जय काली, कलकत्ते वाली

जय काली, कलकत्ते वाली

लॉकडाउन के बाद देश के अधिकतर भागों में अब स्थिति सामान्य हो चली थी। फ्रंटलाइन वर्कर्स को कोविड-१ का टीका भी लग चुका तो कोरोना महामारी काफी कुछ नियंत्रण में आ गई। देशाटन के शौकीन मेरे परम मित्र आनंद शर्माजी इस मौके के इंतजार में ही थे, सो भाईजी ने कोलकाता का कार्यक्रम बना लिया। प्रसंग बना देश-दुनिया को एचआईवी एड्स के नियंत्रण का प्रोग्राम देने वाले, विश्वप्रसिद्ध एपिडेमियोलॉजिस्ट, सोशल कम्युनिटी मेडिसिन विशेषज्ञ, सोनागाछी अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्‍थान के निदेशक, यौनकर्मियों के एनजीओ ‘डी.एम.एस.सी.’ के संस्‍थापक और एमबीबीएस, एम.डी. डॉ. समरजीत जैना के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर एक पुस्तक लिखने का। मुझे इस कार्य में गणेश की भूमिका निभानी थी। प्रसिद्धि-पराङ्मुख और सादा जीवन, उच्च विचार के कायल डॉ. जैना वर्षों से अपने शिष्य आनंद शर्मा का यह आग्रह टालते आ रहे थे। परंतु इस बार डॉ. जैना आनंद शर्माजी के आग्रह को टाल नहीं सके। फिर क्या था, मित्र आनंद शर्मा ने तुरत-फुरत हावड़ा राजधानी में 22 फरवरी, 2021 का आरक्षण करा लिया। हम दोनों ‌ि‌नयत तारीख को नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से राजधानी में सवार हुए और गाड़ी भी अपने नियत समय सायं ४:५० बजे बंगाल की यात्रा पर निकल पड़ी।

चूँकि अब हम कलकत्ता पहुँचने वाले हैं, तो पहले इस कलकत्ता महानगर के बारे में आपको कुछ बताता हूँ। विश्व के महानगरों में इसकी गिनती होती है। इसको भारत का सर्वाधिक जनसंख्या वाला नगर होने का गौरव प्राप्त है। यह भारत का पूर्वी प्रवेश-द्वार भी है। चार शताब्दी पूर्व ईस्ट इंडिया कंपनी के एक अंग्रेज व्यापारी ने इसे यहाँ के सुबर्नी राय चौधरी नामक व्यक्ति से मात्र बारह सौ रुपए में खरीद लिया था। उस अंग्रेज व्यापारी का नाम चार्नाक था। व्यापारी चार्नाक मुगलों के भय से हुगली स्थित अपने कारखाने को सुतानारी गाँव में ले गया, फिर धीरे-धीरे इस कारखाने का विस्तार कलिकाता ग्राम तक हो गया। ऐसा भी उल्लेख मिलता है कि सन् 1698 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने सम्राट् औरंगजेब के पुत्र से इसके निकट का गोविंदपुर गाँव भी खरीद लिया था। इस प्रकार कालिकाता, गोविंदपुर और सुतानारी, यानी तीनों गाँवों को मिलाकर जो नगर बसा, वही आज का महानगर कोलकाता (कलकत्ता) है।

प्रथम अंग्रेज गवर्नर वारेन हेस्टिंग ने कलकत्ता को ब्रिटिश उपनिवेश भारत की राजधानी बनाया। सन् 1885 से लेकर 1912 तक कलकत्ता भारत की राजधानी रहा। शहर के नाम को लेकर विद्वानों और इतिहासकारों के अलग-अलग मत हैं। कुछ का कहना है कि शक्तिपीठ काली माता के नाम पर इसका नाम कलकत्ता पड़ा। कुछ लोग कालिकट का बदला हुआ रूप कलकत्ता को मानते हैं। लेकिन एक अन्य मत यह है कि यहाँ के मूल आदिवासी ‘कोलकाहोता’ का परिष्कृत रूप ही ‘कोलकाता’ है। यही कोलकाता महानगर वर्तमान में प. बंगाल की राजधानी है। स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी नेता और बंगाल के सपूत डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की दूरदर्शिता और जुझारूपन के कारण ही आज यह भारत का अंग है।

हमारी गाड़ी हावड़ा ब्रिज से गुजर रही है। ब्रिटिश सरकार की देन हावड़ा ब्रिज कोलकाता की शान है। हुगली (गंगा) नदी पर बना यह विशाल ब्रिज कलकत्ता की पहचान है। शताब्दी पार कर चुका यह ब्रिज आज भी शान से खड़ा है। दिन-रात इस पर से अनगिनत ट्रैफिक गुजरता है। ऐसा कहा जाता है कि उन दिनों हुगली में जहाज आया-जाया करते थे, तब जहाजों को रास्ता देने के लिए हावड़ा ब्रिज बीच से दो भागों में बँटकर ऊपर की ओर खड़ा हो जाया करता था। इसमें कितनी सच्चाई है, पता नहीं। हाँ, यह इंजीनियरी का अद्भुत नमूना है। यह दुनिया का सबसे बड़ा तैरता हुआ पुल है। यह ब्रिज पंद्रह सौ फीट लंबा तथा पचासी फीट चौड़ा है। यह कैंटिलीवर पुल हावड़ा से कलकत्ता शहर को जोड़ता है। आठ कतारों में गाडि़याँ इस पर आ-जा सकती हैं। 14 जून, 1965 को प्रसिद्ध कवि रवींद्रनाथ टैगोर के नाम पर इसका नाम बदलकर ‘रवींद्र पुल’ कर दिया गया। मैं देख रहा हूँ, यहाँ छोटे-बड़े वाहनों की भारी चिल्ल-पों मची है।

सोनागाछी कोलकाता का ही नहीं, पूरे एशिया का सबसे बड़ा रेड लाइट एरिया है। यह चार मंजिला इमारत ठीक चौराहे पर स्थित है, इसके तीन ओर गलियाँ तथा सड़क हैं। इमारत में तीनों ओर खिड़कियाँ खुलती हैं, जिनसे तीनों ओर का नजारा लिया जा सकता है।

ठीक बारह बजे हम लोग डॉ. जैना के कार्यालय पहुँचे। तीसरे तल पर स्थित उनके कैबिन में उनसे भेंट हुई। डॉ. जैना ने हमारा कुशल-क्षेम तथा यात्रा में कोई तकलीफ तो नहीं हुई, वह सब पूछा। आनंदजी ने सबकुछ बताया तथा मेरा परिचय भी दिया। प्रथम दृष्टया डॉ. जैना मुझे बेहद सहज-सरल, व्यावहारिक तथा आडंबरहीन व्यक्तित्व लगे। सादा पैंट-शर्ट का लिवास, पैरों में सदा स्पोर्टस शू, दमकता ललाट और आँखों में तेज। डॉ. साहब ने हमें ब्लैक टी पिलवाई। वे खुद भी हमेशा ब्लैक टी ही पीते हैं। हालाँकि डॉ. जैना जॉन हॉपकिन विश्वविद्यालय, मिशिगन विश्वविद्यालय, वाशिंगटन विश्वविद्यालय के साथ काम किया, राष्ट्रीय एड्स परिषद् के मुखिया, ए.आई.एन.एस.डब्‍ल्यू के संरक्षक तथा मुख्य सलाहकार हैं और एक सुप्रसिद्ध इंटरनेशनल पर्सनैलिटी, पर उनका रहन-सहन एकदम सादा है। (पर हाय! ८ मई, २०२१ को कोरोना ने उन्हें हमसे छीन लिया।)

कुशल-क्षेम के बाद डॉ. जैना ने संक्षेप में अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि, पढ़ाई-लिखाई तथा डॉक्टरी शिक्षा आदि पर प्रकाश डाला। फिर बोले,  आज मैंने थोड़ा-थोड़ा बता दिया है, आज इतना ही, कल से मैं आपको पर्याप्त समय दूँगा और सब बातें विस्तार से बताऊँगा। आज आप कलकत्ता घूम-फिर लें, कल से काम शुरू करते हैं।  उन्होंने ड्राइवर कन्हाई को हमें दक्षिणेश्वर और बेलूड़ मठ आदि घुमा लाने का आदेश कर दिया। फिर बोले,  भोजन का कैसे रहेगा, इधर रोटी तो मिलता नहीं, पर यहाँ ऑफिस में 15-20 लोगों का खाना बनता है, दुपहर में इधर ही भोजन कर लिया करें।  मैं उनकी सदाशयता और आतिथ्य का कायल हो गया, जब सड़सठ वर्षीय डॉ. जैना तीसरे तल से चलकर हमें नीचे तक छोड़ने आए।

दुपहर दो बजे हमने दुर्बार ऑफिस की रसोई में भोजन किया। भोजन-कक्ष में टेबल पर हमारी थालियाँ सजा दी गईं। थाली में चावल, मसूर की दाल, दो-तीन सब्जियाँ, जिनमें चुकंदर प्रमुख है, बैंगन का भरता। हाथ से भात खाने में एक अलग ही तृप्ति का अहसास होता है, भोजन की समाप्ति पर मिष्टी दही का आनंद लिया। सच गरमागरम भोजन करके घर जैसा सुख मिला। यहाँ दोनों जून चावल पकाया जाता है, मछली भी, पर रोटी नहीं बनती है। एक और अनोखी बात, आप घर में भोजन करें या होटल-ढाबे में अथवा किसी मंदिर-आश्रम में, हर जगह बैंगन का भरता या इसका पकौड़ा जरूर मिलता है। बंगाल के भोजन में बैंगन प्रधान है।

अपराह्न‍ तीन बजे हम लोग ड्राइवर कन्हाई के साथ गाड़ी में बैठ बेलूड़ मठ के लिए निकले। मित्र आनंद शर्मा मुझे रास्ते में पड़ने वाले बाजार, इलाकों के बारे में बताते चल रहे हैं। जब हमारी गाड़ी बेलूड़ पहुँचे, तब तक ड्राइवर कन्हाई ने जो बताया, वह संक्षेप में मैं आपको बताता हूँ। विश्वप्रसिद्ध आध्यात्मिक तीर्थ बेलूड़ मठ हावड़ा से हुगली (गंगा) के पश्चिमी तट पर स्थित है। यह रामकृष्‍ण मिशन का मुख्यालय है। इस मठ की स्‍थापना स्वामी रामकृष्‍ण परमहंस के विलक्षण शिष्य स्वामी विवेकानंद ने सन् 1897 में की थी। यहाँ पर जो भवन-इमारतें बनी हैं, उनका वास्तु शिल्प हिंदू, ईसाई तथा इसलामी सभ्यता का मिश्रण है, जो सब धर्मों की एकता को इंगित करता है। मठ का पूरा परिसर गंगा के किनारे-किनारे करीब चालीस एकड़ भूमि पर फैला है।

एक भव्य प्रवेश-द्वार से अब हमारी गाड़ी बेलूड़ मठ के परिसर में प्रवेश कर रही है। इस सड़क के दोनों ओर मिशन के शिक्षा-संस्‍थान, जिनमें विद्या मंदिर, शिल्प मंदिर, विवेकानंद सभागृह, वेद विद्यालय तथा स्वामी विवेकानंद विश्वविद्यालय, विवेकानंद एजूकेशन ऐंड रिसर्च आदि हैं।

इसी सड़क पर आगे चलकर बाईं ओर स्वामी विवेकानंद द्वारा अपने आध्यात्मिक गुरु को समर्पित अद्भुत भव्य-‌दिव्य ‘रामकृष्‍ण मंदिर’ है। इस बहुमंजिला मंदिर का अंतः-बाह्य‍ वास्तु-शिल्प बेजोड़ है। यहाँ रस्सियों बाँधकर यात्रियों का इधर-उधर जाना प्रतिबंधित कर दिया गया है। सब दर्शनार्थी रामकृष्‍ण परमहंस की दिव्य मूर्ति का दर्शन, श्रद्धा व्यक्त करते हुए दाईं ओर बाहर निकल रहे हैं। मंदिर के अंदर गजब की शांति पसरी हुई है, इतनी कि हम अपनी श्वास की आवाज सुन सकते हैं। सबके बीच से मैं उस आवाज को सुन पा रहा हूँ, जो विवेकानंद ने अपने गुरुभाइयों से कही थी— इन सब देवताओं को गठरी में बाँधकर रख दो, ईश्वर की प्रतिकृति इन गरीबों, असहायों, भूखों, बीमारों, वंचितों की सेवा करो। अपने इन दरिद्र नारायण की सेवा करो।

रस्सी के सहारे बनाई गई दर्शक गैलरी में सब तीर्थयात्री झुंड-के-झुंड आगे बढ़ रहे हैं। यहाँ फोटो खींचना मना है। जगह-जगह मिशन के मार्गदर्शक गार्ड खड़े हैं। पूरे परिसर में इतनी फुलवारी है कि लगता है, रंग-बिरंगे, सुंदर कालीन बिछा दिए गए हों। गंगा के बिल्कुल किनारे-किनारे सीधी पंक्ति में मठ के दिवंगत संन्यासियों की समाधियों के ऊपर उनकी बैठी मूर्तियाँ बनी हैं। इसी के अंत में, मठ के उत्तर-पूर्व में एक दो मंजिला इमारत है, आज यह बलुआ पत्थर से बनी, इसी में कभी स्वामी विवेकानंद रहा करते थे। यहाँ से अब वापस लौटना है। इस सबकी परिकल्पना स्वामी विवेकानंद ने ही की थी, पर उनकी इस परिकल्पना को उनके परम प्रिय शिष्य स्वामी विज्ञानानंद ने साकार किया। गंगा किनारे के आखिरी छोर पर माँ शारदा देवी तथा स्वामी विवेकानंद एवं स्वामी ब्रह्म‍ानंद की देहाग्नि-स्‍थल पर उनके समाधि मंदिर बने हैं। सबको दंडवत् प्रणाम कर हम लोग मठ द्वारा बनाए गए दर्शक-पथ से होते हुए बाहर निकल आए।

इस पावन तीर्थ को बारंबार प्रणाम कर हम भी अब गंगा के उस पार दक्षिणेश्वर के लिए निकल पड़े हैं। तीर्थयात्री यहाँ से दक्षिणेश्वर को नाव से भी जा सकते हैं। गंगा (हुगली) के पश्चिमी तट पर बेलूड़ मठ है तो पूरबी तट पर दक्षिणेश्वर। यहाँ पर काली माता भवतारिणी देवी का बड़ा ही प्रतिष्ठित मंदिर है। इसका निर्माण सन् 1854 में जान बाजार की रानी रासमणि ने करवाया था। सन् 1857-68 के बीच श्रीरामकृष्‍ण परमहंस हिंदू नवजागरण के सूत्रधारों में से एक थे। वे एक अद्भुत दार्शनिक एवं धर्मगुरु थे, जो बाद में स्वामी विवेकानंद के गुरु बने। दक्षिणेश्वर मंदिर का निर्माण सन् 1847 में प्रारंभ होकर 1855 में पूरा हुआ। यह मंदिर पच्चीस एकड़ क्षेत्र में फैला है। इसके बारे में ऐसा कहा जाता है कि जान बाजार की एक जमींदार रानी रासमणि ने स्वप्न देखा था, जिसमें काली माँ ने उन्हें निर्देश दिया कि उनके लिए एक मंदिर का निर्माण कराए। तब रानी ने बड़ी श्रद्धा के साथ यह मंदिर बनवाया और बड़े ही भक्तिभाव से मंदिर में काली माता की मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा कराई।

हम लोग मोबाइल, जूता-चप्पल आदि गाड़ी में छोड़ प्रवेशद्वार से मंदिर परिसर में आगे बढ़े। अहा! यही वह पावन स्‍थल, जहाँ ईश्वर की खोज करते हुए जिज्ञासु युवा नरेंद्र पहली बार आया था और उसे देखते ही भाव-विह्व‍ल हो श्रीरामकृष्‍ण परमहंस ने पूछा था— नरेंद्र, तू अब तक कहाँ था, मैं कब से तेरी राह देख रहा हूँ।  इस प्रथम भेंट से अवाक् नरेंद्र ने भी पूछ लिया था— क्या आप ने ईश्वर को देखा है?  और रामकृष्‍ण का वैसा ही जवाब— हाँ, बिल्कुल देखा है, जैसे मैं तुम्हें देख रहा हूँ।  अहा! यही है वह भवतारिणी माँ का मंदिर, जहाँ रामकृष्‍ण माँ से प्रत्यक्ष वार्त्तालाप किया करते थे।

मैं देख रहा हूँ, मंदिर का स्‍थापत्य बेमिसाल है। मुख्य शिखर सबसे ऊँचा, चारों ओर मध्यम ऊँचाई और फिर कम ऊँचाई के कुल बारह शिखर हैं। विशाल चबूतरे पर दक्षिण की ओर स्थित यह मंदिर तीन मंजिला है। गुंबदों पर सुंदर आकृतियाँ बनी हैं। मंदिर की सीढ़ियों से लेकर नीचे तक माँ के भक्तों की कतार लगी। कतार में पुरुषों की अपेक्षा महिलाएँ अधिक हैं। ठीक सामने गर्भगृह में हजार पँखुड़ियों वाले चाँदी के कमल-पुष्प में माता काली शस्‍त्र धारण किए विराजमान हैं, उनकी लाल जिह्वा बाहर निकली हुई है, चरणों में भगवान् शिव लेटे हैं। पुजारीजी दर्शकों को जल्दी-जल्दी आगे बढ़ाते जा रहे हैं। हम दोनों ने माता भवतारिणी के दर्शन किए, श्रद्धा से हाथ अपने आप जुड़ गए हैं। माँ को प्रणाम किया और पीछे हटकर खंभे के सहारे खड़े अपलक माँ को निहार रहे हैं। यहाँ माँ की आध्यात्मिक शक्ति के वलयों से पूरा वातावरण आध्यात्मिक हो गया है। भक्तजन माँ के जयकारे लगा रहे हैं। दर्शन कर हम सीढ़ियों से नीचे उतर आए। इस मंदिर का वास्तु 46 फीट चौड़ा तथा सौ फीट ऊँचा है। हरे-भरे मैदान के बीच खड़ा यह मंदिर बेमिसाल है। मंदिर के पश्चिम की ओर भगवान् शिव के बारह मंदिर एक जैसे, एक पंक्ति में बने हैं। इनके ठीक पीछे माँ गंगा (हुगली) शांत बह रही हैं।

मुख्य मंदिर के सामने नट मंदिर है, यहाँ पर बच्चों के मुंडन संस्कार होते हैं। मंदिर के उत्तर, पूरब और पश्चिम में अतिथि-कक्ष हैं तथा इधर ही मंदिर का कार्यालय है। मंदिर के उत्तर-पश्चिमी कोने में स्वामी रामकृष्‍ण परमहंस का निवास हुआ करता था, उनका वह कक्ष आज भी उनकी स्मृति के रूप ज्यों का त्यों सहेजकर रखा गया है। मैं देख रहा हूँ, इसमें उनका पलंग, बिस्तर तथा उनके उपयोग में आने वाली चीजें रखी हैं। श्रद्धालु यहाँ भी दर्शन करने आ रहे हैं। मैंने श्रद्धापूर्वक आध्यात्मिक गुरु के सम्मान में सिर नवाया। फिर हम दोनों मित्र मंदिर परिसर से बाहर निकल आए। दाईं ओर वह छोटा सा स्‍थान है, जहाँ माँ शारदा रहा करती थीं। इससे थोड़ा हटकर रानी रासमणि का स्‍थान है। अब हम लोग यहाँ से कुछ दूरी पर स्थित ‘आद्या माता’ के मंदिर में दर्शन करने जा रहे हैं।

बताया जाता है कि युगावतार श्रीरामकृष्‍ण परमहंस ने चटगाँव के मशहूर डॉक्टर श्रीश्री अन्नदा ठाकुर को स्वप्नादेश दिया कि कोलकाता के ईडन गार्डन के जलाशय से आद्या माँ की मूर्ति को बाहर निकालकर दक्षिणेश्वर में रामकृष्‍ण संघ आद्यापीठ की प्रतिस्‍थापना की जाए। तब अन्नदा ठाकुर ने रामनवमी के दिन प्रातः में आद्या माता की मूर्ति को दक्षिणेश्वर में स्‍थापित कर यह शानदार मंदिर बनवाया। सभी धर्मों के प्रति श्रद्धाभाव दरशाने के लिए इस मंदिर के शिखर पर हिंदू धर्म का त्रिशूल, इसलाम धर्म का चाँद-तारा, ईसाइयों का क्रूस तथा बौद्ध धर्म का हाथपंखा शोभायमान है।

रामकृष्‍ण परमहंस के स्वप्न-निर्देश पर मंदिर में अद्भुत समन्वय स्‍थापित करते हुए गुरु, माँ काली तथा हरि की मूर्तियाँ लगाई गईं। एक ही मंदिर में रामकृष्‍ण, आद्या माँ और राधाकृष्‍ण की मूर्तियाँ प्रतिष्ठित की गईं। अन्नदा ठाकुर दीन-दुखियों में ही ‌शिव के दर्शन करते थे। यह आद्या माँ मंदिर दीन-दुखियों की सहायता के अनेक कार्य कर रहा है। यहाँ भली प्रकार से दर्शन किए, घूम-फिरकर सब देवों को दंडवत् प्रणाम किया और फिर कोलकाता के लिए लौट पड़े।

आज खूब दौड़ा-दौड़ी रही। कमरे पर लौट होटल से खाना लाकर खाया और फिर सो गए। रेड लाइट एरिया होने के कारण रात भर जोर-जोर से गाने बजते रहे, रात भर भारी चिल्लपों मची रही। प्रातः में चाय-नाश्ता करके हम लोग करीब साढ़े ग्यारह बजे दुर्बार के नीलमणि वाले ऑफिस पहुँच गए। डॉ. जैना पधारे, हमारी कुशल-क्षेम पूछी और उनके अपनी कुरसी पर बैठने के साथ ही काम शुरू हुआ। डॉ. साहब बोले कि आज पहले डॉक्टरी की पढ़ाई से शुरू करते हैं। डॉ. जैना अपनी जीवन-कहानी सुना रहे हैं और मैं पॉइंट नोट कर रहा हूँ अपनी डायरी में। दरअसल डॉ. जैना का प्रिय विषय फिजिक्स था और वे आगे चलकर फिजिक्स के प्रोफेसर बनना चाहते थे। लेकिन उनकी छोटी बहन की अच्छे इलाज के अभाव में डिप्‍थीरिया से मृत्यु हो जाने के कारण पिता के प्रबल आग्रह पर उन्हें डॉक्टरी की पढ़ाई करनी पड़ी। इस तरह समरजीत जैना प्रोफेसर बनने की इच्छा के बावजूद एम.बी.बी.एस., एम.डी. डॉक्टर बन गए। दुपहर के भोजन के बाद फिर साढ़े पाँच बजे तक उनके साथ संवाद चला। सच में डॉ. जैना की जीवन-कहानी बड़ी संघर्षपूर्ण तथा रोमांचक है।

अगले दिन भी लिखने का वह सिलसिला चला। डॉ. जैना ने बताया कि जब वे दिल्ली के एम्स में मेडिकल छात्रों को पढ़ाते थे, तब तक बाढ़ तथा प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए कोई संगठन नहीं था, उनकी सिफारिश पर भारत सरकार ने डिजास्टर मैनेजमेंट संगठन बनाया। डॉ. जैना ने भोपाल गैस कांड की जाँच, कलपक्कम परमाणु बिजलीघर में रेडियम से सुरक्षा, कपड़ा बुनता मिलों में मजदूरों के स्वास्‍थ्य रक्षा के लिए सख्त कानून बनवाए। कोयला खदानों तथा कंकरीट क्रैशरों में काम करनेवाले मजदूरों के हित में कानूनों को सख्त करवाया तथा उन स्‍थानों की विजिट करके सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपी। सायं को डॉ. साहब को ऑफिस के जरूरी काम निपटाने थे, सो हम को साढ़े तीन बजे ही मुक्त कर दिया और मेरी ओर इशारा करके बोले कि ये तो पहली बार कलकत्ता आए हैं, आज इन्हें कहीं घुमा लाओ। तब ड्राइवर कन्हाई को आदेश हुआ कि हमें कालीबाड़ी लेकर जाना है। करीब पौने पाँच बजे हम कन्हाई के साथ गाड़ी में बैठ काली माता के दर्शन के लिए निकले। गाड़ी के अंदर से ही मित्र आनंद शर्मा मुझे बताते जा रहे हैं।

दर्शनों से पहले आपको यहाँ के बारे में बताता हूँ। कालीबाड़ी का यह प्रसिद्ध काली मंदिर शक्तिपीठ कहलाता है। कहा जाता है कि माता सती के दाएँ पैर की कुछ उँगलियाँ इस स्‍थान पर गिरी थीं, जहाँ-जहाँ माता सती के कटे अंग गिरे, वे शक्तिपीठ कहलाए और हिंदुओं की श्रद्धा के केंद्र बन गए। मंदिर का शिखर काफी ऊँचा है, जो दूर से ही दिखाई देता है। मंदिर के गर्भगृह में काली माता की बैठी हुई प्रतिमा स्‍थापित है, जो एक ऊँचे चबूतरेनुमा मंदिर में विराजमान है। मंदिर के पीछे से गंगा (हुगली) बह रही है। मंदिर में जीर्णोद्धार का काम चल रहा है, इसलिए मंदिर के कुछ हिस्से बंद हैं। हमने आगे बढ़ चबूतरे के नीचे से ही माँ को प्रणाम कर‌ लिया। बंगाल में कालीमाता की बड़ी मान्यता है। माँ काली के हजारों भक्त यहाँ हर दिन दर्शन करने आते हैं। यहाँ से लौटते हुए आनंद शर्माजी ने मुझे कलकत्ता की ट्रामगाड़ी, पुरानी पुस्तकों के बाजार के रूप में प्रसिद्ध कॉलेज स्ट्रीट; फिर इशारे से बताया कि थोड़ा अंदर जाकर बहू बाजार में सोने-चाँदी का बड़ा बाजार है। यहाँ के आभूषण-कारीगर बड़े प्रसिद्ध हैं। यहीं से स्वर्ण-चाँदी के आभूषण, मूर्तियाँ, बरतन आदि तैयार करके देश भर में भेजे जाते हैं। बहू बाजार रेड लाइट एरिया भी है।

अगले दिन शुक्रवार को नित्य की तरह डॉ. जैना के साथ बैठे। उनकी जीवन-कहानी सुनकर रोमांच बढ़ता ही जा रहा है। डॉ. जैना की हर चीज को देखने की एक अलग दृष्टि है, वे हर विषय पर गहराई से सोचते हैं। वे समस्या के दोनों पहलुओं पर विचार कर उसका स्‍थायी समाधान खोजने में विश्वास करते हैं। इसीलिए तो डॉ. जैना बड़े-बड़े प्रोजेक्ट को कामयाब बनाने में सफल रहे हैं। चाहे वह एचआईवी कंट्रोल कार्यक्रम हो; चाहे यौनकर्मियों का सबसे बड़ा संगठन दुर्बार खड़ा करना हो, चाहे यौनकर्मियों का अपना कोऑपरेटिव बैंक ‘उषा’ हो; चाहे मजदूरों के पक्ष में बनवाए गए कानून हों। आज का काम पूरा हुआ। शनि-रवि को दुर्बार का ऑफिस बंद रहता है। डॉ. जैना सप्ताहांत के दो दिन ‘चिल्ड्रन होम’ पर बिताते हैं। शनिवार को हमने नवद्वीप और मायापुर जाना तय कर लिया था। पता चला, हावड़ा जं. से प्रातः आठ बजे की लोकल ट्रेन है, सो हम प्रातः ही नहा-धोकर तैयार हो गए, कचौड़ी-सब्जी का नाश्ता भी ‌कर लिया। कन्हाई हमें समय से हावड़ा जं. पहुँचा आया। यहाँ पर रेलगाड़ियों की बड़ी अच्छी व्यवस्‍था है—लोकल ट्रेन अलग, एक्सप्रेस अलग। प्लेटफॉर्म नं. तीन से हम हावड़ा-कटवा लोकल ट्रेन में बैठे, जो हमें नवद्वीप धाम उतार देगी; यहाँ तक का किराया 25 रुपया प्रति यात्री है। नवद्वीप यहाँ से 107 किमी. दूर है। इस तरह रुकते-चलते करीब ढाई घंटे में, यानी साढ़े दस बजे हम लोग नवद्वीप धाम स्टेशन पर उतर गए।

नवद्वीप धाम वैष्‍णवों का प्रसिद्ध तीर्थस्‍थान है। सन् 1485 में चैतन्य महाप्रभु का यहाँ पर जन्म हुआ था। बारहवीं शताब्दी में नवद्वीप सेन वंश के राजाओं की राजधानी रहा। इस नगर को पहले ‘नदिया’ कहा जाता था। यहाँ पर वर्ष भर यात्री आते रहते हैं। अठारहवीं शताब्दी के कई दर्शनीय मंदिर भी। रेलवे स्टेशन नगर से दूर है, अतः यहाँ से रिक्‍शा में बैठ गंगा घाट पहुँचे। हम लोग पहले मायापुर जाना चाहते हैं, सो घाट पर बड़ी और छोटी नावें लगी हैं। बड़ी नाव का भाड़ा प्रति यात्री तीन रुपया तथा छोटी का सात रुपया। जिनको जल्दी होती है, समयाभाव रहता है, वे छोटी नाव से गंगा पार करते हैं, क्योंकि बड़ी नाव को यात्रियों से भरने में समय अधिक लगता है। हमें पहले इसका पता नहीं था, हमारे पास बड़ी नाव की टिकट है। पर इसको भरने में ज्यादा समय नहीं लगा। सुबह अपनी यात्रा पर निकला सूरज गुस्से में लाल-लाल हो रहा है और वह अपना गुस्सा हम यात्रियों पर उतार रहा है। धूप के ताप से बचने के लिए कुछ यात्रियों ने छाते तान रखे हैं, कुछ ने रूमाल सिर पर बाँधे हैं, छोटे बच्चों को उनकी माँओं ने अपने पल्लू से ढक लिया है। बहुत सी महिलाएँ नाव के फर्श पर झुंड बनाकर बैठ गई हैं। कुछ यात्री अपने स्कूटर, मोटर साइकिल के साथ यात्रा कर रहे हैं। वैसे नाव में तीर्थयात्री ही ज्यादा संख्या में हैं। आइसक्रीम और दूसरी चीजें बेचने वाले हॉकर मजे में अपना सामान बेच रहे हैं। मंथर गति से नाव मायापुर की ओर बढ़ रही है। मायापुर में इस्कॉन द्वारा बनवाया जा रहा विशाल-भव्य मंदिर यहाँ से दिखाई पड़ रहा है। गंगा का निर्मल जल शांत बह रहा है। नाव में चिल्ल-पों मची है, जैसे रेलवे का प्लेटफॉर्म।

कुछ ही मिनटों के बाद हमारी नाव किनारे पर लगी। उल्लास से भरे यात्री उतर पड़े। गंगा के ऊँचे कगार पर चढ़ पैदल आगे बढ़े। यहाँ से थोड़ा आगे चलकर मित्र आनंद शर्मा सामने खड़ी एक बस में चढ़ गए, मैं भी। गौड़ीय वैष्‍णवों का यह पावन धाम है। प्रभुपाद स्वामी ने मायापुर को इस्कॉन का मुख्यालय बनाया। इस्कॉन द्वारा यहाँ भव्य और बेमिसाल श्रीकृष्‍ण मंदिर बनवाया जा रहा है। यहाँ पर गंगा और जलांगी नदी का संगम होता है।

बस ने हमें इस्कॉन के मायापुर चैतन्य मठ के परिसर के ठीक सामने ही उतार दिया। यहाँ का प्रवेश-द्वार विशाल और शानदार है। प्रवेश-द्वार के अंदर ठीक सामने ही मंदिर में भोजन के कूपन की कई खोखेनुमा दुकानें हैं। आनंद शर्माजी ने 50-50 रुपए के दो कूपन ले लिये। यहाँ से दाईं ओर प्रभुपाद स्वामी का बड़ा ही भव्य-दिव्य समाधि मंदिर है। इसका गुंबद काफी ऊँचा है, जिसके शिखर पर चारों ओर पीतल की चमकीली मूर्तियाँ शोभायमान हैं। समाधि-मंदिर का डिजाइन बहुत ही चित्ताकर्षक है। इसी के साथ कमल-पुष्प में बना सफेद संगमरमर का मंदिर है। इसके पीछे एक बहुमंजिला मीनार जैसी इमारत है।

कृष्‍णमंदिर में दर्शन करने गए। मोबाइल हमने अमानती सामान घर में जमा कराए। जूते-चप्पल चीकू के विशाल वृक्ष के नीचे उतार दर्शन के लिए आगे बढ़े। यहाँ मंदिर प्रवेश से पूर्व गहन जाँच होती है, मास्क के बिना प्रवेश नहीं मिल रहा। यह कृष्‍णमंदिर भी काफी लंबा-चौड़ा है। अंदर के विशाल हॉल में ठीक सामने रजत आभा से देदीप्यमान राधाकृष्‍ण एवं सखियों की झाँकी में अपलक निहारता रह जाता हूँ। अभी आरती हो रही है। कृष्‍णभक्त भक्ति-सागर में ऊभ-चूभ रहे हैं। इसके बराबर वाले हॉल में राधा-कृष्‍ण के अवतार चैतन्य महाप्रभु की नृत्यरत नयनाभिराम झाँकी है। झाँकियों की भव्यता-दिव्यता इस्कॉन मंदिरों की विशेषता है। यहाँ दर्शन कर अब हम इसके ठीक सामने हॉल में ही स्थित चैतन्य महाप्रभु संग्रहालय में आ गए हैं। यहाँ पर चैतन्य महाप्रभु की जीवन-लीलाओं को सुंदर झाँकियों के माध्यम से दिखाया गया है। झाँकियाँ इतनी जीवंत लगती हैं कि अपने आकर्षण में बाँध लेती हैं। यहाँ से अब हम भोजन के लिए सीधे गीता भवन की ओर लौटे।

गीता भवन के हॉल में संगमरमर के धवल फर्श पर लंबे-लंबे बिछावन बिछे हैं। इन पर पत्तल और जल के लिए कागज के गिलास परोस दिए गए हैं। भोजन के लिए पंक्ति में आगे बढ़ते हुए एक संत कूपन लेकर हॉल में आगे बढ़ा देते हैं। अभी भी बैठे सैकडों लोग भोजन कर रहे हैं। पहले चावल-दाल, बैंगन का पकौड़ा परोसा गया, इसके बाद चावल, पत्तागोभी, छोले-पनीर की रसेदार सब्जी, बाद में चपाती भी, लेकिन चपाती शायद ही किसी ने ली हो, हम तो लेते, पर अब उदर में जगह नहीं, अंत यानी भोजन की समाप्ति पर स्वादु मीठी खीर परोसी गई। भोजन कर परम तृप्ति का अहसास हुआ।

भोजन करने के बाद हम वापसी में ‘गदा भवन’ के आगे से निकले, यहाँ भी भोजन के लिए लंबी-लंबी कतारें लगी हैं। इस्कॉन मंदिर के परिसर से बाहर निकल इ-रिक्‍शा लिया, जो हमें सब मंदिरों के दर्शन कराते हुए गंगाघाट पर छोड़ देगा। रिक्‍शा वाले ने पहले हमें चैतन्य महाप्रभु की मौसी का घर, श्रीनिवास-आँगन, गदाधर आँगन, जहाँ पर महाप्रभु ने जगाई-मधाई का उद्धार किया, वे तीर्थ-मंदिर दिखाए। इसके आगे चैतन्य महाप्रभु का घर, जहाँ नीम के नीचे उनका जन्म हुआ, इस कारण उनका एक नाम ‘निमाई’ पड़ गया। वह विशाल नीम वृक्ष आज भी अपनी लंबी-मजबूत बाँहें पसारे अपने भाग्य पर इतरा रहा है। नीम के साथ में ही ऊँचे चबूतरे पर खपरैल की वह झोंपड़ी है, जिसमें चैतन्य का अवतरण हुआ और बाद में उनकी माताजी ने यहाँ एकाकी जीवन बिताया। यहाँ पर बना मंदिर तथा उसका कथा-हॉल बहुत विशाल है। यहाँ पर कई देव-महाविभूतियों के जन्मस्‍थान भी हैं।

अब हमारा रिक्‍शेवाला महाप्रभु की ढोलकीबाड़ी पर ले आया है, जहाँ कीर्तन करते हुए एक दुष्ट ने चैतन्य का ढोल फोड़ दिया था; वह फूटा ढोल आज भी इस मंदिर में रखा हुआ है। इसके आगे गौर-गोविंद मंदिर, गुप्त वृदांवन, श्याम कुंड, भक्ति प्रियरंजन गोस्वामी, ठाकुर समा‌धि, चैतन्य म्यूजियम, अविद्याहरन, सारस्वत नाट्य मंदिर आदि का दर्शन किया। रिक्‍शेवाले ने हमें गंगा घाट पर उतार दिया। इस बार हमने छोटी नाव का टिकट लिया। जल्दी ही गंगा पार कर इस ओर हम घाट पर आ लगे। सरकार चाहे तो यहाँ पुल का निर्माण करा सकती है, तब मायापुर आना-जाना और भी सुगम हो जाएगा। घाट से चलकर अब हम बाजार में आ गए हैं। यहाँ से हमें स्टेशन जाना है, पर रिक्‍शेवाले को बताया कि हमें योगमाता के दर्शन कराते हुए स्टेशन छोड़ दे।

कुछ ही देर में हमारा रिक्‍शेवाला हमें योगमाता मंदिर पर ले आया। मंदिर का शिखर काफी ऊँचा और पुराना है। गर्भगृह में पीपल वृक्ष का तना है, जहाँ पर योगमाता विराजमान हैं। हमारे पूछने पर यहाँ के पुजारीजी ने बताया कि चैतन्य महाप्रभु के जन्म से बहुत पहले योगमाता के एक परमभक्त वासुदेव की तप-आराधना से प्रसन्न होकर योगमाता यहाँ पर प्रकट हुईं। चैतन्य की छठी पूजन इसी मंदिर में हुआ था। आज भी यहाँ बच्चों का मुंडन तथा छठी संस्कार होता है। तब यहाँ मेला जैसा लग जाता है। जिस दिन पुरी में भगवान् जगन्नाथजी की रथयात्रा होती है, उस दिन यहाँ पर एक विशाल कार्यक्रम होता है। हमने यहाँ गुड़हल की माला माता को भेंट की और दंडवत् कर रिक्शे पर आ बैठे। रिक्‍शेवाले ने जल्दी ही हमें विष्‍णुप्रिया हॉल्ट पर उतार दिया। उसे विदा कर फटाफट दो टिकट लिये। पाँच मिनट से पहले ही गाड़ी प्लेटफॉर्म पर आ लगी। जल्दी से पानी की बोतल खरीद दौड़कर गाड़ी में चढ़ गए। गाड़ी में सीट भी सहज ही मिल गई। गाड़ी में ज्यादा भीड़भाड़ नहीं है, हाँ, हॉकरों की वही रेलमपेल है। रुकते-चलते करीब सात बजे हम हावड़ा जं. स्टेशन पर उतर गए। यहाँ से पैदल ही हावड़ा ब्रिज पार किया; बाजारों का नजारा लेते हुए सोनागाछी स्थित अपने डेरे पर आ लगे।

अगले दिन हमें दुर्बार के ‘चिल्ड्रन होम’ पर जाना है। रात को खूब अच्छी नींद सोए। प्रातः जागकर जल्दी ही स्नान, चाय-नाश्ता कर तैयार हो गए। ठीक नौ बजे कन्हाई गाड़ी लेकर आ पहुँचा। अब हमारी गाड़ी कलकत्ता शहर से पचास-साठ किलोमीटर बाहर बराईपुर स्थित दुर्बार के होम, यानी ‘राहुल विद्या निकेतन’ के लिए दौड़ रही है। इस होम की स्‍थापना सन् 2002 में उस कारण हुई, जब यहाँ का एक स्कूल यौन कर्मियों के बच्चों को दाखिला देने को तैयार हुआ, तब बच्चों को यहाँ रखने के लिए यह हॉस्टल यानी विद्या निकेतन बनवाया गया। यहाँ पर दुर्बार के एक और संगठन ‘उषा’ कोऑपरेटिव मल्टीपर्पज सोसाइटी लि. की जमीन, गेस्ट हाउस, मछली पालन के लिए दो तालाब, फुटबॉल प्ले ग्राउंड है। हाल-फिलहाल में यहाँ वृद्ध हो चुकी यौन-कर्मियों के लिए ‘ओल्ड ऐज होम’ तथा उन फुटबॉल खिलाड़ियों के लिए एक ‘प्लेयर्स स्टे होम’ भी बन रहा है, जो यौनकर्मियों के बच्चे बाहर से यहाँ फुटबॉल टूर्नामेंट खेलते आते हैं।

करीब डेढ़-दो घंटे का सफर तय कर हम लोग होम-परिसर में आ पहुँचे। मैं देख रहा हूँ, परिसर में बहुत सारे पेड़-पौधे हैं; सब्जी भी उगाई जाती है; दूध की पूर्ति के लिए दो गायें तथा बहुत सी बकरियाँ पाल रखी हैं। शहर के कोलाहल से दूर प्राकृतिक वातावरण में यह बड़ा ही मनोरम स्‍थान है। गेस्ट हाउस के अंदर आ गए हैं। डॉ. जैनाजी से भेंट हुई। प्रणामपाती के बाद बैठे, डॉ. साहब ने कुशल-क्षेम पूछी, फिर हमें ब्लैक टी पिलवाई बिस्कुट के साथ। इसके बाद खेतों की तरफ थोड़ा घूमे-फिरे, खेतों में धान के पौधे मगन हो मस्ती में नाच रहे हैं, और फिर दुपहर दो बजे होम की रसोई में भोजन किया। भोजन में चावल, दाल, दो-तीन सब्जियाँ, सहिंजन की सब्जी तथा करेले की भुजिया विशेष। बैंगन तो यहाँ सब जगह थाली की शोभा है ही, और अंत में टमाटर की चटनी तथा दही। भोजन के बाद थोड़ा आराम, फिर डॉ. जैना के साथ हुई चर्चा में उन्होंने बताया कि कैसे उन्होंने यौनकर्मियों के अधिकारों के लिए, यौन कर्म को पेशे का दर्जा दिलाने के लिए अपनी सरकारी नौकरी दाँव पर लगा दी, जब वे अपने संस्‍थान के डायरेक्टर बनने वाले थे। यौनकर्मियों को दीन-दशा से छुटकारे तथा उनके सशक्तीकरण के लिए ‘उषा’ नामक बैंक की स्‍थापना करवाई।

सायं में भोजन के बाद डॉ. जैना के साथ होम-परिसर से बाहर घूमने गए। होम के सर्व सुविधा गेस्ट हाउस के कमरे में रात्रि को बड़ी सुखद नींद आई। प्रातः मैं जल्दी ही जाग गया। अहा! आज की सुबह कितनी उजली-उजली है। पेड़-पौधे ओस में नहाए खड़े सूर्य-वंदना करते प्रतीत हो रहे हैं। मैं तो खेतों के बीच सैर के लिए निकल गया हूँ। सैर से लौटकर ब्लैक टी-बिस्कुट का आनंद लिया। मित्र आनंद शर्मा अभी बिस्तर का मोह नहीं छोड़ पाए हैं। आखिर चाय पीकर वे भी टहलने निकले। डॉ. जैना ने आज होम में स्थित दोनों तालाबों में जाल डलवाया है। जाल में सभी तरह की मछलियाँ फँसी, बड़ी-बड़ी मछलियाँ रखकर बाकी सब तालाब में वापस डाल दी गईं। डॉ. जैना ने बताया कि एक-दो महीने में जाल डलवाना जरूरी होता है; अगले महीने ये मछलियाँ भी बड़ी हो जाएँगी। हम सब यहाँ तालाब पर बैठे मछलियों का कौतुक देख रहे हैं; श्रीमती जैना हमारे लिए एक सहायक के साथ फिर से ब्लैक-टी और बिस्कुट ले आईं। हमारे आतिथ्य में वे कोई कोर-कसर नहीं रहने देना चाहती हैं। चिल्ड्रन होम के बच्चे आज भोजन में मछलियों की दावत उड़ाएँगे।

दुपहर करीब बारह बजे हम लोग डॉ. जैना के साथ गाड़ी में कलकत्ता लौट आए। बंगाल में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं, रैलियों और नुक्कड़ सभाओं का दौर चल रहा है। आज डॉ. जैना का शेड्यूल थोड़ा टाइट है। प्रेस कॉन्फ्रेस तथा मीटिंग में व्यस्त रहेंगे। अतः अब उनसे कल ही भेंट होगी। सो हम भी अपने डेरे पर लौटे, नहाए-धोए। दुपहर को दिल्ली होटल में भोजन किया। आज कहीं आना-जाना नहीं हुआ। शाम को लाड़ले के साथ सोनागाछी रेड लाइट एरिया में थोड़ा घूमे-फिरे। अब तक दोपहर हो गया है, डेरे पर लौट दुर्बार कार्यालय गए। यहाँ की औपचारिकताएँ पूरी कीं। विगत आठ दिनों से हम कलकत्ता तथा इसके आस-पास घूम-फिर रहे हैं। कई मायनों में कलकत्ता शहर मुझे दिल्ली से बेहतर लगा। यहाँ के लोग आदतन नियम का पालन करते हैं।

इस नगर की सभ्यता, शुचिता तथा जन-सामान्य को कोई कष्ट न होने देने का यहाँ के नेताओं का एक आँखों देखा अनुभव मैं आपको बताना चाहता हूँ। इन दिनों प. बंगाल में विधानसभा के चुनाव घोषित हो गए हैं, तो रोज ही जनसभाएँ हो रही हैं। एक दिन हमारी इमारत के नीचे चौराहे पर एक राजनीतिक दल का मंच सजा। चौक पर थोड़ा सा स्थान लेकर एक छोटा सा मंच बनाया गया, इसे विद्युत्-लड़ियों से सजाया गया। न तो मुख्य सड़क का ट्रैफिक रोका गया, न ही दोनों ओर की गलियों में लोगों का आना-जाना बाधित हुआ। मंच के आगे से बराबर ट्रैफिक गुजरता रहा। दो दर्जन से ज्यादा नेताओं ने मंच से भाषण किया, न तो मंच पर अफरा-तफरी हुई, न श्रोताओं को कोई बाधा पहुँची; दर्शक-श्रोता बराबर तालियाँ भी बजाते रहे। करीब दो-ढाई घंटे यह चुनावी सभा चली। मंच से नेता का नाम पुकारा जाता, मंच पर पटका पहनाकर उसका स्वागत होता और वह नेता अपना भाषण समाप्त कर नीचे आ सामने दर्शकों के बीच बैठ जाता। किसी को कोई असुविधा न हुई। पुलिस ड्यूटी पर थी जरूर, पर उन्हें कुछ करना नहीं पड़ा, वे कुरसियों पर बैठे अन्य श्रोताओं की तरह भाषण का आनंद लेते रहे। नेताओं का लिवास भी इतना सादा, कोई चमक-दमक नहीं। राजनेताओं को यह सब सीख लेने की जरूरत है कि आपके कृत्य से जनसाधारण को कोई असुविधा नहीं होनी चाहिए, तभी आप सच्चे नेता कहलाने के अधिकारी हैं।

हमने डॉ. जैना से जुलाई में पुनः आने का वायदा किया। कोलकाता की संस्कृति और सभ्यता मुझे भा गई; अच्छाई या अच्छी बातें जहाँ से भी मिलें, उन्हें अपनाने में गुरेज नहीं करना चाहिए। कोलकाता में बिताए वे दिन मुझे बार-बार याद आते हैं और बड़ा भला लगता है अपना सोनार बांग्ला!

जी-326, अध्यापक नगर,
नांगलोई, दिल्ली-110041

दूरभाष : 9868525741

हमारे संकलन