भाषा ही ध्यान है

भाषा ही ध्यान है

सोचने का तरीका है लेखन

केवल भाषा ही अनाम चीजों के भय से हमारी रक्षा करती है। भाषा ही ध्यान है। मैं अश्वेत लोगों के लिए लिख रही हूँ, ठीक उसी तरह जैसे टाल्सटॉय मेरे लिए अर्थात् लोरेन, ओहियो की इस १४ वर्षीय लड़की के लिए नहीं लिख रहे थे। मुझे क्षमा माँगने या अपने को सीमित समझने की आवश्यकता नहीं है कि मैं श्वेत लोगों के बारे में नहीं लिखती, जबकि यह पूर्णत: सच नहीं है—मेरी पुस्तकों में बहुत से श्वेत जन विद्यमान हैं। बात यह है कि कोई श्वेत समीक्षक आपके कंधे पर सवार होकर इसे अनुमोदित नहीं करता।

मैं पूर्णत: जिज्ञासु, जीवंत और नियंत्रण में होने का अनुभव करती हूँ।...और जब मैं लिखती हूँ तो प्राय: अपनी उत्कृष्टता में होती हूँ।

मैं संग-पथ में, जहाँ आप कुछ भी नहीं कर सकते, एक चरित्र पर विचार करते हुए बहुत सी साहित्यिक समस्याओं का समाधान कर सकती हूँ।

एक कहानी रचो। सबकी खातिर राह में अपना नाम भूल जाओ और हमें बताओ कि अँधेरे स्थानों और उजाले में दुनिया आपके लिए कैसी रही। हमें यह न बताओ कि किस पर विश्वास करना है और किससे डरना है। हमें विश्वास की चौड़ी स्कर्ट और वह सिलाई दिखाओ, जो भय के आवरण हटा देती है।

यदि आप एक ऐसी पुस्तक पढ़ना चाहते हैं, जो अभी तक लिखी नहीं गई है, तो आपको वह पुस्तक लिखनी चाहिए।

हमें अपनी डरावनी कहानियों से लगाव रोकना होगा। जेम्स जॉयस की यूलिसिस को चौदह बार अस्वीकार किया गया। मैं उस कहानी को पसंद नहीं करती, मैं उससे नफरत करती हूँ। फिट्जराल्ड थक गया और काम नहीं कर सका। हेमिंग्वे हताश हो गया और काम नहीं कर सका। ‘क’ पागल हो गया, ‘ख’ गरीबी में मर गया, ‘ग’ पी-पीकर मर गई, ‘घ’ को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया, ‘ङ’ ने आत्महत्या कर ली। मुझे उन कहानियों से नफरत है। महान् कृतियाँ जेलों और शिविरों में लिखी जाती हैं। इसी तरह अरुचिकर किताबें हैं। दयनीयता कार्य को सुदृढ़ नहीं करती। यह संवेदनाओं को अपमानित और कार्य का अनादर करती है।

जाति जैसी कोई चीज नहीं

समस्त आनंद और सुख-शांति के स्थान उन लोगों द्वारा अभिकल्पित किए गए हैं, जो वहाँ नहीं हैं, जिन्हें वहाँ जाने की अनुमति नहीं है।

मुझे लगता है कि राजनीतिक औचित्य पर विमर्श वास्तव में उस शक्ति के बारे में है, जो लोगों के लिए सीमाएँ तय करने में सक्षम हैं। सीमाएँ तय करने वाले ऐसा शक्ति के नाम पर करते हैं और प्रभावित जन अब उनकी उस शक्ति को उनसे दूर ले जा रहे हैं।

मुझे पता है कि दुनिया को चोट लगी है और रक्त बह रहा है। हालाँकि यह महत्त्वपूर्ण है कि इस दर्द को नजरअंदाज न करें, किंतु यह भी महत्त्वपूर्ण है कि इस विद्वेष के आगे झुकें नहीं। विफलता की तरह अराजकता में भी जानकारी होती है, जो ज्ञान की ओर ले जा सकती है—बुद्धिमानी की ओर भी। ठीक कला की तरह। अमेरिकी का अर्थ है श्वेत और अफ्रीकी लोग जातीयता के साथ एवं हाइफन पर हाइफन पर हाइफन लगाते हुए इस शब्द का स्वयं पर प्रयोग करने के लिए संघर्ष करते हैं। ऐसी कोई सभ्यता नहीं, जो कला के साथ शुरू न हुई हो, चाहे वह रेत पर एक लकीर खींचना हो, गुफा को चित्रांकित करना हो या कि नृत्य करना हो।

आतंक के दौर में कलाकारों को कभी भी चुप नहीं रहना चाहिए। यह ठीक वह समय होता है जब कलाकार काम पर लग जाते हैं। यहाँ निराशा के लिए कोई समय नहीं, आत्म-दया के लिए कोई स्थान नहीं, चुप रहने की आवश्यकता नहीं और डर के लिए कोई जगह नहीं। हम बोलते हैं, हम लिखते हैं, हम भाषा का प्रयोग करते हैं। उसी से तो सभ्यताएँ स्वस्थ रहती हैं।

जातीयता का सबसे गंभीर कार्य है—ध्यान भंग करना। यह आपको अपना काम करने देने से दूर करता है। यह आपको बार-बार आपके होने के कारण समझाता रहता है। कोई कहता है कि आपके पास कोई भाषा नहीं है और आपको यह सिद्ध करने में २० वर्ष लग जाते हैं कि आपकी भाषा है। कोई कहता है कि आपके सिर की आकृति ठीक नहीं है और आपके पास इस तथ्य के लिए वैज्ञानिक काम करते हैं कि इसकी आकृति ठीक है। कोई कहता है कि आपके पास कोई कला नहीं है, अत: आप वह खोज निकालते हैं। कोई कहता है आपका कोई राज्य नहीं है, इसलिए आप वह ढूँढ़ निकालते हैं। इनमें से कोई भी आवश्यक नहीं है। हमेशा ही कोई और बात तो होगी ही।

जाति जैसी कोई चीज नहीं है। बिल्कुल नहीं। केवल एक मानव जाति है—वैज्ञानिक रूप से, मानव विज्ञान की दृष्टि से। जातीयता रची गई है; यह एक सामाजिक निर्मिति है।

जातीयता जब लाभजनक नहीं रहेगी और जब यह मनोवैज्ञानिक रूप से उपयोगी नहीं होगी, तब यह लुप्त हो जाएगी। जब कभी भी ऐसा होगा, यह चली जाएगी। लेकिन फिलहाल तो लोग इसके नाम पर धनार्जन करते हैं।

आप प्रेम पा सकते हैं...

एक स्वतंत्र आदमी का प्रेम कभी सुरक्षित नहीं रहता। हम प्रेम में कभी-कभी सुरक्षा चाहते हैं; हम प्रेम करते हैं कि हम सुरक्षित रह सकें। मैं यह कहना चाहती हूँ कि रोमांटिक प्रेम स्वयं अपना अंत मानकर चलती है। ‘रोमांटिक’ का अर्थ मित्रता और साहचर्य पर आधारित नहीं है।

आप बहुत सारी चीजों से प्रेम करने के योग्य रहे हैं—आप अपने माता-पिता से, अपने देश से, अपने ईश्वर से, अपने बच्चों से, समलैंगिक व्यक्ति से, अपने मित्र से, विपरीत लिंग के व्यक्ति से प्रेम कर सकते हैं। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद किसी भी तरह हमें उन अन्य चीजों से प्रेम करने की अनुमति नहीं थी। यदि आप अपने माता-पिता से प्रेम करते थे और स्वतंत्र थे तो संभवत: आप मातृरति (Oedepus Complex) से ग्रस्त थे, यदि आप अपने ईश्वर से प्रेम करते थे तो आप अवैज्ञानिक और संभवत: अशिक्षित थे। यदि आप अपने देश से प्रेम करते थे तो आप रुढ़िवादी थे और विश्वप्रेमी नहीं थे। यदि आप अपने बच्चों से प्रेम करते थे तो आपका रवैया उन पर अधिकारपूर्ण था। यदि आप अपनी महिला मित्र से प्रेम करते थे तो आप समलैंगिक थे। अत: विपरीत लिंग के व्यक्ति के अतिरिक्त कुछ नहीं बचा था। अंतत: जीवन-साथी को ही सहन करना होता है—सबकुछ! जो कोई नहीं कर सकता! कोई इसके बराबर नहीं हो सकता!

भले ही आपने कितने ही कष्ट सहे हों, आप प्रेम के योग्य नहीं होते। किसी ने आपके साथ गलत किया हो तो इसके कारण भी आप प्रेम के योग्य नहीं होते। चूँकि आप प्रेम चाहते हैं, केवल इसलिए भी आप प्रेम के योग्य नहीं होते। आप प्रेम पा सकते हैं—अभ्यास से और सावधानीपूर्वक ध्यान से, इसे सही रूप में अभिव्यक्त करने और इसे स्वीकार करना सीखने की क्षमता से।

प्रेम केवल पवित्र होता है और हमेशा कठिन। यदि आपको लगता है कि यह आसान है तो। आप मूर्ख हैं, यदि आप सोचते हैं कि यह स्वाभाविक है तो आप अंधे हैं।

क्रोध असहायता की स्थिति है

क्रोध की भावना पंगु बना देती है। इससे आप कुछ भी नहीं कर सकते। लोग इसे रुचिकर और जुनून से भरा प्रदीपन मानते हैं। किंतु ऐसा कुछ भी नहीं है। यह असहायता की स्थिति है। यह नियंत्रण की अनुपस्थिति है। मुझे तो मेरे सभी कौशल, संपूर्ण नियंत्रण और सभी शक्तियों की आवश्यकता है...क्रोध से यह सब नहीं मिलते...मेरे लिए इसकी कहीं भी कोई जगह नहीं।

...अमेरिका दुख से पीड़ित है, वह क्रोध भी करता है। हमारा प्रश्न है—हम ऐसा क्यों होने देते हैं?

क्रोध से और अधिक क्रोध पैदा होता है। हम सामाजिक प्राणी हैं और सामाजिक प्रभावों के प्रति अति-संवेदनशील हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि हमारा विकास इस प्रकार हुआ है कि हम सकारात्मक भावनाओं की अपेक्षा नकारात्मक भावनाओं को अधिक आसानी और शीघ्रता से प्रवाहित करते हैं। इस तरह से विकसित प्रवृत्ति का संबंध अस्तित्व से है। यदि एक जनसमूह खतरे में है तो वह समूह अपने श्रेष्ठ हित में एक रक्षात्मक रूप लेता है और अपने सशक्त हमलावरों से आक्रमण के लिए तैयार हो जाता है। कठिनाई यह है कि हमारे प्रागैतिहासिक पूर्वजों के लिए यह व्यवहार उपयोगी रहा हो, किंतु आज आधुनिक विश्व के जीवन के लिए यह आवश्यक नहीं कि यह बहुत अनुकूल हो, जबकि यह आधुनिक विश्व भी तो आक्रामक हो चुका है।

व्यक्तियों का शारीरिक और भावनात्मक हित तो सामाजिक समरसता की ओर बढ़ने में है।

और अंत में...

हमारी मृत्यु होती है। यह जीवन का अर्थ हो सकता है। लेकिन हम भाषा का प्रयोग करते हैं। यह हमारे जीवन का पैमाना हो सकता है।

11, सूर्या अपार्टमेंट, रिंग रोड,
राणाप्रताप नगर, नागपुर-440022 (महाराष्ट्र)

दूरभाष : 9422811671

balkrishna.kabra2@gmail.com

सितम्बर 2021

   IS ANK MEN

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