साहित्य की खटपट

साहित्य की खटपट

सुपरिचित व्यंग्यकार। अब तक चौदह व्यंग्य-संग्रह, एक उपन्यास ‘समय का सच’ एवं बाल साहित्य की करीब बीस पुस्तकों का प्रकाशन। ‘कन्हैयालाल सहल पुरस्कार’ के साथ-साथ अनेक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत-सम्मानित।

साहित्य में मेरे योगदान का मूल्यांकन अभी कोई आलोचक नहीं कर पाया है और मैं इस मामले में दूसरे के भरोसे रहना भी नहीं चाहता। दूसरे लोगों को मैंने अब अच्छी तरह पहचान भी लिया है। वे मेरे घर में जब तक चाय-नाश्ता उड़ाते हैं, तब तक तो साहित्य में मेरा अस्तित्व स्वीकारते हैं और मेरे यहाँ से विदा होते ही मेरी मजाक बनाते हैं तथा मेरे योगदान के बारे में कोई जिक्र तक नहीं करते। इसलिए मैंने तय किया है कि अपने कार्य का मूलयांकन मुझे खुद करना होगा। इतना लिख लिया है तो आकलन तो होना चाहिए ही। वैसे मुझे पता है कि मैं कितने पानी में हूँ। जो लोग मेरा मजाक बनाते हैं, मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि वे छिछले पानी में खड़े हैं और उनके पाँव अभी साहित्य में पूरी तरह भीगे भी नहीं हैं। मैं यहाँ उनकी आलोचना नहीं कर रहा, लेकिन अपना कद आँकने के लिए मुझे किसी से तो अपनी तुलना करनी ही होगी। इसलिए थोड़ा सा पत्र-वाचन विरोधियों पर हो जाए तो यह मेरे योगदान के लिए प्रासंगिक है।

अब खटपटजी को ही लें, वे व्यंग्य क्या लिखते हैं, मेरी समझ में उनकी विसंगति और उस पर किया गया प्रहार आज तक समझ में नहीं आया। लेकिन वे आए दिन अपने लेखन-कर्म को लेकर मुझसे खटपट करते रहते हैं। मैंने एक दिन उनसे कहा भी—“भाई खटपटजी, आप जो अपना एकालाप करते हो, उसमें पाठक की समझ को गौण कैसे कर देते हो? जिसके लिए रचना लिखी जा रही है, उसकी रुचि और पाठन का तो ध्यान आपको रखना चाहिए।” इस पर खटपटजी नाराजी के स्वर में बोले, “देखो शर्मा, व्यंग्य तुम्हारी समझ से परे है, मैं मानता हूँ, व्यंग्य तुम भी लिखते हो, परंतु वे मेरी समझ में नहीं आते। जहाँ तक मेरे व्यंग्य लेखन का प्रश्न है, क्या संपादक को पागल कुत्ते ने काटा है, जो वह मेरे व्यंग्य लगातार प्रकाशित कर अपने पत्र में छापते हैं?”

मैंने कहा, “आपने ठीक कहा, संपादक को पागल कुत्ते ने नहीं काटा है, लेकिन अब वे भी करें क्या, व्यंग्य का कॉलम चलाना है तो व्यंग्य के नाम पर आप जो लिख रहे हैं, वह पाठकों को परोस देते हैं। जिम्मेदारी तो आप की बड़ी है कि आप व्यंग्य लेखन के प्रति संजीदा नहीं हैं। व्यंग्य लेखन को आपने अखबार की खबर बना रखा है, जिसे लिखकर आप व्यंग्य का तोष प्राप्त कर रहे हैं। इस तरह तो आपका मूल्यांकन व्यंग्य विधा में कहाँ होगा, यह आप स्वयं आसानी से समझ सकते हैं। जहाँ तक मेरी रचनाओं का प्रश्न है, मैं उन पत्रों को प्रकाशनार्थ देता नहीं, जिन्हें आप देते हैं। मैंने अपना आभामंडल, माफ करना, राष्ट्रीय स्तर पर विकसित कर लिया है। इसलिए यदि मेरा व्यंग्य-लेखन रेखांकित होता है तो मैं इसका हकदार हूँ।”

खटपटजी अब की बार तैश में आ गए, बोले, “अमां यार शर्मा, अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनना तो कोई तुमसे सीखे—दस मिनट से बक-बक किए जा रहे हो, अपनी ही कहोगे या मेरी भी सुनोगे?”

“तुम्हारी सुनने के लिए तो मैं इतनी बक-बक की है। तुम भी कहो अपनी राम कहानी?” मैंने कहा तो वे लगभग चीखकर बोले, “तुम्हारा अभी एक व्यंग्य वसंत पर छपा है। ध्यान से सुनो, वसंत पर व्यंग्य लिखना गुजरे जमाने की बात हो गई और एक तुम हो कि वसंत पर हर वर्ष व्यंग्य लिखकर अपनी रचना छपवा लेते हो। मेरा मतलब तुम्हारे पास विषयों की विविधता नहीं है। वह तो संपादक को वसंत पंचमी पर लेख छापना होता है, इसलिए वह तुम्हारा वसंत छाप देता है। तुमने कभी देश के हालात पर नजर डाली है। मेरा मतलब चारों तरफ भ्रष्टाचार का हाहाकार मचा हुआ है। भ्रष्टाचार कह रहा है कि मुझ पर लिखो, परंतु तुमने तो वसंत का आॅथेंटिक राइटर होने का ठेका सा ले लिया है। वसंत पर भी लिखते हो तो पहले वसंत को जानो तो सही भाई। उसमें कितना लालित्य है। इस समय वसंत की माली हालत क्या है? पहले जो वसंत पर लिखकर चले गए, उन्हें पढ़ो तो जानोगे कि वसंत होता क्या है। मेरे विचार से वसंत पर निबंध हो सकता है, व्यंग्य तो किसी कोण से बनता ही नहीं। तुम अपनी वसंत रचना के ऊपर हर बार व्यंग्य लिख देते हो। इसलिए तुम्हारा मूल्यांकन संदिग्ध है। मुझे पता है तुम्हारे भीतर स्थापित होने की कितनी छटपटाहट है। भाई, आराम से लेटकर एक दिन सोचो तो सही कि तुमने साहित्य को आखिर दिया क्या है? मेरा मतलब तुम्हारे योगदान से ही है।”

“अब तुम भी सुन लो मेरी बात। मैं झटपटजी की तरह नहीं हूँ, जो दिनभर में तेरह रचनाएँ लिखकर डाक के लाल डिब्बे के हवाले प्रतिदिन कर देते हैं। पता है, उन्हें लिखने की इतनी जल्दी है कि उन्होंने कभी आकलन ही नहीं किया कि तेरह में से तीन रचनाएँ भी नहीं छपती। मैं झटपटजी की तरह नहीं हूँ, जो बिना सोचे-समझे लिखे चले जा रहे हैं, जहाँ तक खटपटजी आपका व्यंग्य-लेखन है, वह भी झटपटजी की श्रेणी का ही है। वह इसलिए कि आपने भी कभी ठहरकर नहीं सोचा कि आपने वसंत पर एक भी रचना क्यों नहीं लिखी? क्या आप वसंत पर लिख नहीं सकते या वसंत से ज्यादा आपको वोल्कर समिति की रिपोर्ट प्यारी है। वोल्कर में तीन चौथाई लेखन तो अखबार सुलभ करवा देते हैं, बाकी दस पंक्तियाँ आप अपनी पिद्दी टिप्पणी के साथ चेप देते हैं। मैंने वसंत को जिया है। मैंने उससे बात की है, इसलिए मैं वसंत का आॅथेंटिक राइटर भी हूँ। इसलिए आपकी तुलना में मेरा साहित्य श्रेष्ठ ठहराया जा सकता है। नई पीढ़ी में परसाई के बाद मेरा नाम ले रहे हैं, अब आपने यह नहीं सुना तो इसमें मेरा क्या दोष है?” मैंने कहा।

इस बार खटपटजी आग बबूला होकर बोले, “शर्मा थोड़ी गैरत रखो। परसाईजी को अपने साथ जोड़कर इतना छोटा मत करो कि लोग परसाई के लेखन को तुम्हारे कारण पढ़ना छोड़ दें। परसाई का नाम ही सुना है या उसे पढ़ा भी है?” उनके प्रतिप्रश्न के उत्तर में मैंने कहा, “क्या परसाईजी ने वसंत पर नहीं लिखा और जब लिखा है तो मैंने वसंत पर लिखकर साहित्य का क्या अनर्थ कर दिया?”

“परसाईजी ने वसंत को पहले भोगा है और बाद में अपनी कलम उठाई है। तुमने वसंत की मादकता को देखा, न पहचाना और लिख मारा वासंती व्यंग्य। तुमने अपना मूल्यांकन खुद ही किया है और अपना कद रोज एक इंच बढ़ा लिया है, ऐसी स्थिति में क्या किया जा सकता है। डॉ. विकट खोपड़ा ने तुम्हारे व्यंग्य पर एक भी पंक्ति लिखी हो तो बताओ। इधर साहित्य शिरोमणि दादा बटुकनाथ ने भी कभी तुम्हारा जिक्र तक नहीं किया है तो तुमने अपने को साहित्य के दरिया में कमर तक कैसे भिगो लिया है? थोड़ा खयाल करो और देखो—दूसरे लोग तुम्हारे बारे में क्या सोचते हैं?”

“मुझे पता है, दूसरे लोग क्या सोचते हैं। आप सोच रहे हैं मेरे बारे में। मैंने अपना मूल्यांकन खुद किया है और अपने आप को साहित्य की मुख्यधारा में पाया है। मैं आपके भरोसे नहीं हूँ। मैं व्यंग्य में स्थापित हो चुका हूँ, आप कर लीजिए जो कुछ करना है वह।” मेरे इस दंभी चीत्कार के सामने उनका सिंहासन एक पल हिला और क्रोधाग्नि में जलते हुए झटपटजी के घर की ओर दौड़ लिए। आप भी सुधी पाठक हैं, स्वयं तय कर लें कि खटपटजी और झटपटजी के सामने मेरा लेखन कहाँ ठहरता है! साहित्य की खटपट यही है।

124/61-62, अग्रवाल फार्म,
मानसरोवर, जयपुर-302020 (राज.)

दूरभाष : 9828024500

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