डूब जाता है कभी मुझमें समंदर मेरा

डूब जाता है कभी मुझमें समंदर मेरा

पद्मा सचदेव नहीं रहीं। हिंदी डोगरी की विदुषी कवयित्री, संस्‍मरणकार एवं गद्यकार पद्मा सचदेव का न रहना हिंदी की एक ऐसी दुनिया का अवसान हो जाना है, जिसमें एक ऐसी लेखिका भी थी, जो खुद तो कविताएँ लिखती ही थीं, पर लोगों को जोड़कर रखने वाले अनूठे संस्‍मरणों की स्रष्‍टा थीं। वे जहाँ होती थीं, वहाँ जैसे उजाला बिखरा होता था। छोटे कद की अपनी ही प्रतिष्‍ठा और आत्‍मीयता के दुकूल में सिमटी और पगी रहने वाली पद्मा सचदेव का जीवन कोई बहुत ‘फूलों की कहानी है तितली की जबानी है’ नुमा नहीं रहा बल्‍कि जीवन में बहुतेरे संघर्ष रहे, जिनसे उबरने में उन्‍हें काफी वक्‍त लगा। वे लंबे अरसे तक माइग्रेन से ग्रस्‍त रहीं, जिसमें उनकी जीवन नियति की अपनी भूमिका रही है और जिसका ब्यौरा उन्‍होंने अपनी आत्‍मकथा ‘बूँद बावड़ी’ में दिया है। ‘बूँद बावड़ी’ से गुजरने वाला पाठक उसे बिना रोए या अश्रुस्‍नात हुए उनकी आत्‍मकथा नहीं पढ़ सकता। उनमें जीवन और गृहस्‍थी पर पड़ने वाली ऐसी खरोंचों का सिलसिलेवार वर्णन है, जो एक संवेदनशील कवयित्री को भीतर तक लहूलुहान कर देते थे। उस त्रासद जीवन से उन्‍हें वे बाहर न निकल पाई होतीं तो जिस पद्मा सचदेव की लेखकीय आभा से हिंदी जगत् तेजोमय रहा है, वह न हो पाता।

पैदायश और साहित्‍यिक संस्‍कार

पद्मा सचदेव का जन्‍म 17 अप्रैल, 1940 को जम्‍मू कश्‍मीर के पुरमंडल में हुआ था। हिंदी व संस्‍कृत के जाने माने विद्वान् प्रो. जयदेव बादु की वे सुपुत्री थीं। उनकी शुरुआती तालीम देवका के तट पर स्‍थित पुरमंडल के प्राथमिक विद्यालय से हुई। संस्‍कृत विद्वान् अपने पिता के सान्‍निध्‍य में रहकर तमाम श्‍लोक उन्‍होंने बचपन में ही रट रखे थे, जिसने उनकी भाषाई नींव को उत्तरोत्तर मजबूत किया। लोक कथाओं के प्रति उत्‍सुकता ने किस्‍सागोई की बुनियाद उनमें डाली, जिससे बाद में वे एक कहानीकार व उपन्‍यासकार के रूप में प्रतिष्‍ठित हुईं। ‘राजा दिया मंडियाँ’ नामक उनकी पहली कविता जब चौदह साल की उम्र में छपी तो इलाके में उनका खूब नाम हुआ। इतनी अपरिपक्‍व उम्र में लिखी यह कविता बाद में डोगरी की एक क्लासिक कविता मानी गई तथा डोगरी के अनेक संकलनों में वह शामिल की गई। बाद में उनका पहला संग्रह ‘मेरी कविता मेरे गीत आया’ तो उसकी भूमिका राष्‍ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने लिखी।

अपने तीन भाई-बहनों में सबसे बड़ी पद्मा सचदेव का विवाह 1966 में सिंह बंधु नामक प्रख्‍यात गायक जोड़ी के सुरिंदर सिंह से हुई तथा चितरंजन पार्क दिल्‍ली में उनकी रिहायश थी। मुंबई में भी वे काफी दिनों रहीं। शुरुआत में उन्‍होंने जम्‍मू और कश्‍मीर रेडियो में कार्य किया तथा बाद में दिल्‍ली आकाशवाणी से डोगरी समाचार वाचिका के पद पर नियुक्‍त हुईं। वे डोगरी में कविताएँ व कहानियाँ लिखा करती थीं, किंतु बाद में संस्‍मरण और आत्‍मकथा की ओर मुड़ीं तो अनेक बेहतरीन कृतियाँ उनकी प्रकाशित हुईं। डोगरी में उनकी आत्‍मकथा ‘चित्त चेते’ और हिंदी में आत्‍मकथा ‘बूँद बावड़ी’ उनके प्रारंभिक जीवन संघर्ष का ब्यौरा है। ‘बूँद बावड़ी’ में उनका आहत कवि मन जगह-ब-जगह नजर आता है, जो किसी अनाम शायर के संपर्क में आकर जैसे घुट रहा था। ये दिन उनके जीवन में माइग्रेन वाले दिन थे, जिसकी पृष्‍ठभूमि में उनकी आत्‍मा और मन पर की गई चोंटें थीं। ‘बूँद बावड़ी’ इन्‍हीं अंदरूनी चोटों की दास्‍तान है।

लेकिन प्रारंभिक जीवन से निकल कर नए जीवन में प्रवेश करने के बाद पुन: एक नई पद्मा सचदेव का जन्‍म हुआ। उनकी कविताओं में डोगरी लोकगीतों व डोगरी एवं कश्‍मीरी लोक समाज की पीड़ा के दर्शन होते हैं। उन्‍होंने अपनी कविताओं में जम्‍मू के लोकल को भी बखूबी उकेरा है। उन्‍होंने अपनी माटी का ऋण ‘जम्‍मू जो कभी शहर था’ नामक उपन्‍यास लिखकर अदा किया। महज 31 साल की उम्र में डोगरी भाषा में अपनी पुस्‍तक ‘मेरी कविता मेरे गीत’ के लिए साहित्‍य अकादेमी पुरस्‍कार पाकर उन्‍होंने डोगरी का मान बढ़ाया। दिल्‍ली स्‍थायी रूप से रहने के पहले वे मुंबई आकाशवाणी से संबद्ध रहीं तथा वहाँ रहकर वे धर्मवीर भारती, पुष्‍पा भारती, लता मंगेशकर सहित अनेक फिल्‍मी गायकों, कलाकारों से गहरे जुड़ी थीं। उनके संस्‍मरणों में मुंबई की दुनिया लहलहाती मिलती है।

सर्जनात्‍मक कृतियाँ एवं पुरस्‍कार

यों तो वे मूलत: डोगरी भाषा की कथाकार व कवयित्री रहीं, पर धीरे-धीरे हिंदी की दुनिया में रमती गईं। डोगरी में उनके आठ कविता-संग्रह आए और तीन गद्य कृतियाँ छपीं तो हिंदी में कुल उन्‍नीस पुस्‍तकें तथा उर्दू में एक पुस्‍तक प्रकाशित हुई। तमाम भाषाओं में उनकी रचनाओं के अनुवाद भी हुए, जिनमें विभिन्‍न भाषाओं से अनूदित 11 कृतियाँ हैं। यों एक सूची उनकी पुस्‍तकों की बनाई जाए तो इस तरह बनती है—मेरी कविता मेरे गीत, तवी ते चन्हाँ, नेहरियाँ गलियाँ, पोटा-पोटा निम्बल, उत्तर बैहनी, तैथियाँ, अक्‍खर कुंड व सबद मिलावा; जैसे कविता-संग्रह—गोदभरी व बुहुरा; कहानी-संग्रह—मितवाघर, दीवानखाना, अमराई व बारहदरी जैसे साक्षात्‍कार संस्‍मरण और जम्‍मू जो कभी शहर था, अब न बनेगी देहरी, नौशीन, भटको नहीं धनंजय आदि उपन्‍यास व आत्‍मकथाओं की कृतियाँ चित्‍त चेते व बूँद बावड़ी व यात्रा वृत्तांत की पुस्‍तक ‘मैं कहती हूँ आँखिन देखी’। वे अपने कृतित्‍व के लिए साहित्‍य अकादेमी पुरस्‍कार, सरस्‍वती सम्‍मान (चित्त चेते के लिए), सोवियत लैंड नेहरू पुरस्‍कार, हिंदी अकादमी पुरस्‍कार, उत्‍तर प्रदेश हिंदी संस्‍थान सौहार्द सम्‍मान, केंद्रीय हिंदी संस्‍थान—गंगाशरण सिंह पुरस्‍कार, राजा राममोहन राय पुरस्‍कार, जोशुआ पुरस्‍कार व कबीर सम्‍मान आदि से सम्‍मानित की जा चुकी हैं। उन्‍हें पद्मश्री से भी नवाजा जा चुका है। 2019 में पद्माजी को साहित्‍य अकादेमी का फेलो बनाया गया तथा उन्‍हें महत्तर सदस्‍यता दी गई।

उनकी कविता पढ़कर पंजाबी कवि डॉ. हरभजन सिंह ने कहा था,  मैंने आज तक कोई लेखिका नहीं देखी जो इतनी सकारात्‍मक हो, उनकी कविता स्‍त्रीत्‍व को पूर्णता में प्रिया, बहन अथवा माँ के रूप में प्रस्‍तुत करती है।  उनकी कुछ कहानियों पर फिल्‍में व टेलीधारावाहिक भी बने हैं तथा हिंदी व डोगरी गीतों को फिल्‍म में भी इस्‍तेमाल किया गया है। उन्‍होंने डोगरी के लिए पहला संगीत डिस्‍क तैयार किया, जिसमें अनेक गीत व धुनें हैं, जिन्‍हें स्‍वर कोकिला लताजी ने स्‍वरबद्ध किया है। सबसे उल्‍लेखनीय यह कि जब डोगरी की उनकी काव्‍यकृति को साहित्‍य अकादेमी पुरस्‍कार 1971 में मिला तो उनके साथ पुरस्‍कार ग्रहण करने वालों में मुल्‍कराज आनंद, नामवर सिंह व रशीद अहमद सिद्दीकी जैसे दिग्‍गज लेखक भी मौजूद थे। मुल्‍कराज आनंद को तो वे बचपन में अपनी पाठ्य पुस्तक में पढ़ भी चुकी थीं। यह लम्‍हा उनके लिए वाकई खास था, जब वे सचमुच सातवें आसमान पर थीं।

एक संवेदनशील कवयित्री के रूप में उन्‍होंने डोगरी आँखें में खोलीं तो अपने आस-पास लोकगीतों का खजाना पाया। लोकगीत वैसे ही मार्मिक होते हैं, आत्‍मा को खींच लेने वाले। उन गीतों का असर उनकी कविताओं पर भी पड़ा। साहित्‍य अकादेमी की महत्तर सदस्‍यता स्‍वीकार करते हुए 12 जून, 2019 को उन्‍होंने अकादेमी सभागार में दिए गए अपने वक्‍तव्‍य में कहा था कि मैं कविता लिखते हुए कुछ ऐसा महसूस करती हूँ—

टूट जाते हैं कभी मेरे किनारे मुझमें

डूब जाता है कभी मुझमें समंदर मेरा।

वे कहती हैं कविताएँ अपने आप आती हैं, गद्य को लाना पड़ता है। उस लम्‍हे में जितना डूब सकें, उतने ही ज्‍यादा कीमती रत्‍न ढूँढ़कर लाए जा सकते हैं। उन्‍होंने अपने वक्‍तव्‍य में आभार माना,  मैं सिर्फ डोगरी में कविताएँ लिखती थी, किंतु धर्मवीर भारती के कहने पर गद्य लिखना शुरू किया। हर तरह का गद्य लिखा। चार पुस्तकें साक्षात्‍कारों पर लिखकर बहुत संतोष मिला। मैं जिंदगी से भर गई।  

हालाँकि वे डोगरी की एक संवेदनशील कवयित्री थीं, जो कश्‍मीर की भाषा है, किंतु उनकी कविताओं के संग्रह हिंदी में अनूदित होकर छपते रहे, जिससे वे हिंदी जगत् में उसी तरह पढ़ी जाती थीं, जैसे अमृता प्रीतम पंजाबी लेखिका होते हुए हिंदी की लेखिका की तरह पढ़ी और सराही जाती थीं। बल्‍कि कहा जाए कि पंजाबी नहीं हिंदी ने अमृता प्रीतम को महान् बनाया तो अत्‍युक्‍ति न होगी। उसी तरह डोगरी की होकर भी पद्मा सचदेव जानी पहचानी गईं तो इसमें उस उदारचेता हिंदी का योगदान है, जिसने उन्‍हें हिंदी जगत् में भी लोकप्रिय बनाए रखा। उनकी एक कविता के अंश देखें—

सुनो

सुनो तो सही

मेरे आसपास बँधा हुआ यह जाल मत तोड़ो

मैंने सारी उम्र इसमें से निकलने का यत्न किया है

इससे बँधा हुआ काँटा-काँटा मेरा परिचित है

पर ये सारे हीं काँटे मरते देखते-देखते उगे हैं

रात को सोने से पहले

मैं इनके बालों को हाथों से सहलाकर सोयी थी

और सुबह उठते हीं

इनके वो मुँह तीखे हो गए हैं

इसमें से निकलने के जितने हीले

मुझे इसके बीच रहकर सूझते हैं

इसके बाहर वो कहाँ

उम्र की यह कठिन बेला

मुझे काटने दो इस जाल के भीतर दबकर

चलो, अब दूर हो जाओ

जाल के काँटों के बहुत से मुँह

मेरे कलेजे में खुभे हुए हैं

जाल काटते हीं अगर ये मुझमें टूट गए

तो मत पूछो क्या होगा

बुजुर्ग कहते हैं—

टूटे हुए काँटों का बड़ा दर्द होता है।

जम्‍मू से प्रेम

जम्मू आँखों में है रहता

यहाँ जाग कर यहीं है सोता

मैं सौदाई गली-गली में

मन की तरह घिरी रहती हूँ

क्या कुछ होगा शहर मेरे का

क्या मंशा है कहर तेरे का

अब न खेलो आँख मिचौली

आगे-आगे क्या होना है

उन्‍होंने कुछ बालसुलभ कविताएँ भी लिखी हैं, जिसका एक ललित उदाहरण देखें—

सो जा बिटिया, सो जा रानी,

निंदिया तेरे द्वार खड़ी।

निंदिया का गोरा है मुखड़ा

चाँद से टूटा है इक टुकड़ा,

नींद की बाँहों में झूलोगी

गोद में हो जाओगी बड़ी।

निंदिया तेरे द्वार खड़ी!

उनकी एक पुस्‍तक रुबाइयों की ही है। रुबाइयों में जीवन-दर्शन किस तरह कूट-कूटकर भरा है, इसका उदाहरण उनकी ये दो रुबाइयाँ हैं—

शहर में अब कोई मित्तर न रहा

आज तक जो था चरित्तर न रहा

आस के तोते सभी तो उड़ गए

पालने को कोई तीतर न रहा

पानी तेरी आहटें हलकी नहीं

हिल गईं चाहे मगर छलकी नहीं

जब भी समंदर में तुम मिल जाओगे

कौन हो तुम कुछ खबर होगी नहीं

उनसे बातें-मुलाकातें

उन्‍हें कई मंचों पर सुन चुका था। उनकी कई पुस्‍तकें, जिनमें बूँद बावड़ी, अक्‍खर कुंड, इन बिन तथा कुछ संस्‍मरणात्‍मक कृतियाँ पढ़ चुका था, इसलिए उनके लेखकीय मिजाज और रेंज का पता था। पर उनसे बात होगी और इतनी अकुंठ खुली तथा स्‍नेहिल दिल की स्‍त्री होंगी, इसे उस बातचीत के पहले न जानता था, जब तक कि उन्‍होंने आउटलुक में भारतीय ज्ञानपीठ से आई अपनी पुस्‍तक ‘इन बिन’ पर मेरी समीक्षा पढ़ने के बाद संपादक नीलाभ मिश्र से फोन लेकर मुझसे बात न की थी। ‘इन बिन’ में उनके ऐसी संस्‍मरणात्‍मक कथाएँ हैं, जो उन्‍होंने घर के नौकर-चाकरों व कमजोर तबके के पात्रों पर लिखी हैं। मैंने पाया कि एक ऐसी संभ्रांत लेखिका जो लता मंगेशकर, अमिताभ बच्‍चन, भारती जैसे लेखकों एवं बड़ी हैसियत के लोगों में पैठ रखती हैं, वे अपने नौकर-चाकर, परिजनों पर इतना स्‍नेह लुटाते हुए संस्‍मरण लिखेंगी। एक बड़ा लेखक वही है, जो ऐसे लोगों पर लिखते हुए भी उनमें मौजूद मनुष्‍यता के उच्‍च सूचकांक को पहचाने और उसे अपनी लेखनी से उजागर करे। उन्‍होंने ऐसा ही किया था। महादेवी वर्मा के बहुत अरसे बाद मैं ऐसी पुस्‍तक पढ़ रहा था, जो लगभग उसी प्रकृति की थी। हाँ उनमें प्राणि प्रजातियाँ जरूर न थीं, जिनके ऊपर महादेवी ने आत्‍मीयता से सराबोर होकर लिखा है। इन बिन ने मुझे छुआ न होता तो शायद न लिखता। इस बातचीत में मैं पहली बार उनसे मुखातिब था। उन्‍होंने पता नहीं मेरी आवाज पर टिप्‍पणी करते हुए कहा था कि ओमजी आप की आवाज बहुत अच्‍छी है। आपको इसका उपयोग करना चाहिए। मेरे यह कहने पर कि मैं तो बैंक के प्रबंधक हूँ, वहाँ तो इसकी कोई गुंजाइश है नहीं सिवाय कुछ रुटीन कार्यक्रमों के या कभी-कभी किसी साहित्‍यिक गोष्‍ठी के संचालन आदि के। बात आई-गई हो गई। वे समीक्षा की भाषा से प्रसन्‍न थीं। शायद उस पुस्‍तक पर यह मेरी पहली समीक्षा थी। उन्‍होंने कहा भी कि कभी मेरे घर आइए। पर मेरा जाना नहीं हो सका। चितरंजन पार्क कुँवर नारायणजी के घर अकसर जाना होता था और कभी खयाल आता कि देखूँ, शायद पद्माजी से भेंट हो जाए, पर अकसर कुँवरजी के घर से देर से निकलना होता और बात वहीं स्‍थगित हो जाती।

दो साल पहले सूर्यबालाजी के उपन्‍यास ‘दूर देस को वासी-वेणु की डायरी’ पर इंदिरा गांधी कला केंद्र द्वारा आयोजित एक समीक्षा गोष्‍ठी में उनसे भेंट हुई थी, जिसमें सूर्यबालाजी ने मुंबई की अपनी पुरानी सहेली को इसके लिए याद किया तथा अपनी पुस्‍तक पर बोलने के लिए बुलवाया था। वे व्‍यस्‍त होते हुए भी सूर्यबालाजी के इस आयोजन में आईं। बोलीं और जोरदार शब्‍दों में सूर्यबालाजी की कथाकारिता पर अपनी बात रखी। मैं उनकी बगल ही बैठा था, सो अभिवादन के साथ जैसे मैंने दो चार वाक्‍य कहे, उन्‍हें मेरी आवाज फिर से याद हो आई। फिर कहा कि ओमजी, मैं फिर से यह बात कह रही हूँ, जबकि मैं आकाशवाणी से गए चालीस से जुड़ी हूँ। आपकी आवाज बहुत खनकदार है। एक अनकहा आकर्षण और अनुगूँज है। आज आप बोल रहे थे तो मैं ध्‍यान से सुन रही थी। आवाज का थ्रो बहुत मोहक है। खैर, फिर कहा, आइए कभी मेरे आवास पर। उन्‍हें कहीं जाना था, इसलिए उस दिन वे बीच में इजाजत लेकर उठ गईं अपनी कार्ड देकर। मैंने वादा किया कि इस बार जब भी कुँवरजी के घर के लिए निकलूँगा आपसे जरूर मिलूँगा, पर यह मिलना न हो सका। अब मेरी इन बातों का शायद कोई यकीन भी न करे और माने कि यह कोई सुनियोजित आत्‍मप्रशंसा जैसी है। पर है तो है।

बात ‘इन बिन’ की चल ही रही है तो दो-चार शब्‍द इस पर भी। वे कहती हैं,  गुजरे हुए वक्‍त में हैसियत वाले लोगों के घरों में काम करने वाले नौकर-चाकर पीढ़ी दर पीढ़ी अपने मालिकों के साथ रहते हुए उस घर के सदस्‍य जैसे हो जाते थे। बहुत से घरों में बुजुर्ग हो जाने पर ये नौकर घरेलू मामलों में सलाह भी देने लगते थे। इन रिश्‍तों के और भी बहुत से पहलू हैं, पर मैं तो सिर्फ यह जानती हूँ कि आज भी इनके बिना घर गृहस्‍थी के संसार से पार होना मुश्‍किल है।  अपने घर के जिस नौकर को पहले उन्‍होंने देखा-जाना, उसका नाम लभ्‍भू था। उसने पद्मा को बचपन में गोद में खिलाया था तथा कंधे पर बैठाकर सैर कराई थीं। जब वे बड़ी होकर जम्‍मू रेडियो पर समाचार वाचिका बनीं तो एक दिन उसने उन्‍हें देखकर उनकी माँ से पूछा, क्‍या यह वही अपनी पद्दो है। माँ बचपन में पद्मा को पद्दो ही कहा करती थीं। माँ ने कहा, हाँ तो उसने कहा कि इनका नाम तो रेडियो पर आता है। फिर नकल उतारता हुआ बोला,  हुन तुस डोगरी चा खबरां सुनो।  किस्‍सागोई में तो पद्मा को कोई मात नहीं दे सकता। बातें और बातों में बातें उनकी विशेषता थी। बात बनाने की कला में भी वे माहिर थीं। शायद किस्‍सागो होने की पहली शर्त ही यही है।

‘जम्‍मू जो कभी शहर था’ व उनकी अन्‍य कृतियाँ

वैसे तो उन्‍होंने कई उपन्‍यास लिखे हैं, पर जैसा कि ऊपर कहा है ‘जम्‍मू जो कभी शहर था’ लिखकर उन्‍होंने अपनी माटी का ऋण अदा किया है। पर यह जम्‍मू उनके मन की एक फाँस भी है, जो सदैव उनके भीतर चुभती रही। जम्‍मू में पैदा होकर जिस जम्‍मू को देखा। वहाँ की आबोहवा में पली बढ़ीं, वही जम्‍मू बाद में बहुत गंदा होता गया, इसका मलाल रहा उन्‍हें। दूसरी बात यह कि महाराजा हरिसिंह ने शेख अब्‍दुल्‍ला की सलाह पर किसी के भी यहाँ आ बसने पर रोक लगाई तो संभवत: इसलिए कि यहाँ भीड़ न होने पाए, पर वहीं यहाँ की बेटियाँ, जो बाहर ब्‍याही गईं, इस जमीन से बेगानी हो गईं और लड़कों को रियासतें मिलीं। यहाँ की न होकर भी इन लड़कों से ब्याह करनेवाली स्‍त्रियाँ यहाँ की बाशिंदा हो गईं। यह बात उन्‍हें सालती रही। इस उपन्‍यास के केंद्र में एक सुग्‍गी नाइन है, जिसके जरिए जम्‍मू के अतीत को देखा-पहचाना जा सकता है। ‘तेरी ही बात सुनाने आए’—किसी गजल का मतला सा लगता है। यह संग्रह उनकी डोगरी रुबाइयों का हिंदी में अनूदित संग्रह है, जिन्‍हें चौपदे कह सकते हैं या मुक्‍तक भी। इन रुबाइयों में पद्मा सचदेव का कवि मन गहरे अतल में गोते लगाता है, जिसमें आध्‍यात्‍मिक झलक भी पाई जा सकती है और लौकिक भी।

‘मैं कहती हूँ आँखिन देखी’ यात्रा-वृत्तांतों की पुस्‍तक है। कहना न होगा कि 79 के आस-पास वे धर्मवीर भारती के संपर्क में आईं और पद्मा सचदेव के गद्य लेखन की शुरुआत हुई। इसके पीछे भारती के मार्गदर्शन और प्रेरणा का खासा हाथ रहा है। वे इस बात को स्‍वीकार भी करती थीं। भारती परिवार के तो वे कितनी निकट थीं, यह बात उनके संस्‍मरण खुद बताते हैं। उन्‍होंने देश-विदेश बहुतेरी यात्राएँ की हैं तथा यह पुस्‍तक इन्‍हीं यात्रा वृत्तांतों का दुर्लभ दस्‍तावेज है। ‘भटको नहीं धनंजय’ अर्जुन पर केंद्रित उपन्‍यास है। यानी महाभारत आधारित कथा। पर उन्‍होंने यहाँ स्‍त्री होकर द्रौपदी की पीड़ा का भाष्‍य नहीं किया है। वह तो सर्वत्र कथा संसार की नायिका रही ही हैं, खुद महाभारत की भी, जिसके इर्द-गिर्द पूरा महाभारत का युद्ध लड़ा गया। पर यहाँ पीड़ा अर्जुन की है। अर्जुन जानते हैं कि द्रौपदी उनकी पत्‍नी होकर भी सभी भाइयों में बँटी हुई है। यह तो एक बाधा रही है कि एक पत्‍नी से पतिधर्म निभाने में सभी भाइयों को समस्‍या आती रही होगी, पर द्रौपदी से दूर जाने पर अर्जुन की क्‍या मनोभूमि रही है, इसे पद्मा सचदेव ने इस उपन्‍यास के केंद्र में रखा है। वे स्‍त्री होकर भी अपने को अर्जुन की त्रासदी में अंतर्भुक्‍त कर लिया; तब इस उपन्‍यास का जन्‍म हुआ।

‘अमराई’ उनके संस्‍मरणों का संग्रह है। बहुत आत्‍मीयता के साथ उन्‍होंने त्रिलोचन, केदारनाथ सिंह, इंदिरा गोस्‍वामी, कुर्रतुलऐन हैदर, प्रभाकर माचवे, शिवानी, मलिका पुखराज, यू.आर. अनंतमूर्ति, फारूख अब्‍दुल्‍ला, नामवर सिंह, धर्मवीर भारती, सुमित्रानंदन पंत व ललिता शास्‍त्री को याद किया है। त्रिलोचन उनके लिए रमता जोगी थे तो पंतजी मैके के कवि व ललिताजी एक उदास कजरी। इसी तरह बारहदरी यादों की बारहदरी है, जिसमें बारह आला शख्‍सियतों की यादों का खजाना है। इनमें अशोक वाजपेयी, अमीन सायानी, विष्‍णुकांत शास्‍त्री, लता मंगेशकर, गुलजार, कमलेश्‍वर, खुशवंत सिंह, फैज जैसे लोग शामिल हैं। त्रिलोचन के लिए लिखा है उन्‍होंने कि दाल का दूल्‍हा चला गया तो खुशवंत सिंह को सच्‍चे आचरण की मिसाल कहा है, कमलेश्‍वर के लिए हम जहाँ पहुँचे कामयाब आए, लिखा तो लता मंगेशकर को तेरी उपमा तोहे बन आव; गुलजार के लफ्जों में वे नमक का असर देखती हैं तो राजिंदर सिंह बेदी को वे लफ्जों का जादूगर लिखती हैं। एक तरह से कवि व उपन्‍यासकार होने के अलावा मुख्‍यत: संस्‍मरण के मामले में वे एक यादगार कोष थीं।

आज वे नहीं हैं। इस पार्थिव चोले से छिटककर वे दूर चली गई हैं, जहाँ से कोई लौटकर नहीं आता। पर ऐसे लोगों का कृतित्‍व हमारे बीच रह जाता है, जिसे हम समय-समय पर पढ़ते और याद करते हैं। पद्मा सचदेव अपनी कविताओं, कहानियों, उपन्‍यासों एवं संस्‍मरणों-साक्षात्‍कारों के लिए याद की जाएँगी, इसमें संदेह नहीं। उनकी जैसी विनम्रता व सादगी कम लेखकों में देखी जाती है और अब वह धीरे-धीरे दुर्लभ हो चली है। बड़े लोगों के संसर्ग में रहकर उन्‍होंने जाना था कि लेखकों की सादगी के क्‍या अर्थ होते हैं कि वह अपने पाठकों का नायक होता है।

जी-१/५०६ ए, उत्तम नगर

नई दिल्‍ली-११००५९

दूरभाष : ९८१००४२७७०

सितम्बर 2021

   IS ANK MEN

More

हमारे संकलन