असमिया विवाह-गीतों में राम और कृष्ण

असमिया विवाह-गीतों में राम और कृष्ण

नवोदित लेखिका। १२ अक्तूबर, १९९६ को असम के गुवाहाटी में जन्म। दिल्ली विश्वविद्यालय दिल्ली से हिंदी भाषा में एम.ए.। पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित हो रही हैं।

मानव जीवन में संस्कारों का अत्यधिक महत्त्व है। ‘सम’ उपसर्ग पूर्वक ‘कृ’ धातु से ‘घञ’ प्रत्यय लग कर बना हुआ यह शब्द शुद्धि, परिष्कार, परिमार्जन जैसे अर्थ का वाचक है। जिन क्रिया-कलापों द्वारा मनुष्य का शरीर, मन और आत्मा परिष्कृत होकर सुंदर बन जाता है, वही संस्कार है। भारतीय संस्कृति में तीन प्रकार के संस्कार प्रमुख हैं—जन्म संस्कार, विवाह संस्कार और मृत्यु संस्कार। इन तीनों में से विवाह-संस्कार को सर्वोपरि माना जाता है।

संसार के सभी समाजों में अलग-अलग रीति-रिवाजों से विवाह संस्कार कराया जाता है और इनमें ध‌ार्मिक परंपरा निहित रहती है। भारतीय समाज में ऋग्वेद के समय से ही विवाह को एक संस्कार अर्थात् धार्मिक उत्तर दायित्व स्वीकार किया गया है। तैत्तिरीय संहिता कहती है—

“जायमानो ह वै ब्राह्म‍णस्त्रिभिऋणावा जायते ब्रह्मच” ब्रह्मचर्येण ऋषिभ्यो यज्ञेन देवेभ्यः प्रजया पितृभ्यः। एष वा अनृणो यः पुत्री यज्वा ब्रह्मचरिवासी।” (6/3/10/5)

भारतीय परंपरा में आठ प्रकार के विवाह संस्कारों का उल्लेख है। मनुसंहिता के अनुसार—

“चतुर्णामपि वर्णानां प्रेत्य चेह हिताहितान्।

अष्टाविमासमासेन स्‍त्रीविवाहन्निबोधन॥

बाह्यो दैवस्तथैबार्षः प्राजापत्यस्त थासुर।

गान्धर्वो राक्षसश्चैव पौशाचरचाष्टमोऽधमः॥”

(अध्याय 2, श्लोक-20, 21)

अर्थात् चारों वर्णों के इहलोक-परलोक दोनों में हित-अहित साधन करनेवाले आठ प्रकार के विवाहों को संक्षेप में कहूँगा। बाह्य, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, गांधर्व, आसुर, राक्षस और आठवाँ पैशाच सब में निकृष्ट है।

असम में प्राचीन काल से इन आठ प्रकार के विवाह का प्रचलन था। परंतु वर्तमान बाह्य पद्धति के विवाह का प्रचलन अधिक है। असम विभिन्न जाति, जनजाति, उप-जातियों का निवास-स्‍थान है। इन जनजाति-उपजातियों की अपनी-अपनी भाषा-संस्कृति है। उपासना पद्धति भी अलग-अलग है। इन सभी समाजों में अपनी-अपनी परंपरा के अनुसार विवाह संस्कार संपन्न होता है। असम के हिंदू समाज में विशेष रूप से ब्राह्य और गांधर्व विवाह का प्रचलन अधिक है। विवाह-कार्य में पंडित-पुरोहित के अलावा महिलाओं का योगदान अनिवार्य व महत्त्वपूर्ण है। विवाह के पूर्व संध्या से लेकर विदाई पर्व तक महिलाओं द्वारा विभिन्न प्रकार के गीत गाने की परंपरा प्राचीन काल से लेकर आज तक चलती आ रही है। भारतीय सनातन धर्म में तीन देवताओं का विशेष स्‍थान है। ये हैं—शिव, राम और कृष्‍ण। उनके अलावा देवी पार्वती, सीता, रुक्मिणी, राधा आदि का नाम भी आदर के साथ लिया जाता है।

असमिया विवाह गीतों में इन देवी-देवताओं का उल्लेख प्रचुर मात्रा में हुआ है। इनमें भी राम और कृष्‍ण का उल्लेख सबसे अधिक होता है। इन विवाह-गीतों में दूल्हे को राम, कृष्‍ण, शिव के रूप में संबोधित किया जाता है और दुलहन को सीता, रु‌क्मिणी, पार्वती के रूप में। असमिया विवाह के अलग-अलग कार्यक्रम और रीति-रिवाजों के लिए अलग-अलग विवाह-गीतों का प्रचलन है। सभी गीत मनोरंजक होने के साथ-साथ सामाजिक दृष्टि से भी प्रेरणादायक है।

विवाह के हफ्ते भर पहले से ही अलग-अलग कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। असम सहित पूर्वोत्तर भारत के लोगों का प्रमुख खाद्य है चावल। इसीलिए सभी धार्मिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों में चावल से बने सामग्री और पक्वान्नो का प्रयोग सर्वाधिक होता है। चावल से बने खाद्यों में भात, चिउरा, सांदह (भूना हुआ चावल का चूर्ण), पिठा, लड्डू आदि प्रमुख है। विवाह के तीन दिन, पाँच दिन या हफ्तेभर पहले दूल्हा-दुलहन के घर में ‘सांदह’ प्रस्तुत करने का रिवाज है। ये ‘सांदह’ श्राद्ध में देने के अलावा शादी के अंत में दूल्हा-दुलहन को खाने के लिए देकर व्रत तोड़ने दिया जाता है। ‘सांदह’ तैयार करने के कार्यक्रम को ‘यात्रासांदह’ कहा जाता है। इस कार्यक्रम में अलग-अलग विवाह-गीत गाए जाते हैं। इन गीतों में राम और कृष्‍ण का प्रयोग प्रचुर मात्रा में किया जाता है—

“जय जय जय परम मंगल ए ए

हाय मोर किष्‍ण ए ए

देवकी नंदन किष्‍ण ए ए

आजि नंदर घरे जय जय करे ए ए

अ आनंदरे सीमा नाई ए राम

देवकी नंदन कृष्‍ण ए ए

शास्‍त्रते उत्तम गीता भागवत ए ए

हाय मोर कृष्‍ण ए ए

अ धर्मते उत्तम नाम ऐ राम

देवकी नंदन किष्‍ण ए ए”

अर्थात् हे देवकी नंदन कृष्‍ण! सबका मंगल हो। आज दूल्हे के घर में आनंद की सीमा नहीं है। शास्‍त्र में उत्तम है गीता भागवत। धर्मों में उत्तम नाम है। हे देवकी नंदन कृष्‍ण! सबका कल्याण करो।

(मोर-मेरा, आजि-आज, नाई-नहीं)

“राम राजार भाखेरीरे ए ए

धानके अनिला।

जानि बुजि बापुर माके आखाके जुरिला”

अर्थात् दूल्हे की माँ भंडार-घर से धान ले आई और सांदह तैयार करने के लिए चूल्हा जलाया।

(भाखेरी-भंडार-घर, जानि-बुजि-जान-बूझकर, आखा-चूल्हा)

असमिया विवाह में विवाह के पूर्व संध्या दूल्हे के परिवार के लोग दुलहन के लिए कपड़े, गहने सहित अनेक सामग्रियाँ दुलहन के घर ले जाते हैं। इसे ‘जोरोण दीया’ कहते हैं। ‘जोरोण’ के समय गाए जानेवाले गीतों में राम और कृष्‍ण ही प्रमुख हैं—

“ओलाइ आहा रामर मातृ रजार मादै

रजार मादै

शुभक्षणें यात्रा करि जोरोण दियो गै।

जोरोण दियोगै।”

अर्थात् दशरथ राजा की रानी और राम की माँ (दूल्हे की माता) बाहर आ जाओ। शुभ मुहूर्त में ‘जोरोण’ देने के लिए यात्रा शुरू करो।

(मादै-रानी, ओलाइ आहा-बाहर आओ)

“पाटर साजे विंधि ओलाला देवकी

ऐ राम लगत किनो वस्तु ललाहे।

शुभक्षणे यात्रा करि

ऐ राम जोरोण पिन्‍धाओ बलाहे।”

अर्थात् रेशमी वस्‍त्र पहनकर देवकी (दूल्हे की माँ) तैयार हो गई। औरतें पूछती है दुलहन को देने के लिए क्या-क्या लाई हो? चलो, शुभ मुहूर्त में जाकर दुलहन को ‘जोरोण’ पहनाते हैं।

(पाटर-रेशमी, साज-कपड़ा, विन्धि-पहनकर, लगत-साथ)

“जनकर घरे आजि पठाव जोरण

पठाव जोरण

जनक रजार घरे आछे सीता महासती

सीता महासती।

सर्व अलंकार पठाय राम रघुपति

राम रघुपति।

अर्थात् राजा जनक के घर (दुलहन के घर) आज ‘जोरोण’ भेजेंगे। वहाँ महासती सीता है। राम अपनी दुलहन के लिए ढेर सारे आभूषण भेजे हैं।

(पाठव-भेजना, आजि-आज)

निछले आसाम में ‘जोरोण’ को ‘तेलर भार दीया’ कहा जाता है। असम के इस प्रांत की भाषा थोड़ी अलग है।

“जाइकि पाबा ऐ रुकुनीर पद्रुलि

ऐ राम, ताते तेलोर भार थबाहे

रुकुनी सुधिवो कार तेलोर भार

ऐ राम, कवा द्वारकार पार। दिया बुलि है।”

अर्थात् रुक्मिणी के घर पहुँचकर सामान रख देना। रुक्मिणी पूछेगी तो बोल देना, द्वारका से उनके लिए सामान भेजे गए हैं।

(जाइकि-पहुँचकर, पद्रुलि-आँगन)

शादी के दिन दूल्हा-दुलहन को स्नान करवाने के लिए मिट्टी के घट में पास ही के नदी या जलाशय से औरतें पानी लेने जाती हैं। जाते-जाते औरतें विभिन्न प्रकार के विवाह-गीत गाती हैं। इस प्रकार के गीतों को ‘पानी तोला गीत’ कहा जाता है—

“ओलाइ आहा शशी प्रभा

रजार महा दै

शुभक्षणे यात्रा करि

पानी आवो गै

ओलाइ आहा नंदरानी

किय ऐतबेलि

सेवा करि तुलि लोवा

धरमर टेकेलि”

अर्थात् दूल्हे की माँ! बाहर आ जाओ। शुभ मुहूर्त में पानी लाने के लिए यात्रा करते हैं। नंदरानी (दूल्हे की माँ) जल्दी करो। सेवा करके धर्म का कलश उठा लो।

(ऐतबेलि-इतनी देर, तुलि लोवा-उठा लो, टेकेलि-कलश)

विवाह के दिन सुबह पूर्वपुरुष के लिए श्रद्ध-कर्म किया जाता है। इस अवसर पर माताएँ और बहनें मिलकर गाते हैं—

“राम राम जनके बहिछे

राम राम श्राद्ध करिवाके

राम राम रामलै सजाइछे पिरा हे।”‍

अर्थात् दुलहन के पिता श्राद्ध करने के लिए बैठे हैं और दूल्हे के लिए आसन सजाकर रखा है।

(बहिछे-बैठना, पिरा-आसन)

विवाह के दिन संध्या काल में दूल्हा और दुलहन को अपने-अपने निवास में केले के पौधे के नीचे स्नान करवाया जाता है। इस कार्यक्रम में जो गीत गाए जाते हैं, वे इस प्रकार के हैं—

“ओलाइ आहा रामचंद्र

ऐ शशी माटिल मंगल चाइ।

गणवे गणना करे

ऐ शशी द्रुवार दलिर बाजे

धरते धुवाव माये

ऐ शशी नकरिवा लाजे।”

अर्थात् रामचंद्र (दूल्हा) शुभ मुहूर्त देखकर आ जाओ। एक-एक क्षण बीतती जा रही है। द्वार पार कर आ जाओ। घर में ही तुम्हारी माँ स्नान करवाएगी तो शरमाओ मत।

(लाज-शर्म, धुवाव-स्नान)

दुलहन के घर में दूल्हे का स्वागत कर इस प्रकार के विवाह-गीत गाए जाते हैं—

“ओलाइ आह। जनक रजा

हाते चोवर धरि

राम आहि रै आछे

नियाहि आदरि।”

अर्थात् दुलहन के पिता हाथ में पंखा लेकर आ जाओ। दूल्हा राह देख रहा है। अतः उनका सम्मान के साथ स्वागत करो।

(चोवर-पंखा, रै-राह देखना, आरि-स्वागत)

विवाह मंडप में दुलहन की सखियाँ गाती हैं—

“राम आहि पाले अजि

मिथिला रजाइ वार्ता पाले

आहे रघुवर।”

दुलहन के पिता को सूचना मिल गई है कि दूल्हा-दुलहन के घर पहुँच गया है। फेरे के समय भी दूल्हा-दुलहन के घर की औरतें मिलकर तरह-तरह के विवाह गीत गाती हैं—

“अ हे रघुवर जनके पातिछे सीतारे सयबर अ

होम पता यज्ञ पाता अ

नापाता विघिनी अ रघुबर...”

अर्थात् हे राम! जनक राजा ने सीता का स्वयंवर आयोजित किया है। यज्ञ करो, हवन करो। विघ्न मत डालो।

(विघिनी-विघ्न)

“फूलर माला हाते लै अ

अ जानकी सुंदरी अ जानकी बरिब रामक अ

पिन्‍धाना रामक माला अ

अ कृतांजलि करि अ जानकी”

अर्थात् फूलों का हार रामचंद्र को पहनाकर जानकी सुंदरी हाथ जोड़कर सेवा करती है।

दुलहन की विदाई अत्यंत भावुक मुहूर्त होता है। माता-पिता जब अपनी लाडली बेटी को विदाई देते हैं, तब उनके दिल की व्यथा को घर की औरतें अत्यंत मार्मिक स्वर में व्यक्त करते हैं—

“सीता कि अ सीता जनकर दुहिता

पितृ गृह एरि जाबलै ओलाला

सीता कि अ किहत दुखे पाला

किहत कष्ट पाला पितृगृह एरि

जाबलै ओलाला।”

अर्थात् हे जनक की बेटी सीता। पिता का घर छोड़कर जाने को तैयार हो गई। अपने पिता के घर में किस चीज की कमी रह गई थी कि तुम इसे छोड़कर जा रही हो।

(एरि-छोड़कर, जाबलै-जाने को)

“मरमर आइ, दुवार धरि विदाइ ‌दिया

सीता अयोध्यालै जाय।

चावि काठि चमजालो देउता विदाइ मागिलो

मा ओलाइ चोवाहि तोमार कन्या ओलाइ जाय।”

प्यारी माँ, तुम्हारी बेटी ससुराल जा रही है। उसे विदा करो। पिता, घर की चाबी तुम्हारे हाथ में देकर विदा हो रही हूँ। माँ, बाहर आकर देख लो, तुम्हारी कन्या जा रही है।

(आइ-माँ, देउता-पिता)

दूल्हे के घर में दुलहन के स्वागत में औरतें गाती हैं—

“कृष्‍ण आहि पाले आजि रुक्मिणीक लै

आदराहि दैवकीये मने रंग कै।

रुक्मिणीक लै कृष्‍ण द्वारकालै आहे।

द्वारकात बेरि बेरि चाय प्रजासवे।”

अर्थात् कृष्‍ण रुक्मिणी को लेकर द्वारका पहुँच गए हैं। हर्षित देवकी स्वागत के लिए तैयार हो गई। द्वारका की समस्त प्रजा कृष्‍ण और रुक्मिणी को घूर-घूरकर देख रहे हैं।

असमिया लोक-गीतों में विवाह-गीत अत्यंत लोकप्रिय है। ये गीत सालों से असमिया समाज में प्रचलित रहे हैं। विवाह-गीतों की संख्या इनती अधिक है कि एक लेख में समेटना गागर में सागर भरने जैसा है। मौखिक रूप से समाज में प्रचलित विवाह-गीतों को वर्तमान पुस्तक का रूप देकर संरक्षण किया जा रहा है। विवाह में जितनी रिवाजें होती हैं, सबके लिए औरतों के पास गीत मौजूद होते हैं। विवाह-गीत असमिया लोक-संस्कृति और लोक-साहित्य का वैभव है।

साहित्य-संस्कृति का मूलाधार है लोक-साहित्य और लोक-संस्कृति। उनकी अनेक विधाएँ हैं। विवाह के गीत लोक-साहित्य यानी लोक-गीतों की प्रमुख विधा है। हमारे देश के सभी प्रांतों की सभी जाति, उपजाति, जनजातियों में इस प्रकार के गीतों का भंडार है। इन सबका हमारे राष्ट्र-भाषा हिंदी के माध्यम से आदान-प्रदान की व्यवस्‍था होनी चाहिए। इससे राष्ट्रीय स्तर पर सांस्कृतिक और भावात्मक एकता सुदृढ़ हो सकती है।

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