अथश्री शेषराम कथा

अथश्री शेषराम कथा

जैन उच्चतर माध्यमिक विद्यालय दरियागंज की जिस इमारत में अवस्थित है, उस इमारत का निर्माण लाला मुंशीराम कागजी ने समंतभद्र संस्कृत महाविद्यालय के लिए करवाया था। उन दिनों संस्कृत विद्यालय शाम को पौने छह से रात सवा नौ बजे तक लगता था। चूँकि इमारत संस्कृत विद्यालय की थी, इसलिए उसके मुख्यद्वार की कुंजी विद्यालय के चपरासी की सुपुर्दगी में रहती थी।

शेषराम समंदभद्र संस्कृत महाविद्यालय के इकलौते चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी हुआ करते थे। इमारत के दोनों मुख्यद्वार सुबह खोलना और रात में उनमें ताला जड़ना उन्हीं की जिम्मेदारी थी। इस कारण एक तरह से वे चौबीसों घंटे ऑन ड्यूटी ही रहते थे।

इसी इमारत के पिछले हिस्से में दो छोरों पर दो उपभवन और थे। सड़क छोर वाले उपभवन में लाला मुंशीराम धर्मार्थ औषधालय था और दूसरे छोर पर तीन कमरों का आनंदसागर छात्रावास था। इसी छात्रावास की सीढ़ियों के नीचे बनी कोठरी शेषराम का आवास थी। इस आवास के बदले में उन्हें दिन के कुछ घंटे तीसरे छोर पर बनी मुंशीराम प्याऊ में बैठकर आते-जाते प्यासों को पानी पिलाने का काम करना होता था।

शेषराम विद्यालय में चपरासीगीरी के अलावा बगीचे की देखभाल और रखरखाव का काम भी करते थे। इसके लिए उन्हें स्कूल से माली की मद में कुछ मेहनताना मिल जाता था। छुट्टी के दिन वे औषधालय में वैद्यजी के निर्देशानुसार खलबट्टे पर दवाइयाँ कूटने का काम भी कर दिया करते थे।

औरों की तरह मैं भी शेषराम के बारे में इतना ही जानता था। सदा चुप रहने और केवल मुसकरानेवाले शेषराम के बारे में इससे अधिक जाना भी कैसे जा सकता था! वह तो हुआ यह कि मुझे अनायास आश्रम से छात्रावास में भेज दिया गया, तब उन्हें और उनके बारे में बहुत कुछ जानने का मौका मिला।

पिछले तीन साल से मेरा एक सहपाठी रात को विद्यालय में आकर मुझसे कोई न कोई कॉपी गृहकार्य टीपने के लिए ले जाता था। एक बार वह स्कूल आते समय मेरी कॉपी घर में ही छोड़ आया। उसकी वजह से मुझे कक्षा में सजा भुगतनी पड़ी। तब से मैं खुद सुबह की सैर से लौटते हुए उसके घर से अपनी कॉपी लाने लगा था।

छात्रावास में आने के अगले दिन भी मुझे उसी के चलते सुबह सैर के बहाने बाहर जाने की जरूरत महसूस हुई।। मुख्यद्वार की कुंजी शेषराम के पास हुआ करती थी, इसलिए मैं उनकी कोठरी तक गया। वे मुझे वहाँ नहीं मिले। मैं मैन गेट तक आया। मैंने देखा, शेषराम कहीं से लौटकर आ रहे हैं। उनके सिर पर एक गमछा है और पीठ पर छोटे तकिए से बँधा एक वैसा झूला है, जैसा खारी बावली में बोझा ढोनेवाले मजदूरों, कुलियों और झल्लीवालों के पास होता है।

मुझे देखते ही शेषराम का चेहरा स्याह हो गया। जैसे मैंने उन्हें घोर अपराध करते देख लिया हो।

जैसे ही उन्होंने गेट का ताला खोला, मैंने कहा, मैं फैज बाजार तक जा रहा हूँ अपने एक सहपाठी से अपनी कॉपी लेने। मेरे लौटने तक आप मैन गेट का ताला खुला रहने देना। मैं खुद लौटकर आपसे चाबी लेकर ताला लगा दूँगा।

वे ताले की चाबी मुझे देते हुए बोले, हाँ, हाँ, जाओ। खुद ही ताला लगाकर चाभी हमें दे जाना। मैंने ‘हाँ’ में गरदन हिलाई और अपनी मुहिम को पूरा करने के लिए चल दिया। जब में चाभी उन्हें देने गया, तब बोले, किसी को यह मत बताना कि तुमने हमें इतनी सुबह बाहर से आते देखा था। मैंने पूछा,  क्यों?

वे बोले,  यह खबर प्रधानाचार्यजी तक पहुंच गई तो वे हमें नौकरी से निकाल सकते हैं, जबकि हमें इस नौकरी की सख्त जरूरत है।

मैंने भरोसा दिलाया कि मैं किसी को नहीं बताऊँगा। बल्कि मैं तो खुद आज की तरह बार-बार बाहर जाना चाहूँगा।

दरअसल में अपने जिस सहपाठी योगेंद्र को गृहकार्य के लिए कॉपी उधार देता था, वह अपने घर की पहली मंजिल पर रहता था और भूतल पर उसके पिता का टाइपिंग इंस्टीट्यूट था। जब मैं पहली बार उसके घर सुबह-सुबह अपनी कॉपी लेने पहुँचा था, तब तक योगेंद्र ने मेरी कॉपी से अपनी कॉपी में होमवर्क उतारा नहीं था।

वह बोला, तू बैठ, मैं अभी उतारता हूँ। तभी उसके पिता बोले, लाइट जलाकर नींद खराब मत कर! इसे नीचे ले जा!

योगेंद्र मुझे इंस्टीट्यूट में ले आया। वहाँ हर मेज पर एक-एक टाइपराइटर रखा था। सामने दीवार पर की-चार्ट टँगा था। सभी टाइपराइटरों में एक सादा कोरा कागज फँसाया हुआ था। योगेंद्र होमवर्क करने में जुट गया और मैं टाइपराइटर बजाने में। उँगली रखते ही टाइपराइटर में से आवाज निकलती थी—टक-टक-टक-टक!

मुझे आनंद आने लगा। इस फेर में टाइपराइटर से निकलनेवाली आवाज ऊँची होती गई। सुबह के सन्नाटे में वह आवाज ऊपर उसके पिता के कानों तक भी पहुँची। वे नीचे आए और मुझसे बोले,  बेटा राम, ऐसे तो इसकी सब ‘की’ टूट जाएँगी। तुम तो समझदार और होशियार बच्चे हो न!

फिर उन्होंने मेरे हाथ थामकर मेरी उँगलियाँ कायदे से टाइपराइटर के कीबोर्ड पर रखीं। फिर अपनी उँगलियों से दाब देकर बाईं ओर की ‘की’ चलानी शुरू की।

कनिष्ठा से A, अनामिका से S, मध्यमा से D, तर्जनी से F और उसी से G लिखी ‘की’ पर दबाव बनाया। फिर तर्जनी को वापस F पर ले आए। इस बीच मुझे सामने कागज पर ये पाँचों एल्फावेट छपे नजर आने लगे।

अब उन्होंने मेरे दाएँ हाथ की उँगलियों को हरकत में लाने के लिए दबाव बनाया। सबसे किनारे की ‘की’ जगह उससे अगली की पर कनिष्ठा को रखकर उसे दबाया, जिससे सामने कागज पर उभरा, फिर अनामिका से L, फिर मध्यमा से K, फिर तर्जनी से J और फिर तर्जनी से ही H उलछारने के बाद तर्जनी को वापस J पर रखा। फिर कनिष्ठा को दाईं ओर की अंतिम की पर ले गए, जिससे टाइपराइटर पर लगे कागज पर बना। फिर सामने टँगे चार्ट को देखकर आहिस्ता-आहिस्ता ‘की’ चलाने की हिदायत देकर वापस सोने चले गए।

कहना न होगा, तभी से मैं नियमपूर्वक कॉपी लेने योगेंद्र के घर जाने लगा। नतीजा, वह हर रोज सुबह काम टीपने में जुटने लगा और मैं उतने समय टाइपराइटर पर टाइप करना सीखने में। पिछले तीन सालों में मैं अंग्रेजी ही नहीं, हिंदी की टाइपिंग में भी महारत हासिल कर चुका था।

शेषराम का भय मेरे लिए वरदान सिद्ध हुआ। अब मैं उन्हीं के साथ भोर में ही योगेंद्र की दुकान पर पहुँचने लगा।

साथ-साथ जाने-आने के दौरान शेषराम से पता लगा कि वे नि:संतान हैं। पत्नी गाँव में रहती है। एक छोटा भाई है, जिसे वह उच्च शिक्षा दिला रहे हैं। उसकी पढ़ाई का खर्च जुटाने के लिए ही भोर में दरियागंज की सब्जीमंडी में बोझा ढोते हैं। ट्रकों से बोरे चढ़ा-उतारकर रोजाना तीन-चार रुपए कमा लेते हैं। बागवानी के एवज में कुछ बँधी रकम स्कूल से मिलती है। प्याऊ पर, खासकर शाम को डीएमएस के बूथ पर दूध लेने आनेवाले बुजुर्गों से आने-दो आने मिल जाते हैं। यह सारी रकम भाई को भेजकर शेषराम अपनी गुजर-बसर विद्यालय के वेतन से कर लेते हैं।

उनके बारे में इतना कुछ जानकर अच्छा लगा। उन पर अभिमान हो आया। उनमें अपने वे बड़े भाई नजर आने लगे, जो कभी-कभार मुझे पाँच रुपए मनी आर्डर के जरिए पहुँचाया करते थे।

आश्रम के बाद छात्रावास भी यकायक छूटा। फिर शेषराम से भेंट हुई आठ साल बाद।

मेरे मित्र सुरेशचंद्र मिश्र समंतभद्र में प्राध्यापक नियुक्त हो गए। उन दिनों हमने आयाम प्रकाशन आरंभ किया था। हमारी योजना संस्कृत में पुस्तकें छापने की थी। सो सोचा गया कि क्यों न मैं समंतभद्र में दाखिला ले लूँ, ताकि हमारा प्रतिदिन मिलना भी हो सके और इसके लिए अलग से समय भी न निकालना पड़े, चूँकि दिन में तो मैं दिल्ली प्रेस में काम करता था।

और मैं समंतभद्र में साहित्याचार्य प्रथम वर्ष का शिक्षार्थी बन गया।

विद्यालय आने पर शेषराम से वार्त्तालाप का मन होता था, पर वह मुझे देखकर भी अनदेखा करने लगे थे। उनके चेहरे पर उदासी ने स्थायी रूप से घर बनाया हुआ था।

एक दिन मैंने उन्हें घेर ही लिया। पुराने दिनों की याद दिलाई। न जाने क्यों, उस दिन उनके हावभाव में एक अंतर आया। उन्‍होंने मेरा कुशल-क्षेम पूछने के बाद कहा, कल साँझ को हमरे डेरे पर हमरी मेहरारू के हाथ की बनी चाय पीना। मैंने न्योता स्वीकारते हुए खुशी जाहिर की, मतलब हमारी भौजी अब यहीं रहने लगी हैं।

वह बोले, और कहाँ जाती! हमरे संग जीना, हमरे संग मरना। वह फिर उदास हो चले। अगली शाम शेषराम अपनी कोठरी तक ले गए। चारपाई पर बैठाया। घूँघट किए एक महिला आईं और चाय रखकर वहीं जमीन पर बैठ गईं। मैंने कहा, भौजी प्रणाम। हम इनके छोटे भाई हैं। हमारा नाम... मेरा वाक्य पूरा भी नहीं हो पाया था कि वे फफककर रो पड़ीं। शेषराम भी रुलाई रोकने को मुँह पर हाथ रखकर वहाँ से चले गए। मैं अवाक् और अजीब धर्मसंकट में! करूँ तो क्या करूँ! अंतत: सूझा कि मौन बने रहो। इस दौर को अपने पाँव लौट जाने दो। रुलाई थमने पर भौजी ने जो बताया, वह सन्न कर देनेवाला था।

उनके शब्द तो दोहराना संभव नहीं है, पर उनके कथन का सार यह था कि उनके पति शेषराम अब वह शेषराम नहीं रहे, जिन्हें मैं जानता था। उनके छोटे भाई ने उनका बल, उनका भरोसा, उनकी आस, सब कुछ छीन लिया।

चार साल पहले उसकी पढ़ाई पूरी हुई। उसने बताया कि वह ट्रेनिंग के लिए मसूरी जा रहा है सो मिलना-जुलना नहीं हो सकेगा। अगले साल फिर यही कहा। एक साल पीछे खबर दी कि वह सरकार में कलेक्टर हो गया है। फिर खबर दी कि वह अपने जितनी काबिल मेहरारू ले आया है। हमें ब्याह में बुलाने का बक्त नहीं मिला। सब जल्दी-जल्दी में हो गया।

वे सुबकती जा रही थीं और बताती भी जा रही थीं। शेषराम अभी तक लौटे नहीं थे। पीरियड पूरा होने की घंटी बजी। मैंने कहा, शेषरामजी की चाय फिर गरम कर दो, वे आ सकते हैं। भौजी ‘ना’ में गरदन हिलाते हुए बोलीं, आहाँ, वे न आएँगे। इसी के साथ उन्होंने रुका हुआ प्रसंग आगे बढ़ाया।

जब से देवर की पढ़ाई पूरी हुई, तब से हम यहाँ इनके संग रह रहे हैं। हमें शादी में शामिल न हो पाने का रंज तो था, हमरे और आपके भैयाजी के भी कुछ अरमान थे, पर होनी पर किसका जोर चलता है!

वह सब भुलाकर हम दोनों इन गरमियों में इनके भाई से मिलने गए। उन्हें बड़ा सा बँगला मिला हुआ है। घर में हमरी देवरानी तो नहीं थी, पर नौकर-चाकर भतेरे थे।

जैसे ही हम पहुँचे, देवरजी ने सबको छुट्टी दे दी। हमसे बोले, देवरानी को छुट्टी नहीं मिल सकती सो एकाध दिन में आपको उसके पास ले जाऊँगा। हम सब कई दिन वहीं रहेंगे, इसलिए यहाँ सब नौकरों को छुट्टी दे दी है।

फिर रोज शाम बँगले पर आते ही देवरानी के पास जाने का इरादा अगले दिन पर टालते रहे। आपके भैया अपने भाई के ठाटबाट देखकर इतने प्रसन्न हुए कि सारे शिकवे क्षणभर में बिसूर दिए। हमने रसोई सँभाल ली और इन्होंने बगीचा। देवर तो जीप में बैठ कभी कहीं को निकल जाते थे, कभी कहीं को। हम दोनों के साथ बैठकर दो बातें करने का उनके पास बखत ही नहीं होता था। एक सुबह उनके कोई मिलनेवाले आए। हम दोनों को देखते ही उन्होंने देवरजी से पूछा, नई रसोईदारिन और माली रखे हो का? देवरजी बोले, हाँ, रखे तो हैं, पर देखो कितने दिन टिकते हैं।

हालाँकि देवर ने इतनी धीमी आवाज में कहा था कि हमें सुनाई न दे, पर ऐन तभी आपके भैयाजी इस इरादे से उनकी बैठक की ओर चले आए थे कि छोटका अपने मिलनेवाले से इनकी बाख्पियत कराएगा।

वह तो न हुआ, पर इन्हें हम दोनों के बारे में जो कहा जा रहा था, वह सुनने को मिल गया। देवर तो अपने पहचानवाले के साथ टहलने निकल गए और ये हमरा और अपना सामान बाँधने लगे।

इन्होंने ऐलान कर दिया कि जिस भाई को इन्हें अपना भाई या अपना रिश्तेदार तक कहते लाज आती है, अब उसके घर में रहना तो दूर, ऐसे घर का एक घूँट पानी भी गले न उतारेंगे।

बस देवर के लौटने से पहले ही हम स्टेशन पर जा लगे थे। भौजी आगे का किस्सा बयान करतीं कि उन्हें शेषराम के आने की आहट सुनाई दी। वे एक खाली, एक चाय से भरा कप उठाकर ले जाने लगीं। तब तक शेषराम हमारे करीब आ चुके थे।

आते ही बोले, अपने देवर को एक चाय और पिलाओ। भौजी ने मना किया, ज्यादा चाय पीना अच्छी आदत नहीं होती। शेषराम बोले, अरी, ये पत्रकार हैं। चाय-सिगरेट से तो इनका चोली-दामन का सा नाता होता है। यह सुनते ही मुझे वाकई सिगरेट की तलब मची। मैंने सिगरेट सुलगा भी ली। उधर भौजी ने चाय बनाने के कोई लक्षण नहीं दिखाए। वे कप भीतर रखकर खाली हाथ लौट आईं।

मेरे करीब जमीन पर बैठते हुए बोलीं, लला, अब इन्हें तुम्हीं समझाओ। जब से भाई के घर से लौटे हैं, उदास रहते हैं। न ठीक से खाते हैं न काम में पहले जैसा मन लगाते हैं। मेहनत करना छोड़ दिए हैं, सो काया ढलने लगी है। यही हाल रहा तो बुढ़ापा कैसे कटेगा! अब हम इनके और ये ही हमरा सहारा हैं। कोई और तो हमें पानी देनेवाला है नहीं।

ये पहले भी हमें तुमरी बाबत बताते रहे हैं और जबसे तुम विद्यालय में आए हो, तबसे फिर बताते रहते हैं। इनकी बातों से हम जान गए हैं कि ये तुमरे को अपना हितू मानते हैं। इसी करके हमने बेखटके तुमरे आगे दुखड़ा रोया है। आज हमने और किसी से कहना तो दूर, खुद अपने से भी यह सब नहीं कहा। अब तुम ही इन्हें सही राह सुझाओ।

मैंने भौजी को कोई आश्वासन नहीं दिया। न शेषराम से कुछ कहा। चुपचाप उठा और वहाँ से विदा हो लिया।

अगले कुछ दिन शेषराम को भौजी की भावनाओं के अनुरूप समझाया। जब उसमें फिर से पुराना शेषराम नजर आने लगा, तब राहत की साँस ली।

अंतिम पेपर के दिन शेषराम मुझे फिर अपनी कोठरी तक ले गए। वहाँ कुछ मिठाइयाँ, चाय और बिना घूँघट की भौजी मेरी प्रतीक्षा में थीं।

मैंने भौजी को प्रणाम करते हुए हैरानी जताई, अरे वाह! तो शेषरामजी ने हमारी इतनी प्यारी और सलौनी भौजी घूँघट की ओट में छिपाई हुई थीं!

जवाब भौजी ने दिया, हमने इनसे कह दिया था, आज हम अपने लला को मनभर देखेंगे और खुद को दिखाएँगे भी। उस दिन हम घूँघट में थे। तब हमें देखा होता तो उमर भर तुमरी यादों में हमरा उदास चेहरा समाया रहता। आज हम बहुत-बहुत प्रसन्न हैं, सो अब तुम उमर भर हमरा यही मुखड़ा याद करोगे, है कि नहीं!

उत्तर में मैंने हामी भरी।

मेरे आगे मिठाइयाँ सरकाते हुए भौजी बोलीं,  लला, हम जिनगी भर न तुमरा जस गाएँगे। यह उपकार न भूल पाएँगे। तुमने हमरा आदमी वापस ला दिया। अब ये पहले सी मेहनत करने लगे हैं। खूब कमाते हैं, सो हम पर खूब खर्चते हैं। खूब खुश रहते हैं, सो हमें भी खूब खुश रखते हैं। हमरी मंशा तो पूरी हो गई, अब तो रामजी से विनती है कि वह तुमरे लाने एक गोरी-नारी सुलक्षणी ललाइन बहुरिया तजबीज दें। हम जानत हैं कि रामजी हमरी विनती जरूर से जरूर सुनेंगे।

कहना न होगा, शेषराम भौजी के दिल से निकली दुआ कुबूल हुई और तीन माह बीतते न बीतते उनके इस देवर को उनकी कल्पना और भावना के अनुरूप मेहरारू मिल भी गई।

बाद के सालों में जब मैं दरियागंज में ही टाइम्स समूह की ‘सारिका’ में कार्यरत रहा, तब कभी-कभी शेषराम और भौजी से भी भेंट होती रही। भरी दोपहरी में, खासकर गरमियों के दिनों में दोनों प्याऊवाली कोठरी में पानी से भरे मटकों की ठंडक लेते दिख जाया करते थे। अब उस ओर जाना नहीं होता। संभवत: शेषराम भी समंतभद्र में अब तक नहीं ही रहे होंगे।

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