आओ, यूरोप चलें!

आओ, यूरोप चलें!

सुप्रसिद्ध लेखक। अब तक पंद्रह ग्रंथ एवं ४०० शोध-लेख प्रकाशित। आकाशवाणी, दूरदर्शन पर तीस वात्ताएँ, साक्षात्कार। नेशनल रिसर्च कॉन्फ्रेंस में ४०० शोध-पत्र तथा अंतरराष्ट्रीय सेमिनारों में ५० शोध-पत्र वाचन। अनेक अकादमिक संस्थानों के सदस्य, अधिकारी। छोटे-बड़े अनेक पुरस्कार-सम्मान प्राप्त। संप्रति हिंदी विभागाध्यक्ष, उपाधि महाविद्यालय, पीलीभीत (उ.प्र.) एवं संस्कार भारती एवं अ.भा.सा. परिषद् के प्रांतीय अधिकारी।

मन में कई वर्षों से यूरोप जाने की इच्छा मचल रही थी। अचानक मेरे आत्मीय अग्रज और देश के समर्पित हिंदी साहित्यकार प्रो. महेश दिवाकर (मुरादाबाद) ने बताया, इस वर्ष हम लोग यूरोप के चार देशों का भ्रमण कार्यक्रम तथा आस्ट्रिया में अंतरराष्‍ट्रीय शोध संगोष्ठी की योजना बना रहे हैं। मन नाच उठा। वर्षों की अभिलाषा पूरी होती दिखने लगी। आस्ट्रिया, जर्मनी, बेल्जियम तथा नीदरलैंड (हॉलैंड) का १०-२० जून, २०१९ का कार्यक्रम तय हुआ। तत्काल ही नियत राश‌ि जमा करा दी। अब शुरू हुई सेनेगन वीजा के कागज जुटाने की तैयारी। अपने कॉलेज का अनुभव प्रमाण-पत्र, अवकाश स्वीकृति प्रमाण-पत्र, तीन माह का वेतन प्रमाण-पत्र, गत तीन वर्षों का आयकर विवरण छह महीनों का बैंक स्टेटमेंट आदि-आदि सब यत्नपूर्वक जुटाया। बीजा के प्रोसेस हेतु पहले निर्धारित कंपनी वी.एफ.एस. जाना पड़ता है। इसके कार्यालय देश में मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, दिल्ली में हैं। जो यात्री जिस क्षेत्रीय कार्यालय के निकट रहता है, उसे वहीं के कार्यालय जाना पड़ता है। हमारे निकट दिल्ली है, अतः हमें दिल्ली जाना पड़ा। १७ मई, २०१९ को जाने की डेट मिली, वहाँ हमारे सारे फार्म, प्रपत्र, पासपोर्ट, फोटो जमा होते हैं। फिंगर प्रिंट भी लिए जाते हैं। इसकी निर्धारित फीस ६१०० रुपए भी जमा कराए गए। जो लोग बीजा मिल जाने पर अपना पासपोर्ट से स्वयं ले जाते हैं, उन्हें कोई कॉरियर शुल्क नहीं देना पड़ता है। जो लोग पासपोर्ट कॉरियर से मँगाते हैं, उन्हें ४०० रुपए अतिरिक्त देना पड़ता है। दूतावास वाले लगभग १५ कार्यदिवस का समय माँगते हैं। कभी-कभी वीजा १० दिन में भी मिल जाता है। धीरे-धीरे उत्सुकता और उत्कंठा के बीच यात्रा की तिथि भी निकट आ गई। हमारी फ्लाइट ९ जून की रात्रि १ बजे थी। तकनीकी रूप से यह १० जून मानी जाती है। ९ जून को प्रातः ६ बजे पीलीभीत से प्रस्थान किया। गृहस्वामिनी डॉ. प्रणीताजी ने स्वादिष्ट पूरी-आलू बना दिए। ८:३० बजे बरेली से ए.सी. डबलडेकर एक्सप्रेस से दोपहर १ बजे आनंद विहार पहुँचा। तदनंतर दिलशाद गार्डन चाचाजी डॉ. रमाकांत भारद्वाजजी के घर गया। मेरा पासपोर्ट कॉरियर से उन्हीं के घर आया था। चाचीजी ने सुमधुर भोजन कराया। दो घंटे गप्प-गोष्‍ठी चली। फिर नई दिल्ली से एयरपोर्ट वाली मेट्रो पकड़कर टी-३ पहुँचा। इस सांस्कृतिक दल में पूरे देश से ४० सहचर साहित्यकार जा रहे हैं। ८ नं. गेट के निकट विश्राम कक्ष में सभी लोग बड़ी आत्मीयता से मिले। हमारे टूर एजेंट अनमोल ट्रैवल्स मुरादाबाद के स्वामी श्री विवेक अग्रवालजी भी साथ जा रहे हैं। यह एक मिलनसार तथा कुशल प्रबंधक हैं। रात्रि भोजन की थाली भी इन्होंने मँगवा ली थीं। मैंने भोजन नहीं किया। लंबी फ्लाइट में कम खाना सदैव बेहतर रहता है। रात्रि १० बजे चैक-इन कराया। इससे पूर्व यात्रार्थ कुछ यूरो खरीदे। एयरपोर्ट पर इस प्रकार की मुद्रा हमेशा ४, ५ रुपए महँगी मिलती है। यदि बाहर से खरीद ली जाए तो कुछ आर्थिक लाभ हो सकता है। ठीक रात्रि १ : ०० पर एयरोफ्लोट के विमान से रवाना हुए। यह ८ घंटे की फ्लाइट है, जो पहले हमें मॉस्को ले जाएगी। वहाँ से २ घंटे बाद एयरोफ्लोट की ही दूसरी फ्लाइट हमें आस्ट्रिया की राजधानी वियना ले जाएगी। भारत के समय में तथा मॉस्को के समय में ३:३० घंटे का अंतर है। शाकाहारी भोजन तथा ड्रिंक द्वारा दोनों विमानों में स्वागत किया गया। हम लोग १० जून को ११:३० बजे प्रातः वियना एयरपोर्ट पर उतरे। यहाँ के और भारतीय समय में ४:३० घंटे का अंतर है। हमारे ग्रुप की साथी डॉ. सविता चड्ढा तथा उनके पति का बैग, सामानवाली बैल्ट पर नहीं आया। उसकी शिकायत दर्ज कराने पर दूसरे दिन वह बैग होटल में ही एयरपोर्ट के कर्मचारियों द्वारा भिजवाया गया। एयरपोर्ट से शानदार बस द्वारा हम लोग होटल कॉर्टिना पहुँच गए। रास्ते में ही बस रोककर नम-नम रेस्टोरेंट से लंच पैक करा लिया गया। होटल बहुत बड़ा तो नहीं है, पर फोरस्टार श्रेणी का है। कमरे बहुत साफ-सुथरे तथा सुंदर हैं। सभी लोगों ने स्नानादि से निवृत्त होकर लंच किया। मेरे पास श्रीमतीजी द्वारा बनाई हुई पूड़ी थीं। मैंने पूड़ी तथा पनीर की सब्जी का आनंद लिया। सभी ने ३ घंटे विश्राम किया। सायं ६ बजे हम लोग रात्रि भोजन के लिए बॉम्बे रेस्टोरेंट गए। हम लोग आनंदित ओर चकित थे कि यूरोप में अरहर की दाल, मिक्स वेज, रायता, पापड़, चावल, रोटी, सहजता से मिल रही है। अब यूरोप में भारतीय भोजन की कोई कमी नहीं रहती। भारत के कई लोगों ने सुंदर रेस्टोरेंट खोल रखे हैं। यूरोप एक व्यवस्थित, समृद्ध, संपन्न, सुंदर विकसित देश है। २७ देशों का यह एक अनुशासित कॉण्टीनेंट है। किसी एक देश का वीजा मिल जाने पर आप पूरे यूरोप में जा सकते हैं। यह सेनेगन वीजा कहलाता है। आज ११ जून को प्रातः ८ बजे होटल में ही सूक्ष्म जलपान किया। कई प्रकार के जूस, ब्रेड, फल, दूध, चाय, कॉफी, कॉर्नफ्लैक्स यहाँ परोसे गए। ९ बजे हम सभी शानदार बस से सिटी टूर के लिए निकल गए। नियत स्थान पर हमें गाइड किस्ट्रीना बर्गर मिलीं। उन्होंने सारे दर्शनीय स्थलों का ३ घंटे में व्याख्या सहित, इतिहास बता-बताकर घुमाया। आस्ट्रिया नें २३ जिले हैं। यह आकार में बहुत छोटे-छोटे हैं। यूरोप की एक प्रमुख नदी ‘डेन्यू’ वियना, में बहती है। इसका जल बड़ा निर्मल है। म्यूजियम, यूनिवर्सिटी ऑफ वियना, रॉयल पैलेस देखा। वियना को ‘कैपिटल ऑफ म्यूजिक’ भी कहते हैं। यहाँ पूरे वर्ष बड़े-बडे मोजार्ट होते रहते हैं। कई ओपेरा हाउस बने हुए हैं। यहाँ के निवासी बड़े शांत, स्वच्छता पसंद तथा अनुशासित हैं। घूमते-घूमते दल के कई साथियों को टॉयलेट जाना पड़ा। पता चला कि यहाँ तो टॉयलेट के प्रयोग करने के भी ६० सेंट देने पड़ेंगे। ५० रुपए की बात सुनकर कुछ साथी गए, कुछ ने विचार ही त्याग दिया। एक कठिनाई और आई, हमारे पास ५० यूरो का नोट था पर चाहिए थे ६० सेंट। हमारी सहायता वहाँ के एक सहयोगी निवासी ने की। उसने अपने पास से खुले पैसे दे दिए। हमने उसे धन्यवाद दिया। यहाँ का प्रमुख व्यापारिक केंद्र है—सिटी सेंटर। ऊँचे-ऊँचे सज्जित भवन देखकर अच्छा लगा। यहाँ यू. एन. ओ. का एक केंद्र भी है। नदी के तट पर कुछ क्रूज भी खड़े थे। नदियों में स्नान की परंपरा यहाँ न के बराबर है। पूरे शहर में धूल तथा गंदगी का नामोनिशान नहीं है। विदेश में आने पर हमारे भारतीय साथी भी सफाई के विशेष ध्यान रख रहे हैं। काश यह स्वच्छता-बोध भारत पहुँचने पर भी बना रहे। लंच नम-नम रेस्टोरेंट में किया। विशुद्ध भारतीय भोजन मिला। भोजन के पश्‍चात २ घंटे होटल में विश्राम किया। सायं ५ बजे नदी के तट पर गए। वियना में समुद्र तो नहीं है, पर नदी के तटों को ही रेत आदि डालकर बीच का लुक दे दिया गया है। १ घंटे नदी तट का आनंद लिया। रात्रि भोज टेस्ट ऑफ इंडिया में किया। रात्रि में हम ग्रुप के ११ लोग एक म्यूजिक कंसर्ट देखने गए। इसका टिकिट ४५ यूरो था। जिस प्रकार का आर्केस्ट्रा फिल्मों में देखा था उसे? साक्षात् देखकर आनंद आया। लगभग ४० संगीत कलाकार प्यानो, बाँसुरी, ड्रम आदि बड़े सुर, लय-ताल में बजाते हैं। बीच-बीच में कुछ संक्षिप्त नृत्य प्रस्तुतियाँ भी चलती रहीं। कुल मिलाकर एक नया अनुभव लेकर होटल लौटे आज १२ जून है। यहाँ से होटल चैक आउट करके हमें आस्ट्रिया के दूसरे शहर साल्सबर्ग जाना है। सूक्ष्म जलपान करके ९ बजे प्रातः हम लोग साल्सबर्ग के लिए प्रस्थान कर गए। होटल छोड़ते समय पता चला कि दो कमरे के कार्पेट गीले हो जाने पर साथियों पर ५०-५० यूरो का फाइन लग गया। बहुत आग्रह करने के बाद भी फाइन देकर ही छूटे। वियना से साल्सवर्ग का रास्ता लगभग २०० किमी. का है। सड़क के दोनों ओर सलीके से की गई खेती, ऑल्टस पर्वतमाला का मनोहारी नजारा निहारते-निहारते कब साल्सबर्ग आ गया, पता ही नहीं चला। रास्ते में बड़ी मनोहर झील भी मिली। पहुँचकर हंस रसोई में स्वादिष्‍ट भोजन किया। भोजनोपरांत ३ बजे गाइड एलिजाबेथ आ गई। वे हम समी को एक सुंदर बगीचा घुमाते हुए एक विशाल और विराट् चर्च ले गईं। १२ यूरो देकर हम सभी एक अत्यंत ऊँचाई पर ट्रेन से गए। वहाँ से पूरे नगर का विहंगम दृव्य देखकर मन झूम गया। साल्सवर्ग में नदी का एक पुल है। वहाँ के निवासियों की यह मान्यता है कि इस पुल के दोनों ओर बनी जाली की दीवार पर प्रेमी/प्रेमिका या पति/पत्नी यदि ताला लगाकर चाबी नदी में फेंक देंगे तो उनका प्यार अमर रहेगा। हमने भी देखा, पुल के दोनों ओर सैकडों ताले लटके हुए थे। रात्रि भोजन महाराजा होटल में किया। रात्रि विश्राम हेतु हम सभी एरिना सिटी होटल आ गए। रात्रि शयन किया। आज १३ जून है। आज ही अंतरराष्‍ट्रीय साहित्य कला मंच तथा यूनिवर्सिटी ऑफ साल्सबर्ग के संयुक्त तत्त्वावधान में एक अंतरराष्‍ट्रीय शोध संगोष्‍ठी आयोजित की जानी है। प्रो. महेश दिवाकरजी ने बड़े यत्नपूर्वक इस आयोजन की रचना की है। संगोष्‍ठी का उद्घाटन बड़ी भव्यता से संपन्न हुआ। साल्सवर्ग यूनिवर्सिटी के प्रो. किम, प्रो. डेनियल, भारत से डॉ. रवींद्र भारती, डॉ. चंद्रकांता सिंहल, प्रो. महेश दिवाकरजी मंच पर विराजे। मुख्य अतिथि के रूप में पधारे डॉ. रवींद्र भारती ने हिंदी के वैश्‍विक विस्तार को लेकर अपनी आश्‍वस्ति प्रकट की। डॉ. चंद्रकांता सिंहल (चंदौसी) ने बताया कि हम हिंदी प्रेमियों को निराश होने की आवश्‍यकता नहीं है, आज विश्व के १५० विश्‍वविद्यालयों में हिंदी का अध्ययन तथा अध्यापन हो रहा है।

इस सत्र का सरस संचालन दिल्ली से पधारी श्रीमती सीमा सूरी ने किया। दोपहर भोजन के उपरांत संगोष्‍ठी का प्रथम पर्व आरंभ हुआ। इसमें डॉ. सुरेश कानडे (नासिक) डॉ. विजय संदेश (झारखंड) डॉ. पी.के. अग्रवाल (लखनऊ) डॉ. मीरा सिंह (मुंबई) डॉ. मोहिनी चतुर्वेदी (दिल्ली) डॉ. ऋतु बोहरा (दिल्ली), डॉ. एस.के. शर्मा (बरेली) आदि ने प्र्रपत्र वाचन किया। इसका संचालन मैंने तथा अध्यक्षता कोलकाता से पधारे डॉ. बाबूलाल शर्मा ने की। हम सभी प्रतिभागियों ने मुक्त कंठ से अंतरराष्‍ट्रीय साहित्य कला मंच के अध्यक्ष प्रो. महेश दिवाकरजी के प्रबंध कौशल की सराहना की तथा देशर-देशांतर में हिंदी के उत्थान के लिए किए जा रहे मंच के प्रयासों का स्वागत किया। संगोष्‍ठी की समाप्ति के पश्‍चात हम लोग सायं ५ बजे आस्ट्रिया के ही एक दूसरे नगर इन्सबर्ग के लिए निकल पड़े। ३ घंटे की बस-यात्रा पूरी करके इन्सबर्ग के क्रोनेन होटल में पहुँचे। यह बड़ा शानदार होटल है। इस नगर का भौगोलिक परिवेश काफी कुछ स्विट्जरलैंड के ज्यूरिख जैसा है। ठंड और स्वच्छता नैनीताल जैसी प्रतीत हुई। भोजनोपरांत टहलने भी गए। एक विषेश बात देखी यहाँ रात्रि १० बजे सूर्यास्त होता है तथा प्रातः ३ बजे ही सूर्योदय हो जाता है। आज १४ जून है। हम लोग प्रातः नाश्‍ता करने के बाद सोरोस्की म्यूजियम देखने गए। यह एक प्रकार की धातु है जो हीरे के समान मूल्यवान है। इसके आजकल खूब आभूषण बनाए जाने लगे हैं। पहले इस म्यूजियम में आभूषणों का कलात्मक प्रेजेंटेशन देखा, फिर विक्रय के लिए रखे गए आभूषणों को देखा, समझा, परखा। कुछ मित्रों ने खरीदे भी। तदनंतर रामा रेस्टोरेंट में भोजन किया। लगभग ४ घंटे की बस यात्रा करके हम सभी जर्मनी के शहर म्यूनिख पहुँचे। यहाँ २ घंटे का गाइडेड सिटी टूर किया। टाउन हाल देखा, उसी में बैठकर हिटलर ने बड़े कठोर और कड़े निर्णय लिये थे। सिटी सेंटर की चहल-पहल देखी। एक रेस्टोरेंट देखा। गाइड ने बताया कि इसमे पूरे दिन में दस हजार लीटर वीयर की खपत होती है। यूरोप में पानी से बीयर सस्ती है। रात ९:३० पर हम लोग म्यूनिख के निकट एक नगर डकाउ के होटल सेंट्रल में पहुँच गए। रास्ते में सुहाग रेस्टोरेंट से डिनर पैक करा लिया। यहाँ से स्विट्जरलैंड का नगर ज्यूरिख ३ घंटे की दूरी पर है। कुछ साथियों के साथ मेरा मन भी मचला, पर जाना संभव नहीं हो पाया। आज १५ जून है। हम समी प्रातः नाश्‍ता करके म्यूनिख से फ्रेंकफर्ट प्रस्थान करेंगे। रास्ते में म्यूनिख में कुछ प्राचीन इमारतों को देखते हुए हम लोग फ्रेंकफर्ट पहुँच गए। दोपहर ४ बजे फ्रेंकफर्ट के पंजाबी ढाबा रेस्टोरेंट पर पहुँचकर भोजन किया फिर २ घंटे गाइड ने सिटी सेंटर, चर्च, मेन नदी का तट दिखाया।

फ्रेंकफर्ट तीन विशेषताओं के कारण विश्व भर में जाना जाता है। प्रथम यहाँ बैंक बहुत हैं। द्वितीय विश्व प्रसिद्ध एलियांस इंश्‍योरेंस कंपनी यहाँ की है। तृतीय यह विश्व का तीसरा सबसे बड़ा एयरपोर्ट जंक्‍शन है। नगर में स्वच्छता तो देखते ही बनती है। चौड़ी-चौड़ी सड़कें गगनचुंबी इमारतें आदि प्रशंसनीय हैं। आज वर्षा ने हमारा स्वागत भी किया आज १६ जून है। हम लोग जर्मनी के ही दूसरे नगर कोलोन घूमने जा रहे हैं। यह एक प्राचीन नगर है। इसके बाद हम लोग दोपहर भोजन के पश्‍चात बेल्जियम के नगर ब्रुसेल्स पहुँचे। यहाँ हमारा होटल इकोटेल था। एक अटपटी बात देखी। इन देशों में हमारी तरह घूमने आए अथवा यहाँ नौकरी कर रहे भारतीय यदि कहीं मार्ग में दिख जाते हैं तो उनके चेहरे पर भारतीयों को देखकर कोई भाव प्रकट नहीं होते। आप आगे बढ़कर यदि नमस्ते कर भी लें तो भी बड़े अनमने मन से उत्तर देते हैं। पर यूरोपियन हमेशा आपसे मुसकराकर ही मिलते हैं। आज १७ जून है। आज नाश्‍ते के बाद हम लोग बेल्जियम के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल ब्रग्स गए। यह ब्रसेल्स से १०० किमी. दूर है। यहाँ प्रसिद्ध कैथोलिक चर्च, मार्केट घूमे। बेल्जियम, चॉकलेट, बीयर तथा अपने विश्वविद्यालयों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ की कैथोलिक यूनिवर्सिटी पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। नेपाल रेस्टोरेंट में दोपहर का भोजन करने के बाद हम लोग ब्रसेल्स लौट आए। यहाँ दो घंटे गाइड ने चर्च, सिटी सेंटर, मार्केट घुमाया। रात्रि ९ बजे होटल लौटे। हमारे ग्रुप के साथ एक दुःखद घटना भी घटी, हमारे ग्रुप के लोग होटल अन्नपूर्णा में भोजन करके होटल के बाहर टहल रहे थे। दिल्ली के सुभाष चड्ढाजी के पास एक पुरुष और स्त्री आए। हिंदी में बोले, कहा हम लंबे समय के बाद भारत जा रहे हैं। कृपया हमें भारतीय नए नोट दिखा दीजिए। सहज भाव से चड्ढाजी ने अपनी जेब में रखे भारतीय नोट दिखा दिए। फिर लड़का बोला, यदि डॉलर हों तो वह भी दिखा दें। उनके पास काफी डॉलर थे। उन्होंने १०० डॉलर का नोट दिखा दिया। जाने किस कला से उसने उनके हाथों में दबे हुए ११०० डॉलर खींचकर अपनी साथी महिला को पकड़ा दिए और वह चलती बनी। यह घटना बरेली के श्‍यामलाल कनौजिया के साथ भी उसी समय घटी। उनके भी २७५ डॉलर उसने उड़ा लिए। यह घटना बस में लौटने पर हम सभी ने सुनी तो दंग रह गए। विदेश में यदा-कदा इस प्रकार की घटनाएँ घट जाती हैं। घूमते समय अपना पासपोर्ट सदैव कमरे में ही छोड़कर जाना चाहिए। पासपोर्ट की छायाप्रति, होटल का विजिटिंग कार्ड और उस देश की कुछ मुद्रा अपनी जेब में अवश्‍य रखनी चाहिए। आज १८ जून है। नाश्‍ते के बाद प्रातः ८:३० पर हम सभी मेड्रोडम होते हुए शाम को एम्सटर्डम (नीदरलैंड) पहुँचेंगे। यह यूरोप का अति सुंदर देश है। फूलों की खेती तथा विश्व में फूलों के निर्यात के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ समुद्र का किनारा भी बड़ा स्वच्छ एवं मनोरम है। यह यूरोप का एक औद्योगिक तथा अत्यंत प्राचीन नगर है। सर्च करने पर पता चला कि यहाँ इस्कॉन तथा ‌शिव मंदिर भी है। दोपहर का भोजन बॉम्बे पैलेस में किया। तदंतर ‘लवर्स कैनाल क्रूज’ से घूमे। नहरों का एक सुंदर जाल पूरे नगर में बिखरा हुआ है। हमारे देश को भी जल-पर्यटन की प्रेरणा यहाँ से लेनी चाहिए। रात्रि भोजन रंगोली रेस्टोरेंट में किया। यहाँ हमारा निवास होटल अपोलो में है। यह एम्सटर्डम शहर से ३० किमी. दूर समुद्र के तट पर बना हुआ है। पहले तो बस से, होटल की दूरी को लेकर सभी लोग किच-किच करने लगे, पर होटल का व्यू देखकर सभी लोग झूम उठे। सी-फेसिंग कमरे, बालकनी देखकर दूरी का अहसास जाता रहा। शाम को होटल में चैक-इन करके सभी लोग समुद्र तट पर टहलने गए। बड़ा सुहाना मंजर था। रात्रि १० बजे तट से लौटे, तब तक खूब उजाला था। यहाँ अँधेरा होता है रात्रि ११ बजे तथा उजाला हो जाता है प्रातः ४ बजे। आज १९ जून है। प्रातः नाश्‍ते के बाद हम लोग नगर भ्रमण को गए। चौड़ी-चौड़ी सड़कें, नहरों का सुंदर मायाजाल, एक जैसे भवन, परिचय के बिना भी नजरें मिल जाने पर मुसकराते लोग, एक ही सड़क पर ट्राम, टैक्सी, कार, बस का अनुशासित रूप में चलना, इन सभी से अधिक संख्या में साइकिल चलाते बालक, युवा, वृद्ध, इक्का-दुक्का कुत्तों की डोरी पकड़े लोग, यह सारा दृश्‍य मोहित करनेवाला था। पूरे दिन की इस यात्रा में एक बार भी हमने किसी कार, ट्रक, बस का हॉर्न नहीं सुना। इन १० दिनों में एक देश से दूसरे देश जाते हुए हम लोग लगभग २,००० किमी. चले होंगे, पर यहाँ के हाइवे इतने शानदार है कि सफर का अहसास ही नहीं होता। यहाँ के ट्रकों के ड्राइवर केबिन भी वातानुकूलित होते हैं, यह देखकर अच्छा लगा। मोतीमहल रेस्टोरेंट में दोपहर भोजन किया। फिर सभी ४ घंटे शॉपिंग के लिए गए। हम भारतीय शॉपिंग के प्रति इतने दीवाने क्यों हो जाते हैं? यह मैं आज तक समझ ही नहीं पाया, कुछ शॉपिंग प्रेमियों ने तो इतनी खरीदारी कर ली कि उनको सामान को रखने के लिए उन्हें नए बैग खरीदने पड़े। रात्रि विश्राम होटल में हुआ। आज रवानगी का दिन है। २० जून को हमें यूरोप को अलविदा कहना है। मॉस्को होते हुए हमारी दोपहर १:३० पर फ्लाइट है। आज २० जून को हमने प्रातः ८ बजे अपोलो होटल से चैक-आउट किया। ९ बजे एम्सटर्डम एयरपोर्ट पहुँचे। हमारी फ्लाइट १:१५ पर थी। वापसी में बोर्डिंग पास लेते समय एक चूक हो गई। हमारे संयोजक प्रो. महेश दिवाकरजी के पुत्र डॉ. मयंक पँवार की अटैची बिना टैग लगे ही सामानवाली बैल्ट पर चली गई। काउंटर पर बैठी हुई लड़की से कहा भी, पर उसने अनसुना कर दिया। हम लोगों ने कंपलैंट दर्ज तो कराई, पर कुछ हुआ नहीं। दिल्ली पहुँचकर पुनः कंपलैंट की। बताया गया कि लगभग ८ दिन में आपकी अटैची, यदि मिल गई तो हम उसे आपके स्थायी पते पर मुरादाबाद ही भेज देंगे। यह एक बड़ी दिक्कत विदेश यात्रा में यदा-कदा हो जाती है। इसी प्रकार दिल्ली से आस्ट्रिया पहुँचने पर पता चला कि हमारी सहयात्री डॉ. सविता चड्ढा (दिल्ली) के दो बैग वियना पहुँचे ही नहीं। हम सब उनके बैग के चक्कर में १ घंटे एयरपोर्ट पर ही ठहरे रहे। फिर शिकायत दर्ज कराई। दो दिन बाद यह दोनों बैग होटल कार्टिना (वियना) में पहुँचे। इन दो दिनों में बिना बैग के सविताजी को बड़ी परेशानी का सामना करना पड़ा। पुनः यही घटना हुई। दो दिन बाद हमारे ग्रुप में दिल्ली से पहुँची मोहिनी चतुर्वेदीजी तथा उनकी बेटी जागृति के दो बैग साल्जबर्ग (आस्ट्रिया) नहीं पहुँचे। एक बैग दूसरे दिन होटल में पहुँचा। दूसरा दिल्ली लौटने तक हाथ नहीं आया। इस प्रकार की घटनाओं से यात्री को तो संकट का सामना करना ही पड़ता है, एयरलाइन की भी साख खराब होती है। यूरोप यात्रा के बाद हम सभी ने महसूस किया कि पूरा यूरोप अपने-अपने स्वास्थ्य तथा पर्यावरण के प्रति बड़ा सचेत है। यहाँ के निवासी बिना किसी शर्म, संकोच के साइकिल का भरपूर प्रयोग करते हैं। इससे खुद का तो स्वास्थ्य-संतुलन बना ही रहता है, पर्यावरण भी निर्मल रहता है। भारत के निवासियों को इससे जरूर शिक्षा लेनी चाहिए। मैं भी जल्दी ही यूरोप से प्रेरणा लेकर एक साइकिल खरीद रहा हूँ। यहाँ एक और नई बात देखी। जिन लोगों को घुमक्कड़ी करने का विशेष शौक है, वे लोग एक कार-वैन को अपने हिसाब से डिजाइन करवा लेते हैं। उसमें स्लीपिंग रूम, टॉयलेट, ड्राईंग रूम आदि सारी सुविधाएँ होती हैं। इसे कभी-कभी कार के पीछे जोड़कर चलाया जाता है, तो कभी-कभी परिचालन की सुविधा हेतु इसी में ड्राइवर-कैबिन भी होता है। इसे जहाँ चाहे रोककर विश्राम कीजिए। होटल के खर्चे से बचने का यह एक अच्छा उपाय लगा मुझे। जिन चार देशों में हमने भ्रमण किया उनमें तथा शायद सारे यूरोप में ही जल-पर्यटन तथा परिवहन पर विशेष जोर दिया गया है। इन देशों ने अपनी नदियों, तथा नहरों का जाल पूरे नगर में बिछा रखा है। कई प्रकार की नौकाएँ, छोटे स्टीमर, क्रूज हर नहर, नदी में विचरते दिखाई दिए। जहाँ समुद्र है वहाँ तो बड़े-बड़े मालवाहक तथा यात्रीवाहक पानी के जहाज, क्रूज भी खूब चलते हैं। पूरे यूरोप में सरकार की ओर से अपने-अपने निवासियों को सामाजिक-सुरक्षा का कवच पहनाया गया है। यदि आप बेरोजगार हैं, तो आपको फ्री मकान तथा जीवन-यापनार्थ एक हजार यूरो की सरकारी मदद दी जाती है। यदि आपका विजनेस नहीं चल रहा है तो आपको पंद्रह सौ यूरो की मासिक सरकारी सहायता दी जाएगी। यह सारी सरकारी इमदाद पूँजीपतियों, दुकानदारों, व्यापारियों से टैक्स के रूप में प्राप्त राशि में से प्रदान की जाती है। नगर में एकरूपता दिखाई देती रहे, इसके पालनार्थ घरों के बाहर की पुताई एक जैसी करानी पड़ती है। घर के अंदर भी निर्माण कार्य बिना उचित सरकारी परमीशन के आप नहीं करा सकते। एक अच्छी बात, अब पूरे यूरोप में भारतीय भोजनालय बहुलता में खुल गए हैं। इनके संचालक, वर्कर, कुक, वेटर सभी या तो भारतीय हैं, अथवा नेपाली बांग्लादेशी या सूरीनामी। सभी होटल में पहुँचने पर अच्छी हिंदी से आपका स्वागत करते हैं। इनके नाम भी, टेस्ट ऑफ इंडिया, रंगोली, ताजमहल, नम नम, बॉम्बे रेस्टोरेंट, हंस रसोई, महाराजा, रामा, सुहाग, ज्वैल ऑफ इंडिया, गार्डन ऑफ पंजाब, नेपाल किचिन, अन्नपूर्णा, हवेली आदि हैं। उत्तम भारतीय स्वाद का भोजन अब यहाँ अलभ्य नहीं रहा। नगरों में शाम को बीयर की महफिलें जमती हैं। शनिवार-रविवार को यहाँ के निवासी मौज-मस्ती के मूड में होते हैं। लोग बड़े सहयोगी हैं। एक दिन हमारी एक सहयात्री को माइग्रेन की दवा खरीदनी थी। हम लोग एक मेडिकल शॉप पर पहुँचे, तो पता चला आज सनडे के कारण बंद है। पास ही एक सज्जन से पूछा तो वे उस दुकान पर गए। बाहर एक छोटी स्क्रीन लगी थी, उस पर उन्होंने देखकर कि इस दुकान के निकटस्थ अन्य दूसरी मेडिकल शॉप कहाँ है, कितनी दूर है? यह व्यवस्था हमें नई और अच्छी लगी। यूरोपियन भले ही आपसे अपरिचित हों, पर आपके उनकी ओर देखने पर वे मुसकराएँगे अवश्‍य। होटलों में नियम बड़े सख्त हैं। कालीन के गीला हो जाने पर वे तगड़ी पैनाल्टी वसूलते हैं। हाँ, पूरे यूरोप में आप कहीं भी सार्वजनिक नल से, होटल में वॉशबेसिन की टोंटी से पानी पी सकते हैं। यह पूरी तरह फिल्टर्ड तथा कीटाणु मुक्त होता है।

कुल मिलाकर हमारी यूरोप यात्रा प्रभु कृपा से निर्विघ्न तथा सानंद संपन्न हुई। सभी चालीस यात्रियों का सहभाग, स्वभाव तथा सद्भाव स्मरणीय रहेगा। कुछ नए मित्र बने, जिनमें प्रो. सुरेश कानडे, मुरादाबाद के डॉ. मयंक पँवार, दिल्ली से सीमा सूरी, ऋतु बोहरा, जालंधर से डॉ. सुनीता शर्मा आदि। संयोजक तथा प्रख्यात हिंदी सेवी डॉ. महेश दिवाकरजी का संयोजन त्रुटि मुक्त, आत्मीय, स्नेहिल, सुचिंतित, सुविचारित, अनुकरणीय लगा। अनमोल ट्रैवल्स, मुरादाबाद के स्वामी श्री विवेक अग्रवालजी के सारे प्रबंध भी मुग्ध करनेवाले थे। ईश्‍वर इसी प्रकार की कृपा बनाए रखे, जिससे हिंदी की सेवा में हम सभी कुछ चरण चल सकें तथा हिंदी का मस्तक ऊँचा कर सकें।

कल्पतरु, ए-३०, वसुंधरा कॉलोनी

पीलीभीत-२६२००१ (उ.प्र.)

दूरभाष : ९८३७९६०५३०

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