शिकारपुर के आम आदमी

शिकारपुर के आम आदमी

अपने समाज शास्‍त्र के गहन अध्ययन से पी. लाल इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि जो खास नहीं है, वही आम आदमी है। यों उनकी यह मान्यता भी महत्त्वपूर्ण है कि यूरोप-अमेरिका के आम आदमी को रोटी सुलभ है, भारत में उसी के लाले हैं। फिर भी सामान्य भारतीय की जिजीविषा इतनी प्रबल है कि  सूखे में भरा नहीं, बाढ़ में न डूबा है, भारत का आदमी वाकई अजूबा है।  इस अजूबे के विषय में एक अन्य महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि वह कतई राम-भरोसे है। भारत के गाँव एक शाही परिवार के ‘सुशासन’ के बावजूद आज भी अर्ध-विकसित हैं। कहीं बिजली है, कहीं नहीं है। नल का पानी तो अधिकतर नहीं ही है। इस शाही परिवार की खासियत है कि उसके एक सदस्य ने स्वतंत्रता-संग्राम में अहम भूमिका निभाई थी। उसके बाद सामंती मानसिकता के देश में पुश्तैनी शासन चल निकला। इस परिवार ने अपने सदस्यों को विपुल शासकीय सम्मान दिया। तभी तो शिक्षण संस्थाओं से लेकर अस्पतालों तक का नाम उसी परिवार के मृत सदस्यों पर है। कोई शोध-छात्र अध्ययन करे तो इस नतीजे पर पहुँचे कि राष्ट्रपिता बापू के मुकाबले इस शासक-खानदान के सदस्यों का सड़कों, इमारतों का नामकरण कहीं अधिक है। यों पंछी-पखेरू भी इस परिवार के कृतज्ञ हैं। कइयों ने मूर्तियों पर घोंसले बना लिए हैं। उन्हें मौसम से सुरक्षा और बीट करने की सुविधा जो है।

गाँव में न शिक्षा की उचित व्यवस्था है, न हारी-बीमारी के इलाज की। भूले-भटके किसी ‘डॉक्टर-बाबू’ के आगमन से अधिक तो त्योहार, गाँव में पधारते हैं। कंपाउंडर यदि है, तो वही डॉक्टर की भूमिका का जिम्मेदार है अन्यथा झोला-छाप डॉक्टर तो हैं ही। उन्होने दर्द की कुछ गोलियों और कुछ एंटी-बायोटिक के नाम ही नहीं रटे हैं, उन्हें शहर से लाकर बहुरंगी-शीशियों में सँजो भी लिया है। हर रोगी इन्हीं से स्वास्थ्य-लाभ करता है। यदि ठीक हुआ तो श्रेय झोला-छाप का, वरना हरि-इच्छा। एक बढ़ई तो सर्जन बन बैठा है। उसका तर्क है कि वह लकड़ी की काट-छाँट का विशेषज्ञ है। सवाल काट-छाँट का है। आदमी के शरीर की संरचना उसने एक सर्जन के घरेलू-सहायक के रूप में सीख ली है, उसके अस्त्र-शस्त्र भी। लिहाजा, वह अपनी सर्जरी में उनका ‘प्रयोग’ करता है। कभी किसी की नाक काटना है, कभी किसी के दाँत उखाड़ता है। डॉक्टर तो वह है ही, बस सर्जन और डॉक्टर का ‘टू इन वन’ हो गया है। सामान्य, मान्य डॉक्टर और सर्जन तथा उसमें इतना अंतर है कि यह डिग्री उसने बिना कोर्स किए बैठे-ठाले, अपने गाँव के ‘बुडलैंड स्कूल ऑफ मेडसिन’ से हासिल की है। इसमें आश्चर्यजनक कुछ भी नहीं। कुछ छोटी साहित्यिक विभूतियाँ ‘मुसकान मैन’ की पदवी खुद ही अपनाते हैं। उसी प्रकार, इस बढ़ई ने सर्जन के ‘टाइटिल’ से स्वयं को सुशोभित कर लिया है। सवाल यह है कि समाज को अधिक खतरा किससे है? नकली मुसकान मैन से कि सर्जन से? इसका उत्तर विचारक ही देने में समर्थ हैं। हम तो केवल इतना जानते हैं कि साहित्य से इनसान के जीवन की कहीं अधिक महत्ता है। झोला छाप डॉक्टर या सर्जन किसी भी देश के कलंक हैं, जैसे साहित्य के लिए ‘मुसकान मैन’ जैसे स्वयं-प्रचारक।

गाँव में सिर्फ जीवन ही नहीं, शिक्षा भी राम-भरोसे है। ‘मासाब’ अकसर शहर के घर पर रहते हैं और कभी-कभार स्कूल आ जाते हैं। पेड़ के नीचे खुले मैदान में पाठशाला है। कभी धूप आती है, कभी बारिश। स्कूल की इमारत के लिए सरकार स्वीकृत दे चुकी है। दीवारें उठ चुकी हैं। ब्लैक-बोर्ड आ चुके हैं। बस छत पड़ना शेष है। सुनते हैं कि ठेकेदार विभागीय कमीशन चुकाए बिना पैसे लेकर भाग गया है। उसके विरुद्ध पुलिस में एफ.आई.आर दर्ज हो चुकी है। पर पुलिस विभाग से उसके आका के दोस्ताने ताल्लुकात हैं। फिलहाल सबको पता है कि वह कहाँ है, पर कोई गिरफ्तारी आदि की संभावना नहीं है। जल्दी क्या है? ब्लैक-फंगस और कोरोना काल में सब मरीजों की प्राण-रक्षा में व्यस्त हैं। जिस सेहत के क्षेत्र पर आजादी के बाद से कोई तवज्जो नहीं दी गई है, सबका ध्यान आज उसी पर केंद्रित है। वरीयता में स्कूल-विल्डिंग ऑक्सीजन और ब्लैक-फंगस की दवाओं में बहुत नीचे है।

तब तक प्राइमरी स्कूल के शिक्षक पेड़ के नीचे ग्राम-प्रधान से उधार ली गई कुरसी पर बिराजते हैं और जुगाड़ से बनाए ब्लैक-बोर्ड पर छात्रों को ‘क, ख, ग’ से लेकर ‘ए, बी, सी, डी’ तक कंठस्थ करवाते हैं। यह ब्लैक-बोर्ड भी झोला-छाप सर्जन की ईजाद है। उसने ही चार पायों पर इसे टिकाया है। हमारे देश में अंग्रेजी के ज्ञान की बहुत महत्ता है। सर्जन के एक अंग्रेजी-दाँ दोस्त ने उसे सुझाया है कि उसकी डिग्री बुडलैंड यूनिवर्सिटी की है। वह कब और कैसे बुडलैंड गया? कब उसने शिक्षा प्राप्त करके डिग्री हासिल की वगैरह-वगैरह राज की ऐसी बातें हैं, जिनसे सब अपरिचित हैं। कौन कहे, वह खुद भी, शायद ही इस विषय में अज्ञान से पीडि़त हों? बस कोई पूछे तो वह ज्ञान देता है कि वह बुडलैंड विश्वविद्यालय से एम.ओ.डब्ल्यू. है। इसका पूरा फॉर्म ‘मास्टर ऑफ बुडक्राफ्ट’ है। इसका सर्जरी से क्या संबंध है? यह शायद उसे स्वयं भी ज्ञात नहीं है। पर झोला छाप सर्जन से और आशा ही क्या की जा सकती है? यों वह आदमी और लकड़ी दोनों की सतत चीर-फाड़ से बाज नहीं आ रहा है।

छात्रों में शायद ही कोई ऐसा अपवाद हो, जो मासाब द्वारा प्रदत्त अक्षर-ज्ञान से आगे बढ़ा हो। बस इतना जरूर है कि कुछ ने अंग्रेजी के हस्ताक्षर में विशेषज्ञता प्राप्त की है। राम दत्त बड़ी श्‍ाान से आर. दत्त के हस्ताक्षर करते हैं और रहीम खान आर. खान के। इसके आगे पढ़ने की न उन्हें आवश्यकता है न सुभीता। बैंक के कर्मचारी उनके अंग्रेजी ज्ञान से प्रभावित हैं तथा सरकार द्वारा भेजी रकम बाकायदा उनके खाते में जमा होती और निकलती रहती है। गनीमत यह है कि स्वास्थ्य केंद्र हो न हो, हर गाँव के आस-पास किसी न किसी बैंक की शाखा अवश्य स्थित है। अपनी मान्यता है कि सरकार के पास समझदार लोगों की इफरात है। उन्होंने जरूर सरकार को समझाया होगा कि इस अक्षर-ज्ञान की शिक्षा से ग्रामवासियों का क्या लाभ है? यदि इसमें उनकी रुचि नहीं है तो स्वाभाविक है। उन्हें क्यों न खेती विषयक तकनीकी ज्ञान दिया जाए या फिर लुहार, बढ़ई, बीज आदि जैसे उपयोगी विषय पढ़ाए जाएँ? क्यों न गाँवों के आस-पास ऐसे तकनीकी संस्थान स्थापित किए जाएँ? शायद वर्तमान ‘मासाब’ की अपेक्षा यह अधिक जिज्ञासुओं को आकृष्ट कर सके। शिक्षा से ही अच्छे नागरिक बनते हैं। प्राथमिकता की दृष्टि से इसका वरीयता की श्रेणी में होना उसी प्रकार आवश्यक है, जैसे स्वास्थ्य का। वरना सर्वशिक्षा अभियान जैसे नारे देश को कब तक लुभाएँगे? उनके बंजर में बजट की लगातार सिंचाई से क्या हासिल होना है?

हम पी. लाल जैसे विद्वान् से प्रभावित हैं। उन्होंने इस ओर ध्यान दिलाया है कि देश के सामान्य व्यक्ति की समस्याएँ समान हैं। इनमें अशिक्षा, रोजगार का अभाव, पेट पालने की कठिनाई आदि सब ही श्‍ाामिल है। गाँवों से शहर की ओर पलायन का यह मुख्य आर्थिक कारण है। इसके अलावा शहरों की चमक-दमक भी लुभावनी है और दिहाड़ी पाने के अवसर भी। शिक्षा के लिए बहुत कम लोग शहर आते हैं, अधिकतर तो दिहाड़ी की तलाश में नगरों का रुख करते हैं। वहाँ कभी सड़कें बन रहीं, नहीं तो मरम्मत हो रही है, या फिर बहुमंजिली इमारतें। रोजगार के सतत अवसर प्रदान करने के लिए हमें ठेकेदारों का आभारी होना चाहिए। उनके द्वारा निर्मित हर सड़क दो माह के बाद ही गड्ढामय और डामर हीन वैसे ही अनाकर्षक हो जाती है, जैसे बिना विग लगाए गंजा फिल्मी नायक, अथवा मैकअप-हीन नायिका। कई बार तो यह जानलेवा भी सिद्ध होती है। ठेकेदारों का विचार है कि इस प्रकार के निर्माण से वह ‘राष्ट्रीय-आबादी घटाओ’ मिशन में अपना सार्थक योगदान दे रहे हैं। उनका यह भी कथन है कि सरकार से बिना कमीशन के कुछ भी पाना असंभव है। जब बिल आदि पर बाबू का निजी कर-भार है तो बड़े ठेकों पर तो होना ही होना। इस विवशता में वह कैसे विश्व-स्तरीय सड़कें बनाएँ? उनमें घटिया सामग्री लगना ही लगना। इसके अलावा निरीक्षक से लेकर बड़े अफसर तक उसमें सब का ‘कट’ निश्चित है। उसकी मजबूरी है कि वह इन सब के ‘कट’ चुकाए कि निर्माण में गुणवत्ता के मानक अपनाए?

इक्कीसवीं की खासियत है, यह विशेषज्ञता की सदी है। ठेकेदारों में भी विविधता है। कुछ सड़क निर्माण के ‘एक्सपर्ट’ हैं, कुछ पुल बनाने के। पुल नदी या बड़े नालों के दो पाटों को वैसे ही जोड़ते हैं, जैसे घूस जनता और सरकार को। कुछ ज्ञानियों को घूस की ध्वनि से चिढ़ है। समय के साथ शब्दों का चलन भी बदलता है। उन्हें घूस की अपेक्षा ‘कमीशन’ अधिक उचित लगता है। उनकी मान्यता है कि घूस इकतरफा शब्द है। कमीशन से लगता है कि कुछ किया तो कुछ पाया। पुल के ठेकेदार ‘ऐवंई’ तो होते नहीं हैं। वह अंतरराष्ट्रीय टैंडर के माध्यम से चुने जाते हैं। करोड़ों का सौदा है। किसी संस्था या व्यक्ति विशेष का चयन आसान है क्या? बड़े जुगाड़ लगाने और मेहनत करनी पड़ती है इसके लिए काम बड़ा है तो ‘कमीशन’ भी ज्यादा है। ठेकेदारों की बिरादरी में पुल के ठेकेदारों का सम्मान भी अधिक है। वह ऐसों-वैसों को नहीं, प्रधानमंत्री के करीबियों का भी परिचित है।

पुल-निर्माण से वह सैकड़ों तकनीकी व सामान्य कर्मचारियों को रोजगार का जनक है। वह दिन-रात नैतिकता की ‘पीक’ करता है। दीगर है कि पान इधर लोकप्रिय नहीं है, पर पीक करने की आदत मानसिकता में रच-बस गई है। अर्थहीन नैतिक शब्द जैसे ‘सच’, ‘जनसेवा’, ‘सैक्युलर दृष्टिकोण’, ‘आम आदमी के जीवन स्तर में सुधार’ वगैरह-वगैरह बड़े लोग अकसर थूकते ही रहते हैं। ठेकेदारों में भी करप्शन के जरिए चयनित होकर ‘जन सुविधा के लिए बिना अनुचित लाभ के पुल-निर्माण की सेवा’ जैसे शब्द खासे लोकप्रिय हैं। कुछ ठेकेदार पुल सेवा करते-करते चुनाव भी जीत जाते हैं। परिचित बताते हैं कि चुनावी विजय जनसेवा का न होकर कमाई का कमाल है। पैसे की महत्ता हर क्षेत्र में बढ़ रही है तो चुनावों में क्यों न बढ़े?

अनुभवी बताते हैं कि देशी निर्माताओं द्वारा निर्मित पुलों को टपकने का शौक है। इसमें पुल के निर्माता का कोई दोष नहीं है। कागज पर उसमें वर्तमान में उपलब्ध श्रेष्ठ गुणवत्ता की सामग्री का उपयोग किया गया है। सारी की सारी करतूत पुल की है। एक दिन उसने तय किया कि आस-पास पेड़-पत्ते, इमारत, घर अनपेक्षित आँधी में टपकने पर आमादा हैं तो वह भी क्यों न टैं बोल जाए? यों निर्माण के समय से निर्माता को सुखद मुगालता था कि उद्घाटन तक ऐसी दुर्घटना की संभावना नहीं है। पर पुल का इरादा जनकल्याण था। बिना किसी आवाजाही के उसने एक दिन टपकने का फैसला कर लिया। ठेकेदार का बयान आया है कि उसके द्वारा बनाया गया पुल भी जनहित में टपका। सबके प्राण सुरक्षित रहें, यह नुकसान हमारा निजी है। हम बैंकों की पाई-पाई चुकाने को कटिबद्ध हैं और भविष्य में भी देश की सेवा को समर्पित।

पूरे हादसे की जाँच के लिए सरकार ने एक कमीशन का गठन किया है। पुल का यकायक पतन, तकनीकी खामियों, सामग्री की गुणवत्ता आदि का निर्धारण ‘कमीशन’ पर निर्भर है।

पर सरकार के निर्णय का विपक्षी दलों द्वारा विरोध, ‘जैसी निकट अतीत की परंपरा है,’ अभी से प्रारंभ हो गया है। ‘कमीशन’ लीपापोती का बहाना है। लक्ष्य ‘अपने’ ठेकेदार को बचाना है वरना उचित होता कि उसे सीधे जेल में डाल देते। उधर शासक दल कमीशन के निर्णय का स्वागत कर रहा है। ‘इससे दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। सरकार ने न्यायसंगत निर्णय लिया है।’ दल आपस में भिड़े हैं, पर मूक जनता सिर्फ तमाशबीन है। अखबार के लिए पुल टपकना सिर्फ एक सुर्खी है और बेकार के लिए भविष्य में रोजगार का एक अवसर। यों जनता मन ही मन तय कर लिया है कि वह अपना निर्णायक फैसला चुनाव के वक्त ही सुनाएगी।

आम आदमी सिर्फ गाँवों से ही आयातित नहीं होते हैं, उनकी तादाद बढ़ाने में शहरों की भी प्रमुख भूमिका है। नगरों की शिक्षण-संस्थाएँ शिक्षित-बेरोजगारों की एक नई श्रेणी बनाने को कटिबद्ध है। यहाँ की डिग्री, नकल, दादागिरी और ठेके पर निर्भर है। कुछ शैक्षणिक ठेकेदार हैं जो एकमुश्त राशि लेकर डिग्री और डिवीजन दोनों की गारंटी देते हैं। देखने में आया है कि इस सिस्टम में हिंदी साहित्य में पी.एचडी. प्राप्त प्रत्याशी, हिंदी के बिना गलती किए, एक पत्र तक भी लिखने में असमर्थ हैं। उनके भाषा-ज्ञान की जितनी भी प्रशंसा की जाए, वह कम है। इनके साथ एक और भी प्रतियोगिता है। इसमें पैसे के प्रदूषण के बाद भी, यह योग्यता के मापदंड में इतने निकृष्ट हैं कि इनके चयन का प्रश्न ही नहीं उठता है। अपने खुद का रोजगार करने की न इनमें क्षमता है न साहस। बैंक से पूँजी भले मिल जाए, यह उसे लेकर धंधा करने में सक्षम नहीं हैं। इनकी काबिलियत बैंक का पैसा हड़पने में निहित है। जाहिर है कि यह शिक्षित बेकारों की संख्या बढ़ाएँ अथवा बैंक की उधारी राशि लेकर के चंपत हों?

आज के वातावरण जब तकनीकी प्रगति से सरकार की बहाली और कर्मचारियों की कटौती हो रही है, शिक्षित बेकारों की समस्या का कोई निदान निकट भविष्य में संभव नजर नहीं आता है। अगर ऐसा हुआ तो वैसा ही लगेगा जैसे सूरज धूप की जगह चाँद जैसी शीतलता देने लगे। संभावना में भले मुमकिन हो, ऐसा होना एक अनहोनी ही माना जाएगा। सरकार यदि चाहे तब भी इन शिक्षित बेकारों का कुछ भी भला करने में असमर्थ है। लिहाजा यह स्थायी रूप से शिक्षित बेरोजगारों की संख्या में लगातार वृद्धि करते रहेंगे।

जब गाँव से बेरोजगार किसी और शहर में जाते हैं तो यह रोजी-रोटी कमाने की सामान्य प्रक्रिया है। पी. लाल के अनुसार उनका शिकारपुर आगमन एक घटना है। तभी तो कलुआ के पिताजी हर मिलने वाले को बताते हैं कि ‘हमार कलुआ नौकरी के खातिर शिकारपुर गया है।’ जैसे शिकारपुर सिर्फ शहर न होकर, कोई बेहद आकर्षक पर्यटन स्थल है। यह सच भी है। सत्ता का केंद्र होकर किसी भी नगर का महत्त्व बढ़ जाता है। सचिवालय से लेकर राज्यपाल और मंत्रियों के दफ्तर तथा आवास सब शिकारपुर में उपलब्ध हैं। कई भूतपूर्व और वर्तमान मुख्यमंत्री शिकारपुर की शोभा बढ़ा रहे हैं। सत्ता की महानता का कुछ अंश क्या शहर के निवासियों में आना संभव है? शिकारपुर के बारे में कलुआ के पिताजी इस दृष्टिकोण के साक्षी हैं। पी. लाल का मत है कि जैसे यूरोप-अमेरिका में लड़कियाँ ऊँची हील पहनकर अपनी लंबाई बढ़ा लेती हैं, शायद वैसे ही सत्ता की बस्ती शिकारपुर में आकर मजदूर तथा अन्य कर्मचारी भी अपनी कद-वृद्धि कर लेते हैं। मुमकिन है कि यह मुगालता उनसे अधिक दूसरों को हो!

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