हिंदी हूँ हिंद की

हिंदी हूँ हिंद की जान हूँ जान लो,

शान हूँ राष्ट्र की मान हूँ मान लो।

हक है जो हक मेरा हक मुझे चाहिए,

आप सह का दुलार अब मुझे चाहिए।

टुकड़ों में न बँटो बात यह मान लो,

हिंदी हूँ हिंद की...

क्यों नहीं समझ रहे तुम मेरे अल्फाज को,

मोड़ दो ओ हवा जो मेरे खिलाफ हो।

शान बढ़ेगी तुम्हारी मुझको पहचान लो,

हिंदी हूँ हिंद की...

मेरी नस-नस में समर्पण देख लो,

शब्द-शब्द को चुनो आकर्षण देख लो।

चाहे इतिहास लो चाहे वर्तमान लो,

हिंदी हूँ हिंद की...

अपने ही घर में क्यों होता अपमान है,

क्यों नहीं मिला मुझे जो मेरा सम्मान है।

दुख है जो दुख मुझे उसका समाधान लो,

हिंदी हूँ हिंद की...

एक मेरा वतन एक मेरी जमीं,

फिर भी मेरी आँखों में क्यों है आज तक नमी।

खुद ही कर लिया मैंने खुद का गुणगान लो,

हिंदी हूँ हिंद की जान हूँ जान लो।

ग्राम-ढैली, डाकघर-जलना,
प्रखंड-लमगड़ा, जिला-अल्मोड़ा (उत्तराखंड)

सितम्बर 2021

   IS ANK MEN

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