरी में डालते हुए कहती जा रही है—‘‘बेटा, मैंने तो जानबूझकर तुझे बीस रुपए का नोट दिया था। मैं देखना चाहती थी कि तू कितना ईमानदार है।’’ तभी अपनी माँ की आवाज सुनकर रंजन की नींद खुल गई।

वह बुरी तरह घबराया हुआ था। देर से उठने के कारण वह जल्दी-जल्दी तैयार हुआ। उसने खाना भी अच्छी तरह से नहीं खाया और अनमना सा स्कूल की ओर चल दिया।

वह कक्षा में भी दिन भर उदास ही बैठा रहा। उसके मित्र मोहन ने पूछा, ‘‘रंजन, तेरी तबीयत खराब है क्या?’’ लेकिन उसने कोई जवाब नहीं दिया। उसका कोई साथी उसकी तरफ देखता तो वह घबरा जाता, जैसे अभी उसका कोई साथी कहेगा, ‘‘अरे रंजन, तू तो अच्छे घर का लड़का है। तुझसे तो ऐसी उम्मीद नहीं थी।’’

स्कूल की छुट्टी हुई तो उसे थोड़ा चैन मिला। उसने जल्दी से अपनी साइकिल उठाई और घर की तरफ चल दिया। उसे लग रहा था कि जैसे वह घर सुरक्षित भी पहुँच पाएगा या नहीं। उसे ज्यों ही बुढ़िया का बीस रुपए का नोट याद आता, उसके पूरे शरीर में कँपकँपी सी दौड़ जाती। एक-दो बार तो वह रिक्‍शा और मोटरसाइकिल से भी टकराते-टकराते बचा।

उसने घर पहुँचकर स्कूल की वरदी उतारी और जल्दी से दूसरे कपड़े पहने। फिर वह टोकरी उठाकर अपनी माँ से बोला, ‘‘माँ, पैसे दे दो, सब्जी ले आऊँ।’’ वह अब भी उदास लग रहा था। उसकी माँ ने पूछा, ‘‘बेटा, क्या आज तेरी तबीयत खराब है? अगर तबीयत खराब हो तो आज सब्जी मैं ही ले आऊँगी।’’ वह बनावटी हँसी हँसता हुआ बोला, ‘‘नहीं माँ, मैं बिल्कुल ठीक हूँ।’’ और फिर वह पैसे लेकर सब्जी मंडी की ओर चल पड़ा। वह बहुत तेज साइकिल चला रहा था। वह जल्दी-से-जल्दी सब्जी बेचने वाली बुढ़िया के पास पहुँच जाना चाहता था।

वह जल्दी ही बुढ़िया की दुकान पर पहुँच गया। लेकिन उसके मुँह से ‘दादी माँ, मैं आ गया हूँ।’ की आवाज नहीं निकली। वह बुढ़िया के सामने जा बैठा, तभी उसे उसके आने का पता चला। वह उससे पूछने लगी, ‘‘क्या-क्या सब्जी दूँ, बेटा?’’

रंजन के मुँह से एक भी शब्द नहीं निकला। उसकी आँखों से आँसुओं की धारा बहने लगी। बुढ़िया असमंजस में पड़ गई और बोली, ‘‘बेटा, क्या तेरे पैसे रास्ते में गिर गए हैं? अगर ऐसी बात है तो चिंता मत कर। जो सब्जी तुझे लेनी हो, ले जा। पैसे कल आ जाएँगे।’’ लेकिन बुढ़िया को असली बात का पता नहीं था। बुढ़िया के बार-बार पूछने पर भी जब रंजन कुछ नहीं बोला तो वह हैरान रह गई और बोली,  आखिर बात क्या है, बेटा, कुछ तो बता?

तब रंजन ने अपनी निकर की जेब में हाथ डाला और एक दस रुपए का नोट निकालकर बुढ़िया के सामने चटाई पर रखते हुए कहा,  दादी माँ, मुझे माफ कर देना।

बुढ़िया को कुछ समझ नहीं आ रहा था। रंजन फिर बोला, ‘‘मुझे माफ कर दो, दादी माँ, मैं चोर हूँ। मैंने आपका एक दस रुपए का नोट चुराया है।’’

बुढ़िया अब भी कुछ नहीं समझी। बुढ़िया के बहुत पूछने पर भी रंजन ने उसे कुछ नहीं बताया, बस यही कहता रहा, ‘‘पहले आप मुझे माफ कर दो, दादी माँ फिर बता दूँगा।’’

बुढ़िया परेशान हो गई, वह हारकर बोली, ‘‘अच्छा जा, माफ किया बेटा, अब तो बता, आखिर क्या हुआ है?’’

रंजन ने रुँधे गले से बुढ़िया को सारी बात बताई। रंजन की ईमानदारी देखकर बुढ़िया बहुत खुश हुई। उसकी आँखों में खुशी के आँसू छलक आए। वह बस इतना ही कह पाई, ‘‘बेटा, तू बहुत ईमानदार है।’’ बुढ़िया के मुँह से यह सुनकर रंजन के मन का बोझ उतर गया। उसने बाद में आज जो सब्जी लेनी थी, वह ली और शांत मन से घर की ओर चल पड़ा।

नंदभवन, काँवाखेड़ा,

भीलवाड़ा-311001 (राज.)

दूरभाष : 9413211900

सितम्बर 2021

   IS ANK MEN

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