शहीद हेमू कालाणी

शहीद हेमू कालाणी

महाभारत काल से प्रारंभ करके सिंध के अंतिम हिंदू सम्राट् महाराजा दाहर तक, विभाजन पूर्व भारत के सिंध प्रांत का इतिहास शौर्य की ज्वलंत गाथा है। अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति के लिए सिंध ने प्रत्येक मोर्चे पर जुझारू संघर्ष किया। महात्मा गांधी सात बार सिंध गए। उनके प्रत्येक आह्वान की पूर्ति के लिए सिंधवासियों ने जेलों, गोलियों, कोड़ों और यातनाओं का सहर्ष वरण किया। सुभाषचंद्र बोस को हैदराबाद सिंध के धनपति के.ए.जी. चोटरमल ने आजाद हिंद फौज के संचालन के लिए करोड़ों रुपए भेंट किए थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, मुस्लिम लीग और सीमांत गांधी खान अब्दुल गफ्फार खान सक्रिय भूमिका निभा रहे थे। ‘स्वराज्य सेना’ का गठन करके क्रांति मार्ग का अनुसरण किया जा रहा था। नारायण वाधवाणी, परचो विद्यार्थी, ऐशी विद्यार्थी, हशू केवल रामाणी, सोभो ज्ञानचंदाणी के साथ हेमू कालाणी जैसे कम उम्र नवयुवक जान हथेली पर रखकर देश के लिए मर मिटने की तमन्ना से भरे हुए थे।

मुंबई के 9 अगस्त, 1942 के कांग्रेस महाधिवेशन में पारित ‘भारत छोड़ो’ प्रस्ताव की कार्यान्विति के लिए ‘करो या मरो’ (वस्तुतः अंग्रेजी में दिए गए नारे ‘Do or Die’ का हिंदी में अनुवाद ‘करेंगे या मरेंगे’ होना चाहिए था) के नारे के साथ समस्त भारत की तरह सिंध भी उद्वेलित था। गोपनीय सूत्रों से सिंध के क्रांतिकारियों को जानकारी मिली कि बलूचिस्तान में चल रहे उग्र आंदोलन को कुचलने के लिए 23 अक्तूबर, 1942 की रात को अंग्रेज सैनिकों, हथियारों व बारूद से भरी रेलगाड़ी सिंध के रोहिड़ी स्टेशन से रवाना होकर सखर शहर से गुजरती हुई बलूचिस्तान के क्वेटा नगर जाएगी। यह समाचार सुनकर ‘स्वराज सेना’ के सक्रिय सदस्य और लोकमान्य तिलक हाई स्कूल, सखर के 19 वर्षीय छात्र (जन्म 23 मार्च, 1923) हेमू कालाणी का खून खौल उठा। तुरंत योजना बनाई गई। हेमू कलाणी के नेतृत्व में नंद और किशन को रेलगाड़ी गिराने का दायित्व सौंपा गया।

निर्धारित समय पर तीनों नवयुवक एक सुनसान स्थल पर पहुँचे। थैली से निकालकर हेमू कालाणी ने रिंच और हथौड़े की सहायता से रेल की पटरियों की फिशप्लेटों को उखाड़ना शुरू कर दिया। अन्य दो साथी निगरानी कर रहे थे। रात की निस्तब्धता में हथौड़े से किए गए वार की आवाजें सुनकर आसपास गश्त लगाते हुए कुछ सिपाहियों का ध्यान उनकी ओर गया। वे तेजी से उनके ऊपर झपटे। नंद और किशन तो किसी तरह बच निकले मगर हेमू कालाणी उनकी गिरफ्त में आ गए। जेल में कोड़े बरसाकर और बर्फ की सिल्लियों पर लिटाकर हेमू कालाणी से उन दो साथियों के नाम जानने की भरसक कोशिश की गई, जो घटनास्थल से गायब हो गए थे। हर बार हेमू कालाणी का एक ही उत्तर होता, “हाँ, मेरे दो साथी थे—रिंच और हथौड़ा।”

सखर की मार्शल लॉ कोर्ट ने देशद्रोह के अपराध में, आयु मात्र 19 वर्ष कुछ माह होने के कारण हेमू कालाणी को आजन्म कारावास की सजा सुनाई। अनुमोदन के लिए निर्णय हैदराबाद (सिंध) स्थित सेना मुख्यालय के प्रमुख अधिकारी कर्नल रिचर्डसन के पास भेजा गया। ब्रिटिशराज का बड़ा और खतरनाक शत्रु करार देते हुए कर्नल रिचर्डसन ने हेमू कालाणी की आजन्म कारावास की सजा को फाँसी में बदल दिया। सिंध के सभी प्रमुख राजनैतिक व सामाजिक नेताओं सहित अनेक गण्यमान्य एवं प्रतिष्ठित व्यक्तियों के प्रयत्नों के बावजूद 21 जनवरी, 1943 को प्रातः 7 बजकर 55 मिनट पर हेमू कालाणी को फाँसी पर लटका दिया गया। फाँसी के तख्ते पर चढ़ने से पहले हेमू कालाणी ने गर्व से सीना चौड़ा करके ‘इनकलाब-जिंदाबाद’ और ‘भारत माता की जय’ के गगनभेदी नारे लगाते हुए अपने हाथों से फंदा इस तरह गले में डाला, मानो फूलों की माला पहन रहे हों। उस समय उनका वजन सात पौंड बढ़ गया था।

मात्र 19 वर्ष 10 माह से भी कम आयु में हँसते-हँसते भारत को आजाद कराने के लिए किया गया अमर शहीद हेमू कालाणी का आत्मोत्सर्ग समय के भाल पर चंदन-तिलक की भाँति सदैव सुशोभित रहेगा। संसद् परिसर में प्रतिमा के अतिरिक्त भारत सरकार ने उनकी स्मृति में डाक टिकट जारी किया है। अनेक स्थानों पर स्थापित प्रतिमाओं के अतिरिक्त हेमू कालाणी नगर, हेमू कालाणी चौक, जन्म दिवस, शहादत दिवस पर आयोजन आदि उस आदर, श्रद्धा और कृतज्ञता के परिचायक हैं, जो सिंधी समाज के साथ देश के सीने में आज भी धड़क रहे हैं।

डी-183, मालवीय नगर,
जयपुर-302017 (राज.)

दूरभाष : 9828400325

सितम्बर 2021

   IS ANK MEN

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